बिहार के मुख्य सचिव-डीजीपी संग विधायक प्रशांत किशोर की वायरल फोटो देख दिल्ली के भाजपा रणनीतिकारों की बढ़ी बेचैनी
बिहार के मुख्य सचिव-डीजीपी संग विधायक प्रशांत किशोर की वायरल फोटो देख दिल्ली के भाजपा रणनीतिकारों की बढ़ी बेचैनी
(Viral photo of Prashant Kishor with Bihar's Chief Secretary and DGP sparks anxiety among BJP strategists in Delhi.)
"बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर अभी संख्या में छोटे हैं, लेकिन अपने राजनीतिक वजन को प्रशासनिक पहुंच में बदलने की कोशिश कर रहे हैं।” और सरकार के लिए संदेश है कि, “एक विधायक को गंभीरता से सुनना लोकतांत्रिक कमजोरी नहीं, बल्कि जवाबदेह शासन की ताकत है।” इसलिए इस फोटो को सत्ता में प्रशांत किशोर की एंट्री कहना अतिशयोक्ति होगी; लेकिन इसे प्रशासनिक पहुंच और राजनीतिक प्रभाव स्थापित करने की उनकी शुरुआती रणनीति कहना काफी हद तक उचित है।"
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
बिहार के मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत और डीजीपी विनय कुमार संग ब्राह्मण विधायक प्रशांत किशोर की वायरल फोटो देख दिल्ली के ओबीसी राजनेताओं व उनके राजदारों के होश उड़ चुके हैं। उनकी बेचैनी अब देखते-सुनते ही बनती है। बिहार में भाजपा के नेतृत्व में सरकार बने कई माह बीत चुके हैं, लेकिन राज्य की प्रशासनिक कुंजी अब भी नीतीश कुमार के भरोसेमंद अधिकारियों के पास ही बनी हुई है जिससे ब्रेक के बाद भाजपा की राजनीतिक फजीहत होती रहती है। चर्चा है कि पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने वफादार अधिकारियों के सहारे ही भाजपा के खिलाफ जब तब अपनी सियासी खीझ निकालते-निकलवाते रहते हैं। यह बिहार की गठबंधन राजनीति के लिए कोई शुभ संकेत नहीं है।
सवाल है कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के धुर विरोधी विधायक प्रशांत किशोर को जरूरत से ज्यादा तवज्जो आखिर किसके इशारे पर दे रहे हैं? क्या सूबे की ओबीसी राजनीति में दम घुटते दिग्गज सवर्ण अधिकारीगण इस फोटो के मार्फ़त ही कोई संदेश देना चाहते हैं, क्योंकि राजनेताओं के सामने तो उनकी जुबान अक्सर बंद ही रहती है। या फिर प्रशांत किशोर की सधी हुई राजनीति पर अधिकारीगण फिदा हैं! बात चाहे जो भी हो, बतंगड़ बन जाना अप्रत्याशित नहीं कहा जा सकता है।
देखा जाए तो बिहार की राजनीति में कुछ न कुछ ऐसा अवश्य होता रहता है जो बरबस आपका ध्यान खींच ले। ऐसा इसलिए कि यहां के बच्चे-बच्चे में विश्व के महान कूटनीतिज्ञ चाणक्य वाला प्रबुद्ध डीएनए मौजूद हैं। यह राजनीतिक पतंगबाजी वाला प्रदेश है जहां हर ऊंची उड़ती पतंग को काटने के प्रयत्न शुरू हो जाते हैं। ऐसे में मौजूदा मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को भी बार बार अपने कांटों भरे ताज को संभालना पड़ रहा है।
मसलन, उनके पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी यही करना पड़ता था। उनसे पहले मुख्यमंत्री रहे लालू प्रसाद और राबड़ी देवी जैसे जातिवादी समाजवादियों के काल में भी गठबंधन बदल या नेता-मंत्री बदल वाला बारहमासी अभियान चलता रहता था। उनसे पहले कांग्रेस के राजनीतिक वर्चस्व काल में तो ब्रेक के बाद मुख्यमंत्री बदल दिया जाता था।
