आखिर में देश के सामान्य जाति के युवाओं को गांव से महानगर तक क्या करना चाहिए जिससे आरक्षण की जातीय सोच बदले, आर्थिक-सामाजिक पिछड़ापन केंद्र में बने? समझिए
Ultimately, what should the general caste youth of the country, from villages to cities, do to change the caste-based approach to reservation and make socio-economic backwardness the center of attention?
आखिर में देश के सामान्य जाति के युवाओं को गांव से महानगर तक क्या करना चाहिए जिससे आरक्षण की जातीय सोच बदले, आर्थिक-सामाजिक पिछड़ापन केंद्र में बने? समझिए विस्तार से......
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक
आखिर देश के सामान्य जाति के युवाओं को गांव से महानगर तक क्या क्या करना चाहिए ताकि आरक्षण की जातीय, धार्मिक व क्षेत्रीय सोच बदले और संवैधानिक रूप से 'पददलित' गरीब प्रतिभावान लोगों को भी भविष्य में बराबरी का मौका मिले? निःसंदेह यह एक ऐसा जटिल प्रश्न है, जो उन सभी राजनीतिक दुविधाओं के समुचित जवाब दे सकता है, जिससे अक्सर राजनेता, उनके दल, अधिकारी, न्यायाधीश, संपादक आदि भागते तो हैं, लेकिन आपकी एकजुटता के बाद भाग नहीं पाएंगे, बल्कि सवालों के चक्रब्यूह में घिरकर अपनी जनतांत्रिक राजसी सुविधाओं को गंवाएंगे, जो गुलामी काल से जारी सत्तागत अतार्किक सुविधाओं को अब तक गंवाना नहीं चाहते और तमाम तरह के किंतु-परंतु करते करवाते रहते हैं!
किसी भी लोकतंत्र का मालिक, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के शब्दों में समाज का वह अंतिम गरीब व्यक्ति होता है, जो हमारी नीतियों के केंद्र में होना चाहिए, लेकिन हमारे नेता और नौकरशाह तो अमेरिका-चीन-रूस-यूरोप को केंद्र में रखकर नीतियां बनवाते हैं, जनप्रतिनिधियों को मिलाकर उसे पारित करवाते हैं और इस पर सवाल उठाने वाले बुद्धिजीवियों को जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र के नाम पर कठघरे में खड़ा करवाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं। तभी तो इन्होंने पिछले लगभग 80 सालों में दलित/आदिवासी/ओबीसी वर्ग के भीतर भी राजनीतिक, प्रशासनिक, न्यायिक और नवसामंती मानसिकता के पैरोकार पैदा कर रखें हैं जो ऐतिहासिक सामाजिक अन्याय के नाम पर अपने ही गरीब-पिछले भाइयों का रास्ता रोक रहे हैं! अतः इनके नापाक इरादों को बेनकाब करना भी हमारी सामूहिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
लेकिन यहां पर एक महत्वपूर्ण समझदारी बरतनी होगी। आपका लक्ष्य “आरक्षण खत्म करना” नहीं, बल्कि आरक्षण की नीति को अधिक न्यायपूर्ण, लक्षित और अवसर-समानता के अनुरूप बनाना होना चाहिए। यही वह सर्वमान्य रास्ता होगा, जो सामान्य वर्ग के युवाओं की मांग को संवैधानिक वैधता और व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता देगा। इस नजरिए से सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसा कोई भी जन-आंदोलन किसी जाति या जाति समूह के खिलाफ नहीं, बल्कि व्यवस्था की कमियों के खिलाफ हो। जिससे सबका नाता है। जब वो भी यह राज समझ जाएंगे तो आपके साथ खड़े दिखाई देंगे। जैसे कांग्रेसी भाजपाई बन गए, सेक्यूलर राष्ट्रवादी बन गए।
हमें यह याद रखना होगा कि संविधान स्वयं आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए भी विशेष प्रावधान की अनुमति देता है; साथ ही SC/ST/OBC के आरक्षण का आधार केवल गरीबी नहीं बल्कि ऐतिहासिक सामाजिक और शैक्षणिक वंचना भी है। इसलिए “गरीबी बनाम जाति” का सरलीकृत संघर्ष टिकाऊ समाधान नहीं देगा। लिहाज सामान्य वर्ग के युवाओं को क्या करना चाहिए? वह बात मैं एक एक करके समझा रहा हूँ। सबसे पहले आपलोग गांव-गांव और शहरी वार्ड-वार्ड स्तर पर प्रतिभा जागरूकता क्लब बनाइए, इसमें सभी जाति के प्रतिभावान लोगों को जोड़िए, जो ऐसा करना चाहें। फिर इसका जिलास्तरीय, राज्यस्तरीय व राष्ट्रीयस्तरीय संगठन बनाइये। ततपश्चात निम्त मुद्दों पर चरणबद्ध रूप से कार्य कीजिए।
