आखिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के वीटो प्राप्त देशों की अनर्गल भूमिका पर उठते ज्वलंत सवालों की कब तक उपेक्षा करेगी शेष दुनिया?
आखिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के वीटो प्राप्त देशों की अनर्गल भूमिका पर उठते ज्वलंत सवालों की कब तक उपेक्षा करेगी शेष दुनिया?
"वास्तव में, सुरक्षा परिषद को पंगु बनाने में रूस और अमेरिका सबसे आगे हैं, क्योंकि ये दोनों देश अपने भू-राजनीतिक स्वार्थों और सहयोगियों को बचाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय कानूनों को सबसे ज्यादा ताक पर रखते हैं। इसके बाद चीन का नंबर आता है, जो अपनी आर्थिक और सैन्य ताकत के बल पर वैश्विक जवाबदेही से बचता है।"
@ कमलेश पांडेय/ वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है कि "समरथ को नहीं दोष गोसाईं।" यानी जो लोग धन और बल से ताकतवर होते हैं वो कुछ भी करें, दुनिया उनके दोष नहीं गिनती/मानती। संयुक्त राष्ट्र संघ प्रमुख एंटोनियो गुटेरस ने भी कुछ ऐसी ही कड़ी आलोचना दुनियावी वीटो शक्ति प्राप्त देशों की, की है और दो टूक शब्दों में कहा है कि "जो वैश्विक शक्तियां खुद अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करती हैं, वे ही सुरक्षा परिषद में बैठी हैं। इससे सुरक्षा परिषद पंगु हो गई है। इसलिए इस वैश्विक संस्था में सुधार सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।" इसलिए सवाल उठता है कि आखिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के वीटो प्राप्त देशों की अनर्गल भूमिका पर उठते ज्वलंत सवालों की कब तक उपेक्षा करेगी दुनिया?
चूंकि संयुक्त राष्ट्र संघ प्रमुख गुटेरस ने सत्ता के पुनर्वितरण की जरूरत पर जोर दिया और कहा कि ऐसी सुरक्षा परिषद का होना स्वीकार्य नहीं है, जिसकी संरचना आज की दुनिया को दिखाने के बजाय कई दशक पहले की दुनिया को दिखाती हो। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के लकवाग्रस्त होने से ऐसी स्थिति पैदा हो गई है, जिसमें दुनिया भर के हर देश को लगता है कि उन्हें जो चाहे वह करने का हक है। वे जानते हैं कि वे बिना किसी सजा के ऐसा कर सकते हैं। इस बेखौफ रवैये ने ऐसा माहौल बना दिया है, जिसमें हम देख रहे हैं कि ज्यादा से ज्यादा देश अंतरराष्ट्रीय कानून, अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून और मानवाधिकार कानूनों का उल्लंघन कर रहे हैं। इसलिए ग्लोबल साउथ के देशों को सतर्क होना चाहिए और परस्पर मिलकर पी फाइव देशों की मनमानी पर रोक लगानी चाहिए, क्योंकि ये फूट डालो, शासन करो की तर्ज पर काम करते हैं और परस्पर मिले रहते हैं।
संयुक्त राष्ट्र संघ प्रमुख एंटोनियो गुटेरस ने नई दिल्ली ब्रिक्स घोषणा पत्र की चर्चा करते हुए कहा कि उन्हें पता चला है, दुनिया की कई अहम ताकतें मानती हैं कि संकटों से निपटने का रास्ता बहुपक्षवाद ही है। इस साझा घोषणा-पत्र में सभी देशों ने बहुपक्षवाद और संयुक्त राष्ट्र के प्रति मजबूत प्रतिबद्धता जताई, जो कि राहत की बात है। दुनिया की कई अहम ताकतों ने भी अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान का रास्ता बहुपक्षवाद को ही चुना है और स्पष्ट किया है कि इसमें यूएनओ को केंद्र में होना चाहिए। दरअसल, उनकी यह टिप्पणी अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और वैश्विक भू-राजनीति की सबसे बड़ी कड़वी सच्चाइयों में से एक को रेखांकित करती है।
कूटनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो सुरक्षा परिषद को पंगु बनाने में रूस और अमेरिका सबसे आगे हैं, क्योंकि ये दोनों देश अपने भू-राजनीतिक स्वार्थों और सहयोगियों को बचाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय कानूनों को सबसे ज्यादा ताक पर रखते हैं। इसके बाद चीन का नंबर आता है, जो अपनी आर्थिक और सैन्य ताकत के बल पर वैश्विक जवाबदेही से बचता है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की इस लाचारी और पंगुता के वैश्विक स्तर पर गहरे और गंभीर मायने हैं, जो इस प्रकार हैं:-
