बुद्धिजीवी पर्व "रक्षा बंधन" को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सियासी फलक पर मजबूत विस्तार दीजिए, इतिहास के निहितार्थ को समझिए
बुद्धिजीवी पर्व "रक्षा बंधन" को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सियासी फलक पर मजबूत विस्तार दीजिए, इतिहास के निहितार्थ को समझिए
(Give a strong expansion to the intellectual festival "Raksha Bandhan" on the national and international political front, understand the implications of history)
"रक्षा बंधन को यदि केवल “बहन राखी बाँधे और भाई रक्षा का वचन दे” तक सीमित रखा गया तो यह पारिवारिक पर्व बना रहेगा। लेकिन यदि इसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अर्थ को आधुनिक लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, महिला गरिमा, पर्यावरण, नागरिक अधिकार और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से जोड़ा जाए तो यह एक असाधारण भारतीय soft-power narrative बन सकता है।"
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
यदि रक्षा बंधन को केवल भाई-बहन के भावनात्मक पर्व के बजाय एक सभ्यतागत, सामाजिक और कूटनीतिक प्रतीक के रूप में पढ़ें, तो इसका विस्तार राष्ट्रीय ही नहीं, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति तक किया जा सकता है। इसी में राष्ट्रीय हित निहित है। इतिहास में राखी/रक्षासूत्र के अनेक अर्थ रहे हैं—व्यक्तिगत स्नेह, सामाजिक संरक्षण, धार्मिक अनुष्ठान और राजनीतिक-सामाजिक संबंध। इसलिए इसके इतिहास को किसी एक घटना या एकमात्र कथा से जोड़ना उचित नहीं होगा।
# बुद्धिजीवी (ब्राह्मण) पर्व के रूप में रक्षा बंधन
पहला, राखी: निजी रिश्ते से सार्वजनिक सरोकार तक: रक्षा बंधन का मूल संदेश है—“मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा” नहीं, बल्कि “हम एक-दूसरे की रक्षा करेंगे।” यही फर्क इसे आधुनिक लोकतांत्रिक समाज के लिए महत्वपूर्ण बनाता है। आज इसकी व्याख्या इस रूप में की जा सकती है—
बहन–भाई के बीच परस्पर सम्मान, समाज में कमजोर की सामूहिक सुरक्षा, महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा का सामाजिक संकल्प, प्रकृति की रक्षा का पर्यावरणीय संकल्प, संविधान, लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की सामूहिक रक्षा, और सीमाओं से परे मानवता के प्रति साझी जिम्मेदारी, अर्थात राखी को “Protection” से “Mutual Responsibility” की ओर ले जाना होगा।
दूसरा, इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत:
रक्षा बंधन का इतिहास एकरेखीय नहीं है। प्राचीन और मध्यकालीन भारतीय साहित्य में रक्षासूत्र तथा रक्षा-संकल्प के विभिन्न रूप मिलते हैं। बाद के दौर में राखी ने सामाजिक और राजनीतिक संबंधों के प्रतीक के रूप भी ग्रहण किए। लेकिन इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण आधुनिक राजनीतिक प्रयोगों में से एक 1905 का बंग-भंग विरोधी आंदोलन है। तब रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बंगाल विभाजन के विरोध में हिंदू-मुस्लिम एकता को रक्षाबंधन के प्रतीक से जोड़ने का प्रयास किया। लोगों ने एक-दूसरे की कलाई पर राखी बाँधकर सामुदायिक एकता और बंगाली भाईचारे का संदेश दिया। यहीं से एक बड़ा राजनीतिक निहितार्थ निकलता है: राखी केवल दो व्यक्तियों को नहीं जोड़ती; वह दो समुदायों, दो सामाजिक समूहों और दो राजनीतिक संवेदनाओं के बीच विश्वास का धागा भी बन सकती है। इसे ही आज के भारत में नए अर्थ के साथ पुनर्जीवित किया जा सकता है।
तीसरा, राष्ट्रीय राजनीति में रक्षा बंधन का नया अर्थ: आज भारत में राजनीति का बड़ा संकट विश्वास का संकट है।
