मुख्यमंत्री शक्तिशाली हो सकता है, लेकिन संस्थाएँ उससे कमजोर नहीं होनी चाहिए!


मुख्यमंत्री शक्तिशाली हो सकता है, लेकिन संस्थाएँ उससे कमजोर नहीं होनी चाहिए: पंडित गोविंद बल्लभ पंत
           (10 सितंबर को जन्मदिन पर विशेष)
"समकालीन राजनीति में यूपी के मुख्यमंत्री पंडित गोविंद वल्लभ पंत की राजनीतिक उपयोगिता है: विनोद पंत, भाजपा नेता व समाजसेवी, वसुंधरा, गाजियाबाद"

@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

समकालीन राजनीति में उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री पं. गोविंद बल्लभ पंत की राजनीतिक उपयोगिता है, क्योंकि  यह केवल इतिहास को याद करने का विषय नहीं है बल्कि वर्तमान को और सुधारने का संकल्प भी हो सकता है। यह कहना है उनके पौत्र विनोद पंत का, जो खुद भाजपा नेता व समाजसेवी, वसुंधरा, गाजियाबाद  हैं। समकालीन राजनीति में यूपी के मुख्यमंत्री पंडित गोविंद वल्लभ पंत की राजनीतिक उपयोगिता के बारे में विनोद पंत बताते हैं कि स्वतंत्रता सेनानी से मुख्यमंत्री तक का सफर करने वाले पंत आज की राजनीति के लिए सुशासन, संघवाद, भूमि-सुधार, प्रशासनिक अनुशासन और राजनीतिक सहमति का एक उपयोगी राजनीतिक मॉडल प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने समयानुरूप भले ही कांग्रेस की राजनीति की हो, लेकिन प्रशासनिक नजरिए से भाजपा की समकालीन सियासत के लिए भी उनकी वैचारिक उपयोगिता है।
# पंत की राजनीतिक उपयोगिता: अतीत से वर्तमान तक

पं. गोविंद बल्लभ पंत उत्तर प्रदेश के पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री ही नहीं, बल्कि उस पीढ़ी के नेता थे जिसने स्वतंत्रता आंदोलन की राजनीति को शासन की राजनीति में बदलने की कठिन चुनौती स्वीकार की। वे 1937–39 और फिर 1946–54 तक संयुक्त प्रांत/उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। बाद में 1955 से 1961 तक केंद्रीय गृह मंत्री रहे और 1957 में भारत रत्न से सम्मानित हुए। आज जब राजनीति में व्यक्ति-केंद्रित नेतृत्व, जातीय ध्रुवीकरण, सत्ता के केंद्रीकरण और संघ-राज्य तनाव पर बहस तेज है, तब पंत का राजनीतिक चरित्र एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक संदर्भ बन सकता है। 

पहला सबक—राजनीति केवल चुनाव जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि राज्य-निर्माण का उपकरण है। पंत की सबसे बड़ी राजनीतिक उपयोगिता शायद यही है। उन्होंने सत्ता को केवल प्रशासन चलाने की मशीन नहीं माना। उनके समय में उत्तर प्रदेश में जमींदारी उन्मूलन जैसे बड़े संरचनात्मक परिवर्तन हुए। संसद के आधिकारिक अभिलेख में भी उल्लेख है कि उनके नेतृत्व में जमींदारी व्यवस्था समाप्त करने की दिशा में निर्णायक कदम उठाया गया और वे किसानों की समस्याओं की गहरी समझ रखते थे। आज की राजनीति में किसान, पिछड़ा वर्ग, भूमिहीन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक न्याय के प्रश्न फिर केंद्रीय हो रहे हैं। ऐसे में पंत की राजनीति यह सवाल उठाती है—क्या सरकारें केवल लाभार्थी योजनाएँ चलाएँगी या सामाजिक-आर्थिक संरचना में भी स्थायी बदलाव करेंगी?

