क्या सीजेपी के युवा आंदोलन के पीछे किसी विदेशी शक्ति का हाथ है? पूछते हैं लोग!
क्या सीजेपी के युवा आंदोलन के पीछे किसी विदेशी शक्ति का हाथ है? पूछते हैं लोग!
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
देश में जब-जब कोई मजबूत सरकार बनती है, कुछ वर्ष टिकती है तो उसे उखाड़ फेंकने के लिए जनआंदोलन शुरू हो जाते हैं। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ सम्पूर्ण क्रांति (1975), पीएम डॉ मनमोहन सिंह के खिलाफ अन्ना आंदोलन (2010) और अब प्रधानमंत्री सेवक नरेंद्र मोदी के खिलाफ सोशल मीडिया से उपजी "कॉकरोच जनता पार्टी" (CJP) की युवा क्रांति (2026)! जो बेरोजगार युवाओं के बारे में सीजेआई की एक विवादास्पद टिप्पणी से उपजे जनअसंतोष के बाद डिजिटल इंटरनेट माध्यम पर पैदा होकर नई दिल्ली की सरजमीं पर आ धमकी है!
लिहाजा, आमलोगों के मन में यह आशंका सदैव पैदा हुई है कि कहीं इस आंदोलन के पीछे कोई विदेशी सहयोगी तो नहीं हैं, क्योंकि पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का विदेशी प्रेम, फिर सम्पूर्ण क्रांति की उपज प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई पर सीआईए के एजेंट होने के राजनीतिक आरोप और उसके बाद अन्ना आंदोलन जनित एनजीओ क्रांति की उपज मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर कनाडाई खालिस्तानियों के शुभचिंतक होने के जो सियासी आरोप लगे, उससे राजनेताओं को लेकर जनमानस में गहरा अविश्वास है। इनकी कहानियां भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय जब तब बनी रहती हैं।
यही नहीं, हरेक सफल/विफल आंदोलनकारियों की एक अलग अपनी अपनी राम-रहीम कहानी होती है, जो चटखारे के साथ सत्ता के गलियारों में बांची जाती है। इसलिए सीजेपी के मौजूदा आंदोलन के बारे में भी आमलोगों के दिलोदिमाग में कुछ ऐसे ही सुलगते सवाल हैं, जिनका जवाब भारत की खुफिया एजेंसियां या फिर आने वाला वक्त ही दे सकता है।
इसलिए तीखा सवाल है कि कहीं यह सीजेपी युवा क्रांति भी संपूर्ण क्रांति या अन्ना आंदोलन की तरह ही अमेरिकी डीप स्टेट का कोई गुप्त एजेंडा तो नहीं है? क्योंकि सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके का अमेरिका में रहना हुआ है। हालांकि, ऐसा दावा करने के लिए ठोस, सार्वजनिक और सत्यापित साक्ष्य चाहिए, जो अनुपलब्ध है, लेकिन आरोप हवा में तैरते हुए प्रासंगिक बने हुए हैं। अभी तक न तो कथित "कॉकरोच जनता पार्टी" के बारे में कोई व्यापक रूप से स्थापित जानकारी है, न ही यह प्रमाण है कि उसका संबंध किसी अमेरिकी "डीप स्टेट" या विदेशी गुप्त एजेंडे से है।
जहाँ तक जेपी आंदोलन और अन्ना हज़ारे आंदोलन का प्रश्न है, इनके बारे में भी समय-समय पर विभिन्न राजनीतिक धाराओं ने विदेशी प्रभाव, विदेशी फंडिंग या अंतरराष्ट्रीय हितों की भूमिका के आरोप लगाए हैं। लेकिन इतिहासकारों, शोधकर्ताओं और उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड में ऐसे आरोपों पर सर्वसम्मत निष्कर्ष नहीं है कि वे आंदोलन किसी अमेरिकी "डीप स्टेट" द्वारा संचालित थे।