एक, 'दंड से मुक्ति' का माहौल: जब वैश्विक शक्तियाँ (P5 देश—अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, यूके) स्वयं अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करती हैं और अपने वीटो पावर का इस्तेमाल करके अपने या अपने सहयोगियों के खिलाफ किसी भी कार्रवाई को रोक देती हैं, तो दुनिया के अन्य देशों में यह संदेश जाता है कि "जिसकी लाठी, उसकी भैंस"। इसके परिणामस्वरूप छोटे या मध्यम देश भी अंतर्राष्ट्रीय नियमों की परवाह करना बंद कर देते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि न्याय प्रणाली काम नहीं कर रही है।
दो, अंतर्राष्ट्रीय कानून और बहुपक्षवाद का पतन: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया को युद्धों से बचाने के लिए 'नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था' बनाई गई थी। लेकिन जब सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्य ही क्षेत्रीय अखंडता, संप्रभुता और मानवाधिकारों से जुड़े कानूनों को दरकिनार करते हैं, तो बहुपक्षीय संस्थाओं की साख खत्म हो जाती है। संयुक्त राष्ट्र एक "टॉक शो" बनकर रह जाता है जहाँ केवल भाषण दिए जाते हैं, लेकिन संकट रोकने की क्षमता खत्म हो जाती है।
तीन, मानवीय संकटों और युद्धों का लंबा खिंचना: सुरक्षा परिषद के लकवाग्रस्त होने का सबसे भयानक खामियाजा आम नागरिकों को भुगतना पड़ता है। रूस-यूक्रेन युद्ध, इज़राइल-गाजा संघर्ष या सीरिया संकट जैसी स्थितियों में जब भी शांति प्रस्ताव लाया जाता है, कोई न कोई P5 देश अपने भू-राजनीतिक हितों की रक्षा के लिए वीटो कर देता है। इससे युद्ध रुकने के बजाय वर्षों तक खिंचते रहते हैं और लाखों मासूम लोग मारे जाते हैं।
चार, 'ग्लोबल साउथ' का उपेक्षित होना: सुरक्षा परिषद का वर्तमान ढांचा 1945 के विजयी देशों के आधार पर बना था। आज की वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक वास्तविकताएं पूरी तरह बदल चुकी हैं। भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और जापान जैसे देश जो दुनिया की बड़ी आबादी और अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं, उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रिया से बाहर रखा गया है। विकासशील देशों के मुद्दों पर महाशक्तियों की राजनीति भारी पड़ जाती है।
पांच, गुटबाज़ी और एकतरफा कार्रवाइयों का बढ़ना: जब सुरक्षा परिषद शांति स्थापित करने में विफल हो जाती है, तो देश सुरक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र की ओर देखने के बजाय सैन्य गठबंधनों (जैसे नाटो आदि) और एकतरफा कार्रवाइयों पर निर्भर होने लगते हैं। इससे दुनिया फिर से दो या तीन बड़े ध्रुवों में बंटने लगती है और वैश्विक अस्थिरता बढ़ती है।
# आगे का रास्ता: आखिर क्या विकल्प है?
एक, सुरक्षा परिषद में तत्काल सुधार: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सदस्यता का विस्तार किया जाए और भारत जैसे उभरते देशों को स्थायी सीट दी जाए।
दो, वीटो पावर पर अंकुश: नरसंहार, युद्ध अपराध और मानवता के खिलाफ अपराधों के मामलों में P5 देशों के वीटो इस्तेमाल करने पर प्रतिबंध होना चाहिए।
तीन, संयुक्त राष्ट्र महासभा को अधिक अधिकार: यदि सुरक्षा परिषद वीटो के कारण पंगु हो जाती है, तो महासभा (जहाँ सभी देशों के पास समान वोट है) को अंतिम निर्णय लेने की अधिक शक्ति दी जानी चाहिए।
जब तक वीटो पावर रखने वाले देश अपने क्षणिक राष्ट्रीय हितों से ऊपर उठकर वैश्विक शांति और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का सम्मान नहीं करेंगे, तब तक सुरक्षा परिषद इस पंगुता से बाहर नहीं निकल सकती।
