......तो अब सोनिया गांधी ने 'विवादास्पद' किताब लिखकर छीन ली मोदी-भागवत की चैन!
......तो अब सोनिया गांधी ने 'विवादास्पद' किताब लिखकर छीन ली मोदी-भागवत की चैन
@ कमलेश पांडेय/ वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
पूर्व कांग्रेस अध्यक्षा और निवर्तमान यूपीए संयोजिका श्रीमती सोनिया गांधी की प्रस्तावित किताब ‘Belonging: A Journey of Love in India’ को लेकर विवाद पैदा हो गया है। यह विवाद इसलिए बड़ा हो गया है क्योंकि मामला सिर्फ किताब के प्रकाशन का नहीं, बल्कि मोदी सरकार, RSS, चीन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक दबाव के आरोपों तक पहुंच गया है। लिहाजा, इसके विभिन्न पहलुओं की चर्चा लाजिमी है।
बता दें कि यह किताब सोनिया गांधी का संस्मरण है, जिसमें उनके जीवन, राजीव गांधी से विवाह, भारत में उनके अनुभव और लगभग छह दशकों के सामाजिक-राजनीतिक बदलावों को उनके दृष्टिकोण से रखा गया है। खबर है कि अमेरिका में इसे Alfred A. Knopf से 10 नवंबर 2026 को प्रकाशित किया जाना प्रस्तावित है। इससे साफ है कि भारत विरोधी एजेंडा उसके कथित मित्र देश अमेरिका में ही तैयार होने वाला है। मुंह में राम, बगल में छुरी ही अमेरिकी विदेश नीति की सफलता का सार है, जिसके पीछे डीप स्टेट की रणनीति होती है!
सवाल है कि इस विवाद की शुरुआत कहाँ से हुई? जैसी की
रिपोर्ट सामने आई कि Penguin Random House India (PRHI) भारत में इस किताब को प्रकाशित करने से पीछे हट गया। शुरुआती खबरों में कहा गया कि पेंगुइन ने पांडुलिपि के कुछ हिस्सों में संपादकीय बदलाव/हटाने का सुझाव दिया था और सोनिया गांधी इसके लिए तैयार नहीं हुईं। जबकि इसमें कई सबसे संवेदनशील मुद्दे हैं, जिनमें से कौन-से बताए जा रहे हैं? यह समीचीन विषय है।
कांग्रेस नेताओं के अनुसार, जिन हिस्सों पर आपत्ति या संपादन की चर्चा हुई, उनमें मुख्यतः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी नीतियां, RSS, चीन और भारतीय क्षेत्र में चीनी घुसपैठ/कब्जे से जुड़े संदर्भ आदि बताए जा रहे हैं। वरिष्ठ कांग्रेस नेता व राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी कहा कि मुख्य विवाद इन्हीं विषयों से जुड़े हिस्सों को लेकर था। सवाल है कि फिर कांग्रेस ने सरकार पर आरोप क्यों लगाया? क्योंकि कांग्रेस का तर्क है कि अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वही किताब प्रकाशित हो सकती है, तो भारत में उसके प्रकाशन को लेकर इतनी परेशानी क्यों?
