सऊदी अरब पर बढ़त बनाते यमनी आतंकी हुतियों को यदि समय रहते काबू में नहीं किया गया तो इसके भयानक वैश्विक दुष्परिणाम होंगे!

सऊदी अरब पर बढ़त बनाते यमनी आतंकी हुतियों को यदि समय रहते काबू में नहीं किया गया तो इसके भयानक वैश्विक दुष्परिणाम होंगे!

"खाड़ी-अरब देशों से अब अमेरिकी वर्चस्व खत्म होने के आसार बढ़े हैं और रूस, चीन समर्थित ईरान और उसके आतंकी गुटों का वर्चस्व बढ़ेगा। अभी शियाओं के इशारे पर सुन्नी बहुल सऊदी अरब को निशाना बनाया जा रहा है, फिर पाकिस्तान, तुर्कीए आदि के भी नंबर आएंगे। लेकिन जब ईरान अपने असली दुश्मन इजरायल से बदला लेगा और फिर जब शिया मुस्लिम देश जब किसी न किसी बहाने भारत पर हावी होने की कोशिश करेंगे, तब भारत को अपनी तटस्थता वाली गलतियों का एहसास होगा।"

@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक 

भारत के राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' ने अपनी कविता 'समर शेष है' में  लिखा है, "समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध, जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।" (संग्रह: परशुराम की प्रतीक्षा, 1953) भावार्थ यह कि युद्ध या संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है। अत्याचार और पाप के लिए केवल सीधे तौर पर हिंसा करने वाला (व्याध/शिकारी) ही दोषी नहीं है, बल्कि संकट के समय जो लोग चुपचाप तटस्थ (उदासीन या मौन) बने रहते हैं, समय या इतिहास उनके अपराधों को भी लिखता है। जब समाज में अन्याय हो, तब मौन रहना भी एक प्रकार का अपराध है। 

देखा जाए तो आज के खाड़ी और मध्य पूर्व (Middle East) में ईरान समर्थित गुटों (जैसे हुती, हमास और हिजबुल्लाह) के आक्रामक रुख और बढ़ते दबदबे पर उक्त कविता सटीक बैठती है। इस आग को भड़काने वाले 
अमेरिका-इजरायल-सऊदी अरब और इनके समर्थक देशों
की असहाय मुद्रा अब देखते बनती है। खबर है कि अमेरिका ने हुतियों से सांठगांठ कर ली है और सऊदी अरब को अकेला छोड़ दिया है। हालांकि इसका साइड इफेक्ट्स सिर्फ अमेरिका, इजरायल और इनके कट्टर समर्थक सुन्नी मुस्लिम देशों पर ही नहीं पड़ेगा, बल्कि देर सबेर इसकी आंच भारत तक भी पहुंचेगी! इसलिए सऊदी अरब पर बढ़त बनाते आतंकी हुतियों को यदि समय रहते काबू में नहीं किया गया तो भयानक वैश्विक दुष्परिणाम होंगे। पूरी अरब-खाड़ी दुनिया पर वर्चस्व 

ख़बर हैं कि हर ओर से निराश सऊदी अरब उस इस्राइल से मदद मांग रहा है जिसे वह अपना दुश्मन मानता है। इस्राइल के साथ उसके कूटनीतिक संबंध तक नहीं हैं। सवाल उठता है कि क्या इस्राइल सऊदी अरब की मदद करेगा? अगर करेगा तो किस रूप में? क्या इस मदद से सऊदी अरब हूतियों को रोक पाएगा? क्या उसके लिए अब समय आ गया है कि वह सीधे ईरान से बात करके समाधान निकाले? इसके लिए उसे यमन में कुछ खोना पड़ेगा? वैसे क्या उसे अब अपनी सुरक्षा व्यवस्था के बारे में भी नए सिरे से सोचना पड़ेगा? क्या उसे अभी भी मक्का समझौते पर भरोसा करना चाहिए? क्या पाकिस्तान पर निर्भरता का कोई मतलब रह गया है? शायद नहीं!