किसी भी आंदोलन का आकलन करते समय कुछ प्रश्न अधिक उपयोगी होते हैं: यथा- उसका वित्तपोषण कहाँ से हो रहा है? नेतृत्व कौन कर रहा है? उसके घोषित उद्देश्य क्या हैं?क्या उसके दावों और गतिविधियों में पारदर्शिता है? क्या उसके पीछे किसी विदेशी सरकार, संस्था या नेटवर्क के प्रमाणित संबंध हैं? यदि इन प्रश्नों के उत्तर प्रमाणों के साथ उपलब्ध हों, तभी किसी विदेशी एजेंडे की बात विश्वसनीय रूप से कही जा सकती है।
यूँ तो राजनीति में "डीप स्टेट" शब्द अक्सर एक व्याख्यात्मक या आरोपात्मक अवधारणा के रूप में प्रयोग होता है। इसलिए किसी भी आंदोलन को विदेशी षड्यंत्र बताने या पूरी तरह स्वदेशी मान लेने से पहले साक्ष्यों की जांच आवश्यक है। बिना प्रमाण के ऐसे निष्कर्ष अटकल की श्रेणी में आते हैं, तथ्य की नहीं।
# आखिर सीजेपी का युवा आंदोलन विभिन्न मशहूर जनांदोलनों से अलग है या उन्हीं के जैसा हश्र होगा
यूँ तो सत्तापक्ष के खिलाफ विपक्षी दलों के छिटपुट आंदोलन ब्रेक के बाद चलते रहते हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर असरदार आंदोलनों के रूप में उनकी गणना प्रायः नहीं हो पाती है! इसी प्रकार से राज्य स्तर पर भी छिटपुट आंदोलन होते रहते हैं, लेकिन उनका राष्ट्रीय असर प्रायः गौण रहता आया है। हालांकि, यह भी सार्वजनिक चिंता बात है कि इन सभी आंदोलनों में युवाओं-बेरोजगारों को बतौर लोकतांत्रिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया, क्योंकि उनमें राजनीतिक-सामाजिक अनुभवों की कमी होती है।
चाहे गुलाम भारत की बात करें या आजाद भारत की, आंदोलन जीवियों ने अपने संघर्षों से सत्ताप्रतिष्ठान को चैन की सांस नहीं लेने दी। यदि आप गौर करेंगे तो भारत के सफल जनांदोलनों में कुछ समान विशेषताएँ दिखाई देती हैं, जैसे- व्यापक जनभागीदारी, स्पष्ट उद्देश्य, प्रभावी नेतृत्व, संगठनात्मक क्षमता और शांतिपूर्ण तथा लोकतांत्रिक दबाव। इन्हीं कारणों से ये आंदोलन केवल विरोध तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने नीतियों, कानूनों और राजनीतिक व्यवस्था पर भी गहरा प्रभाव डाला।
इसलिए अब आइए एक नजर डालते हैं पिछले लगभग 300 सालों के दस महत्वपूर्ण आंदोलनों पर- भारत के इतिहास में कई महत्वपूर्ण जनांदोलनों ने राजनीति, समाज और शासन की दिशा को प्रभावित किया है। संक्षेप में आधुनिक भारत के प्रमुख जनांदोलन इस प्रकार हैं: पहला, 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम: अंग्रेजी शासन के विरुद्ध पहला व्यापक सशस्त्र विद्रोह, जिसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की नींव रखी। दूसरा, असहयोग आंदोलन: यह महात्मा गांधी के नेतृत्व में चलाया गया, जिसका मकसद अंग्रेजी संस्थाओं और वस्तुओं के बहिष्कार का आह्वान था।
तीसरा, सविनय अवज्ञा आंदोलन: नमक कानून तोड़ने से शुरू हुआ, जिससे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अहिंसक प्रतिरोध का बड़ा अभियान चला। चौथा, भारत छोड़ो आंदोलन: "करो या मरो" के नारे के साथ शुरू हुआ। इसे स्वतंत्रता प्राप्ति की दिशा में निर्णायक आंदोलन माना जाता है। पांचवां, भूदान आंदोलन: विनोबा भावे द्वारा शुरू किया गया। यह भूमिहीन किसानों के लिए स्वैच्छिक भूमि दान का अभियान बना। छठा, चिपको आंदोलन: उत्तराखंड क्षेत्र में जंगलों की रक्षा के लिए पेड़ों से चिपककर कटाई रोकने का अनूठा प्रयास।
