जानिए, दलित राजनीति अब अधिक विभाजित और विभिन्न दलों के बीच सन्तुलन बनाने वाली क्यों हो गई है?
जानिए, दलित राजनीति अब अधिक विभाजित और विभिन्न दलों के बीच सन्तुलन बनाने वाली क्यों हो गई है?
"दलित राजनीति अब अधिक विभाजित और विभिन्न दलों के बीच सन्तुलन बनाने वाली हो गई है, जहां विभिन्न दल अपनी अपनी नीतियों और नैरेटिव के जरिए इस वर्ग को साधने का प्रयास करते हैं।"
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
भारत में दलित राजनीति किसी एक नेता या एक पार्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि अलग-अलग राज्यों में अलग सामाजिक समूह, दलित उप-समुदाय और राजनीतिक गठबंधन अलग नेताओं को प्रभाव देते हैं। भले ही अपने अपने जमाने में बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर, जगजीवन राम और मान्यवर कांशीराम ने दलित राजनीति की जो राष्ट्रीय साख स्थापित की, उस पर दावेदारी को लेकर दलित नेता, अन्य दलित नेताओं की राह में सियासी कांटे बिछाने से बाज नहीं आ रहे हैं, जिससे राज्यवार अलग अलग नेता मजबूत हो रहे हैं और उन्हें उनके ही राज्य में दूसरे दलित नेता भी कड़ी चुनौती दे रहे हैं।
इस प्रकार दलित राजनीति अब अधिक विभाजित और विभिन्न दलों के बीच सन्तुलन बनाने वाली हो गई है, जहां विभिन्न दल अपनी अपनी नीतियों और नैरेटिव के जरिए इस वर्ग को साधने का प्रयास करते हैं। यदि राष्ट्रीय स्तर पर दलित राजनीति के आंकड़े (2011 की जनगणना के मुताबिक) पर नजर दौड़ाएं तो स्पष्ट पता चलता है कि
देश की कुल आबादी का लगभग 16.6% से 18% हिस्सा अनुसूचित जातियों (दलितों) का है, जो चुनावी राजनीति में एक निर्णायक ताकत रखते हैं। जहां तक जनसांख्यिकी और चुनावी हिस्सेदारी वाली कुल आबादी की बात है तो भारत की कुल जनसंख्या में दलितों के लगभग 18 करोड़ मतदाता हैं।
जहां तक इनके राज्यवार प्रभाव की बात है तो उत्तर प्रदेश में दलित मतदाता लगभग 21%, पंजाब में लगभग 32% और उत्तराखंड में लगभग 18% हैं। हिमाचल प्रदेश में
25.19%, पश्चिम बंगाल में 23.51%, हरियाणा में 20.17%, तमिलनाडु में 20.01%, राजस्थान में 17.83%, त्रिपुरा में 17.83%, कर्नाटक में 17.15%, ओडिशा में 17.13%, आंध्र प्रदेश में 16.41%, बिहार में 15.91%, मध्य प्रदेश में 15.62%, छत्तीसगढ़ में 12.82%, झारखंड में 12.08%, महाराष्ट्र में 11.81%, केरल में 9.10%, असम में 7.15%, गुजरात में 6.74%, सिक्किम में 4.63%, मणिपुर में 3.41%, गोवा में 1.74%, मेघालय में 0.58%, मिजोरम में 0.11%, अरुणाचल प्रदेश में 0%, नागालैंड में 0%। भारत में कुल SC आबादी: 16.63%।
चूंकि उत्तरप्रदेश में वर्ष 2027 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, इसलिए यहां के मौजूदा राजनीतिक हालात की एक पड़ताल कर लेते हैं। उत्तरप्रदेश में बसपा की सुश्री मायावती को भीम आर्मी के संस्थापक और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के नगीना सांसद चन्द्रशेखर रावण से कड़ी चुनौती मिल रही है। वहीं, पड़ोसी राज्य बिहार में लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के सांसद और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान को हम (एस) पार्टी के सांसद और केंद्रीय राज्य मंत्री जीतनराम मांझी से मजबूत सियासी टक्कर मिल रही है, जो इस बात की नजीर है कि दलित राजनीति भी अब अंदरुनी रस्साकस्सी की शिकार होती जा रही है।
