रणनीतिक सामग्रियों के उत्पादन में तेजी से आगे बढ़ रहा है भारत


रणनीतिक सामग्रियों के उत्पादन में  तेजी से आगे बढ़ रहा है भारत
"भारत के पास रणनीतिक सामग्री बनने की पर्याप्त आधारभूत क्षमता है; चुनौती संसाधन की कमी से ज्यादा उन्हें बड़े पैमाने पर उच्च-मूल्य, उच्च-शुद्धता वाले तैयार पदार्थों में बदलने की है।"

@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक 

रणनीतिक सामग्री वे खनिज, धातु और उन्नत पदार्थ हैं जिनकी उपलब्धता किसी देश की रक्षा, ऊर्जा-सुरक्षा, अंतरिक्ष, इलेक्ट्रॉनिक्स, दूरसंचार, परमाणु तकनीक, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक वाहन और उच्च-तकनीकी उद्योगों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। इनकी आपूर्ति कुछ देशों में केंद्रित होने के कारण इनका आर्थिक और सामरिक महत्व बढ़ जाता है।

भारत ने मेक इन इंडिया कार्यक्रम के तहत विगत 12 वर्षों में इस क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है। इससे इस बात की उम्मीद बंधती है कि आने वाले वर्षों में अपनी सटीक रणनीति के तहत भारत इस क्षेत्र में भी बुलंदियों पर पहुंचेगा और ग्लोबल साउथ के देशों के लिए भी एक अच्छा विकल्प उपलब्ध करवाएगा।

भारत के संदर्भ में इसे समझने के लिए खनिज, उसके शुद्धिकरण/प्रसंस्करण, धातु/मिश्रधातु, उन्नत पदार्थ/घटक की पूरी श्रृंखला देखना जरूरी है। यहां पर पहला सवाल उठता है कि भारत किन रणनीतिक सामग्रियों को महत्वपूर्ण मानता है? तो जवाब होगा कि भारत की 2023 की आधिकारिक सूची में 30 Critical Minerals हैं, जिनमें लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, कॉपर, ग्रेफाइट, गैलियम, जर्मेनियम, नियोबियम, टंग्स्टन, टाइटेनियम, प्लैटिनम-ग्रुप तत्व और Rare Earth Elements (REEs) आदि शामिल हैं। 

इनका महत्व अलग-अलग क्षेत्रों में सामग्री और उसका प्रमुख उपयोग के तौर पर इस प्रकार है:

लिथियम - बैटरी, ऊर्जा भंडारण।

कोबाल्ट - बैटरी, उच्च-प्रदर्शन मिश्रधातु।

निकेल - बैटरी, स्टेनलेस स्टील, मिश्रधातु।

ग्रेफाइट - बैटरी एनोड, औद्योगिक उपयोग।

दुर्लभ मृदा (Rare Earths) - इलेक्ट्रॉनिक्स, मोटर, उच्च-प्रदर्शन चुंबक।

टंग्स्टन - उच्च-तापमान/कठोर औद्योगिक सामग्री।

टाइटेनियम - एयरोस्पेस, चिकित्सा, इंजीनियरिंग।

गैलियम/जर्मेनियम - इलेक्ट्रॉनिक्स और उन्नत सेमीकंडक्टर।

PGM कैटेलिस्ट - रसायन और उच्च-तकनीकी उपयोग।

दूसरा सवाल है कि क्या भारत इनका निर्माण कर सकता है? तो जवाब होगा कि हाँ—लेकिन भारत की क्षमता एक समान नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण अंतर है संसाधन होना और उससे उच्च-मूल्य वाला तैयार पदार्थ बनाना। भारत खनन, कुछ प्रकार के रिफाइनिंग और प्रोसेसिंग में सक्षम है। उदाहरण के लिए, USGS के अनुसार 2024 में भारत दुनिया में दुर्लभ मृदा का पाँचवाँ बड़ा उत्पादक था, हालांकि वैश्विक उत्पादन में उसका हिस्सा 1% से कम था। 
लेकिन कई क्षेत्रों में भारत की कमजोरी midstream और downstream प्रोसेसिंग में है। दुर्लभ-मृदा परमानेंट मैग्नेट इसका बहुत अच्छा उदाहरण हैं। भारत के पास पर्याप्त REE रिसोर्सेस हैं और माइनिंग/सेपरेशन/ऑक्साइड रिफाइनिंग की क्षमता भी है, लेकिन /ऑक्साइड से मेटल, एलॉय और हाइ-परफॉर्मेंस मैग्नेट  बनाने की औद्योगिक क्षमता अभी सीमित है। सरकार ने 2025 में इसी कमी को दूर करने के लिए ₹7,280 करोड़ की योजना मंजूर की है। 