ऐसे में आप समझ सकते हैं कि मुख्यमंत्री कोई भी हो, किसी दल या गठबंधन का हो, लेकिन अपनी राजगद्दी को लेकर कभी निश्चिंत नहीं रहा। हां, जनता दल, राजद व जदयू को कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस की ओर मेमना भरी नजरों से ताकना जरूर पड़ता था कि अभी सियासी रूप से हलाल मत कीजिए, कुछ वक्त और दे दीजिए। लेकिन चाहे कांग्रेस हो या भाजपा, यदि दिल्ली के सेटर नाराज हुए तो बाजा जल्दी बज जाएगा।
जैसे यूपी में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को उपमुख्यमंत्री केपी मौर्या से भय बना रहता है, वैसे ही बिहार में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा का डर दिखाया जाता है, ताकि दिल्ली की पूछ में कोई कमी नहीं रहे। बहरहाल बिहार में जनसुराज के संस्थापक और बांकीपुर विधायक प्रशांत किशोर ने विजय कुमार सिन्हा के आभामंडल को कमजोर कर दिया, क्योंकि वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पसंदीदा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की घरेलू सीट तक नहीं निकलवा पाए। लेकिन भाजपा उम्मीदवार को हराने वाले प्रशांत किशोर को जदयू और भाजपा के कैडर वोट का जमीनी साथ मिला, जिससे बिहार की ओबीसी राजनीति के दुर्दिन शुरू होने के संकेत मिलने लगे।
आप मानें या न मानें, बिहार में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद की सहमति के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता है। ऐसे में नीतीश कुमार के चहेते कायस्थ मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत और भूमिहार डीजीपी विनय कुमार ने भाजपा के शासनकाल में ही बांकीपुर सीट पर परोक्ष रूप से भाजपा की दुर्गति करवाकर मोदी-शाह को जो परोक्ष संदेश दिया, उसकी कलई तब खुली, जब राज्य के बड़े अधिकारियों के साथ प्रशांत किशोर की मुलाकात वाली फोटो वायरल हुई।
राजनीतिक सूत्र बताते हैं कि बिहार के चाणक्य नीतीश कुमार द्वारा प्रशांत किशोर से पुराने सम्बन्धों के आधार पर जो पर्दे के पीछे से हमदर्दी दिखाई गई, उन्हें जितवाया गया और अब उन्हें मशहूर करवाया जा रहा है, उसके पीछे भाजपा जैसे 'आस्तीन के सांप' के सामने जनसुराज जैसे 'असली राजनीतिक सांप' को तैयार करा देने की अनुभवी रणनीति है, जो एक तीर से कई शिकार करने से अभिप्रेरित है।
यह ठीक है कि मुख्य सचिव, डीजीपी और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ सामने आई बांकीपुर विधायक प्रशांत किशोर की तस्वीर को केवल एक शिष्टाचार मुलाकात माना जा सकता है, लेकिन यह मानना भी अधूरा होगा और इसे तत्काल “सत्ता में उनकी पकड़” का प्रमाण मानना भी जल्दबाजी होगी, क्योंकि उपलब्ध विवरणों में दोनों पहलू दिखाई देते हैं। फिर भी इसके पीछे की राजनीति को समझने की जरूरत है जो इस प्रकार है-
पहला, प्रशासनिक संदेश: विधायक की बात सीधे शीर्ष स्तर तक- बांकीपुर के नवनिर्वाचित विधायक के रूप में प्रशांत किशोर ने शुरुआत से ही स्थानीय समस्याओं—ट्रैफिक, सड़क, जल-निकासी, नागरिक सुविधाओं और कल्याणकारी योजनाओं—को शीर्ष प्रशासन तक ले जाने की कोशिश की है। DGP के साथ उनकी पूर्व बैठक में पटना की यातायात व्यवस्था और सड़क किनारे कारोबारियों से कथित अवैध वसूली जैसे विषय भी उठे थे।
इसका प्रशासनिक अर्थ यह है कि विधायक अपने क्षेत्रीय एजेंडे को विभागीय अधिकारियों की सामान्य फाइल-प्रक्रिया से ऊपर उठाकर समन्वित प्रशासनिक कार्रवाई तक ले जाना चाहते हैं।
दूसरा, लेकिन तस्वीर ने राजनीतिक अर्थ क्यों पैदा किया?