दूसरा सबक—प्रशासन में राजनीतिक दृढ़ता और संस्थागत मर्यादा: पंत एक मजबूत प्रशासक थे, लेकिन उनका मॉडल केवल “कठोर शासन” नहीं था। संसद के अभिलेख उन्हें सक्षम प्रशासक और संविधानवादी नेता के रूप में रेखांकित करते हैं। वे कार्यक्रमों के प्रभावी क्रियान्वयन और लोकतांत्रिक संस्थाओं दोनों के महत्व को समझते थे। आज उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में कानून-व्यवस्था, नौकरशाही, निवेश, अपराध नियंत्रण और विकास की राजनीति के बीच यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि मजबूत सरकार और मजबूत संस्थाओं में संतुलन कैसे बनाया जाए। पंत का मॉडल कहता है— मुख्यमंत्री शक्तिशाली हो सकता है, लेकिन संस्थाएँ उससे कमजोर नहीं होनी चाहिए।

तीसरा सबक—जाति से ऊपर सामाजिक गठबंधन: पंत की राजनीति उस दौर की थी जब कांग्रेस एक व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाने का प्रयास कर रही थी। आज उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरण चुनावी रणनीति का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ऐसे माहौल में पंत की राजनीतिक उपयोगिता यह पूछने में है कि क्या राजनीति को केवल जातीय प्रतिनिधित्व तक सीमित रखा जाए या उससे आगे बढ़कर साझा नागरिकता और साझा विकास की राजनीति बनाई जाए। इसका अर्थ जातीय वास्तविकताओं की अनदेखी करना नहीं है। बल्कि सवाल यह है कि सामाजिक न्याय और सामाजिक एकता को परस्पर विरोधी बनाने के बजाय दोनों को साथ कैसे रखा जाए।

चौथा सबक—केंद्र और राज्य के बीच संतुलन: यह पहलू आज विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। पंत मुख्यमंत्री से केंद्रीय गृह मंत्री बने। इस कारण वे राज्य और केंद्र—दोनों स्तरों की शासन-व्यवस्था को समझने वाले नेताओं में थे। आज जब राज्यपाल, केंद्रीय एजेंसियों, जीएसटी, वित्तीय संसाधनों, कानून-व्यवस्था और केंद्र-राज्य अधिकारों को लेकर संघीय राजनीति में तनाव दिखाई देता है, पंत की विरासत से एक महत्वपूर्ण प्रश्न निकलता है— क्या भारतीय संघवाद प्रतिस्पर्धी राजनीति का अखाड़ा बनेगा या राष्ट्रीय लक्ष्यों और राज्यीय स्वायत्तता के बीच संतुलित साझेदारी का ढाँचा? यहीं पंत आज के राजनीतिक विमर्श में फिर प्रासंगिक हो जाते हैं।

पाँचवाँ सबक—हिंदी और भारतीय भाषाओं का प्रश्न: पंत हिंदी के प्रोत्साहन और प्रचार-प्रसार के समर्थक थे। उत्तर प्रदेश सरकार ने 2026 में भी उनकी पुण्यतिथि पर उनके हिंदी संबंधी योगदान को विशेष रूप से रेखांकित किया। 
आज जब भारतीय भाषाएँ डिजिटल मीडिया, AI, शिक्षा और प्रशासन में नई भूमिका तलाश रही हैं, पंत की विरासत को केवल “हिंदी बनाम अंग्रेजी” के पुराने विवाद में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसे इस रूप में देखा जा सकता है— क्या शासन की भाषा जनता की भाषा के जितना निकट होगी, लोकतंत्र उतना ही सहभागी बनेगा? लेकिन पंत को आज की राजनीति में पुनर्जीवित करने का खतरा भी है।

लिहाजा, यहाँ एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है। पंत को आज की किसी पार्टी या विचारधारा का सीधा राजनीतिक पूर्वज बना देना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा। वे स्वतंत्रता आंदोलन, कांग्रेस संगठन, संवैधानिक राजनीति और उस समय की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों से निर्मित नेता थे। इसलिए “पंत मॉडल” को किसी वर्तमान राजनीतिक दल का मॉडल घोषित करना ऐतिहासिक सरलीकरण होगा। उनकी वास्तविक उपयोगिता उनके राजनीतिक सिद्धांतों और प्रशासनिक दृष्टि में है—न कि उन्हें वर्तमान दलगत राजनीति का प्रतीक बना देने में।