जाति बनाम जाति, धर्म बनाम धर्म, क्षेत्र बनाम क्षेत्र, उत्तर बनाम दक्षिण, बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक—राजनीतिक विमर्श में विभाजन की रेखाएँ लगातार उभरती रहती हैं। ऐसे समय में रक्षा बंधन का राजनीतिक संदेश हो सकता है: “प्रतिस्पर्धा लोकतंत्र में हो, शत्रुता समाज में नहीं।” सत्ता पक्ष विपक्ष की लोकतांत्रिक भूमिका की रक्षा करे। विपक्ष सरकार की संवैधानिक वैधता का सम्मान करे। बहुसंख्यक अल्पसंख्यक की सुरक्षा का संकल्प लें। समाज सक्षम वर्ग के साथ-साथ कमजोर वर्ग की गरिमा की रक्षा करे। और राज्य नागरिक के अधिकारों की रक्षा करे। यानी— रक्षा बंधन → सामाजिक अनुबंध → संवैधानिक नागरिकता।
चौथा, जाति की राजनीति के पार राखी: आज सामाजिक न्याय की राजनीति में सबसे कठिन प्रश्न है—प्रतिनिधित्व और सामाजिक एकता के बीच संतुलन कैसे बने? रक्षा बंधन इस बहस को एक नया प्रतीक दे सकता है। राखी बाँधने का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि सामाजिक असमानताएँ छिपा दी जाएँ। बल्कि संदेश हो: “समान सम्मान के बिना भाईचारा अधूरा है।” इसलिए एक आधुनिक बुद्धिजीवी रक्षा बंधन तीन चीजों को एक साथ स्वीकार करेगा— सामाजिक न्याय + समान अवसर + सामाजिक समरसता। यही इसे खोखले राजनीतिक नारे से अलग करेगा
पांचवां, महिला सशक्तीकरण का नया विमर्श: रक्षा बंधन को केवल “भाई बहन की रक्षा करेगा” तक सीमित करना आज के समय में अपर्याप्त है। आधुनिक अर्थ होना चाहिए: बहन भी भाई की रक्षा करे, भाई भी बहन की; और दोनों मिलकर समाज की गरिमा की रक्षा करें। इसमें महिला को केवल “सुरक्षा की पात्र” नहीं बल्कि समान नागरिक, निर्णयकर्ता और शक्ति के केंद्र के रूप में देखना होगा। इस दृष्टि से रक्षा बंधन को—Women’s dignity + Equal citizenship + Mutual respect का भारतीय सांस्कृतिक प्रतीक बनाया जा सकता है।
छठा, लोकतंत्र की कलाई पर राखी: कल्पना कीजिए—15 अगस्त के आसपास संसद में एक “संविधान रक्षा सूत्र” कार्यक्रम हो। सांसद एक-दूसरे को राखी बाँधें और संकल्प लें: संविधान की मर्यादा की रक्षा करेंगे। असहमति को देशद्रोह नहीं कहेंगे। चुनावी प्रतिस्पर्धा को सामाजिक दुश्मनी नहीं बनने देंगे। महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर नागरिकों की गरिमा की रक्षा करेंगे। लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता का सम्मान करेंगे। तब रक्षा बंधन सांस्कृतिक पर्व से लोकतांत्रिक संस्कार में बदल सकता है।
सातवां, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में “राखी डिप्लोमेसी”: यहाँ इसकी सबसे बड़ी संभावनाएँ हैं। भारत अपनी सांस्कृतिक कूटनीति में “Rakhi Diplomacy” को एक soft-power instrument के रूप में विकसित कर सकता है। कल्पना कीजिए कि भारतीय राजनयिक विभिन्न देशों में रक्षा बंधन के अवसर पर स्थानीय नागरिकों, विद्यार्थियों और समुदायों के साथ कार्यक्रम आयोजित करें। संदेश हो: “हम आपकी स्वतंत्रता और संप्रभुता का सम्मान करते हैं; आप हमारी साझी शांति और मानवता की रक्षा में हमारे साथ खड़े हों।”
यह सैन्य गठबंधन नहीं होगा। यह trust-building diplomacy होगी।
आठवां, पड़ोसी देशों के साथ राखी: भारत के लिए इसकी विशेष उपयोगिता दक्षिण एशिया में हो सकती है। नेपाल के साथ—साझी सभ्यता। भूटान के साथ—साझी शांति।
बांग्लादेश के साथ—साझा इतिहास और मानवीय संबंध।
श्रीलंका के साथ—समुद्री एवं सांस्कृतिक साझेदारी।
मालदीव के साथ—हिंद महासागर की साझा सुरक्षा,
और ASEAN देशों के साथ—Indo-Pacific partnership, राखी यहाँ किसी राजनीतिक प्रभुत्व का प्रतीक नहीं बल्कि विश्वास का सांस्कृतिक पुल बन सकती है।
नौवां, “रक्षा” का अर्थ युद्ध नहीं—मानव सुरक्षा: अंतरराष्ट्रीय राजनीति में “Security” का अर्थ अक्सर सेना, हथियार और सीमाओं से लगाया जाता है। लेकिन 21वीं सदी की सुरक्षा इससे बहुत बड़ी है। Food security, Water security, Health security, Cyber security, Climate security, Energy security and Human security,इसलिए भारत रक्षा बंधन पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नया संदेश दे सकता है: “सुरक्षा केवल सीमाओं की नहीं, मानवता की भी होनी चाहिए।” यह विचार भारत की वसुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा से भी जोड़ा जा सकता है।