चूंकि तस्वीर में मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक (DGP) जैसे राज्य के सर्वोच्च नौकरशाह दिखाई दे रहे हैं। इसलिए राजनीतिक संदेश स्वतः बनता है: वह यह कि “जन सुराज का एकमात्र विधायक संख्या में छोटा है, लेकिन प्रशासनिक संवाद के स्तर पर खुद को छोटा नहीं दिखाना चाहता।” यह प्रशांत किशोर की राजनीति की एक महत्वपूर्ण विशेषता हो सकती है- संख्या से ज्यादा दृश्यता और प्रभाव का इस्तेमाल।
हालांकि, इसे संतुलित ढंग से देखना जरूरी है। ऐसा इसलिए कि बिहार सरकार के स्पष्टीकरण के मुताबिक, 27 अगस्त की मुलाकात मुख्य सचिव के कमरे में कोई विशेष संयुक्त बैठक नहीं थी; बल्कि मुख्य सचिव के कक्ष में पहले से बैठक चल रही थी, इसलिए प्रशांत किशोर से विजिटर रूम में मुलाकात हुई। अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी उसी समय वहां मौजूद थे।
तीसरा, प्रशासन के लिए भी यह संकेत महत्वपूर्ण है: नौकरशाही के सामने अब एक ऐसा विधायक है जो परंपरागत राजनीतिक शैली से अलग है—वह प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली को समझता है, मुद्दों को डेटा/नीति की भाषा में रखता है और सार्वजनिक रूप से अधिकारियों से संवाद को राजनीतिक पूंजी में बदल सकता है। इसलिए अधिकारियों के लिए संदेश दोहरा है: जनप्रतिनिधि की समस्याओं को गंभीरता से लें, लेकिन राजनीतिक निष्पक्षता और संस्थागत मर्यादा बनाए रखें। यही स्वस्थ लोकतांत्रिक संतुलन है।
चौथा, प्रशांत किशोर के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक लाभ:
यह फोटो उनके लिए “मैं सरकार के बाहर हूं, लेकिन शासन के मुद्दों पर प्रभावी हस्तक्षेप कर सकता हूं” वाली छवि बनाने में उपयोगी है। विशेषकर तब, जब जन सुराज विधानसभा में केवल एक सीट पर है। एक विधायक के पास संख्या बल नहीं है, लेकिन वह यदि—मुख्य सचिव तक पहुंच बना सके, DGP के साथ नागरिक समस्याओं पर चर्चा कर सके, विभागीय सचिवों को एक साथ बैठाकर समस्या रख सके, और फिर उसका परिणाम जनता के सामने ला सके, तो वह “एक विधायक बनाम पूरी व्यवस्था” वाली राजनीतिक कहानी को बदलकर “एक विधायक जो व्यवस्था को जवाबदेह बनाने की कोशिश कर रहा है” में बदल सकता है।
पांचवां, सरकार के लिए भी इसमें अवसर है: सरकार इसे राजनीतिक चुनौती मानने के बजाय यदि जनप्रतिनिधि–प्रशासन संवाद का मॉडल बनाए तो लाभ सरकार को भी होगा। लेकिन यहां एक महीन रेखा है। सकारात्मक मॉडल:
विधायक समस्या उठाए → अधिकारी सुनें → विभाग कार्रवाई करे → परिणाम सार्वजनिक हो। वहीं, खतरनाक मॉडल: विधायक और अधिकारी की निकटता की तस्वीरें → राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन → संस्थागत निष्पक्षता पर सवाल। अभी उपलब्ध तथ्यों के आधार पर दूसरे निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। स्वयं प्रशांत किशोर ने भी कहा कि अधिकारियों ने उन्हें समय “बड़प्पन” के कारण दिया, न कि किसी डर या उनके “ऑरा” के कारण।
छठा, असली राजनीतिक परीक्षा अभी बाकी है: फोटो महत्वपूर्ण नहीं है, उसके बाद होने वाली कार्रवाई महत्वपूर्ण है। अगर बांकीपुर की ट्रैफिक, नाली-गली, जल निकासी, सड़क, शिक्षा और नागरिक सुविधाओं पर ठोस फैसले आते हैं, तो यह मुलाकात प्रशांत किशोर के प्रशासनिक मॉडल की पहली सफलता मानी जाएगी। अगर केवल तस्वीरें और बयान रह जाते हैं, तो विपक्ष इसे “फोटो-ऑप और पावर-प्रोजेक्शन” कहेगा।
# इस फोटो सेशन से मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर क्या असर होगा? क्या नीतीश कुमार के इशारे पर यह सबकुछ संभव हुआ, या कोई और बात है?