पहला, “आरक्षण विरोध” से आगे बढ़कर “अवसर-सुधार आंदोलन” बनाइए। इसका नारा हो—“जाति नहीं, वंचना का वैज्ञानिक आकलन; प्रतिभा को अवसर, वंचित को संरक्षण।” फिर देखिए असर।
दूसरा, गांव-गांव व वार्ड-वार्ड के वास्तविक आंकड़े जुटाइए।
कितने गरीब सामान्य वर्ग के विद्यार्थी प्रतियोगी परीक्षाओं में फीस, कोचिंग, भाषा, डिजिटल सुविधा और आर्थिक कठिनाइयों के कारण पीछे रह जाते हैं—इसका जिला/प्रखंड स्तर पर डेटा तैयार किया जाए। भावनात्मक भाषण से ज्यादा ताकत सत्यापित आंकड़ों में होगी। इसी तरह के आंकड़े दलित/आदिवासी/ओबीसी वर्ग के भी बनवाइए। इसमें मिलावट न हो, पूर्वाग्रह न हो, अन्यथा मिशन विवादों में घिर जाएगा। यह सरकार का कार्य था, लेकिन वह नहीं करेगी, क्योंकि वह 'कॉरपोरेट एजेंट' बन चुकी है, पूरी सिस्टम को बनवा चुकी है। इससे ज्यादा तवज्जो देना राजनीतिक नादानी होगी।
तीसरा, EWS को मजबूत बनाने की मांग कीजिए। आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के युवाओं के लिए छात्रवृत्ति, मुफ्त/सस्ती कोचिंग, हॉस्टल, परीक्षा शुल्क सहायता, डिजिटल संसाधन और उच्च शिक्षा में अवसर बढ़ाने की मांग हो। संविधान का अनुच्छेद 16(6) आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण का संवैधानिक आधार देता है। इसी तरह की सुविधाएं उन दलितों, आदिवासियों, ओबीसी बंधुओं को भी दिलवाइए, जो अबतक वंचित हैं। इससे गांव-गांव, वार्ड-वार्ड में आप मजबूत होंगे और राजनीतिक दल कमजोर होते जाएंगे, क्योंकि उनमें दलगत विभाजन है। आप निर्दलीय बनिए, क्योंकि सभी दलों ने आपके वोट लेकर आपको छले हैं।
चौथा, केवल अपने लिए नहीं, बल्कि सबसे गरीब SC/ST/OBC युवाओं के लिए भी आवाज उठाइए।
यही आंदोलन को नैतिक शक्ति देगा। सवाल होना चाहिए: “आरक्षण का लाभ उस वर्ग के सबसे वंचित व्यक्ति तक कैसे पहुंचे?” क्यों नहीं पहुंचे? किनकी कीमत पर नहीं पहुंचे? ध्यान रखिये कि इस दिशा में सुप्रीम कोर्ट का 2024 का State of Punjab v. Davinder Singh फैसला महत्वपूर्ण है। जब सात-न्यायाधीशों की पीठ ने SC के भीतर उप-वर्गीकरण को कुछ संवैधानिक शर्तों के अधीन स्वीकार किया और प्रतिनिधित्व की वास्तविक स्थिति के लिए अनुभवजन्य आंकड़ों पर जोर दिया। बहुमत के कुछ मतों में क्रीमी-लेयर सिद्धांत पर भी चर्चा हुई। बस आपके मौलिक आंकड़ों से इनकी आंखें खुलेंगी और मेरी इन दलीलों से आपको लक्ष्य की प्राप्ति होगी।
पांचवां, “क्रीमी लेयर और लाभ के पुनर्वितरण” पर तथ्य आधारित राष्ट्रीय बहस छेड़िए। मगर सावधानी जरूरी है—यह कहना सही नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने-आप SC/ST के लिए कोई एक समान क्रीमी-लेयर व्यवस्था लागू कर दी है। फैसला राज्यों को उप-वर्गीकरण की संवैधानिक गुंजाइश देता है; वास्तविक नीति बनाना अलग प्रश्न है। बस आप सतत सक्रिय व जागरूक बने रहिए।
छठा, प्रतियोगी परीक्षाओं की असली बराबरी पर आंदोलन कीजिए। एक गांव का गरीब विद्यार्थी और महानगर के महंगे कोचिंग संस्थान में पढ़े विद्यार्थी के बीच परीक्षा-पूर्व संसाधनों का अंतर भी अवसर की असमानता है। इसलिए मांग हो कि समान गुणवत्तापूर्ण सरकारी कोचिंग, गांवों में डिजिटल अध्ययन केंद्र, मुफ्त टेस्ट सीरीज और पुस्तकालय,
परीक्षा शुल्क में लक्षित सहायता, पारदर्शी भर्ती, पेपर लीक पर कठोर कार्रवाई, भर्ती कैलेंडर का पालन, और आर्थिक रूप से कमजोर प्रतिभाशाली विद्यार्थियों के लिए मेंटरशिप की व्यवस्था सरकार करे। क्योंकि देश में ग्रामवासी बहुमत में हैं, शहरी नहीं, चाहे उनका जाति-धर्म कुछ हो।
सातवां, राजनीतिक दलों से जातीय वादों के बजाय “सामाजिक न्याय रिपोर्ट कार्ड” मांगिए। आप हर चुनाव में पूछिए कि कितने गरीब विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति मिली?
