आखिर स्वदेशी की मृगमरीचिका में कबतक भटकती रहेंगी राजनीतिक-प्रशासनिक आस्थाएं?
आखिर स्वदेशी की मृगमरीचिका में कबतक भटकती रहेंगी राजनीतिक-प्रशासनिक आस्थाएं?
(After all, how long will political and administrative beliefs continue to wander in the mirage of Swadeshi?)
"सच कहूँ तो “स्वदेशी से आत्मनिर्भरता, आत्मनिर्भरता से प्रतिस्पर्धी भारत और प्रतिस्पर्धी भारत से विश्व बाजार में भारतीय नेतृत्व की पैठ बढ़ती है।” इसलिए प्रधानमंत्री मोदी ने अपने इंस्टा पोस्ट में देश को आत्मनिर्भर बनाने की आवश्यकता भी बतलाई है।"
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने "आर्थिक विकास दर" में उल्लेखनीय वृद्धि पर देशवासियों को बधाई देते हुए एक बार फिर से स्वदेशी का राग अलापा है और विदेशों से गैर जरूरी सोने की खरीद न करने, विदेश यात्रा से परहेज करने और विदेश में शादी करने से बचने की अपील की है। चूंकि ऐसा वो पहले भी कई बार कर चुके हैं, इसलिए सवाल उठता है कि आखिर स्वदेशी की मृगमरीचिका में राजनीतिक आस्थाएं कबतक भटकेंगी? जब स्वदेशी ही सफलता का मूल मंत्र है तो बार-बार आह्वान करने से बेहतर है, वैधानिक प्रतिबंध लगा देना, या मात्रा निर्धारित कर देना, या फिर उसपर ज्यादा कर लगा देना?
देखा जाए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “स्वदेशी” मंत्र का तातपर्य आज केवल “देश में बनी वस्तुएँ खरीदना” नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की व्यापक आर्थिक-रणनीति पर अमल करने के रूप में जाना जाता है, जो इस प्रकार है- पहला, “लोकल के लिए वोकल” इसका सबसे चर्चित सूत्र है। इसके पीछे broadly ये विचार हैं कि स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता मिले, जिससे भारतीय कारीगरों, किसानों, MSME और स्थानीय उद्यमों के उत्पादों को बढ़ावा मिलेगा। दूसरा, Made in India, Made for the World के तहत भारत में उत्पादन बढ़ाकर वैश्विक बाजार में भारतीय उत्पादों की हिस्सेदारी बढ़ाना है।
तीसरा, आयात पर निर्भरता घटाना खासकर रणनीतिक क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन और सप्लाई-चेन मजबूत करना लक्ष्य है। चौथा, स्वदेशी तकनीक यानी रक्षा, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, दूरसंचार और डिजिटल तकनीक में घरेलू क्षमता विकसित करना है। पांचवां, Vocal for Local यानी स्थानीय उत्पाद खरीदने और उनके बारे में लोगों को बताने की संस्कृति विकसित करना है। छठा, आत्मनिर्भर भारत: लक्ष्य दुनिया से अलग-थलग होना नहीं, बल्कि भारत को इतना सक्षम बनाना कि वह वैश्विक अर्थव्यवस्था में मजबूत साझेदार बने।
सच कहूँ तो “स्वदेशी से आत्मनिर्भरता, आत्मनिर्भरता से प्रतिस्पर्धी भारत और प्रतिस्पर्धी भारत से विश्व बाजार में भारतीय नेतृत्व की पैठ बढ़ती है।” इसलिए प्रधानमंत्री मोदी ने अपने इंस्टा पोस्ट में देश को आत्मनिर्भर बनाने की आवश्यकता भी बतलाई है। देखा जाए तो इस बार भी उन्होंने यह अपील इंस्टाग्राम पर वीडियो जारी करके की। याद दिला दें कि इसके पहले भी उन्होंने ऐसी ही अपील कुछ माह पहले तब की थी, जब पश्चिम एशिया संकट के चलते तेल के दाम लगातार बढ़ रहे थे। तब उन्होंने वर्क फ्राम होम को प्राथमिकता देने और पेट्रोलियम पदार्थों की खपत कम करने का भी आग्रह किया था।