हाँ—सम्राट चौधरी पर इसका राजनीतिक असर पड़ सकता है, लेकिन अभी इसे नीतीश कुमार के इशारे पर हुआ घटनाक्रम मानने के लिए ठोस प्रमाण नहीं हैं। उपलब्ध तथ्यों को जोड़ने पर तस्वीर कुछ ज्यादा दिलचस्प बनती है।
पहला, सम्राट चौधरी के लिए असली चुनौती क्या है? प्रशांत किशोर ने हाल में बांकीपुर उपचुनाव में भाजपा के तीन दशक पुराने गढ़ को तोड़ा और 64,151 वोट लेकर जीत दर्ज की। इसके बाद केवल कुछ पखवाड़े के भीतर उनका DGP से मिलना और फिर मुख्य सचिव से मुलाकात होना राजनीतिक रूप से यह धारणा बना सकता है कि—
“एक विधायक, लेकिन सरकार के सर्वोच्च प्रशासनिक तंत्र तक सीधी पहुंच।” यही चीज मुख्यमंत्री के लिए संवेदनशील है। क्योंकि मुख्यमंत्री की राजनीतिक शक्ति का एक बड़ा हिस्सा सरकार + संगठन + प्रशासन के समन्वय से बनता है। अगर कोई नया राजनीतिक चेहरा जनता के बीच यह स्थापित कर दे कि वह भी शीर्ष नौकरशाही तक सीधे पहुंच रखता है, तो मुख्यमंत्री के political command image पर दबाव बन सकता है। हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि मुख्य सचिव से मुलाकात पहले से तय थी और फोटो में दिख रहे अधिकारी वहां दूसरी बैठक के सिलसिले में पहले से मौजूद थे।
दूसरा, लेकिन क्या इससे सम्राट कमजोर होंगे? शायद
तुरंत नहीं, बल्कि सम्राट चौधरी के सामने दो रास्ते हैं।
पहला—इसे चुनौती मानें: प्रशांत किशोर की हर प्रशासनिक सक्रियता को राजनीतिक हस्तक्षेप मानकर दूरी बनाई जाए।
दूसरा—इसे लोकतांत्रिक अवसर बनाएं: PK को विधायक के रूप में समस्याएं उठाने दें और प्रशासन से उनका समाधान कराएं। दूसरा रास्ता सम्राट के लिए ज्यादा फायदेमंद हो सकता है। क्योंकि अगर बांकीपुर में PK द्वारा उठाए गए मुद्दों पर सरकार काम करती है तो श्रेय केवल PK को नहीं, सरकार को भी मिलेगा। और अगर समस्याएं हल नहीं होतीं तो PK के सामने एक कठिन सवाल खड़ा होगा—“आपके पास अधिकारियों तक पहुंच तो है, लेकिन परिणाम कहां है?” यही वह बिंदु है जहां सम्राट चौधरी PK की राजनीतिक ऊर्जा को अपने लिए अवसर में बदल सकते हैं।
तीसरा, सबसे दिलचस्प सवाल—क्या नीतीश कुमार के इशारे पर यह सबकुछ संभव हुआ? तो जवाब होगा कि
मेरे आकलन में अभी ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा। इसके तीन कारण हैं। पहला, मुख्य सचिवालय ने मुलाकात का अपना औपचारिक विवरण जारी किया है—PK ने 20 अगस्त को समय मांगा था और 27 अगस्त को मुलाकात निर्धारित हुई। दूसरा, PK और वर्तमान सरकार के संबंधों का हालिया रिकॉर्ड इतना सरल नहीं है। बांकीपुर चुनाव से पहले PK ने स्वयं सम्राट चौधरी, भाजपा और पुलिस प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए थे और यहां तक कहा था कि सम्राट को इस्तीफा देना पड़ेगा। तीसरा, PK ने स्वयं अधिकारियों के साथ मुलाकात को “डर या औरा” का परिणाम मानने से इनकार किया है। सरकार ने भी इसे सामान्य प्रशासनिक मुलाकात बताया है। इसलिए “नीतीश ने इशारा किया और प्रशासन PK के सामने झुक गया” वाली कहानी के लिए अभी प्रमाण नहीं है।
चौथा, फिर पर्दे के पीछे क्या हो सकता है? यहां तीन संभावनाएं ज्यादा तार्किक लगती हैं।
A. प्रशासनिक प्रोटोकॉल + PK की रणनीति: सबसे सरल व्याख्या यही है। PK विधायक बन चुके हैं। उन्होंने बाकायदा पत्र लिखकर मुख्य सचिव से समय मांगा। अधिकारी मिले। फिर PK की टीम ने तस्वीर को सार्वजनिक किया। यानी मुलाकात प्रशासनिक थी, लेकिन उसका राजनीतिक संचार बहुत कुशल था।