# यदि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार नहीं हुआ, तो वैश्विक व्यवस्था बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुँच जाएगी
यदि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार नहीं हुआ और वीटो पावर रखने वाली महाशक्तियां इसी तरह अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करती रहीं, तो वैश्विक व्यवस्था एक बेहद खतरनाक और अनिश्चित मोड़ पर पहुँच जाएगी। इसके निम्नलिखित गंभीर और संभावित परिणाम होंगे:-
एक, 'जंगल राज' और 'जिसकी लाठी, उसकी भैंस':
अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की धज्जियां उड़ने से दुनिया में अराजकता का दौर शुरू हो जाएगा। शक्तिशाली देश अपने छोटे और कमजोर पड़ोसी देशों की जमीन पर कब्जा करने, उनके संसाधनों को छीनने या अपनी शर्तें थोपने के लिए बिना किसी डर के सैन्य बल का इस्तेमाल करेंगे, क्योंकि उन्हें पता होगा कि सुरक्षा परिषद उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती।
दो, नए परमाणु हथियारों की दौड़: जब छोटे और मध्यम देशों का अंतर्राष्ट्रीय कानून और सुरक्षा परिषद से विश्वास पूरी तरह उठ जाएगा, तो वे अपनी सुरक्षा के लिए किसी वैश्विक संस्था पर निर्भर रहने के बजाय खुद को सैन्य रूप से मजबूत करेंगे। इससे परमाणु अप्रसार संधि जैसी व्यवस्थाएं ध्वस्त हो जाएंगी। कई देश (जैसे मध्य पूर्व, पूर्वी एशिया और यूरोप के देश) अपनी संप्रभुता बचाने के लिए गुप्त या प्रत्यक्ष रूप से परमाणु हथियार बनाने की होड़ में शामिल हो जाएंगे।
तीन, संयुक्त राष्ट्र का अंत — 'राष्ट्र संघ' जैसी विफलता: प्रथम विश्व युद्ध के बाद दुनिया में शांति बनाए रखने के लिए 'लीग ऑफ नेशंस' बनाई गई थी। लेकिन जब हिटलर और मुसोलिनी जैसे तानाशाहों ने इसके नियमों को तोड़ा और यह संस्था लाचार बनी रही, तो यह अप्रासंगिक होकर खत्म हो गई और द्वितीय विश्व युद्ध हुआ। यदि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद इसी तरह पंगु बनी रही, तो UNO भी लीग ऑफ नेशंस की तरह पूरी तरह अप्रासंगिक हो जाएगा।
चार, दुनिया का गुटों में विभाजन: वैश्विक शांति संस्था के विफल होने पर दुनिया फिर से कई प्रतिस्पर्धी गुटों और सैन्य गठबंधनों में बंट जाएगी। वैश्विक व्यापार, इंटरनेट और आपूर्ति श्रृंखला का विखंडन होगा। वैश्वीकरण खत्म होगा और देश अपनी अर्थव्यवस्थाओं को 'सुरक्षा' के नाम पर बंद करने लगेंगे, जिससे वैश्विक आर्थिक मंदी और गरीबी बढ़ेगी।
पांच, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक संकटों पर कोई समाधान नहीं: जलवायु परिवर्तन, महामारी, साइबर युद्ध और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के नियमन जैसे संकट ऐसे हैं जिन्हें कोई एक देश अकेले हल नहीं कर सकता। जब महाशक्तियों के बीच अविश्वास और कानून का उल्लंघन चरम पर होगा, तो वैश्विक सहयोग पूरी तरह ठप हो जाएगा। इसका खामियाजा पूरी मानवता को भुगतना पड़ेगा।
यदि सुरक्षा परिषद में सुधार नहीं हुआ और नियमों पर आधारित व्यवस्था ध्वस्त हो गई, तो दुनिया एक ऐसे 'तृतीय विश्व युद्ध' या सतत क्षेत्रीय युद्धों के युग में प्रवेश कर सकती है, जहाँ कोई भी देश सुरक्षित नहीं रहेगा।
# सुरक्षा परिषद की पंगुता और लापरवाही के लिए वीटो पावर वाले पाँचों स्थायी सदस्य (P5) ज़िम्मेदार
सुरक्षा परिषद की पंगुता और लापरवाही के लिए वीटो पावर वाले पाँचों स्थायी सदस्य (P5) ज़िम्मेदार हैं, लेकिन वीटो के दुरुपयोग के आंकड़ों, अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के उल्लंघन और हाल के वर्षों में पैदा हुए वैश्विक संकटों के आधार पर इनका क्रम इस प्रकार है:
एक, रूस (पूर्व सोवियत संघ) — सर्वाधिक वीटो (120 से अधिक बार): रूस वीटो का सबसे अधिक इस्तेमाल करने वाला देश है। शीत युद्ध के समय से लेकर आज तक उसने सबसे ज्यादा बार वैश्विक प्रस्तावों को रोका है।