इसलिए अब यह देखना है कि उनकी ओर से नए सिरे से की गई इस अपील का आम जनता पर कितना सकारात्मक असर दिखता है या नहीं दिखता है? चूंकि भारत अपनी आवश्यकता का अधिकांश सोना आयात ही करता है और इसके चलते चालू खाता घाटा बढ़ता रहता है, इसलिए उसकी खरीद से बचने में ही समझदारी है। सोने के प्रति तमाम आकर्षण के बाद भी लोगों को यह समझना होगा कि यह निवेश का उचित विकल्प नहीं है। ऐसा इसलिए भी किया जाना चाहिए, क्योंकि सोने से कोई नियमित आय नहीं होती।
लेकिन इसी के साथ सरकार को भी इस पर चिंतन-मनन-अध्ययन करना चाहिए कि आखिर वोकल फार लोकल यानी स्वदेशी वस्तुओं की खरीद का अभियान गति क्यों नहीं पकड़ पा रहा है? शायद इसलिए कि आज भारत में देशी-विदेशी कमाई युक्त व क्रय क्षमता से लैस एक ऐसा बड़ा उच्च वर्ग और मध्यवर्ग है, जो गुणवत्ता वाली वस्तुएं खरीदना पसंद करता है। खास बात यह कि वह ऐसी विदेश वस्तुएं इसलिए खरीदता है, क्योंकि भारत में वे या तो आसानी से उपलब्ध नहीं हैं या फिर विदेश के मुकाबले महंगी पड़ती हैं।
जानकारों का कहना है कि आज के ग्लोबल दौर में यह अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए कि लोग स्वदेशी के नाम पर देश में निर्मित कम गुणवत्ता वाली वस्तुएं खरीदना पसंद करेंगे। इसलिए सवाल उठता है कि आखिर भारतीय कारोबारी वैसी गुणवत्तायुक्त वस्तुएं क्यों नहीं बना पा रहे हैं, जिनकी भारतीय मध्य वर्ग के बीच मांग है? वहीं, गुणवत्तापूर्ण वस्तुएँ चेक करने वाले अधिकारी अपनी जिम्मेदारी क्यों नहीं निभा रहे हैं? क्या मिलावट और एसेंबलिंग वाली वस्तुओं को वोकल फ़ॉर लोकल के नाम पर बेचना जायज है?
सच कहूं तो नीति-नियंताओं को इस प्रश्न पर विचार करने के साथ ही यह भी जानने का प्रयास करना चाहिए कि यदि धनाढ्य भारतीयों का एक वर्ग विवाह के लिए भी विदेश जाना पसंद कर रहा है तो इसका कारण वहां मिलने वाली सुविधाएं हैं, क्योंकि आम तौर पर ऐसी सुविधाएं भारत में उपलब्ध नहीं होतीं और यदि कहीं कहीं उपलब्ध होती भी हैं तो वे विदेश के मुकाबले इतनी महंगी पड़ती हैं कि लोग विदेश जाना ज्यादा फायदेमंद समझते हैं। आखिर ऐसा क्यों है, किसकी लापरवाही से है, इसके वाजिब कारणों का निवारण करने की महती आवश्यकता है।
मेरा स्पष्ट मानना है कि यदि भारत को वाकई आत्मनिर्भर बनाना है तो भारतीय कारोबारियों को लोगों की आवश्यकता की हर किस्म की वस्तुओं का स्वदेश में निर्माण करना सुनिश्चित करना होगा। इस हेतु उन्हें प्रोत्साहित करना होगा? उन्हें यह सवाल खुद से ही करना होगा कि यदि चीन के कारोबारी यह काम कर ले रहे हैं और वे दुनिया के बाजारों में छा गए हैं तो फिर भारत के कारोबारी ऐसा क्यों नहीं कर पा रहे हैं?
# 1991 से 2026 तक में आरएसएस के स्वदेशी जागरण मंच से भाजपा के ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान तक पर गौर फरमाते हैं!