इसलिए भारत सरकार ने अपनी कूटनीतिक सक्रियता बढ़ा दी है और तेल आपूर्ति करने वाले प्रमुख देशों से संपर्क तेज कर दिया है। भारत के विदेश मंत्रालय ने भी मौजूदा हालात पर गहरी चिंता जताई है। मंत्रालय ने साफ कहा कि वह सऊदी अरब की संप्रभु जमीन पर हुए हमलों की निंदा करता है, खासकर नागरिक ढांचे और आर्थिक संपत्तियों को निशाना बनाने वाले हमलों की। ऐसे कदम क्षेत्रीय स्थिरता को कमजोर करते हैं और बाब अल-मंदेब से आने जाने की स्वतंत्रता को खतरा पहुंचाते हैं। ये भारत के लिए अस्वीकार्य हैं। भारत ने कहा कि उस क्षेत्र से ऊर्जा आपूर्ति फिलहाल जारी है और शांति बहाली की उम्मीद है। 

भारत इसलिए चिंतित है, क्योंकि लाल सागर और बाब अल-मंदेब उसकी ऊर्जा सुरक्षा के संवेदनशील रास्ते हैं। पश्चिम एशिया से आने वाले कच्चे तेल, एलपीजी और कुछ रिफाइंड उत्पादों का बड़ा हिस्सा इन्हीं जलमार्गों से गुजरता है। बाब अल-मंदेब स्ट्रेट अरब प्रायद्वीप पर स्थित यमन और अफ्रीका महाद्वीप (जिबूती और इरीट्रिया) के बीच एक संकरा जलमार्ग है। असली खतरा तब बढ़ेगा जब लाल सागर के साथ होमुर्ज स्ट्रेट जैसे दूसरे मार्ग भी लंबे समय तक ठप्प रहें। 

कहने का तात्पर्य यह कि खाड़ी-अरब देशों से अब अमेरिकी वर्चस्व खत्म होने के आसार बढ़े हैं और रूस, चीन समर्थित ईरान और उसके आतंकी गुटों का वर्चस्व बढ़ेगा। अभी शियाओं के इशारे पर सुन्नी बहुल सऊदी अरब को निशाना बनाया जा रहा है, फिर पाकिस्तान, तुर्कीए आदि के भी नंबर आएंगे। लेकिन जब ईरान अपने असली दुश्मन इजरायल से बदला लेगा और फिर मुस्लिम देश जब भारत पर हावी होंगे, तब भारत को अपनी तटस्थता वाली गलतियों का एहसास होगा। 

अनुभव इस बात की चुगली करता है कि जैसे पाकिस्तान और बांग्लादेश की बढ़ती कट्टरता पर भारत सरकार के मौन की कीमत हिन्दुओं ने चुकाई है, उसी प्रकार अमेरिका जैसे दुष्ट देश का पश्चिम एशिया से तंबू उखड़ने के बाद इजरायल और भारत का भविष्य क्या होगा, इसके लिए राष्ट्रकवि दिनकर की पंक्तियां आज भी प्रासंगिक हैं, यदि हम इससे सीख लेना चाहें तो।

जिस प्रकार यमन के ईरान समर्थित हुतियों ने सऊदी अरब के मोचा, धुबाब और हिस्न मुराद इलाकों पर कब्जा कर लिया है। इसके साथ ही आसपास के सभी सऊदी द्वीप भी हुतियों के नियंत्रण में चले गए हैं, यानी पूरी यमनी तट रेखा हुतियों के नियंत्रण में है। परिणाम स्वरूप पूर्व-पश्चिम ऑइल पाइपलाइन पूरी तरह से नष्ट हो चुकी है। इसका मतलब साफ है कि सऊदी अरब अब अपना 90 प्रतिशत तेल निर्यात नहीं कर सकता। 

इसके अलावा, वे अपना फॉस्फेट, अमोनिया, सल्फर, मेथनॉल, पेट्रोकेमिकल्स समेत यूरिया भी निर्यात नहीं कर सकते। कहने का तात्पर्य यह कि इनमें से किसी को भी निर्यात करने का कोई रास्ता बिल्कुल नहीं है। यह परिस्थिति वैश्विक खाद्य उत्पादन को आधा कर देगा। खासकर भारत, ब्राजील, यूरोप, अमेरिका, पाकिस्तान और कई देशों को सबसे अधिक संभावना गंभीर खाद्य संकट का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि हॉर्मुज जलडमरूमध्य भी बंद हो गया है।