(i) लापरवाही और उल्लंघन: 2022 में यूक्रेन पर आक्रमण करके रूस ने संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सबसे बुनियादी नियम (संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता) का उल्लंघन किया।
(ii) दुरुपयोग का तरीका: यूक्रेन युद्ध से जुड़े अपने खिलाफ आए प्रस्तावों को रूस ने वीटो से रोक दिया। इसके अलावा, सीरियाई गृहयुद्ध के दौरान सीरियाई शासन के खिलाफ रासायनिक हथियारों और युद्ध अपराधों से जुड़े 16 से अधिक प्रस्तावों पर रूस ने वीटो का इस्तेमाल किया।
दो, अमेरिका (संयुक्त राज्य अमेरिका) — दूसरा सबसे बड़ा प्रयोगकर्ता (80 से अधिक बार): अमेरिका ने शीत युद्ध के बाद से सबसे आक्रामक और बार-बार वीटो का इस्तेमाल किया है, विशेषकर मध्य पूर्व (Middle East) के मामलों में।
(i) लापरवाही और उल्लंघन: 2003 में सुरक्षा परिषद की अनुमति के बिना इराक पर आक्रमण करना अंतर्राष्ट्रीय कानून का सीधा उल्लंघन था।
(ii) दुरुपयोग का तरीका: अमेरिका ने अपने वीटो का इस्तेमाल मुख्य रूप से इज़राइल के बचाव में किया है। इज़राइल-फ़िलिस्तीन संघर्ष, गाजा में युद्धविराम और इज़राइली बस्तियों के निर्माण के खिलाफ आए बहुसंख्यक अंतर्राष्ट्रीय प्रस्तावों को अमेरिका ने अकेले वीटो करके खारिज किया है।
तीन, चीन — तेजी से बढ़ता दुरुपयोग (18 से अधिक बार):
यद्यपि चीन ने ऐतिहासिक रूप से कम वीटो का इस्तेमाल किया है, लेकिन पिछले दो दशकों में उसने रूस के साथ मिलकर वीटो का प्रयोग बहुत तेजी से बढ़ाया है।
(i) लापरवाही और उल्लंघन: दक्षिण चीन सागर (South China Sea) में अंतर्राष्ट्रीय न्यायाधिकरण (PCA) के फैसले को मानने से इनकार करना और ताइवान पर सैन्य दबाव।
(ii) दुरुपयोग का तरीका: चीन ने वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ भारत और अन्य देशों के प्रयासों को रोकने के लिए कई बार वीटो/टेक्निकल होल्ड का इस्तेमाल किया (जैसे आतंकवादियों को ब्लैकलिस्ट होने से बचाना)। इसके अलावा, सीरिया, म्यांमार और उत्तर कोरिया के मानवाधिकार उल्लंघन के प्रस्तावों पर उसने रूस का साथ देकर वीटो किया।
चार, यूनाइटेड किंगडम (यूके) — 29 बार वीटो (1989 के बाद से 0): यूके ने शीत युद्ध के दौरान (विशेषकर अपने उपनिवेशों और स्वेज नहर संकट के समय) अमेरिका और फ्रांस के साथ मिलकर कई वीटो दिए।
(i) लापरवाही और उल्लंघन: 2003 में इराक युद्ध में बिना UN अनुमति के अमेरिका का साथ देना।
(ii) वर्तमान स्थिति: ब्रिटेन ने 1989 के बाद से एक भी वीटो का इस्तेमाल नहीं किया है। ब्रिटेन अब सुरक्षा परिषद में वीटो के इस्तेमाल को सीमित करने और इसके विस्तार का समर्थन करता है।
पांच, फ्रांस — 16 बार वीटो (1989 के बाद से 0): फ्रांस ने मुख्य रूप से अपने औपनिवेशिक मामलों (जैसे कोमोरोस द्वीप) के दौरान वीटो का इस्तेमाल किया था।
(i) लापरवाही और उल्लंघन: लीबिया (2011) और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में सैन्य हस्तक्षेप, जिसने उन क्षेत्रों में लंबे समय तक अस्थिरता पैदा की।
(ii) वर्तमान स्थिति: फ्रांस ने भी 1989 के बाद से एक बार भी वीटो का इस्तेमाल नहीं किया है। फ्रांस उस प्रस्ताव का सबसे बड़ा समर्थक है जिसके तहत सामूहिक नरसंहार (Genocide) या युद्ध अपराधों के मामलों में P5 देशों को स्वेच्छा से वीटो का त्याग कर देना चाहिए।
वास्तव में, सुरक्षा परिषद को पंगु बनाने में रूस और अमेरिका सबसे आगे हैं, क्योंकि ये दोनों देश अपने भू-राजनीतिक स्वार्थों और सहयोगियों को बचाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय कानूनों को सबसे ज्यादा ताक पर रखते हैं। इसके बाद चीन का नंबर आता है, जो अपनी आर्थिक और सैन्य ताकत के बल पर वैश्विक जवाबदेही से बचता है।
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