सवाल है कि क्या सियासी जज्बातों से परे हटकर नरेंद्र मोदी ने 35 साल बाद ही सही पर RSS का आर्थिक एजेंडा अपनाया है? तो जवाब होगा कि क्रमबद्ध रूप से इसे समझिए जो निम्नलिखित चरणों से गुजरते हुए यहाँ तक पहुंचा है। वर्ष 1991 में कांग्रेस गठबंधन वाली केंद्र सरकार ने जब भारत में आर्थिक उदारीकरण का रास्ता चुना था, तो उसी दौर में भारतीय जनता पार्टी की मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच (SJM) ने एक बिल्कुल अलग आर्थिक चेतावनी सामने रखी और बताया कि भारत की अर्थव्यवस्था को विदेशी पूंजी, आयात और बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर अत्यधिक निर्भर नहीं होना चाहिए। लेकिन हद तब हो गया जब भाजपाई प्रधानमंत्रियों अटल बिहारी बाजपेयी और नरेंद्र मोदी ने पने ही मातृ संगठन के राष्ट्रीय जज्बातों की घोर उपेक्षा की। लेकिन जब बदलती वैश्विक राजनीति में भारतीय मुद्रा और कारोबार को झटके पर झटके लगे और निजीकरण व उदारीकरण के ज्वार से भाटा की ओर भारतीय अर्थव्यवस्था उन्मुख हुई तो फिर तीन दशक के अधिक समय बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति में स्वदेशी मंत्र यानी ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘वोकल फॉर लोकल’, ‘मेक इन इंडिया’ और घरेलू उत्पादन जैसे नारे केंद्रीय आर्थिक भाषा बन चुके हैं।
यहीं एक बड़ा सवाल पैदा होता है कि....क्या साल 2026 का ‘आत्मनिर्भर भारत’ दरअसल 1990 के दशक के उसी ‘स्वदेशी’ एजेंडे का नया, राजनीतिक रूप से स्वीकार्य संस्करण है, जिसे कभी भाजपा की सरकारों ने भी पूरी तरह स्वीकार नहीं किया था? इस प्रश्न का उत्तर सीधा ‘हाँ’ या ‘ना’ नहीं है। असली कहानी इससे कहीं अधिक जटिल है। आइए इसे क्रमबद्ध रूप से समझते हैं......
# जानिए 1991 में उदारीकरण के समानांतर खड़ा हुआ ‘स्वदेशी’ अभियान
22 नवंबर 1991 को "स्वदेशी जागरण मंच" का गठन उस समय हुआ जब भारत आर्थिक संकट से निकलने के लिए नई आर्थिक नीति अपना रहा था। उस वक्त कांग्रेसी प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली सरकार और उसके तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह (अब भूतपूर्व स्व. प्रधानमंत्री) ने अर्थव्यवस्था को उदार बनाने, आयात प्रतिबंधों को कम करने, विदेशी निवेश आकर्षित करने और भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक बाजार से जोड़ने की दिशा में अत्यावश्यक कदम बढ़ाए।
# विद्वत संगठन "स्वदेशी जागरण मंच" ने इस दिशा पर सवाल उठाया।
तब विद्वत संगठन "स्वदेशी जागरण मंच" का तर्क था कि आर्थिक विकास का अर्थ केवल विदेशी निवेश आकर्षित करना नहीं है, बल्कि भारत की उत्पादन क्षमता, घरेलू उद्योग, छोटे कारोबार, रोजगार और आर्थिक संप्रभुता को भी प्राथमिकता मिलनी चाहिए। यानी 1990 के दशक में भारत के सामने दो अलग-अलग आर्थिक दर्शन दिखाई दे रहे थे— पहला, उदारीकरण यानी विश्व बाजार से जुड़ो, पूंजी आकर्षित करो, और प्रतिस्पर्धा बढ़ाओ। और दूसरा,
स्वदेशी यानी घरेलू उत्पादन बचाओ, स्थानीय उद्योग मजबूत करो और विदेशी निर्भरता सीमित करो, ताकि डॉलर के खेल में न फंसे भारत। किंतु विदेशी परस्त कांग्रेसी सरकार ने किसी की भी एक नहीं सुनी। संयुक्त मोर्चा सरकारों ने भी नौकरशाही का ही एजेंडा चलाया, ताकि उनकी जेबें गर्म होती रहें।