दरअसल पार्टी के कुछ नेताओं ने संकेत दिया कि प्रकाशक पर सरकारी दबाव हो सकता है और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़ दिया गया। यही वह बिंदु है जिसने एक लेखक-प्रकाशक विवाद को राजनीतिक विवाद में बदल दिया। ऐसे में स्वाभाविक सवाल है कि सोनिया गांधी एक लेखिका हैं या फिर उनकी नाम व पहचान का दुरुपयोग किये जाने की कोई शातिर रणनीति तैयार की गई है, शोध का विषय है।
लेकिन अपने ऊपर लगे आरोपों के बीच पेंगुइन ने क्या कहा? यह दिलचस्प है! यहीं कहानी में महत्वपूर्ण ट्विस्ट है।
Penguin Random House India ने 28 अगस्त को सफाई दी कि वह सोनिया गांधी की किताब का भारत में प्रकाशक है ही नहीं। उसने उन खबरों को भी गलत बताया जिनमें कहा गया था कि सोनिया गांधी द्वारा संपादकीय बदलाव स्वीकार न करने के कारण उसने किताब छोड़ दी।
पेंगुइन का कहना है कि प्रस्तावित किताब पर बातचीत हुई थी और फैक्ट-चेकिंग तथा संपादकीय सुझाव देना प्रकाशक की सामान्य जिम्मेदारी है। उसने यह भी संकेत दिया कि वह किताब के तीन हिस्से हटाने के लिए कहे जाने की बात को जिस तरह रिपोर्ट किया गया, वह सही नहीं है।
इसी मुद्दे पर BJP ने पलटवार किया है। BJP ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यह लेखक और प्रकाशक के बीच का मामला है, इसमें सरकार को घसीटने की जरूरत नहीं। BJP नेता अमित मालवीय ने भी सवाल उठाया कि आखिर किताब में तथ्य-जांच की जरूरत क्यों न होनी चाहिए।
# ऐसे में अब समझिए कि इसके पीछे की असली राजनीतिक पेच क्या है? देखा जाए तो इस विवाद को तीन स्तरों पर समझना चाहिए:
पहला—प्रकाशकीय स्तर: क्या वास्तव में कुछ राजनीतिक अंशों में बदलाव मांगे गए थे? इस पर मीडिया रिपोर्ट और कांग्रेस के दावे हैं, लेकिन Penguin की आधिकारिक सफाई इस कहानी को चुनौती देती है। इसलिए इसे अभी निर्विवाद तथ्य मानना जल्दबाजी होगी।
दूसरा—राजनीतिक स्तर: सोनिया गांधी की किताब में मोदी, RSS और चीन जैसे विषयों पर उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक दृष्टि सामने आती है तो स्वाभाविक रूप से वह चुनावी राजनीति में भी हथियार बन सकती है। कांग्रेस इसे सेंसरशिप के उदाहरण के रूप में पेश कर सकती है; BJP इसे फैक्ट-चेक और संपादकीय स्वतंत्रता का मामला बता सकती है।
तीसरा—लोकतांत्रिक स्तर: सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी राजनीतिक रूप से संवेदनशील लेखक की पुस्तक के प्रकाशन में संपादकीय सत्यापन और कानूनी सावधानी को ‘सरकारी दबाव’ कहा जा सकता है? इसका उत्तर तभी निर्णायक रूप से दिया जा सकता है जब पेंगुइन और सोनिया गांधी पक्ष से बातचीत/संपादन संबंधी वास्तविक दस्तावेज सामने आएं।
एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि किताब रुक नहीं गई है। भारत में इसका प्रकाशक बदल सकता है। रिपोर्टों के मुताबिक दूसरे प्रकाशक, विशेषकर HarperCollins, भारतीय संस्करण को प्रकाशित और वितरित करने की बातचीत में हैं। इसलिए फिलहाल इसे “सोनिया गांधी की किताब पर प्रतिबंध” कहना सही नहीं होगा। अधिक सटीक रूप से यह भारत में इसके प्रकाशन को लेकर प्रकाशक, लेखक और राजनीतिक दलों के बीच पैदा हुआ विवाद है।