# आज के उत्तर प्रदेश के लिए पंत मॉडल का अर्थ

यदि पंत की राजनीतिक विरासत को 2026 की राजनीति में पुनर्परिभाषित किया जाए तो उसके पाँच स्तंभ हो सकते हैं— पहला, सामाजिक न्याय के साथ सामाजिक एकता। दूसरा, मजबूत मुख्यमंत्री के साथ मजबूत संस्थाएँ। तीसरा, किसान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए संरचनात्मक सुधार। चौथा, केंद्र के साथ सहयोग, लेकिन राज्यों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा। पांचवां, चुनावी राजनीति से आगे दीर्घकालीन राज्य-निर्माण। यही पंत की सबसे बड़ी समकालीन राजनीतिक उपयोगिता है।

दरअसल, पंत को आज फिर पढ़ने की जरूरत इसलिए नहीं है कि वे अतीत के महान नेता थे; बल्कि इसलिए है कि आज की राजनीति में “सत्ता” तो बहुत दिखाई देती है, लेकिन “राज्य-निर्माण की राजनीति” अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है। और शायद यही इस विषय को एक धारदार राजनीतिक विचार का रूप देता है: “योगी के उत्तर प्रदेश में पंत की वापसी: क्या 21वीं सदी की राजनीति को 20वीं सदी के इस प्रशासक से कुछ सीखना चाहिए?” यह शीर्षक आज के उत्तर प्रदेश की राजनीति, योगी आदित्यनाथ के शासन मॉडल और पंत की प्रशासनिक विरासत को आमने-सामने रखकर एक बेहद प्रभावशाली राजनीतिक विचार बन सकता है। यदि हमलोग बनाना चाहें तो।

विनोद पंत बताते हैं कि उनके दादा जी गोविंद बल्लभ पंत के नाम से हॉस्पिटल, यूनिवर्सिटी, रोड, कई कॉलोनियों के नाम, कई शिक्षण संस्थान, कई रोजगार संस्था चल रही हैं।
ऐसे कई प्रकार के कार्य जो आज भी धीरे-धीरे चल रहे हैं, उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि है। एक वक्त था जब पंत जी ने उत्तराखंड के तराई वाले क्षेत्र में पहाड़ के लोगों को बुलाकर बसाया, क्योंकि खेती की जमीन थी। उस वक्त सब लोग वापस भाग गए, यह कहकर कि यहां पर मच्छर है, यहां पर जानवर है, वह भी एक वक्त था।

उसके बाद पंत जी ने हिंदुस्तान के विभिन्न जगहों से लोगों को वहां बुलाकर बसाया, जिससे आज वहां पर आबादी है, सब लोग संपन्न है और दिल से याद करते हैं। गांव खूंट में कई साल पहले एक उनका मूर्ति लगा जिसकी अभी तक देखभाल नहीं होती है। साल में एक बार राजनीतिक कारण चलते हुए एक माला डाल दी जाती है। हमारे उत्तराखंड में एक से एक राज्यपत्रित अधिकारी दिए जिन्हें कभी याद नहीं किया जाता। समाज भी याद नहीं करता।
राजनीति करने के लिए दूसरों के आगे पीछे घूमते हैं।
अपने समाज को किसी मंच पर याद नहीं करते।

आगे बताते हैं, हर कलाकार इतने बड़े प्रोग्राम करता है, कभी किसी को याद नहीं करता। हमें इतनी ताकत है, देश की बड़ी-बड़ी राजनीति में सहयोग करते हैं, पदों पर सहयोग करते हैं और उनका समाधान भी करते हैं। यह लोग राजनीति से ऊपर है। दिन आएगा चल जाएगा।
सरकारी कार्यों में काम हो जाएगा। कुछ यादें शेष रह जाएगी। वे उन महापुरुषों में थे लोग सोचते थे कि उनकी सोच उससे पहले वहां तक पहुंच जाती है। कभी जाति और समाज से कोई भेद नहीं की, जो हमने देखा हो, सुना अपने घर में और अपने क्षेत्र में। सादर नमन।

(यूपी के प्रथम मुख्यमंत्री के पौत्र विनोद पंत से बातचीत पर आधारित आलेख)

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