दसवां, चीन, पाकिस्तान और अन्य देशों के संदर्भ में भी इसका अर्थ: यहाँ सावधानी जरूरी है। रक्षा बंधन को किसी देश के खिलाफ भावनात्मक या राजनीतिक हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए। यदि भारत किसी पड़ोसी के नागरिकों के साथ राखी का सांस्कृतिक कार्यक्रम करता है, तो उसका संदेश यह होना चाहिए: “हम राजनीतिक मतभेदों के बावजूद मानवीय संबंधों के पक्षधर हैं।” यही भारतीय soft power को अधिक विश्वसनीय बनाएगा।
ग्यारहवां, भारतीय विदेश नीति के लिए एक नया ब्रांड: भारत के पास योग है, आयुर्वेद है, बौद्ध दर्शन है, दीपावली है, भारतीय संगीत और सिनेमा है और रक्षा बंधन भी एक शक्तिशाली cultural diplomacy asset बन सकता है।
लेकिन इसके लिए उसे धार्मिक अनुष्ठान की सीमाओं से निकालकर universal human value के रूप में प्रस्तुत करना होगा। “Rakhi” का अंतरराष्ट्रीय संदेश: Trust, Respect, Protection, Solidarity, Peace, and Shared Responsibility.
बारहवां, बुद्धिजीवी रक्षा बंधन का घोषणापत्र: मेरे विचार से इसका सबसे प्रभावशाली रूप एक छोटे से संकल्प में हो सकता है: मैं केवल अपनी कलाई पर बंधे धागे की रक्षा नहीं करूँगा। मैं उस विश्वास की रक्षा करूँगा जो यह धागा पैदा करता है। मैं स्त्री के सम्मान की रक्षा करूँगा। कमजोर के अधिकार की रक्षा करूँगा। प्रकृति की रक्षा करूँगा। संविधान की मर्यादा की रक्षा करूँगा। लोकतंत्र में असहमति के अधिकार की रक्षा करूँगा। और राष्ट्रों के बीच शांति एवं मानवता के संबंधों की रक्षा करूँगा। यही “बुद्धिजीवी रक्षा बंधन” की असली अवधारणा हो सकती है।
# भारतीय राजनीति की एक दिलचस्प परंपरा है— सियासी रक्षाबंधन”
“सियासी रक्षाबंधन” भारतीय राजनीति की एक दिलचस्प परंपरा है—जहाँ राखी का पारिवारिक भाव धीरे-धीरे सामाजिक सद्भाव, राजनीतिक संरक्षण, महिला-सुरक्षा और वोट-समाज से जुड़ाव के प्रतीक में बदल गया है। रक्षाबंधन का मूल अर्थ ही रक्षा का बंधन है और सरकारी सांस्कृतिक व्याख्या भी इसे जाति-धर्म की सीमाओं से ऊपर भाईचारे और मानवीय संबंध का पर्व मानती है।
# सियासी रक्षाबंधन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
राखी को केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित मानना इतिहास को थोड़ा संकुचित कर देता है। रानी कर्णावती–हुमायूँ की प्रसिद्ध कथा में राखी को राजनीतिक सहायता और संरक्षण की अपील के रूप में देखा जाता है। हालांकि इस प्रसंग के ऐतिहासिक प्रमाण और विवरण को लेकर इतिहासकारों में मतभेद भी हैं, इसलिए इसे निर्विवाद ऐतिहासिक तथ्य की तरह प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। औपनिवेशिक और आधुनिक भारत में भी राखी ने सामाजिक-राजनीतिक अर्थ ग्रहण किए। बंगाल विभाजन के विरोध के दौरान रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने राखी को हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया था—यानी धागा राजनीतिक विभाजन के विरुद्ध सामाजिक एकता का संदेश बन सकता है।
# आज की राजनीति में इसका नया रूप
आज जब नेता राखी बंधवाते हैं तो उसका संदेश अक्सर तीन स्तरों पर पढ़ा जाता है—
पहला, महिला मतदाताओं से भावनात्मक संवाद: नेता महिलाओं से राखी बंधवाकर स्वयं को सुरक्षा, सम्मान और संरक्षण से जोड़ते हैं। 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अलग-अलग महिला समूहों और बच्चों ने राखी बांधी थी।
दूसरा, सामाजिक समूहों तक राजनीतिक पहुंच: राखी कार्यक्रम अब पार्टी मुख्यालयों और सार्वजनिक आयोजनों में भी दिखाई देता है। मसलन, 27 अगस्त 2026 को लखनऊ में सपा मुख्यालय में सैकड़ों महिलाओं ने अखिलेश यादव को राखी बांधी।