सऊदी अरब के नेताओं ने ट्रंप से यमन पर बमबारी करने के लिए कई अनुरोध किए थे, लेकिन ट्रंप ने सभी को खारिज कर दिया। शायद इसलिए कि जब सऊदी अरब के अमेरिकी सैन्य बस पर ईरान हमले कर रहा था तो सऊदी अरब ने तटस्थता दिखाई थी। स्पष्ट है कि ईरान की रणनीति के आगे अमेरिका पस्त पड़ चुका है और खाड़ी/अरब देशों से अब उसका तम्बू उखड़ने ही वाला है। जिसके पाकिस्तान जैसे दोस्त हों, उसे दुश्मनों की क्या जरूरत? वह तो चीन के साथ मिलकर अमेरिका को खाड़ी/अरब देशों से हटाने की योजना पर अमल कर रहा है।

वहीं, सऊदी अरब ने मक्का समझौते की दुहाई देकर पाकिस्तान-तुर्किये के साथ बातचीत की, लेकिन परिमाण सिफर रहा। क्योंकि पाकिस्तान और तुर्कियों को पता है कि जिस ईरान, रूस, चीन के कम्बीनेशन के सामने अमेरिका-इजरायल पस्त पड़ गए, वहां इनकी क्या औकात? सऊदी अरब चाहता है कि उसके समर्थक देश मिलकर संयुक्त रूप से यमन में कई प्रमुख बुनियादी ढांचा स्थलों पर बमबारी करें, ताकि हुतियों के हौसले पस्त पड़ें। क्योंकि, सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से तबाह हो चुकी है। 

सऊदी अरब अब एक विनाशकारी पतन के कगार पर है और यह सबसे अधिक संभावना वैश्विक अकाल को बढ़ाएगा। वे अब विश्व बैंक से 72 अरब डॉलर का ऋण सुरक्षित करने की हताश कोशिश कर रहे हैं। हजारों सऊदी बल भी यमन के सामने आत्मसमर्पण करना शुरू कर चुके हैं। अब्हा, नज जाजान और खमीस में कई ऊर्जा स्थल पूरी तरह से नष्ट हो चुके हैं। सऊदी अरब अरामको पाइपलाइनों, सल्फर सुविधाओं और टर्मिनलों में हिस्सेदारी बेच रहा है ताकि लाभांश का भुगतान कर सके। 

यही कारण है कि सऊदी अरब यमन के हूतियों को रोकने के लिए बड़े पैमाने पर हमले के लिए तेजी से हताश हो रहा है। ऐसे में यदि सऊदी अरब ढह जाता है, तो दुनिया भर में लाखों परिवार भुखमरी का शिकार हो जाएंगे। शिया-सुन्नी का यह युद्ध एक मानवीय प्रलय में बदल रहा है। पिछले महीने धूमधाम से किया गया मक्का समझौता भी अब फेल हो गया है। यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब की हालत ख़राब कर रखी है मगर कोई उसकी मदद के लिए नहीं आ रहा है। 

ख़बर हैं कि सऊदी अरब उस इस्राइल से मदद मांग रहा है जिसे वह अपना दुश्मन मानता है। इस्राइल के साथ उसके कूटनीतिक संबंध तक नहीं हैं। सऊदी अरब ने समझा था कि मक्का समझौते के ज़रिए उसने अपने लिए एक रक्षा कवच तैयार कर लिया है। लेकिन मुसीबत के समय इस कवच ने धोखा दे दिया। पाकिस्तान ने साफ़ कह दिया कि वह दूसरे देश की धरती पर अपनी सेना नहीं भेजेगा। ध्यान रहे कि अमेरिका और ब्रिटेन पहले से ही हूती विद्रोहियों पर हमला करने से इंकार कर चुके हैं। वे केवल ख़ुफ़िया जानकारियाँ देने के लिए तैयार हैं, लेकिन सऊदी अरब की बात इससे बनने वाली नहीं है। क्योंकि हूतियों ने बाब अल मंदब पर कब्ज़ा कर लिया है और उनके हमले बढ़ते ही जा रहे हैं। वे उसके तेल कारखानों को निशाना बना रहे हैं। 