आपको पता होना चाहिए कि भारत की सबसे बड़ी ताकत—दुर्लभ मृदा है। भारत के पास दुर्लभ मृदा तत्वों के बड़े संसाधन हैं। 2026 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार GSI ने देश में REE खनिज संसाधनों को लगभग 767 मिलियन टन तक आंका है। लेकिन संसाधन का बड़ा हिस्सा अपेक्षाकृत कम ग्रेड का है और कुछ संसाधन रेडियोएक्टिव मोनाजिट से जुड़े हैं। इससे एक्सट्रैक्शन और प्रोसेसिंग जटिल एवं महंगी होती है। 

इसलिए भारत की स्थिति को इस तरह समझना अधिक सही है: रिसोर्स बेस मजबूत, माइनिंग/सेपरेशन क्षमता मौजूद, एडवांस्ड प्रोसेसिंग में अंतर, फिनिश्ड हाइ-टेक मैटेरियल्स में अभी बड़ी चुनौती है।

यही वजह है कि भारत ने कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं? सबसे महत्वपूर्ण पहल नैशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन (NCMM) है। जनवरी 2025 में मंजूर इस मिशन के लिए सात वर्षों में ₹16,300 करोड़ का सरकारी व्यय तथा लगभग ₹18,000 करोड़ का अपेक्षित निवेश रखा गया है। GSI को 2024-25 से 2030-31 के बीच 1,200 एक्सप्लोरेशन प्रोजेक्ट्स करने का लक्ष्य दिया गया है। 

इसके अलावा, विदेशों में क्रिटिकल-मिनरल एसेट्स हासिल करने के लिए KABIL जैसी व्यवस्था की गई है। इसके तहत क्रिटिकल-मिनरल ब्लॉक्स की नीलामी, रीसाइक्लिंग और सेकेंडरी  रिसोर्सेस पर जोर दिया गया है। वहीं लिथियम, कोबाल्ट आदि के घरेलू स्रोत खोजने की कोशिश जारी है। रेयर-अर्थ प्रोसेसिंग और परमानेंट मैग्नेट के लिए नई औद्योगिक क्षमता हासिल की जा रही है। 2026-27 में ओडिशा, केरला, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु  में रेयर अर्थ कॉरिडोर्स की घोषणा की है। 

जहां तक इस क्षेत्र में वैश्विक पटल पर भारत की स्थिति का सवाल है तो यहाँ एक महत्वपूर्ण बात है: भारत अभी चीन जैसा इंटीग्रेटेड क्रिटिकल मैटेरियल्स पावरहाउस  नहीं है।

IEA के अनुसार 2024 में रेयर-अर्थ रिफाइनिंग का लगभग 97% हिस्सा शीर्ष तीन देशों में केंद्रित था। यानी केवल खनिज संसाधन होना पर्याप्त नहीं है; असली रणनीतिक शक्ति प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग कैपेसिटी में है। 

भारत की वैश्विक स्थिति को मोटे तौर पर क्षेत्रवार इस तरह देखा जा सकता है:

खनिज संसाधन: कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में मजबूत संभावनाएँ।

खनन: कुछ सामग्रियों में अच्छी क्षमता।

रिफाइनिंग/प्रोसेसिंग: मिश्रित; कई क्रिटिकल मिनरल्स में निर्भरता।

रेयर-अर्थ सेपरेशन: क्षमता मौजूद।

रेयर-अर्थ मेटल्स/एलॉयज: क्षमता विकसित हो रही है।

परमानेंट मैग्नेट: अभी बड़ा आयात-निर्भर अंतर।

एडवांस्ड मैटेरियल्स: चयनित क्षेत्रों में अच्छी वैज्ञानिक/औद्योगिक क्षमता, लेकिन बड़े पैमाने पर विस्तार की जरूरत।