तीसरा, “संरक्षक” की राजनीतिक छवि: नेता अप्रत्यक्ष रूप से यह संदेश देते हैं— “आपका सम्मान और सुरक्षा मेरी जिम्मेदारी है।” यहीं से सियासी रक्षाबंधन भावनात्मक प्रतीक से आगे बढ़कर चुनावी संचार का माध्यम बन जाता है।
चौथा, राजनीतिक समरसता का प्रतीक: दलित नेत्री और उत्तरप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री मायावती जब भाजपा के ब्राह्मण नेता लखनऊ निवासी लाल जी टण्डन को राखी बांधती थी, तो इससे बसपा-भाजपा का पारस्परिक विश्वास मजबूत होता था और गठबंधन की कड़ी जुड़ी रहती थी, जबकि पार्टी स्तर पर कई मतभेद रहे।
# लेकिन एक बड़ा सवाल भी है
राखी का राजनीतिक इस्तेमाल तभी सार्थक है जब राखी के वादे का राजनीतिक अर्थ नीतियों में दिखाई दे। महिला सुरक्षा, शिक्षा, रोजगार, संपत्ति में अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और समान अवसर—इन सवालों पर ठोस काम के बिना राखी बंधवाना केवल फोटो-ऑप बन सकता है।
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी रक्षाबंधन के अवसर पर इसे महिलाओं की सुरक्षा और कल्याण के प्रति पुरुषों की जिम्मेदारी से जोड़ा था।
# 2026 का नया राजनीतिक संकेत
इस वर्ष रक्षाबंधन से ठीक पहले कृति सेनन के राखी विज्ञापन पर कपड़े, संस्कृति और महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर विवाद ने भी राजनीतिक बहस को जन्म दिया। राहुल गांधी ने महिला की पसंद और स्वतंत्रता का समर्थन किया, जबकि कंगना रनौत ने विज्ञापन की सांस्कृतिक प्रस्तुति पर सवाल उठाए।
इससे एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखता है—वह यह कि
राखी की राजनीति अब सिर्फ “कौन किससे राखी बंधवा रहा है” तक सीमित नहीं है; सवाल यह भी है कि राजनीति महिला को संरक्षण की वस्तु मानती है या समान अधिकार वाली नागरिक।
जहां तक असली सियासी परीक्षा की बात है तो आज की राजनीति में रक्षाबंधन का सबसे बड़ा अर्थ “बहन की रक्षा” से आगे “बहन के अधिकार” होना चाहिए। राखी → सुरक्षा → सम्मान → अधिकार → प्रतिनिधित्व → समान अवसर का प्रतीक बन चुकी है। अगर राजनीतिक दल इस पूरी कड़ी को नीति में बदलते हैं, तो सियासी रक्षाबंधन लोकतांत्रिक सामाजिक अनुबंध का सुंदर प्रतीक बन सकता है। अन्यथा यह केवल चुनावी मौसम का भावनात्मक आयोजन बनकर रह जाएगा।
और दिलचस्प बात यह है कि रक्षाबंधन को राजनीतिक-सामाजिक संगठन पहले से ही व्यापक सामुदायिक एकजुटता के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं; RSS ने भी इसे अपने संगठनात्मक पर्वों में शामिल कर भाईचारे के प्रतीक के रूप में पुनर्परिभाषित किया। इसलिए 2026 का सवाल यह नहीं कि नेता किसकी कलाई पर राखी बंधवा रहे हैं—बल्कि यह है कि वे राखी के धागे को सत्ता की जिम्मेदारी में कितना बदल रहे हैं।
निष्कर्ष यह कि रक्षा बंधन को यदि केवल “बहन राखी बाँधे और भाई रक्षा का वचन दे” तक सीमित रखा गया तो यह पारिवारिक पर्व बना रहेगा। लेकिन यदि इसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अर्थ को आधुनिक लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, महिला गरिमा, पर्यावरण, नागरिक अधिकार और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से जोड़ा जाए तो यह एक असाधारण भारतीय soft-power narrative बन सकता है। 1905 में राखी ने बंगाल में विभाजन के विरुद्ध सामाजिक एकता का प्रतीक बनने की क्षमता दिखाई थी। 21वीं सदी में वही धागा भारत के भीतर सामाजिक विश्वास और विश्व राजनीति में मानवीय साझेदारी का प्रतीक बन सकता है। एक पंक्ति में यदि कहूँ तो “राखी की कलाई छोटी है, लेकिन उसका राजनीतिक और सभ्यतागत संदेश विश्व जितना बड़ा हो सकता है।”
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