'भूमिहार ब्राह्मण' जाति को सरकारी दस्तावेजों में सिर्फ 'भूमिहार' दर्ज करना 'ओबीसी राजनीति' का षड्यंत्र नहीं तो क्या है?
(If registering the 'Bhumihar Brahmin' caste as just 'Bhumihar' in government documents is not a 'conspiracy' of 'OBC politics' then what is it?)
भूमिहार ब्राह्मण' जाति को सरकारी दस्तावेजों में सिर्फ 'भूमिहार' दर्ज करना 'ओबीसी राजनीति' का षड्यंत्र नहीं तो क्या है? बिहार के जाति विशेष के लोग जानना चाहते हैं। बताइए नहीं तो लालू प्रसाद की तरह सत्ता से बेदखल होने का इंतजार कीजिए। प्रशांत किशोर आपकी रिक्तता की पूर्ति के लिए तैयार है, पर्दे के पीछे से, जैसी की चर्चा है। समझिए विस्तार से.....
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
बिहार में भूमिहार ब्राह्मण' जाति को सरकारी दस्तावेजों में सिर्फ 'भूमिहार' दर्ज करना 'ओबीसी राजनीति' का 'षड्यंत्र' नहीं तो क्या है? यह सवाल इसलिए कि किसी भी राजसत्ता की प्रकृति और उसके कर्ता-धर्ता व अन्य सिपहसालारों का चरित्र ही षड्यंत्रकारी/शरारती होता है, कुछेक अपवादों को छोड़कर। बिहार में जाति विशेष के साथ यही हो रहा है। ऐसा इसलिए कि राजसत्ता जनित षड्यंत्र के शिकार तो
अमूमन राजा-मंत्री-सामंत-जनप्रतिनिधि लोग भी हो जाते थे, हैं और रहेंगे।
यह कौन नहीं जानता कि हमलोग जिस रामराज्य की परिकल्पना करते नहीं अघाते या धर्मराज युद्धिष्ठिर के विचार साम्राज्य की मीमांसा करते नहीं थकते, उस दौर में भी पारिवारिक विवाद के चलते मर्यादा पुरुषोत्तम राम को सपत्नीक किन धर्मसंकटों से गुजरना पड़ा, और खुद धर्मराज युद्धिष्ठिर को गोतियारी विवाद के चलते किन-किन दूभर परिस्थितियों को झेलना पड़ा, वह और भी दारुण दुःखदायी होता यदि पवनपुत्र हनुमान जैसा अनुचर श्रीराम को और सोलह कलाओं में निपुण श्रीकृष्णजैसा मार्गदर्शक युद्धिष्ठिर/अर्जुन को नहीं मिलता। अन्य दृष्टान्तों से भी सनातन धर्मग्रंथ/साहित्य भरे पड़े हैं।
भारत में मनुस्मृति के चार वर्णों (कार्य विभाजन आधारित ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र वाली वर्ण व्यवस्था) से सामंतों, राजाओं, जनप्रतिनिधियों ने कुछ स्वार्थवश, और कुछ परमार्थवश कितनी जातियां, गोत्र, मूल, और वंश गढ़ लिए, उन्हें सत्ताहित के साधन बनाये, अतीत से वर्तमान तक स्वस्थ बहस का विषय है। हालांकि, महाराष्ट्र से निकले आरक्षण वाले दृष्टिकोण और अंग्रेजों द्वारा आरक्षण को स्थायी प्रशासनिक आधार देने, दिलवाने के बाद तो जात-पात रूपी आग धड़कने लगी। एससी-एसटी वर्ग में जाने को ओबीसी लालायित दिखे तो ओबीसी वर्ग में जाने को सवर्ण लालायित हुए। राजनीतिक अदूरदर्शिता ने आरक्षण की आग में घी डालने का काम किया और रेवड़ियां वोट बैंक के लिहाज से बांटी जाने लगी।
इस विवादास्पद मुद्दे पर स्वस्थ बहस नहीं हो, इसलिए संविधान की नौंवी अनुसूची का उपयोग राजनीतिक हथियार के तौर पर किया गया। वहीं सामाजिक संस्कार च्युत 'मांसभक्षी' ब्राह्मण, 'सुरापान' करने वाले कथित ब्राह्मण, 'परस्त्रीगमन' करने वाले तथाकथित ब्राह्मण से उपजे वर्णसंकर लोग 'दोगलवा सांप' की तरह मनुष्य, देश व समाज के लिए ही खतरनाक साबित हो रहे हैं। कुछ यही हाल क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों यानी सेवकों के वर्णों का भी है। संवैधानिक अंतरजातीय विवाह और अंतर्धार्मिक विवाह से उपजे वर्णसंकर भी आततायी प्रवृत्ति वाले ही होते हैं, ऐसा कुछेक सनातन साहित्य में चर्चा भी है।