# सवाल है कि आखिर सोनिया गांधी की किताब में ऐसा क्या है, जिससे सियासी तूफान उठा?
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह सोनिया गांधी का संस्मरण है और इसमें इटली से भारत आने, राजीव गांधी से विवाह, नेहरू-गांधी परिवार में प्रवेश, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की हत्याओं, राजनीति में उनकी अनिच्छुक एंट्री और कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उनके लंबे राजनीतिक जीवन की कहानी शामिल है। अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन 10 नवंबर 2026 के लिए निर्धारित बताया गया है।
जहां तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उल्लेख की बात है तो सबसे राजनीतिक हिस्सा है। रिपोर्टों के अनुसार विवादित अंशों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी नीतियों से संबंधित टिप्पणियां हैं। कांग्रेस नेताओं का दावा है कि भारतीय प्रकाशन को लेकर कुछ ऐसे अंशों पर संपादकीय आपत्ति हुई, जिनमें मोदी सरकार की नीतियों का आलोचनात्मक मूल्यांकन था। कुछ रिपोर्टों में प्रधानमंत्री मोदी की एक कथित “jersey cow” टिप्पणी का भी उल्लेख है। यही हिस्सा भाजपा के लिए भी राजनीतिक रूप से संवेदनशील है, क्योंकि पुस्तक सिर्फ इतिहास का दस्तावेज नहीं होगी—सोनिया गांधी स्वयं उस दौर की प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रही हैं।
जहां तक RSS का संदर्भ दिए जाने की बात है तो यह कांग्रेस बनाम विचारधारा की बात है। इस तरह से दूसरा बड़ा मुद्दा RSS से संबंधित बताया जा रहा है। कांग्रेस नेताओं के अनुसार पुस्तक में RSS की भूमिका और उसके राजनीतिक प्रभाव से संबंधित टिप्पणियां हैं, जिन्हें हटाने/बदलने की बात सामने आई। यहां विवाद सिर्फ एक संगठन का नहीं है। क्योंकि RSS को भाजपा की वैचारिक पृष्ठभूमि से जोड़कर देखा जाता है, इसलिए सोनिया गांधी का RSS पर लिखा हुआ कोई विस्तृत राजनीतिक आकलन कांग्रेस बनाम भाजपा की वैचारिक लड़ाई का दस्तावेज बन सकता है।
वहीं, चीन और भारतीय क्षेत्र — सबसे संवेदनशील राष्ट्रीय-सुरक्षा मुद्दा है। यानी तीसरा और शायद सबसे गंभीर विषय चीन और भारतीय क्षेत्र में चीनी घुसपैठ/अतिक्रमण से जुड़ा बताया गया है। अशोक गहलोत समेत कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि पुस्तक के चीन संबंधी हिस्से को हटाने या बदलने का सुझाव दिया गया था। यह मुद्दा राजनीतिक रूप से इसलिए विस्फोटक है क्योंकि चीन के साथ सीमा विवाद पर मोदी सरकार और विपक्ष के बीच पहले से तीखा राजनीतिक मतभेद है।
ऐसे में यदि सोनिया गांधी ने अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक भूमिका और उस समय की घटनाओं के आधार पर कोई नया विवरण दिया है, तो वह संसद से लेकर चुनावी मंच तक बहस का विषय बन सकता है।
# लेकिन यहां कहानी का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यही वह जगह है जहां सोशल मीडिया की कई सुर्खियां वास्तविक स्थिति को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर सकती हैं। Penguin Random House India ने 28 अगस्त को साफ कहा कि वह भारत में इस किताब का प्रकाशक नहीं है और उन रिपोर्टों का खंडन किया जिनमें कहा गया था कि सोनिया गांधी द्वारा संपादकीय बदलाव स्वीकार न करने के कारण उसने किताब प्रकाशित करने से हाथ खींच लिया।
पेंगुइन का पक्ष यह है कि किसी प्रस्तावित पुस्तक पर फैक्ट-चेक और संपादकीय सुझाव देना प्रकाशक की सामान्य प्रक्रिया है। इसलिए फिलहाल दो बिल्कुल अलग narratives हैं:
#कांग्रेस समर्थित आरोप/Penguin का पक्ष
1. राजनीतिक अंश हटाने को कहा गया/यह विवरण परिस्थितियों को सही ढंग से नहीं दर्शाता।
2. मोदी/RSS/चीन के संदर्भ निशाने पर थे/सामान्य editorial/fact-check प्रक्रिया।
3. सरकार का दबाव संभव/सरकार की भूमिका का दावा स्वीकार नहीं।
4. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल/Penguin भारत में प्रकाशक ही नहीं है।
