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सिर्फ इतना याद रखना…

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सिर्फ इतना याद रखना… @ कमलेश पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार सिर्फ इतना याद रखना, जब ज्वार उठेगा तो भाटा भी आएगा। हर ऊँची लहर के बाद, समुद्र फिर शांत हो जाएगा। धैर्य को अपना दीपक बनाना, आशा को अपना पतवार। अँधियारे कितने भी गहरे हों, उगता है हर दिन नया उजियार। वक़्त कभी एक-सा नहीं रहता, सुख-दुःख आते-जाते मेहमान हैं। जो ठहरकर संघर्ष करता है, उसी के हाथों में सम्मान है। गिरना यदि जीवन की रीति है, तो उठना भी उसका विधान है। हर हार के गर्भ में छिपा हुआ, एक नई जीत का वरदान है। इसलिए घबराना मत साथी, कठिनाई से न नज़र चुराना। सिर्फ इतना याद रखना— जब ज्वार उठेगा तो भाटा भी आएगा, बस अपने मन में विश्वास जगाए रखना, और हर परिस्थिति में धैर्य बनाए रखना।

औषधि का असली अर्थ

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औषधि का असली अर्थ @ कमलेश पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार औषधि केवल शीशी में बंद, गोली, काढ़ा या इंजेक्शन नहीं, जीवन जीने की सच्ची कला भी स्वास्थ्य की सबसे बड़ी औषधि है कहीं। भोर की पहली किरण कहती है, जल्दी सोओ, जल्दी जागो। ईश्वर स्मरण, योग और प्राणायाम से, तन-मन में नवजीवन जागो। सूरज की गर्माहट, शीतल जल, हर कदम की सैर निराली। हर कौर को प्रेम से चबाना, यही सेहत की असली थाली। वज्रासन का छोटा-सा अभ्यास, उपवास का संयम महान। ध्यान, मौन और मधुर मुस्कान, भर देते जीवन में नवप्राण। हँसी सबसे सस्ती दवा है, संतोष सबसे बड़ा धन। शांत मन और निर्मल अंतःकरण, यही है सुख का सच्चा जीवन। ईमानदारी की उजली राह, सकारात्मक सोच का साथ। निस्वार्थ प्रेम और सेवा-भाव, खोल दें खुशियों की हर बात। परिवार संग बिताया हर पल, मित्रों का स्नेहिल व्यवहार। बिन मूल्य का ऐसा चिकित्सालय, जहाँ मिलता प्रेम अपार। मस्त रहो, व्यस्त रहो, स्वस्थ रहो, उत्साह रहे हर श्वास। हर नया दिन एक उपहार बने, हर क्षण में हो उल्लास। प्रकृति माँ की गोद में छिपी, जीवन की अनमोल विधि। जिसने इसका मर्म समझ लिया, उसी ने पा ली सच्ची औषधि। आओ ऐसा जीवन अ...

Where will India—as it sheds its boundaries of propriety—ultimately end up? The thought is frightening!

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आखिर मर्यादाएं खोता हुआ भारत जाएगा किधर, सोचकर लगता है डर!  @ गौरव पांडेय, स्वतंत्र पत्रकार व राष्ट्रवादी चिंतक https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-6262725213669814 भारत केवल भौगोलिक सीमाओं में बसा एक देश नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से चली आ रही जीवंत संस्कृति, शालीन परंपरा, मानवीय संस्कार और जीवन मूल्यों की सशक्त अभिव्यक्ति है। यहां परिवार को पहली पाठशाला माना गया और माता-पिता, गुरु, बुजुर्ग तथा समाज को व्यक्ति के चरित्र निर्माण का आधार समझा गया।  देश-काल-पात्र की कसौटी पर खरे संतों, ऋषियों-मुनियों और समाज सुधारकों ने अपने आचरण और विचारों के माध्यम से भारतीय समाज को मर्यादा, यम-नियम, संयम, सेवा, तप, त्याग और उत्तम आचरण का जो मार्ग दिखाया, वही लोककल्याणकारी समझा गया। वसुधैव कुटुंबकम और सर्वे भवंतु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया: का स्रोत भी यही उदात्त विचार है जो हमारी अमिट दुनियावी छाप बन चुका है। https://www.varta24live.com/top-news-old/where-will-indiaas-it-sheds-its-...