सच कहूं तो इस दुःखदायी स्थिति-परिस्थिति के लिए दोषी विभिन्न कालखंड के राजा, महाराजा, सामंत या उनके मंत्रीगण, सिपहसालार या नौकरशाही से जुड़े अधिकारी वर्ग ही जिम्मेदार रहे हैं, जिन्होंने क्षणिक स्वार्थपूर्ति की लिप्सा में नीतिगत घालमेल करके देश-प्रांत-समाज को गहरी क्षति पहुंचाई है। फिलहाल बिहार की 'भूमिहार ब्राह्मण जाति' के साथ सदियों से यही होता आया है। मगध में यही बाभन बोले जाते हैं। मिथिलांचल में मैथिल भूमिहार ब्राह्मण मिलते हैं।
कोढ़ में खाज यह कि कभी बिहार की सरकारी जात समझी जाने वाली भूमिहार ब्राह्मण जाति को सिर्फ भूमिहार ठहराकर ब्राह्मणों से तोड़ने का जो सियासी/प्रशासनिक षड्यंत्र चल रहा है, वह अनायास नहीं बल्कि गहरे राजनीतिक प्रशासनिक षड्यंत्रों का द्योतक है। सवाल है कि यह सिर्फ एक ही जाति को लेकर क्यों हो रहा है? और क्या अपने ही दस्तावेज के विपरीत जाने का हक किसी सरकार को है, न्यायिक समीक्षा का विषय है। क्योंकि ओबीसी मुख्यमंत्रियों के इशारे पर नाच रही नौकरशाही, और खामोशी बरत रहे दिग्गज भूमिहार नेताओं की हरकतों से प्रतीत हो रहा है कि यहां इतिहास खुद को दोहरा रहा है। इसलिए इसकी न्यायिक समीक्षा यदि करवाई जाए तो बेहतर होगा। क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद, पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी और उनके चेलों ने जो उलटबांसी की है, करवाई है, यह विवाद इसी का नतीजा है। इनके दुधारी चेहरों में फंसने वाले भूमिहार ब्राह्मण राजनेता, नौकरशाह, पत्रकार, न्यायविद, उद्योगपति आदि सभी जिम्मेदार हैं, और उचित वक्त पर समाज सबको सबक सिखाएगा, वह खुद ही इतना सक्षम था, है और रहेगा!
मैंने उपलब्ध सरकारी RTPS/ServicePlus रिकॉर्ड और हाल की विधानसभा/सरकारी पक्ष से संबंधित रिपोर्टों को मिलाकर देखा तो पता चला कि सोशल मीडिया पर चल रहे दावे में कुछ बातें तथ्यात्मक रूप से पुष्ट होती हैं, लेकिन निष्कर्ष अभी उपलब्ध सार्वजनिक प्रमाणों से सीधे सिद्ध नहीं होता। लिहाजा निष्पक्ष तथ्य-जांच यह है कि विवाद वास्तविक है। बिहार के सरकारी दस्तावेजों में वर्तमान में जाति प्रमाण-पत्र की व्यवस्था में “भूमिहार” नाम इस्तेमाल हो रहा है। बिहार सरकार के RTPS पोर्टल पर सामान्य प्रशासन विभाग के अंतर्गत जाति प्रमाण-पत्र जारी करने की सेवा उपलब्ध है।
जबकि पुराने सरकारी अभिलेखों में “भूमिहार ब्राह्मण” होने का दावा भी वास्तविक विवाद का हिस्सा है। जुलाई 2026 में बिहार विधानसभा में भाजपा विधायक जीवेश मिश्रा ने 1931 की जनगणना, पुराने राजस्व अभिलेखों और अन्य सरकारी दस्तावेजों का हवाला देकर कहा कि उनमें “भूमिहार ब्राह्मण” लिखा हुआ है, जबकि वर्तमान जाति सूची/प्रमाण-पत्रों में “भूमिहार” है। सवाल है कि कहीं इसमें पुरानी जमीनें हड़पने की साजिश तो नहीं? नाम में या जन्मतिथि में थोड़े परिवर्तन से जब सरकारी कार्य रुक जाते हैं, तो यहां तो पूरी जाति ही बदली हुई दिखेगी!