B. PK की नई रणनीति—“सिस्टम के भीतर से चुनौती”: यह ज्यादा महत्वपूर्ण संभावना है। PK अब केवल राजनीतिक भाषण देने वाले नेता नहीं हैं। वह विधायक हैं और प्रशासनिक तंत्र से काम करवाने की कोशिश कर रहे हैं। DGP से ट्रैफिक, नशे और वेंडरों की समस्या; फिर मुख्य सचिव से नागरिक सुविधाओं और कल्याणकारी मुद्दे—यह क्रम बताता है कि वह एक विधायक के रूप में शासन के delivery mechanism को target कर रहे हैं। यह उनकी 2029/2030 की बड़ी राजनीति के लिए महत्वपूर्ण प्रयोग हो सकता है।
C. नीतीश फैक्टर—संभावना, प्रमाण नहीं: नीतीश कुमार बिहार की राजनीति में लंबे समय से प्रशासनिक तंत्र और राजनीतिक गठबंधनों की बारीकियों को समझने वाले नेता रहे हैं। इसलिए राजनीतिक विश्लेषण में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या PK के लिए कोई अप्रत्यक्ष राजनीतिक स्पेस बनाया जा रहा है। लेकिन अभी इसे तथ्य की तरह कहना उचित नहीं होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि PK स्वयं हाल में सम्राट चौधरी के खिलाफ काफी आक्रामक रहे हैं। इसलिए फिलहाल “PK = नीतीश का प्रॉक्सी” वाला निष्कर्ष बहुत कमजोर है।
पांचवां, असली खेल शायद सम्राट बनाम PK नहीं है: मुझे लगता है कि बड़ा सवाल यह है: क्या बिहार की राजनीति में एक नया power triangle बन रहा है—सम्राट चौधरी, तेजस्वी यादव और प्रशांत किशोर? तेजस्वी पारंपरिक विपक्ष का चेहरा हैं। सम्राट सत्ता और NDA का चेहरा हैं।
PK अपने आपको “सत्ता और पारंपरिक विपक्ष दोनों के विकल्प” के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। यही कारण है कि PK लगातार सम्राट और तेजस्वी—दोनों को चुनौती दे रहे हैं। हाल ही में उन्होंने दोनों को मैट्रिक परीक्षा पास करने की सार्वजनिक चुनौती भी दी। यदि PK बांकीपुर से आगे बढ़कर पटना के शहरी मध्यवर्ग, युवाओं और रोजगार/शिक्षा/प्रशासनिक सुधार के मुद्दों पर अपना आधार बनाते हैं, तो सबसे ज्यादा दबाव भाजपा और सम्राट चौधरी पर पड़ सकता है, क्योंकि वह उसी राजनीतिक स्पेस में नए मतदाताओं को आकर्षित करने की कोशिश करेंगे।
छठा,. और एक बहुत महत्वपूर्ण संकेत: मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी इस समय दूसरी तरफ development + governance की अपनी कथा बनाने में लगे हैं—100 करोड़ रुपये से ऊपर की परियोजनाओं की समीक्षा और तेजी से क्रियान्वयन पर जोर, तथा शिक्षक भर्ती परीक्षा को एक चरण में कराने जैसे फैसले इसी दिशा में दिखाई देते हैं। इसलिए PK की चुनौती का सबसे प्रभावी जवाब PK को रोकना नहीं, बल्कि बेहतर शासन देना होगा।
निष्कर्ष यह है कि नीतीश कुमार का हाथ होने का प्रमाण अभी नहीं है, बल्कि सिर्फ चर्चा भर है। लेकिन यह घटना बिहार की राजनीति में एक दिलचस्प संदेश जरूर देती है: प्रशांत किशोर को केवल “एक विधायक” समझना अब सम्राट सरकार के लिए पर्याप्त नहीं होगा। वह संख्या में एक हैं, लेकिन narrative, media visibility, प्रशासनिक संवाद और राजनीतिक प्रयोग में अपनी संख्या से कहीं बड़ा प्रभाव पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। और यदि आने वाले महीनों में PK को प्रशासनिक पहुंच मिलती रहती है, उनके उठाए मुद्दों पर सरकारी कार्रवाई होती है और नीतीश कुमार के साथ उनके संबंधों में कोई नया सार्वजनिक समीकरण दिखाई देता है, तब यह केवल संयोग नहीं बल्कि बिहार के नए राजनीतिक power game का संकेत माना जा सकेगा।