# लेकिन असली परीक्षा भाजपा की सत्ता में आने के बाद हुई
अगर स्वदेशी केवल कांग्रेस-विरोधी राजनीतिक हथियार होता तो कहानी बहुत आसान होती। लेकिन जब 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा सत्ता में आई तो फिर यहीं से स्वदेशी विचारधारा की सबसे कठिन परीक्षा शुरू हुई। क्योंकि तब एनडीए गठबंधन वाली वाजपेयी सरकार को भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ने, निवेश बढ़ाने, बुनियादी ढांचे का विस्तार करने और आर्थिक विकास की गति तेज करने की जरूरत थी। लिहाजा बाजपेयीसरकार ने उदारीकरण और निजीकरण की दिशा में कई कदम उठाए। यहीं से स्वदेशी जागरण मंच और भाजपा सरकार के बीच वैचारिक तनाव साफ दिखाई देने लगा।
तब भी स्वदेशी समर्थक संगठनों ने विदेशी निवेश, विनिवेश और कुछ आर्थिक सुधारों का विरोध किया। इसका अर्थ यह नहीं था कि संघ परिवार सरकार के खिलाफ खड़ा हो गया, बल्कि तस्वीर अधिक जटिल थी। तब संगठन की वैचारिक प्राथमिकताएँ और सरकार की व्यावहारिक आर्थिक जरूरतें अलग-अलग थीं। इसलिए सवाल उठता है कि तब क्या संघ मौन रहा? यह दावा कि संघ पूरी तरह मौन रहा, ऐतिहासिक रूप से सटीक नहीं होगा। क्योंकि
RSS और उससे जुड़े संगठनों ने समय-समय पर वैश्वीकरण, विदेशी पूंजी और आर्थिक नीतियों पर आपत्तियाँ उठाईं। स्वदेशी जागरण मंच ने कई नीतिगत फैसलों का विरोध किया।
लेकिन दूसरा सवाल अधिक महत्वपूर्ण है—क्या उस विरोध ने भाजपा सरकार की आर्थिक दिशा बदल दी? अधिकांश मामलों में जवाब है—पूरी तरह नहीं। यही वह जगह है जहाँ संघ परिवार और भाजपा की सत्ता-राजनीति के बीच संबंध को समझना आवश्यक है। संघ के पास वैचारिक प्रभाव था, लेकिन सरकार को बजट, निवेश, रोजगार, विकास दर, राजकोषीय स्थिति और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंधों जैसे व्यावहारिक प्रश्नों का सामना करना पड़ता था। इसलिए ‘स्वदेशी’ विचार को पूरी तरह लागू करना सत्ता के लिए उतना सरल नहीं था।
# अब समझिए कि मनमोहन सिंह सरकार ने क्या बदला?
जब 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व वाला UPA सत्ता में आई तो
उदारीकरण की दिशा समाप्त नहीं हुई, बल्कि आर्थिक वैश्वीकरण, सेवा क्षेत्र, विदेशी निवेश और निजी क्षेत्र की भूमिका आगे बढ़ती रही। हालांकि, विडंबना यह थी कि जिस उदारीकरण की वैचारिक आलोचना स्वदेशी जागरण मंच करता रहा था, उसी आर्थिक ढांचे में भारत ने तेज विकास, बढ़ते सेवा क्षेत्र और वैश्विक आर्थिक एकीकरण का दिलचस्प अनुभव किया। इसका मतलब यह नहीं कि स्वदेशी की सारी आशंकाएँ गलत थीं। किसानों, छोटे उद्योगों, रोजगार, आयात निर्भरता और आर्थिक असमानता से जुड़े प्रश्न लगातार बने रहे। यानी भारत ने उदारीकरण अपनाया, लेकिन स्वदेशी का प्रश्न समाप्त नहीं हुआ। वह लगातार पृष्ठभूमि में मौजूद रहा।
# 2014: पीएम नरेंद्र मोदी युग और ‘नई भाषा में स्वदेशी’
2014 के बाद आर्थिक राष्ट्रवाद की भाषा फिर मजबूत हुई।
Make in India, Skill India, Digital India, Startup India, Vocal for Local और अंततः Atmanirbhar Bharat जैसे अभियानों ने घरेलू उत्पादन और भारतीय क्षमता को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया। लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण बदलाव था। मोदी मॉडल ने 1990 के दशक के स्वदेशी को हूबहू स्वीकार नहीं किया, बल्कि उसने उसका नया संस्करण प्रस्तुत किया। चूंकि पुराना सवाल था कि विदेशी निर्भरता कम करो, तो नई नीति की भाषा बनी—भारत में उत्पादन करो, भारत को वैश्विक उत्पादन केंद्र बनाओ और दुनिया को निर्यात करो। यानी स्वदेशी से आत्मनिर्भरता और आत्मनिर्भरता से वैश्विक प्रतिस्पर्धा की ओर संक्रमण तेज हुआ।