# असली राजनीतिक खेल कहां है?
जानकारों के मुताबिक, इस विवाद को “किताब छपी या नहीं छपी” के बजाय चार स्तरों पर देखना चाहिए।
पहला — Sonia vs Publisher: अगर वास्तव में लेखक और प्रकाशक के बीच राजनीतिक सामग्री पर असहमति हुई, तो यह मूलतः लेखकीय स्वतंत्रता बनाम प्रकाशकीय जोखिम का मामला है।
दूसरा — Congress vs BJP: कांग्रेस इसे यह कहने के अवसर के रूप में इस्तेमाल कर सकती है कि “मोदी सरकार के दौर में असहज राजनीतिक इतिहास लिखने की आजादी पर दबाव है।” वहीं भाजपा का जवाब स्वाभाविक रूप से होगा: “फैक्ट-चेक को सेंसरशिप क्यों कहा जा रहा है?”भाजपा नेता अमित मालवीय पहले ही सवाल उठा चुके हैं कि आखिर किताब में क्या तथ्य-जांच की जरूरत थी।
तीसरा — Sonia Gandhi की राजनीतिक विरासत: यह शायद सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। सोनिया गांधी ने भारतीय राजनीति में लगभग तीन दशक बिताए। उनकी किताब UPA युग, मनमोहन सिंह सरकार, कांग्रेस नेतृत्व, 2004-2014 की राजनीति और मोदी युग के शुरुआती दौर को एक अंदरूनी दृष्टिकोण से प्रस्तुत कर सकती है। इसलिए किताब कांग्रेस के लिए सिर्फ संस्मरण नहीं है—यह अपनी राजनीतिक विरासत की कहानी खुद लिखने का प्रयास भी है।
चौथा — 2026 की राजनीति: और यहीं यह विवाद सबसे ज्यादा दिलचस्प हो जाता है। किताब का अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन नवंबर 2026 में प्रस्तावित है। यानी भारत में अगले राजनीतिक चक्र के पहले यह पुस्तक सार्वजनिक विमर्श में आ सकती है। अगर इसमें मोदी, RSS, चीन, राहुल गांधी, मनमोहन सिंह, UPA सरकार, 2014 के बाद कांग्रेस की गिरावट और सोनिया गांधी के अपने निर्णयों पर अंदरूनी टिप्पणियां हैं, तो किताब के कुछ अध्याय आने वाले महीनों में राजनीतिक ammunition बन सकते हैं।
# सबसे बड़ा सवाल: क्या यह “सेंसरशिप” है?
अभी निर्णायक रूप से नहीं कहा जा सकता। क्योंकि हमारे सामने फिलहाल किताब की विवादित पांडुलिपि या संपादकीय correspondence सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। एक तरफ कांग्रेस नेताओं के गंभीर आरोप हैं कि राजनीतिक अंश हटाने/बदलने को कहा गया। दूसरी तरफ Penguin ने इन दावों के आधार को चुनौती दी है और कहा है कि वह भारत में पुस्तक का प्रकाशक नहीं है।
इसलिए “RSS-मोदी-चीन का सच दबाने के लिए किताब रोक दी गई” कहना अभी आरोप है, स्थापित तथ्य नहीं।
लेकिन एक बात तय है, वह यह कि किताब का विवाद उसकी बिक्री बढ़ाने वाला साबित हो सकता है। जिस किताब को शायद केवल सोनिया गांधी का संस्मरण माना जाता, वह अब: Sonia Gandhi → Modi → RSS → China → Publishing Freedom → Political Pressure की पूरी राजनीतिक बहस बन गई है। और अगर भारत में कोई दूसरा प्रकाशक इसका संस्करण निकाल देता है, तो सबसे ज्यादा उत्सुकता इसी बात को लेकर होगी कि विवादित अंश आखिर प्रकाशित होते हैं या नहीं। यही इस पूरे मामले की असली अग्निपरीक्षा होगी। सियासी गलियारे में चकल्लस काटी जा रही है कि अब सोनिया गांधी ने 'विवादास्पद' किताब लिखकर छीन ली है मोदी-भागवत की चैन! कांग्रेस की आक्रामक प्लानिंग से सकते में है सरकार!
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