Collaboration Camp: The Identity of a New Bihar (सहयोग शिविर : नए बिहार की पहचान)


                सहयोग शिविर : नए बिहार की पहचान
कवि : कमलेश पांडेय

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न टालमटोल, न कोई बहाना,
अब बदला है शासन का तराना।
जनता के द्वार स्वयं प्रशासन,
यही है सेवा, यही सुशासन।

फाइलों की धूल झाड़ दी गई,
लालफीताशाही हार गई।
बिचौलियों के टूटे जाल,
जनता को मिला अधिकार विशाल।

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सहयोग शिविर बना विश्वास,
जन-जन को मिला नया प्रकाश।
अधिकारी बैठे गाँव-गाँव,
सुनते हर पीड़ा, हर घाव।

अब नहीं महीनों का इंतजार,
तुरंत समाधान, तुरंत विचार।
न्याय पहुँचता घर के द्वार,
यही है विकास का असली सार।

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कड़क नेतृत्व, दृढ़ संकल्प,
जनहित जिसका सर्वोत्तम विकल्प।
सम्राट चौधरी के मार्गदर्शन में,
बिहार बढ़ रहा नव सृजन में।

सत्ता नहीं केवल सम्मान,
जनसेवा ही है उनकी पहचान।
साफ नीयत, ईमानदार विचार,
बना रहे हैं विकास का आधार।

आत्मनिर्भरता की नई कहानी,
हर चेहरे पर लिखी रवानी।
उम्मीदों का यह नव विहान,
गढ़ रहा है विकसित बिहार महान।

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जनता का संबल, जनता का मान,
सहयोग शिविर बना अभियान।
नए बिहार की यही पुकार—
सेवा, सुशासन और सतत विस्तार।

— कवि कमलेश पांडेय

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