# राष्ट्रीय स्तर पर उभरे हुए प्रमुख दलित चेहरों के बारे में जानिए
यदि 2024 लोकसभा चुनाव और 2026 की मौजूदा राजनीतिक स्थिति को आधार मानें तो राष्ट्रीय स्तर पर उभरे हुए प्रमुख दलित चेहरे इस प्रकार हैं:
एक, सुश्री मायावती (BSP): उत्तर प्रदेश में दलित, विशेषकर जाटव राजनीति की सबसे पुरानी राष्ट्रीय धुरी हैं जो अपने देशव्यापी ऐतिहासिक प्रभाव के लिए जानी जाती हैं, लेकिन वर्तमान चुनावी प्रभाव में उनमें गिरावट दर्ज की गई, जिससे उनका प्रभाव क्षेत्र सिकुड़ रहा है। 2024 में BSP को यूपी में 9.39% वोट मिले, लेकिन एक भी लोकसभा सीट नहीं मिली।
दो, मल्लिकार्जुन खरगे (कांग्रेस अध्यक्ष): राष्ट्रीय विपक्ष की प्रमुख आवाज हैं जिनका संस्थागत राष्ट्रीय प्रभाव बहुत व्यापक है। वे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता हैं।
तीन, चंद्रशेखर आजाद (आजाद समाज पार्टी - कांशीराम): ये भीम आर्मी से उभरे युवा दलित नेता हैं जो तेजी से उभरता हुआ राष्ट्रीय चेहरा बनते जा रहे हैं। 2024 में नगीना से लगभग 1.51 लाख मतों के अंतर से जीते और उनके आंदोलन का आधार खासकर युवा दलितों में दिखाई देता है।
चार, रामदास आठवले (RPI-A): ये एनडीए के अंग हैं और मोदी सरकार में केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री हैं। सरकार के भीतर राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व करते हैं। वे SC/OBC तथा सामाजिक न्याय के मुद्दों पर केंद्र में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।
पांच, चिराग पासवान (LJP- रामविलास): बिहार के पासवान/दलित आधार पर इनकी पकड़ है। ये एनडीए सरकार में मंत्री हैं। बिहार से बाहर भी राष्ट्रीय गठबंधन-राजनीति में अपना प्रभाव रखते हैं। 2024 में हाजीपुर से लोकसभा जीते।
छह, जीतन राम मांझी (HAM-S): बिहार के मुसहर/महादलित आधार पर इनकी पकड़ मजबूत है। बिहार-केंद्रित लेकिन केंद्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। गया लोकसभा क्षेत्र से 2024 में जीते और वर्तमान में केंद्रीय एमएसएमई राज्य मंत्री हैं।
सात, जिग्नेश मेवाणी ( गुजरात): ये दलित अधिकार और सामाजिक न्याय की राजनीति करते हैं। इनका विचारधारात्मक व आंदोलनकारी प्रभाव है, हालांकि उनका स्वतंत्र चुनावी प्रभाव मुख्यतः गुजरात तक केंद्रित है।
आठ, चरनजीत सिंह चन्नी (पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री): ये पंजाब कांग्रेस में महत्वपूर्ण दलित राजनीतिक चेहरा हैं, हालांकि उनका राष्ट्रीय प्रभाव मुख्यतः कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति के माध्यम से है।
# उपर्युक्त नेताओं के राष्ट्रीय प्रभाव
जहां तक उपर्युक्त नेताओं के राष्ट्रीय प्रभाव को समझने की बात है तो उनके बीच का महत्वपूर्ण अंतर इस प्रकार है:-
मायावती और चंद्रशेखर आजाद मुख्यतः स्वतंत्र दलित राजनीतिक लामबंदी के प्रतिनिधि हैं, जबकि
खरगे का प्रभाव एक बड़े राष्ट्रीय दल के शीर्ष नेतृत्व से आता है। वहीं, आठवले, चिराग पासवान और मांझी का प्रभाव केंद्रीय सत्ता/गठबंधन राजनीति में उनकी भूमिका से आता है। इसलिए केवल लोकसभा सीटों की संख्या से दलित राजनीति का प्रभाव मापना सही नहीं होगा। उदाहरण के लिए, 2024 में BSP को यूपी में कोई सीट नहीं मिली, फिर भी उसे 9.39% वोट मिले और कई सीटों पर उसके मत जीत के अंतर से अधिक थे।
