परीक्षाओं में व्यापक सुधार और पेपर लीक रोकने से जुड़े यक्ष प्रश्नों को समझिए


परीक्षाओं में व्यापक सुधार और पेपर लीक रोकने से जुड़े यक्ष प्रश्नों को समझिए

(Understand the Yaksha questions related to comprehensive reforms in examinations and prevention of paper leaks)


"यद्यपि राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने छात्रों-युवाओं को पेपर लीक रोकने से लेकर परीक्षा प्रणालियों में सुधार का कदम उठाए जाने का भरोसा दिया है, फिर भी केंद्र सरकार से कुछ बुनियादी यक्ष प्रश्न पूछना लाजिमी है, क्योंकि सिस्टम के सड़ांध से छात्र परेशान हैं।"

@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

पेपर लीक अब केवल किसी एक परीक्षा या किसी एक राज्य की समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह मेहनत, मेरिट, रोजगार, प्रशासनिक विश्वसनीयता और देश की मानव पूंजी से जुड़ा प्रश्न बन चुका है। लिहाजा परीक्षाओं में व्यापक सुधार अपेक्षित है। यूँ तो स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने छात्रों-युवाओं को पेपर लीक रोकने से लेकर परीक्षा प्रणालियों में सुधार का कदम उठाए जाने का भरोसा दिया है, फिर भी केंद्र सरकार से कुछ बुनियादी यक्ष प्रश्न पूछना जरूरी है:

पहला यह कि हर बार पेपर लीक के बाद परीक्षा रद्द और पुनर्परीक्षा ही क्यों? दूसरा यह कि परीक्षा से पहले ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं बनती कि प्रश्नपत्र लीक होना लगभग असंभव हो? तीसरा यह कि जिम्मेदारी आखिर तय किसकी होगी? चौथा यह कि दलाल और छोटे कर्मचारियों की गिरफ्तारी के साथ परीक्षा संस्था के वरिष्ठ जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही कब तय होगी? पांचवां यह कि एक पेपर लीक की कीमत विद्यार्थी ही क्यों चुकाए?

छठा यह कि यात्रा, रहने, तैयारी और एक साल के समय का नुकसान झेलने वाले अभ्यर्थियों के लिए क्षतिपूर्ति की व्यवस्था क्यों नहीं? सातवां यह कि गरीब और ग्रामीण विद्यार्थी सबसे ज्यादा प्रभावित क्यों हों? आठवां यह कि महंगी कोचिंग का खर्च उठाने में असमर्थ विद्यार्थी बार-बार होने वाली परीक्षाओं और पुनर्परीक्षाओं का खर्च कैसे उठाए? नौवां यह कि परीक्षा कैलेंडर की विश्वसनीयता कब सुनिश्चित होगी? दसवां यह कि भर्ती परीक्षाओं की तारीख, परिणाम और नियुक्ति की निश्चित समयसीमा क्यों नहीं होनी चाहिए?

ग्यारहवां यह कि प्रश्नपत्र की पूरी सुरक्षा-श्रृंखला पारदर्शी क्यों नहीं हो सकती? बारहवां यह कि प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर परीक्षा केंद्र तक हर चरण का डिजिटल लॉग और स्वतंत्र ऑडिट क्यों न हो? तेरहवां यह कि परीक्षा संस्थाओं का स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट कौन करेगा? चौदहवां यह कि जिस संस्था पर परीक्षा कराने की जिम्मेदारी है, उसी पर उसकी सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी क्यों निर्भर रहे? पन्द्रहवां यह कि पेपर लीक और तकनीकी गड़बड़ी में फर्क कैसे तय होगा?

सोलहवां यह कि परीक्षा रद्द करने से पहले वैज्ञानिक तरीके से यह निर्धारित क्यों न किया जाए कि वास्तव में कितने अभ्यर्थी प्रभावित हुए? सत्रहवां यह कि दोषियों को सजा और निर्दोषों को न्याय—दोनों साथ कैसे मिलेंगे? अठारहवां यह कि जांच वर्षों तक चलने के बजाय समयबद्ध क्यों न हो? उन्नीसवां यह कि क्या केवल कड़ा कानून पर्याप्त है?बीसवां यह कि सजा बढ़ाने के साथ परीक्षा-प्रणाली की कमजोर कड़ियों को खत्म करने की ठोस कार्ययोजना कहाँ है?

