How will the US-Iran war end? When will the world find relief? Understand this.
आखिर कैसे थमेगा अमेरिका-ईरान युद्ध? कबतक राहत पाएगी दुनिया? समझिए
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
अमेरिका–ईरान संघर्ष केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता नहीं है। इसमें धार्मिक पहचान, वैचारिक टकराव, क्षेत्रीय वर्चस्व, सुरक्षा हित और वैश्विक शक्ति-संतुलन जैसे अनेक आयाम जुड़े हुए हैं। इसलिए कई लोगों की दृष्टि में यह केवल दो देशों का विवाद नहीं, बल्कि प्रभाव और विचारधाराओं के टकराव का भी संघर्ष है। इसलिए दुनियावी लोगों के जेहन में सिर्फ एक सवाल सुलग रहा है कि आखिर कैसे थमेगा अमेरिका-ईरान युद्ध? और इसकी विकरालता से कबतक राहत पाएगी दुनिया? अमेरिका–ईरान संघर्ष अत्यंत जटिल और बार-बार उभरने वाला संकट क्यों बन चुका है? आखिर इस युद्ध में तो नागरिक ढांचे भी सुरक्षित क्यों नहीं बचे?
क्या अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार ऐसे किसी भी युद्ध को स्वतः "जायज" नहीं माना जा सकता? आइए इन्हें समझते हैं।
प्रथमदृष्टया जहां कुछ अंतर्राष्ट्रीय विश्लेषक अमेरिका–ईरान संघर्ष को धार्मिक, वैचारिक और भू-राजनीतिक (geopolitical) तत्वों का मिश्रण मानते हैं। वहीं अन्य विश्लेषक इसे मुख्यतः राष्ट्रीय सुरक्षा, परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय प्रभाव और शक्ति-संतुलन का संघर्ष मानते हैं।
इसलिए अमेरिका–ईरान संघर्ष को केवल धर्मयुद्ध समझना इसकी जटिलता को कम करके देखना होगा। वास्तव में यह धर्म, विचारधारा, क्षेत्रीय वर्चस्व, राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक शक्ति-संतुलन—इन सभी का मिला-जुला संघर्ष है।
यदि गौर किया जाए तो जहां अमेरिका की नीतियाँ मुख्यतः राष्ट्रीय सुरक्षा, क्षेत्रीय रणनीति और परमाणु प्रसार को रोकने के तर्कों पर आधारित बताई जाती हैं, तो वहीं ईरान की राजनीतिक व्यवस्था में धार्मिक नेतृत्व की केंद्रीय भूमिका है, इसलिए उसके कुछ निर्णयों में धार्मिक विचारधारा का प्रभाव दिखाई देता है। लेकिन दोनों पक्षों के निर्णयों में आर्थिक, सामरिक और राजनीतिक हित भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
जानकारों का कहना है कि अमेरिका–ईरान युद्ध तभी थमेगा, जब दोनों पक्ष यह समझ लें कि सैन्य जीत की कीमत राजनीतिक जीत से कहीं अधिक है। मौजूदा परिस्थितियों में युद्ध का स्थायी समाधान केवल कूटनीति, सुरक्षा गारंटी और चरणबद्ध समझौते से ही संभव दिखता है। हाल के दिनों में कई मध्यस्थ देशों ने 10-दिवसीय युद्धविराम और वार्ता का प्रस्ताव रखा है, लेकिन अभी तक दोनों पक्षों ने उस पर अंतिम सहमति नहीं दी है।
हमारी राय में युद्ध रोकने के लिए सबसे महत्वपूर्ण कदम होंगे: तत्काल और सत्यापित युद्धविराम, ओमान, कतर, पाकिस्तान या अन्य स्वीकार्य मध्यस्थों की मौजूदगी में प्रत्यक्ष या परोक्ष वार्ता, ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर पारदर्शी निगरानी और बदले में चरणबद्ध प्रतिबंधों में राहत,