आपको बता दें कि सामान्य प्रशासन विभाग ने इस विषय पर पहले विचार-विमर्श किया था। रिपोर्टों के अनुसार 10 अक्टूबर 2025 को सामान्य प्रशासन विभाग ने उच्च जाति आयोग से यह राय मांगी थी कि सरकारी कागजातों में “भूमिहार” लिखा जाए या “भूमिहार ब्राह्मण”। आयोग में इस विषय पर बैठकें भी हुईं। वहीं, 23 जून 2026 के पत्र का उल्लेख भी कई स्वतंत्र रिपोर्टों में मिलता है। विधानसभा में दिए गए विवरण के अनुसार 23 जून 2026 को सामान्य प्रशासन विभाग ने इस विषय को सरकार के स्तर पर विचाराधीन बताया था। इसलिए आपकी जानकारी के लिए इस पूर्व पत्राचार का उल्लेख करना तथ्यात्मक रूप से उचित प्रतीत होता है।
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि सरकार का वर्तमान आधिकारिक रुख “भूमिहार ब्राह्मण” के पक्ष में नहीं है।
24 जुलाई 2026 को विधानसभा में सामान्य प्रशासन विभाग के मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव ने कहा कि सरकार सरकारी रिकॉर्ड में “भूमिहार” ही रखेगी। उनके अनुसार उच्च जाति आयोग के वर्गीकरण में ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार और कायस्थ अलग-अलग जातियां हैं और आयोग ने “भूमिहार” का नाम बदलकर “भूमिहार ब्राह्मण” करने की अनुशंसा नहीं की। चूंकि बिहार में यादवों और भूमिहारों की वैमनस्यता लालू काल से ही बढ़ी हुई है, इसलिए किसी यादव मंत्री से यह अपेक्षा करना बेमानी है, वो भी पूर्व मुख्यमंत्रीगण लालू प्रसाद, नीतीश कुमार के सियासी चेलों से!
इस पूरे मामले का सबसे संवेदनशील बिंदु यह है कि
यदि परिषद के पास पुराने मूल सरकारी अभिलेख, खतियान, राजस्व रिकॉर्ड, गजट, जनगणना दस्तावेज आदि हैं, जिनमें लगातार “भूमिहार ब्राह्मण” दर्ज है, और बाद में किसी सरकारी प्रक्रिया में उन्हें बदलकर केवल “भूमिहार” किया गया, तो दस्तावेजी विसंगति की जांच की मांग पूरी तरह जायज है। लेकिन किसी पुराने रिकॉर्ड में “भूमिहार ब्राह्मण” लिखा होना अपने-आप यह साबित नहीं करता कि बाद में “भूमिहार” लिखना गलत है। बल्कि इसके लिए यह साबित करना होगा कि किस मूल रिकॉर्ड में क्या लिखा था; वह रिकॉर्ड किस विभाग ने कब बनाया; बाद में किस आदेश/अधिसूचना से नाम बदला; बदलाव किस अधिकारी/प्राधिकरण ने किया; क्या उस बदलाव का वैधानिक आधार था; क्या मूल दस्तावेज में जानबूझकर काट-छांट/हेरफेर हुई; और क्या इससे नागरिकों के कानूनी अधिकार वास्तव में प्रभावित हुए। इसलिए “दस्तावेजों में विसंगति/नाम संबंधी प्रशासनिक विवाद” कहना अभी अधिक तथ्यपरक है।