# दलित राजनीति का बहु-केंद्रीकरण का बढ़ता प्रचलन
2024 आम चुनाव के बाद राजनीतिक तस्वीर यह उभरी है कि दलित राजनीतिक प्रतिनिधित्व एक ही राष्ट्रीय केंद्र के बजाय कई केंद्रों में बंटा हुआ दिखाई देता है। 18वीं लोकसभा के 84 SC सांसदों के विश्लेषण में भी अलग-अलग राज्यों और दलित उप-समुदायों का असमान राजनीतिक प्रतिनिधित्व सामने आया। उत्तर प्रदेश में 17 SC सीटों में 7 पासी और 5 जाटव उम्मीदवार जीते थे।
इसका अर्थ यह है कि आगे की दलित राजनीति को समझने के लिए केवल "मायावती बनाम चन्द्रशेखर रावण" देखना पर्याप्त नहीं होगा; बल्कि जाटव, पासी, पासवान, मुसहर, वाल्मीकि, रविदास/चमार तथा अन्य SC समूहों के क्षेत्रीय राजनीतिक रुझान भी महत्वपूर्ण हैं।
राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि कांग्रेस नीत इंडिया गठबंधन, भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के अलावा उत्तरप्रदेश की समाजवादी पार्टी, बिहार का जनता दल यूनाइटेड ने अपने अपने दलित नेताओं को मजबूती प्रदान करके दलित राजनीति को हाइजैक करती जा रही है, इससे मायावती, चन्द्रशेखर, चिराग पासवान, जीतनराम मांझी आदि की सियासी चुनौतियां निकट भविष्य में बढ़ने वाली हैं। इनके पास अब एक ही चारा बचा है कि या तो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से जुड़ जाएं या फिर इंडिया गठबंधन से, अन्यथा बढ़ती सियासी रस्साकसी के बीच अस्तित्व बचाना मुश्किल होगा।
ऐसा इसलिए कि मुख्यधारा की राष्ट्रीय पार्टियों (कांग्रेस और भाजपा) द्वारा दलित राजनीति और उनके प्रतीकों को अपने पाले में करने के बाद, मायावती और चिराग पासवान जैसे क्षेत्रीय व दलित क्षत्रपों के सामने अपनी राजनीतिक जमीन बचाने और सियासत में प्रासंगिक बने रहने के लिए सीमित लेकिन महत्वपूर्ण रणनीतिक विकल्प बचे हैं।
# बसपा नेत्री मायावती के पास उपलब्ध विकल्प और रणनीतियां
जहां तक मायावती के पास उपलब्ध विकल्प और रणनीतियों की बात है तो उन्हें अपने ठोस कैडर बेस को पुनर्जीवित करना होगा। चूंकि बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) का मूल आधार उसका वैचारिक और जमीनी कैडर रहा है। इसलिए मायावती को दोबारा से कांशीराम के दौर की तरह घर-घर जाकर वैचारिक आधार मजबूत करने की जरूरत है। जहां तक गठबंधन की राजनीति पर पुनर्विचार की बात है तो उन्हें पूरी तरह से अकेले चुनाव लड़ने की जिद छोड़ने और समय के अनुसार अन्य क्षेत्रीय या विपक्षी दलों के साथ रणनीतिक मोलभाव करने की क्षमता विकसित करनी होगी। यही नहीं, युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाना होगा। पारिवारिक युवा चेहरों के अलावा खुद दलित समाज के प्रतिभाशाली युवाओं को संगठन में जगह देनी होगी। युवा चेहरों को आगे करके ही Gen-Z और नए मतदाताओं की आकांक्षाओं से जुड़ना संभव हो सकेगा।