होरमुज़ जलडमरूमध्य में सुरक्षित समुद्री आवागमन की गारंटी, ताकि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति सामान्य हो सके और
दोनों पक्षों द्वारा क्षेत्रीय सहयोगी समूहों के माध्यम से संघर्ष को और न बढ़ाने की प्रतिबद्धता।
यदि युद्ध थमता है, तो दुनिया को कई मोर्चों पर राहत मिल सकती है: कच्चे तेल और गैस की कीमतों में स्थिरता आएगी, महंगाई और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव कम होगा, मध्य पूर्व में व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का खतरा घटेगा,
भारत सहित ऊर्जा आयातक देशों को आर्थिक राहत मिलेगी, वैश्विक वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता कम होगी।
हालांकि सबसे बड़ी चुनौती भरोसे की कमी है। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर पूर्व समझौतों के उल्लंघन का आरोप लगाते रहे हैं, इसलिए केवल युद्धविराम पर्याप्त नहीं होगा; उसके साथ ऐसा तंत्र भी चाहिए जो समझौते के पालन की स्वतंत्र निगरानी कर सके। हाल की घटनाओं से भी संकेत मिलता है कि युद्धविराम की कोशिशें बार-बार हिंसा बढ़ने से पटरी से उतर जाती हैं।
वस्तुतः अमेरिका–ईरान युद्ध का समाधान रणभूमि में नहीं, बल्कि वार्ता की मेज पर है। यदि दोनों पक्ष अपने अधिकतम राजनीतिक लक्ष्य छोड़कर न्यूनतम साझा हित—क्षेत्रीय स्थिरता, सुरक्षित समुद्री मार्ग और परमाणु जोखिम में कमी—पर सहमत होते हैं, तभी दुनिया को स्थायी राहत मिल सकेगी।
# अमेरिका–ईरान संघर्ष अत्यंत जटिल और बार-बार उभरने वाला संकट
अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, अमेरिका–ईरान संघर्ष अत्यंत जटिल और बार-बार उभरने वाला संकट है। इसके लंबे समय तक बने रहने के प्रमुख कारण हैं: दोनों देशों के बीच दशकों पुराना अविश्वास, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर विवाद, मध्य पूर्व में क्षेत्रीय प्रभाव की प्रतिस्पर्धा, आर्थिक प्रतिबंध, प्रतिरोधी कार्रवाइयाँ और प्रतिनिधि (proxy) समूहों की भूमिका और घरेलू राजनीति, जो कई बार समझौते को कठिन बना देती है।
फिर भी इतिहास बताता है कि लंबे और कटु संघर्ष भी अंततः बातचीत से समाप्त हुए हैं। अमेरिका और वियतनाम, अमेरिका और चीन, तथा शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ के संबंध समय के साथ बदले। इसलिए यह कहना कि यह संघर्ष कभी समाप्त नहीं हो सकता, उचित नहीं होगा। यदि दोनों पक्ष प्रत्यक्ष या परोक्ष संवाद बहाल करें, परमाणु मुद्दे पर सत्यापन योग्य समझौता करें, क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था पर सहमत हों, और बाहरी मध्यस्थों की भूमिका स्वीकार करें, तो तनाव में उल्लेखनीय कमी आ सकती है।
वास्तव में, अमेरिका–ईरान संघर्ष को "पुरानी और बार-बार भड़कने वाली बीमारी" कहना उचित है—जिसका इलाज कठिन है, लेकिन असंभव नहीं। युद्ध अंततः स्थायी समाधान नहीं देता; टिकाऊ समाधान कूटनीति, विश्वास-निर्माण और अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान से ही निकलता है।