इक्कीसवां यह कि AI और डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल कब व्यापक होगा? बाइसवां यह कि सुरक्षित प्रश्नपत्र वितरण, बायोमेट्रिक पहचान, CCTV, डिजिटल ट्रैकिंग और असामान्य गतिविधियों की पहचान जैसी तकनीकों का मानकीकरण क्यों न हो? तेइसवां यह कि कोचिंग माफिया और पेपर लीक नेटवर्क पर संयुक्त कार्रवाई कब? चौबीसवां यह कि केवल पेपर खरीदने वाले विद्यार्थियों या छोटे बिचौलियों तक जांच सीमित क्यों रहे? पच्चीसवां यह कि क्या परीक्षा सुधार को शिक्षा सुधार से अलग रखा जा सकता है?

छब्बीसवां यह कि गुणवत्तापूर्ण सरकारी शिक्षा और निःशुल्क डिजिटल तैयारी संसाधनों के बिना गरीब विद्यार्थी समान अवसर कैसे पाएगा? सत्ताईसवां यह कि क्या परीक्षा व्यवस्था रोजगार व्यवस्था से जुड़ी है? अट्ठाइसवां यह किलाखों युवाओं को वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं में लगाए रखने के बजाय शिक्षा, कौशल, रोजगार और उद्यमिता के वैकल्पिक रास्ते कितने मजबूत किए जा रहे हैं?उनतीसवां यह कि क्या परीक्षा व्यवस्था आर्थिक विकास का हिस्सा बनेगी? तीसवां यह कि यदि मानव पूंजी भारत की सबसे बड़ी ताकत है, तो उसकी प्रतिभा को निष्पक्ष परीक्षा और समयबद्ध नियुक्ति के माध्यम से अर्थव्यवस्था की उत्पादक शक्ति में बदलने की राष्ट्रीय रणनीति क्या है?

वहीं, सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह कि क्या भारत पेपर लीक होने के बाद कार्रवाई करने वाली व्यवस्था से आगे बढ़कर ऐसी परीक्षा प्रणाली बनाएगा जिसमें पेपर लीक की गुंजाइश ही न्यूनतम हो? क्योंकि एक पेपर लीक केवल प्रश्नपत्र नहीं लीक करता, बल्कि वह विद्यार्थी का समय, परिवार का पैसा, उसकी उम्मीद और व्यवस्था पर विश्वास भी लीक कर देता है।

और सबसे गरीब विद्यार्थी के लिए इसका अर्थ और भी गंभीर है: वह यह कि “जिसके पास कोचिंग के लिए पैसा नहीं, क्या उसके पास निष्पक्ष परीक्षा और अपनी प्रतिभा के बल पर आगे बढ़ने का भरोसा तो होना ही नहीं चाहिए?” यही प्रश्न परीक्षा सुधार को शिक्षा सुधार, सामाजिक न्याय और भारत की आर्थिक रफ्तार से जोड़ता है। इसलिए इस बारे में कोई भी लापरवाही भारत के युवा भविष्य से खिलवाड़ नहीं तो क्या है? 

मेरा सुझाव है कि सिर्फ एक शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से काम नहीं चलेगा, बल्कि भ्रष्टाचार से संक्रमित हर उस शख्स को सिस्टम से आउट किया जाए तो तुच्छ लाभ के लिए साधनहीन, सुविधाहीन लेकिन प्रतिभाशाली युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने की जुर्रत करता है। जो चाहता ही नही कि गरीब वर्ग के लोग आगे बढ़ें। वह आरक्षण की सोच में भी पलीता लगाता है, क्योंकि आरक्षित वर्ग के बच्चे भी परेशान हो रहे हैं।






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