कितने पद खाली रहे? कितनी भर्तियां समय पर हुईं?
किस सामाजिक समूह की सरकारी सेवाओं में कितनी वास्तविक भागीदारी है? आरक्षण का लाभ कितने परिवारों तक बार-बार पहुंच रहा है? इससे उनकी आंखें खुलेंगी।
आठवां, सोशल मीडिया पर भाषा बदलना सबसे जरूरी है।
“सवर्ण बनाम दलित”, “आरक्षण बनाम मेरिट” जैसी भाषा समाज को और बांटेगी। इसके बजाय आप “सामाजिक न्याय + आर्थिक न्याय + अवसर की समानता + पारदर्शी भर्ती = वास्तविक समानता।” और सबसे महत्वपूर्ण—कानूनी रास्ता पर अपनी मुहिम केंद्रित कीजिए।
आपको यह नहीं भूलना चाहिए कि मुगलिया व ब्रिटिश काल में भारत की सामाजिक सहिष्णुता को रौंदा गया और फूट डालो और शासन करो वाली नीति के तहत जाति-धर्म जैसे विभेद पैदा किये गए। जहां ब्राह्मणों को मनुवादी ठहराया गया, वहीं, क्षत्रियों को मुसलमानों का पिट्ठू। लेकिन जब आप सबके हित की बात प्राचीन कालीन ब्राह्मणों की तरह करेंगे तो इससे आपस में फूट डलवाने वाली विदेशी ताकतें भी देर सबेर मुँहकी खाएंगी। उनके दलित साहित्य, पिछड़े साहित्य वाले षड्यंत्र धरे के धरे रह जाएंगे।
ऐसे में, वास्तविक तौर पर यदि कोई समूह व्यवस्था बदलना चाहता है तो उसे संसद, राज्य विधानसभाओं, न्यायपालिका, जनहित याचिकाओं, नीति-अध्ययन और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक आंदोलन का रास्ता अपनाना चाहिए। संविधान के खिलाफ कोई मांग आंदोलन को कमजोर करेगी। मेरे हिसाब से सामान्य वर्ग के युवाओं के लिए सबसे प्रभावी दीर्घकालीन एजेंडा यह हो सकता है: “आरक्षण हटाओ” नहीं → “आरक्षण को अधिक न्यायपूर्ण बनाओ।” “जाति से लड़ो” नहीं → “जातीय भेदभाव और अवसर की असमानता दोनों से लड़ो।” “दूसरे का अधिकार छीनो” नहीं → “हर गरीब प्रतिभावान को आगे बढ़ने का रास्ता दो।”
निःसंदेह यही दृष्टिकोण सामान्य वर्ग के आंदोलन को जातीय असंतोष से निकालकर संवैधानिक सामाजिक-सुधार आंदोलन में बदल सकता है। सदैव याद व भरोसा रखिए: साध्य कठिन हो, साधन चाहे स्वल्प। पूर्ण करेगा वह मेरा संकल्प। Set the target, hit the target- फिर नौकरशाही व न्यायपालिका इसे समझेगी। और आप जब सफल होंगे, राजनीतिक सफलता प्राप्त करेंगे, तो जो सरकारी सुविधा भोगी जमात है, उसे जनहित में कम उपभोग करने और त्याग करने की सीख देकर व्यापक नीतिगत बदलाव करवाइए। फिर यह राम राज्य का सूत्र बन जाएगा, तरह तरह से हरामखोरी के दिन लद जाएंगे। धैर्य व विश्वास रखिए।
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