# लोजपा रामविलास के नेता चिराग पासवान के पास उपलब्ध विकल्प और रणनीतियां
जहां तक चिराग पासवान के पास विकल्प और रणनीतियों की बात है तो सुदृढ़ एनडीए गठबंधन से ही उन्हें मजबूती मिलेगी। चिराग पासवान (लोक जनशक्ति पार्टी - रामविलास) वर्तमान में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए का हिस्सा हैं। उनके पास सत्ता के साये में रहकर अपनी पार्टी के लिए मंत्रालय और नीतियां तय कराने का अवसर है। अपने 'बिहारी फर्स्ट' का विजन अपनाकर उन्होंने जातिगत दायरे से बाहर निकलकर विकास, युवाओं और प्रवासियों के मुद्दों को अपनी राजनीति का केंद्र बनाना तेज किया है, जिससे एक व्यापक जनसमर्थन भी मिल रहा है। उनकी स्वतंत्र मोलभाव की क्षमता भी है। एनडीए के भीतर रहकर भी दलित हितों के मुद्दों पर हमेशा मुखर रहते हैं ताकि उनका अपना स्वतंत्र राजनीतिक वजूद कमजोर न पड़े।इन नेताओं के पास मुख्य विकल्प यही है कि वे केवल पारंपरिक पहचान की राजनीति पर निर्भर रहने के बजाय नए युग के मुद्दों, युवाओं के असंतोष और आक्रामक जमीनी संगठन के साथ अपनी अलग राजनीतिक पहचान को नए सिरे से परिभाषित करें।
# महत्वपूर्ण सियासी करवट जो चुनावी नतीजों को सीधे प्रभावित करते हैं।
एक, राजनीतिक और सामाजिक बदलाव: वोट बैंक से राजनीतिक ताकत मिलती है। 1970 के दशक के बाद दलित समुदाय केवल एक बंधुआ वोट बैंक नहीं रहा, बल्कि बहुजन समाज पार्टी (BSP) जैसी पार्टियों के जरिए स्वतंत्र राजनीतिक ताकत के रूप में उभरा है।
दो, दलितों के लिए आरक्षित सीटें: जहां तक दलितों के लिए आरक्षित सीटों की बात है तो संविधान के अनुच्छेद 330–334 के तहत लोकसभा और विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों के लिए सीटें आरक्षित हैं, जिससे उनकी विधायी भागीदारी सुनिश्चित होती है।
तीन, दलित राजनीति की मौजूदा सियासी प्रवृत्तियां: जहां तक इनकी मौजूदा सियासी प्रवृत्तियों की बात है तो राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दलित राजनीति अब अधिक विभाजित और विभिन्न दलों के बीच सन्तुलन बनाने वाली हो गई है, जहां विभिन्न दल अपनी अपनी नीतियों और नैरेटिव के जरिए इस वर्ग को साधने का प्रयास करते हैं।
# उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर सूबे में तेज हुई सियासी सरगर्मी
वर्ष 2027 में उत्तरप्रदेश विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं।इस चुनाव में दलितों को लुभाने के लिए राजनीतिक पार्टियां अलग अलग तरह से दांव चल रही हैं। इस चुनाव को देखते हुए सभी प्रमुख राजनीतिक दल राज्य के करीब 21 प्रतिशत दलित वोट बैंक को अपने पाले में लाने के लिए लगातार नए राजनीतिक दांव चल रहे हैं।
# समाजवादी पार्टी (SP) का 'नीला' और पीडीए (PDA) दांव
जहां समाजवादी पार्टी (SP) का 'नीला' और पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक (PDA) दांव दलित मतदाताओं को पशोपेश में डाल रहा है। समाजवादी पार्टी अपनी पारंपरिक लाल पहचान के साथ-साथ अब नीले रंग (दलित स्वाभिमान का प्रतीक) का भी इस्तेमाल कर रही है, जैसे छात्र सभा के कार्यकर्ताओं के लिए नीले रंग की ड्रेस कोड। इस नीला दांव के जरिए पार्टी जेन-ज़ी और युवा दलित वोटरों को आकर्षित करना चाहती है। वहीं, अखिलेश यादव ने बहुजन समाज पार्टी (BSP) संस्थापक कांशीराम की जयंती को बड़े पैमाने पर 'बहुजन समाज दिवस' के रूप में मनाकर पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को मजबूत किया है। बताया जाता है कि समाजवादी पार्टी अनुसूचित