# आखिर इस युद्ध में तो नागरिक ढांचे भी सुरक्षित क्यों नहीं बचे?
इस युद्ध का सबसे गंभीर और चिंताजनक पहलू यह है कि
नागरिक ढांचे भी सुरक्षित नहीं बचे। कमोबेश दोनों पक्षों की ओर से गलतियां हुई हैं। अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून (International Humanitarian Law) के अनुसार अस्पताल, स्कूल, आवासीय क्षेत्र, बिजली, पानी और अन्य नागरिक ढांचे सामान्यतः संरक्षित होते हैं। लिहाजा किसी भी पक्ष को केवल सैन्य लक्ष्यों पर हमला करना चाहिए और नागरिकों को होने वाली क्षति को न्यूनतम रखने का दायित्व होता है।
यदि किसी संघर्ष में नागरिक ढांचे पर हमले होते हैं, तो तीन महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न उठते हैं: क्या वह वास्तव में सैन्य लक्ष्य था? क्या हमले में अनुपातिकता (proportionality) का पालन किया गया? क्या नागरिकों को बचाने के लिए सभी संभव सावधानियां बरती गईं? हालिया रिपोर्टों में यह दावा किया गया है कि इस संघर्ष में पुलों, ऊर्जा ढांचे तथा अन्य नागरिक सुविधाओं को भी नुकसान पहुँचा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। वहीं कुछ मानवाधिकार संगठनों और विधि विशेषज्ञों ने स्कूलों, स्वास्थ्य केंद्रों और आवासीय क्षेत्रों पर हमलों की स्वतंत्र जांच की मांग की है।
इसी तरह, यदि ईरान द्वारा भी नागरिक क्षेत्रों, ऊर्जा या जल संयंत्रों अथवा अन्य असैन्य ढांचों को निशाना बनाया गया हो, तो वह भी अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का उल्लंघन माना जा सकता है। युद्ध के नियम दोनों पक्षों पर समान रूप से लागू होते हैं। इसलिए, नागरिक ढांचे का सुरक्षित न रहना किसी भी पक्ष के लिए स्वतः उचित नहीं ठहराया जा सकता। प्रत्येक कथित हमले की स्वतंत्र जांच आवश्यक होती है ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि कहीं युद्ध अपराध या अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन तो नहीं हुआ।
# क्या अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार ऐसे किसी भी युद्ध को स्वतः "जायज" नहीं माना जा सकता?
यदि अमेरिका यह दावा करे कि उसने अपने ऊपर हुए आसन्न (imminent) हमले को रोकने के लिए आत्मरक्षा में कार्रवाई की, या संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 के तहत वैध आत्मरक्षा का अधिकार प्रयोग किया, तो वह युद्ध को कानूनी और नैतिक रूप से उचित ठहराने का प्रयास कर सकता है। दूसरी ओर, अनेक अंतरराष्ट्रीय विधि विशेषज्ञों का मत है कि यदि किसी सैन्य कार्रवाई को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति न मिली हो, और तत्काल आत्मरक्षा की शर्तें स्पष्ट रूप से पूरी न होती हों, तो ऐसी कार्रवाई संयुक्त राष्ट्र चार्टर के विरुद्ध मानी जा सकती है। 2026 के संघर्ष के संदर्भ में 100 से अधिक अंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञों ने अमेरिकी हमलों की वैधता पर गंभीर प्रश्न उठाए हैं।
साथ ही, यह भी महत्वपूर्ण है कि यदि ईरान जानबूझकर नागरिकों, तटस्थ देशों या असैन्य ढांचों पर हमला करता है, तो वह भी अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का उल्लंघन हो सकता है। युद्ध में दोनों पक्षों पर नागरिकों की सुरक्षा और युद्ध संबंधी नियमों (Law of Armed Conflict) का पालन करना अनिवार्य होता है। अलबत्ता अमेरिका–ईरान युद्ध को बिना शर्त "जायज" या "नाजायज" कहना उचित नहीं होगा। इसकी वैधता इस बात पर निर्भर करती है कि क्या आत्मरक्षा की कानूनी शर्तें वास्तव में पूरी हुई थीं? क्या संयुक्त राष्ट्र चार्टर का पालन किया गया? क्या युद्ध के दौरान अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का सम्मान किया गया? इसी कारण इस संघर्ष की वैधता आज भी अंतरराष्ट्रीय कानून और कूटनीति के विशेषज्ञों के बीच गहन बहस का विषय बनी हुई है।
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