बाब अल मंदब पर हूतियों के कब्ज़े से सऊदी अरब के लिए तेल बेचने के सारे रास्ते बंद हो गए हैं। होर्मुज पहले ही बंद था। अभी तक वह लाल सागर से थोड़ा-बहुत तेल बेचने में कामयाब हो रहा था लेकिन अब वह भी नहीं कर सकता। होर्मुज और बाब अल मंदब दोनों रास्तों से दुनिया का क़रीब 32 फ़ीसदी तेल निर्यात होता है। लेकिन दोनों रास्तों के बंद होने से तेल की सप्लाई बुरी तरह से प्रभावित हुई है और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमतें एकदम से बढ़ गई हैं। इससे वैश्विक संकट खड़ा हो गया है।  

तेल की क़ीमतें अब 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई हैं। कहा जा रहा है कि अगर जल्दी ही कुछ न हुआ तो क़ीमतें 130-140 डॉलर तक पहुँच सकती हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प के लिए ये बहुत बुरी ख़बर है, क्योंकि ठीक मिड टर्म इलेक्शन के समय अमेरिका में गैसोलीन की क़ीमतें बढ़ गई हैं और महंगाई में भी उछाल आया है। हूतियों की कामयाबी ने मध्यपूर्व की राजनीति को भी बदल डाला है। ईरान अब और मज़बूत हो गया है और किसी भी बातचीत में उसका पलड़ा भारी रहने वाला है। 

वास्तव में ईरान समर्थित गुटों (जैसे हुती, हमास और हिजबुल्लाह) से अमेरिका-पाकिस्तान गठबंधन और पाकिस्तान के भीतर मौजूद अमेरिका-समर्थक समूहों पर गहरा असर पड़ रहा है, जिसके ​भू-राजनीतिक परिणाम (Geopolitical Impact) इस प्रकार होंगे :- 

एक, ​पाकिस्तान का रणनीतिक संकट: खाड़ी देशों (विशेषकर सऊदी अरब) में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने पाकिस्तान को बेहद असहज स्थिति में डाल दिया है। पाकिस्तान एक तरफ अमेरिकी आर्थिक सहायता और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) बेलआउट पर निर्भर है, तो दूसरी तरफ सऊदी अरब का पारंपरिक साझेदार है। बावजूद इसके खाड़ी में हुतियों और ईरान समर्थित समूहों का बढ़ता दबदबा पाकिस्तान के अमेरिका-समर्थक गुटों और सैन्य प्रतिष्ठानों को दबाव में ला रहा है।

दो, ​चीन और ईरान का बढ़ता असर: मध्य पूर्व में अमेरिका की पकड़ कमजोर होने या बहु-आयामी युद्ध में उलझने से चीन और ईरान के क्षेत्रीय नेटवर्क को बल मिला है। पाकिस्तान के भीतर अमेरिका-समर्थक नेतृत्व और लॉबी की तुलना में चीन और ईरान के प्रति झुकाव रखने वाले धड़ों की सौदेबाजी की शक्ति बढ़ रही है।

जहां तक ​आंतरिक और सामाजिक प्रभाव की बात है तो वह इस प्रकार है:- 

एक, ​कट्टरपंथ और जन-विरोध: हमास और हुतियों द्वारा अमेरिकी व इजरायली नीतियों के खिलाफ दिखाए गए आक्रामक रुख ने पाकिस्तान की आम जनता और धार्मिक संगठनों के बीच भारी सहानुभूति बटोरी है। इससे पाकिस्तान का अमेरिका-समर्थक राजनीतिक वर्ग बैकफुट पर आ गया है, क्योंकि किसी भी अमेरिकी नीति का खुलकर समर्थन करना उनके लिए राजनीतिक रूप से घाटे का सौदा बन गया है।

दो, ​आर्थिक दबाव: लाल सागर (Red Sea) और खाड़ी क्षेत्र में हुतियों के हमलों के कारण समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति बाधित हुई है। पाकिस्तान पहले से ही गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है; तेल की बढ़ती कीमतों और व्यापार में रुकावट ने देश के अमेरिका-समर्थक नागरिक प्रशासन को और कमजोर कर दिया है।

​कुल मिलाकर, खाड़ी में ईरान समर्थित गुटों के बढ़ते प्रभाव ने मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया में अमेरिकी प्रभाव को सीमित किया है, जिसके कारण पाकिस्तान के अमेरिका-समर्थक गुटों को अलग-थलग पड़ने और अपनी रक्षात्मक नीति अपनाने पर मजबूर होना पड़ रहा है।

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