जातियों के लिए सुरक्षित सीटों के अलावा कम से कम 14 सामान्य सीटों पर भी दलित उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर रही है। हालांकि उत्तरप्रदेश में सपा और बसपा एक दूसरे की प्रमुख प्रतिद्वंद्वी पार्टी हैं। मायावती और मुलायम सिंह यादव के सियासी रिश्ते में दरार आने के बाद दोनों दलों के हार्डकोर कैडर एक दूसरे को देखना पसंद नहीं कर रहे हैं। बाद में अखिलेश यादव ने बुआ- भतीजा के रिश्ते को मजबूती देनी चाही लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली।
# कांग्रेस ने वरिष्ठ दलित नेता आर.पी. गौतम को उत्तर प्रदेश का नया प्रभारी नियुक्त किया
जहां तक कांग्रेस पार्टी की रणनीति का सवाल है तो कांग्रेस ने संगठन में फेरबदल करते हुए वरिष्ठ दलित नेता आर.पी. गौतम को उत्तर प्रदेश का नया प्रभारी नियुक्त किया है, ताकि राज्य के दलित समुदाय के बीच पार्टी की पकड़ फिर से मजबूत हो सके। इसके अलावा, राहुल गांधी लगातार संविधान की लाल किताब हाथ में लेकर डॉक्टर भीमराव अंबेडकर और आरक्षण के मुद्दों को उठा रहे हैं, और भाजपा पर संवैधानिक अधिकारों को खतरे में डालने का आरोप लगा रहे हैं।
# भारतीय जनता पार्टी दलितों को लुभाने के लिए बूथ स्तर पर कर रही फोकस
जहां तक यूपी की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) की बात है तो उसका बूथ स्तर पर फोकस है। भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सुझाए गए चार प्रमुख वर्गों—युवा, किसान, महिला और दलित (अनुसूचित जाति)—पर विशेष ध्यान दे रही है। पार्टी जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों को तैनात कर रही है ताकि कमजोर बूथों की पहचान कर दलित बस्तियों तक सरकारी योजनाओं और विकास कार्यों का संदेश पहुंचाया जा सके। भाजपा ने एसी-एसटी कानून को और मजबूत बनवाया है, आरक्षण के प्रावधानों को भी मजबूत किया है, इसलिए दलित उसके पक्ष में आएंगे, ऐसा उन्हें आत्मविश्वास है।
# बहुजन समाज पार्टी (BSP) की चुनौती
जहां तक बहुजन समाज पार्टी (BSP) की चुनौती की बात है तो बसपा अपने पारंपरिक नीले आधार और जनाधार को बचाने के लिए सांगठनिक बदलावों और रैलियों के जरिए आंतरिक मजबूती में जुटी है, क्योंकि पिछले कुछ चुनावों में दलित वोटों का रुख अन्य दलों की तरफ भी देखा गया है। बता दें कि यूपी में 21 फीसदी दलित वोट हैं। यूपी में मायावती की ताकत लगातार कम हो रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने 37 सीटें जीतीं, लेकिन बसपा का खाता तक नहीं खुल सका।
ऐसे में सीधा सवाल है कि यूपी में BSP से बिछड़ते दलित अब किसका दामन थामेंगे? यक्ष प्रश्न है! भले ही चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी ने 'नीला' दांव चला है, और कांग्रेस ने दलित नेता को ही प्रदेश प्रभारी बना दिया।लेकिन बीजेपी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने सपा पर तंज कसते हुए कहा, "रंग बदलने से उनके कर्मों के दाग नहीं धुलेंगे। विपक्षी दल (पोशाक का) रंग बदलकर दलित मतदाताओं को लुभाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसमें कामयाब नहीं होगा।
# लेखक
कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
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