जरा गौर कीजिए, एक विधायक (प्रशांत किशोर) मुख्यमंत्री के मुख्य सचिव से मिलने के लिए पत्र लिखता है। उसके बाद मुलाकात का समय तय होता है। फिर मुलाकात मुख्यमंत्री के कक्ष में नहीं, Visitor’s Room में होती है और सरकार को बाकायदा प्रेस विज्ञप्ति जारी कर यह बताना पड़ता है कि यह कोई असामान्य मुलाकात नहीं थी, बल्कि वहां पहले से अधिकारी मौजूद थे और जनप्रतिनिधियों से ऐसी मुलाकात होती रहती है।
सवाल मुलाकात का नहीं है। सवाल यह है कि सरकार को हर सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया पर सफाई क्यों देनी पड़ रही है? अगर व्यवस्था स्पष्ट है तो प्रेस विज्ञप्ति की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए। और अगर सफाई देनी पड़ रही है तो कहीं न कहीं संवाद और प्रबंधन में कमी जरूर है। बिहार को ऐसा नेतृत्व चाहिए जहां फैसले सोच-समझकर हों, अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच संवाद सहज हो और सरकार को हर दूसरे दिन अपनी ही व्यवस्था का बचाव न करना पड़े। सरकार चलाना सिर्फ कुर्सी संभालना नहीं है।
सरकार चलाने के लिए गंभीरता, संवाद और फैसलों में परिपक्वता भी चाहिए।
उधर, जब बिहार की राजधानी पटना में बांकीपुर और क्षेत्र की समस्या को लेकर चीफ सेक्रेटरी और डीजीपी से प्रशांत किशोर की मुलाकात मामले को लेकर सवाल उठने लगे तो पीके ने इस मामले पर अपना स्टैंड क्लियर किया है। पीके ने दो टूक कहा कि, "मैं मीडिया में ये स्पष्ट करना चाहता हूं कि जो भी सरकार के वरीय पदाधिकारी जो मिले हैं। वो हमारा कोई डर और औरा की बात नहीं है। ये उनका बड़प्पन है।" सुन लीजिए। उन्होंने समय दिया। उनका बड़प्पन है। बांकीपुर की समस्या को ले जाकर हमने बात की। इसको मीडिया वाले लोग ऐसे दिखा रहे हैं कि प्रशांत किशोर कोई बहुत बड़े आदमी हैं, इसलिए अधिकारी मिल रहा है, ऐसी कोई बात नहीं है। मैं उनका धन्यवाद कर रहा हूं। जो सीनियर पदाधिकारी हैं। उन्होंने समय निकाला और उन्होंने बातचीत की।
विधायक प्रशांत किशोर ने आगे कहा कि जरूरत इस बात की है कि बांकीपुर की समस्या का निदान हो। लोगों का काम हो। ये कोई वन ऑपमैनशीप वाली लड़ाई नहीं है। किसी भी पदाधिकारी के यहां जाना हो। वो चाहे चीफ सेक्रेटरी के यहां जाना हो। थानेदार के यहां जाना हो। हमको जाने में कोई दिक्कत नहीं है। बांकीपुर के लोगों का काम होना चाहिए। चीफ सेक्रेटरी के यहां जाना पड़ा, तो उनसे समय लेकर गए हैं। जरूरत पड़ेगा, तो थाने में जाना होगा, थाने में भी जाएंगे। उसके नीचे के भी कार्यालय है, उसमें भी जाएंगे। इसलिए मुख्यमंत्री को भी अब गंभीरता बरतने की जरूरत है! उनकी इस सधी हुई बयानबाजी से कई राजनीतिक संकेत मिलते हैं।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश शायद यह है कि “बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर अभी संख्या में छोटे हैं, लेकिन अपने राजनीतिक वजन को प्रशासनिक पहुंच में बदलने की कोशिश कर रहे हैं।” और सरकार के लिए संदेश है कि, “एक विधायक को गंभीरता से सुनना लोकतांत्रिक कमजोरी नहीं, बल्कि जवाबदेह शासन की ताकत है।” इसलिए इस फोटो को सत्ता में प्रशांत किशोर की एंट्री कहना अतिशयोक्ति होगी; लेकिन इसे प्रशासनिक पहुंच और राजनीतिक प्रभाव स्थापित करने की उनकी शुरुआती रणनीति कहना काफी हद तक उचित है।
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