सातवां, जेपी आंदोलन: जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में भ्रष्टाचार और शासन व्यवस्था के विरुद्ध "संपूर्ण क्रांति" का आह्वान। इस आंदोलन ने भारतीय राजनीति में बड़ा बदलाव लाया। आठवां, नर्मदा बचाओ आंदोलन: विस्थापन और पर्यावरणीय प्रभावों के मुद्दे पर केंद्रित, जिसके प्रमुख नेताओं में मेधा पाटकर इसकी रहीं। नौवां, अन्ना हजारे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन: भ्रष्टाचार विरोधी जनलोकपाल कानून की मांग। इसने देशभर में युवाओं और मध्यवर्ग को बड़ी संख्या में जोड़ा। दसवां, किसान आंदोलन 2020-21:कृषि कानूनों के विरोध में चला। लंबे आंदोलन के बाद केंद्र सरकार ने तीनों कृषि कानून वापस लिए।
लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि आजादी के आंदोलन की सफलता के बाद महात्मा गांधी के सहयोगियों ने, सम्पूर्ण क्रांति के प्रणेता लोकनायक जयप्रकाश के सियासी चेलों ने, और ईमानदारी के मसीहा अन्ना हजारे के सामाजिक से राजनीतिक बने अनुगामियों ने सत्ता मिलते ही क्या-क्या सियासी कुकर्म नहीं किये, जाति-भाषा-धर्म की आड़ में राजनीतिक तिकड़म नहीं किए, यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है। चाहे जातीय-क्षेत्रीय-धार्मिक आरोप-प्रत्यारोप की बात हो, या फिर भ्रष्टाचार और अपराध को बढ़ावा देने की फितरत, इनकी घटिया हरकतों से कांग्रेस के पुराने राजनीतिक पाप लगभग फीके पड़ गए।
हद तो यह कि ऐसे सभी दल अंततः कांग्रेस की बैशाखी पर ही टिके रहने को अभिशप्त हो गए। यही वजह है कि इनके पास जनता के समक्ष कुछ ठोस प्रस्तुत करने को नहीं है। उड़ीसा में बीजद नेता पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और बिहार में जदयू नेता और पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने सही-गलत निर्णयों से समाजवाद की बची-खुची इज्जत भी मिट्टी पलीद कर दी।
इसलिए अब सीजेपी के रूप में जेन-जी के स्वतःस्फूर्त सोशल मीडिया मुहिम को पर्दे के पीछे से धरातलीय आंदोलन का शक्ल देने-दिलवाने की जो चालें पेशेवर आंदोलनकारियों और विपक्षी नेताओं के स्वघोषित मुखौटों ने जी चली हैं, उनके असरदार चेहरे के रूप में सामने आए, उनमें राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव, सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक, छत्तीसगढ़ की एक पंजीकृत पार्टी के प्रमुख अमित जोगी आदि और उनके प्रत्यक्ष-परोक्ष सहयोगी भविष्य में 'अरविंद केजरीवाल' की तरह कौन सा गुल खिलाएंगे, कुछ कहा नहीं जा सकता!
और तो और, तथाकथित सफलता मिलने के बाद अपने स्वघोषित सहयोगियों के खिलाफ कौन सा राजनीतिक व्यवहार करेंगे, ऐसे उदाहरण भारतीय राजनीति में भरे पड़े हैं। इसलिए देश के बुद्धिजीवियों का पुनः चिंतित होना स्वाभाविक है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो जिस तरह से एक वर्ग को इन आंदोलनों से दस कदम दूर रहने की नसीहत दी गई, उससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि इनके सलाहकार प्रोफेशनल हैं और उन्हें पता है कि अल्पसंख्यक समाज की भागीदारी बढ़ते ही, बहुसंख्यक समाज दूर होता चला जायेगा।
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