# यक्ष प्रश्न: क्या मोदी ने 35 साल बाद ही सही पर RSS का एजेंडा स्वीकार किया?
जवाब होगा- कुछ हद तक—हाँ, लेकिन पूरी तरह—नहीं।
यह अंतर समझना बेहद जरूरी है। स्वदेशी जागरण मंच (SJM) की पारंपरिक सोच में विदेशी पूंजी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रति गहरा संदेह रहा है, जबकि मोदी सरकार की आर्थिक नीति इसके विपरीत विदेशी निवेश को पूरी तरह खारिज नहीं करती। लिहाजा भारत आज भी वैश्विक पूंजी, तकनीक और अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन को आकर्षित करना चाहता है। इसलिए मोदी का आत्मनिर्भर भारत आत्म-बहिष्कार नहीं है। यह वैश्वीकरण से बाहर निकलने के बजाय वैश्वीकरण में भारत की bargaining power बढ़ाने का प्रयास है। यही 1990 के दशक के स्वदेशी और 2020 के दशक के आत्मनिर्भर भारत के बीच सबसे बड़ा अंतर है।
सवाल: तो फिर 1990 के दशक का स्वदेशी इतना प्रभावशाली क्यों नहीं हुआ?
जवाब होगा कि इसके कई कारण हैं। पहला—समय बदल चुका था। दूसरा, 1991 के बाद दुनिया तेजी से वैश्वीकृत हो रही थी। तीसरा, WTO व्यवस्था, वैश्विक सप्लाई चेन, विदेशी निवेश और तकनीकी परिवर्तन ने देशों को एक-दूसरे से जोड़ दिया। अब इसे विस्तार से समझते हैं। पहला, भारत पूरी तरह अलग रास्ता नहीं चुन सकता था। दूसरा—सत्ता की आर्थिक मजबूरी यानी सरकारें केवल विचारधारा से अर्थव्यवस्था नहीं चला सकतीं। क्योंकि उन्हें निवेश चाहिए। रोजगार चाहिए। तकनीक चाहिए। निर्यात चाहिए। बुनियादी ढांचा चाहिए। इसलिए सत्ता में आने के बाद भाजपा सहित लगभग हर सरकार को वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के साथ तालमेल करना पड़ा। तीसरा—भाजपा का वैचारिक परिवर्तन यानी भाजपा भी समय के साथ बदली।
विपक्ष में रहते हुए उसकी भाषा अधिक वैचारिक हो सकती थी। किंतु सत्ता में आने के बाद उसे व्यावहारिक आर्थिक नीति बनानी पड़ी। इसलिए ‘स्वदेशी बनाम विदेशी’ की जगह धीरे-धीरे ‘भारतीय हित में वैश्विक पूंजी’ जैसी सोच विकसित हुई।
# लेकिन आज एक नई विडंबना सामने है
यदि 1990 के दशक में स्वदेशी जागरण मंच की कई आशंकाएँ थीं, तो आज भारत उन्हीं सवालों से नए रूप में जूझ रहा है। चीन पर निर्भरता, इलेक्ट्रॉनिक्स आयात,
सेमीकंडक्टर, रक्षा उपकरण, दवा उद्योग के कच्चे माल,
ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज और सप्लाई चेन। इन सभी क्षेत्रों ने दिखाया है कि अत्यधिक बाहरी निर्भरता रणनीतिक कमजोरी बन सकती है। यहीं स्वदेशी की पुरानी अवधारणा को नई प्रासंगिकता मिलती है।