जहां तक EWS के संबंध में एक महत्वपूर्ण सुधार का विषय है तो यह दावा भी सावधानी से करना चाहिए कि “भूमिहार” लिखे जाने से स्वतः EWS प्रमाण-पत्र में फर्जीवाड़ा हो रहा है। बिहार RTPS व्यवस्था में EWS आय एवं संपत्ति प्रमाण-पत्र अलग सेवा के रूप में उपलब्ध है, जबकि जाति प्रमाण-पत्र अलग सेवा है। पोर्टल स्वयं बताता है कि जाति, आय और EWS प्रमाण-पत्रों का सत्यापन संबंधित जारीकर्ता प्राधिकारी के अंतिम सत्यापन के अधीन है।
इसलिए यदि किसी बच्चे/बच्ची को EWS प्रमाण-पत्र केवल “भूमिहार” नाम के कारण अस्वीकार किया गया है, तो उस विशेष मामले का आवेदन, अस्वीकृति आदेश और लागू नियम देखना जरूरी होगा। केवल जाति के नाम की शब्दावली से EWS पात्रता स्वतः समाप्त नहीं होती।
एक महत्वपूर्ण तथ्य परिषद के पक्ष को भी मजबूत करता है
बिहार के वर्तमान जाति प्रमाण-पत्र आवेदन में जाति के प्रमाण के लिए पिता/पूर्वज के राजस्व अभिलेख—खतियान, दानपत्र, भूमि संबंधी दस्तावेज आदि—को स्वीकार्य साक्ष्य माना गया है।
इसलिए यदि परिषद के पास पुराने राजस्व अभिलेखों की प्रमाणित प्रतियां हैं जिनमें “भूमिहार ब्राह्मण” दर्ज है, तो उन्हें केवल भावनात्मक तर्क के रूप में नहीं बल्कि एक व्यवस्थित दस्तावेजी केस के रूप में सरकार के सामने रखना महत्वपूर्ण होगा।
निष्पक्ष निष्कर्ष यह है कि राष्ट्रीय भूमिहार ब्राह्मण परिषद का मुख्यमंत्री/मुख्य सचिव/सामान्य प्रशासन विभाग के समक्ष प्रतिनिधित्व करना लोकतांत्रिक और प्रशासनिक दृष्टि से वैध मांग है। उपलब्ध तथ्यों से यह स्पष्ट है कि “भूमिहार” बनाम “भूमिहार ब्राह्मण” कोई काल्पनिक विवाद नहीं है; यह 2025 से प्रशासनिक विचार-विमर्श और जुलाई 2026 में विधानसभा की बहस तक पहुंच चुका वास्तविक मुद्दा है।
लेकिन “सामान्य प्रशासन विभाग ने अनदेखी किया” का आरोप तभी विश्वसनीय रूप से स्थापित होगा जब परिषद द्वारा उद्धृत मूल दस्तावेजों और उन्हें बदलने वाले सरकारी आदेशों की स्वतंत्र दस्तावेजी जांच हो।
मेरी दृष्टि में सबसे मजबूत मांग यह होनी चाहिए:
“सरकार ‘भूमिहार’ और ‘भूमिहार ब्राह्मण’ दोनों नामों से संबंधित सभी ऐतिहासिक एवं वर्तमान सरकारी अभिलेखों का उच्चस्तरीय दस्तावेजी ऑडिट कराए, नामकरण का विधिक आधार सार्वजनिक करे और जब तक विवाद का अंतिम निपटारा न हो, पुराने वैध अभिलेखों के आधार पर नागरिकों के जाति/EWS संबंधी अधिकारों में किसी प्रकार की प्रतिकूलता न आने दे।” यह मांग जातीय भावनात्मक आग्रह से अधिक संवैधानिक, प्रशासनिक और प्रमाण-आधारित होगी और सरकार के लिए भी इसे खारिज करना कठिन होगा। यही वजह है कि राष्ट्रीय भूमिहार ब्राह्मण परिषद द्वारा मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत को भेजे गए पत्र में सभी महत्वपूर्ण बातों का समावेश करते हुए उसमें लिखे हर संवैधानिक दावा, सरकारी पत्र, 1931 जनगणना संदर्भ से पता चलता है कि दावा कितना मजबूत है, और कहाँ भाषा/कानूनी आधार सुधारना चाहिए।
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