वैश्विक आपूर्ति-श्रृंखला डाइवर्सिफिकेशन: भारत के लिए महत्वपूर्ण अवसर।

# इन क्षेत्रों में आगे है भारत

हैदराबाद में रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट के लिए पायलट प्लांट शुरू किया गया है। वहीं, इसरो, एससीएल ने अंतरिक्ष अभियानों के लिए विक्रम 3201 व कल्पना 3201 मेक-इन-इंडिया माइक्रोप्रोसेसर विकसित किए। वहीं, सोलर मॉड्यूल निर्माण क्षमता. 2014 के 2.3 गीगावॉट से बढ़कर जून 2026 तक 192 गीगावॉट पहुंच गई।

अब समझिए कि भारत के लिए असली चुनौती कहाँ है? भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती "खनिज निकालना" नहीं बल्कि "खनिज को रणनीतिक सामग्री में बदलना" है।उदाहरण: खनिज अयस्क,  कंसंट्रेट,  प्यूरीफाइड ऑक्साइड, मैटल, एलॉय, एडवांस्ड मैटेरियल, कंपोनेंट और फिनिश्ड प्रोडक्ट।

इस पूरी श्रृंखला में जितना आगे बढ़ेंगे, प्रति टन आर्थिक और रणनीतिक मूल्य उतना बढ़ता जाएगा। यही कारण है कि भारत यदि केवल अयस्क निर्यात करे और तैयार मैग्नेट, एडवांस्ड एलॉय या अन्य हाइ-वैल्यू मटेरियल आयात करे, तो रणनीतिक आत्मनिर्भरता अधूरी रहेगी।

वस्तुत: भारत के पास संसाधन, वैज्ञानिक संस्थान, इंजीनियरिंग क्षमता, बड़ा घरेलू बाजार और सरकारी निवेश—ये सभी महत्वपूर्ण आधार मौजूद हैं। लेकिन वैश्विक अग्रणी स्थिति हासिल करने के लिए खनन से आगे बढ़कर रिफाइनिंग, मेटलर्जी, एडवांस्ड मैटेरियल्स, रीसाइक्लिंग और कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग की पूरी वैल्यू चैन देश में बनानी होगी।

विशेष रूप से दुर्लभ मृदा, परमानेंट मैग्नेट, लिथियम-बैटरी मैटेरियल्स, सेमी कंडक्टर-रिलेटेड मैटेरियल्स  और हाइ-परफोर्मेंस एलॉयज भारत की रणनीतिक सामग्री नीति के निर्णायक क्षेत्र बन सकते हैं।

जानकार बताते हैं कि अग्रलिखित योजनाओं और नीतियों से देश आगे बढ़ा है:- 

एक, एफडीआई नीति - 2014-26 के दौरान भारत को 843 अरब डॉलर का कुल एफडीआई मिला, जो पिछले 12 वर्षों से 169 फीसदी अधिक है।

दो, पीएलआई योजनाएं - कुल 14 क्षेत्रों में लागू पीएलआई से 2.6 लाख करोड़ रुपये का निवेश आया। इससे 23.8 लाख करोड़ रुपये का उत्पादन हुआ और 14.6 लाख रोजगार पैदा हुए।

तीन, पीएम गतिशक्ति - अगस्त 2026 तक 18.66 लाख करोड़ रुपये की 396 प्रमुख बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का मूल्यांकन किया गया।

चार, सेमीकॉन 2.0 - सेमीकंडक्टर के लिए 1,27,500 करोड़ आवंटित हुए।

पांच, मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग - घरेलू वैल्यू-एडिशन बढ़ाने के लिए 62,500 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया।

यदि एक पंक्ति में इसे कहा जाए तो भारत के पास रणनीतिक सामग्री बनने की पर्याप्त आधारभूत क्षमता है; चुनौती संसाधन की कमी से ज्यादा उन्हें बड़े पैमाने पर उच्च-मूल्य, उच्च-शुद्धता वाले तैयार पदार्थों में बदलने की है।

लेखक 
कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक 
91-8586800513

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