# क्या संघ ने भाजपा को कभी कठघरे में खड़ा किया?
कई मौकों पर संघ परिवार से जुड़े संगठनों ने भाजपा सरकारों की आर्थिक नीतियों की आलोचना की है। लेकिन राजनीतिक रूप से एक सीमा के बाद टकराव नियंत्रित भी रहा। इसका कारण भी स्पष्ट है। RSS और BJP का संबंध केवल आर्थिक नीति पर आधारित नहीं है। दोनों के बीच व्यापक वैचारिक और संगठनात्मक संबंध हैं।
इसलिए आर्थिक मुद्दों पर मतभेद होने के बावजूद संबंध टूटने की स्थिति सामान्यतः नहीं बनी। यही कारण है कि 1990 के दशक का स्वदेशी आंदोलन भाजपा सरकारों की आर्थिक दिशा को पूरी तरह पलट नहीं सका।
# असली सवाल: क्या ‘स्वदेशी’ की जीत हुई?
शायद इसे जीत या हार के रूप में देखना उचित नहीं होगा, बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि स्वदेशी की भाषा बदल गई। 1991 में वह कहता था कि “विदेशी निर्भरता से सावधान।” जबकि 2026 में उसकी नई राजनीतिक अभिव्यक्ति कहती है कि “भारत इतना सक्षम बने कि उसे किसी एक देश पर निर्भर न रहना पड़े।” पहले जोर था—
स्थानीय उत्पादन बचाने पर। किंतु अब जोर है—स्थानीय उत्पादन को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने पर। पहले प्रश्न था कि विदेशी कंपनियों को कितना प्रवेश दिया जाए?
अब प्रश्न है कि विदेशी कंपनियों को भारत में उत्पादन के लिए कैसे आकर्षित किया जाए और उससे भारतीय रोजगार, तकनीक और निर्यात कैसे बढ़ाया जाए? यह एक बड़ा वैचारिक बदलाव है। इसलिए 35 साल बाद इतिहास का फैसला क्या कहता है? 1991 का स्वदेशी जागरण मंच तत्कालीन आर्थिक नीति को पूरी तरह बदल नहीं पाया। जब भाजपा सत्ता में आई तो उसने भी वैश्वीकरण को स्वीकार किया। कांग्रेस सरकारों ने उदारीकरण को आगे बढ़ाया।
लेकिन तीन दशक बाद वैश्विक संकटों, चीन पर निर्भरता और सप्लाई-चेन की कमजोरियों ने फिर वही सवाल सामने खड़े कर दिए—क्या आर्थिक विकास का आधार केवल वैश्विक बाजार हो सकता है? यहीं से ‘स्वदेशी’ की पुरानी चेतावनी को नई राजनीतिक उपयोगिता मिली। इस अर्थ में कहा जा सकता है कि मोदी का आत्मनिर्भर भारत 1990 के दशक के स्वदेशी का पुनर्जन्म नहीं, बल्कि उसका पुनर्पाठ है। और शायद यही सबसे बड़ा राजनीतिक व्यंग्य भी है कि, जिस स्वदेशी को कभी सत्ता के गलियारों में ‘अति-राष्ट्रवादी आर्थिक सोच’ मानकर किनारे किया जाता था, वही आज ‘आत्मनिर्भर भारत’ के रूप में सरकारी नीति की केंद्रीय भाषा बन चुका है।
लेकिन इतिहास का अगला प्रश्न अभी बाकी है, वह यह कि क्या आत्मनिर्भर भारत सचमुच आर्थिक स्वदेशी को जमीन पर उतारेगा, या यह भी वैश्वीकरण के भीतर भारतीय हितों को मजबूत करने की एक नई रणनीति बनकर रह जाएगा? इसका उत्तर नारों से नहीं, बल्कि आयात निर्भरता, घरेलू उत्पादन, रोजगार, MSME की स्थिति, तकनीकी आत्मनिर्भरता और भारतीय कंपनियों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा के आंकड़े देंगे। यही 1991 के स्वदेशी से 2026 के आत्मनिर्भर भारत तक की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक-आर्थिक यात्रा है।
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