क्या सीजेपी भारत में जेन-जी क्रांति का आगाज कर-करा सकती है?
क्या सीजेपी भारत में जेन-जी क्रांति का आगाज कर-करा सकती है?
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
डिजिटल युवा पीढ़ी के बीच चर्चा का विषय बन चुकी प्रस्तावित "कॉकरोच जनता पार्टी" (सीजेपी) के कर्ताधर्ता गण जब से जंतर-मंतर पर प्रदर्शन शुरू किए हैं, तब से आमलोगों के बीच भी उनकी सियासी शैली की चर्चा होने लगी है। देश की राजधानी में हाई प्रोफाइल युवा जिस तरह से चिलचिलाती धूप में सड़कों पर उतरे हैं, उससे बेरोजगार युवाओं में भी जोश जागृत हुआ है। छात्रों का तो कहना ही क्या? लेकिन पड़ोसी देश श्रीलंका, बंगलादेश और नेपाल के युवाओं की सत्ताविरोधी हरकतों से वाकिफ लोगों के मनोमिजाज में यह सवाल उभर रहा है कि क्या सीजेपी भारत में जेन-जी क्रांति का सूत्रपात कर सकती है?
तो आइए और यह जान लीजिए कि इसका संक्षिप्त उत्तर है- हाँ, संभावना है; लेकिन अभी यह कहना बहुत जल्दबाज़ी होगी कि CJP भारत में "जेन जी क्रांति" का आगाज/सूत्रपात कर चुकी है। वैसे भी वर्तमान में CJP की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उसने बेरोजगारी, परीक्षा घोटालों, महंगाई और अवसरों की कमी जैसे मुद्दों पर बड़ी संख्या में युवाओं का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। यही वजह है कि कुछ ही दिनों में करोड़ों सोशल मीडिया फॉलोअर्स जुटाना अपने आप में एक असाधारण घटना है। वहीं, दिल्ली की सड़कों पर एक आह्वान पर हजारों युवाओं का इस चिलचिलाती धूप में निकलना उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता का द्योतक है।
इसलिए सवाल मुखर है कि आखिर किन कारणों से यह प्रदर्शन जेन-जी आंदोलन बन सकता है? तो जवाब होगा कि युवाओं की साझा पीड़ा, क्योंकि भारत की बड़ी युवा आबादी रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं और करियर की अनिश्चितता से जूझ रही है। चूंकि CJP ने इन्हीं मुद्दों को अपनी पहचान बनाया है। इसलिए ये युवा कुछ भी कर सकते हैं। वहीं, जहां तक इनकी नई राजनीतिक भाषा की बात है तो यह आंदोलन पारंपरिक भाषणों के बजाय मीम्स, व्यंग्य और सोशल मीडिया संस्कृति का उपयोग करता है,क्योंकि यही जेन ज़ेड की संचार शैली भी है।
जानकार बताते हैं कि पुराने स्थापित दलों से युवाओं के बीच निराशा व्याप्त है। लाखों युवा केवल सत्तापक्ष ही नहीं, बल्कि पारंपरिक विपक्ष से भी असंतुष्ट दिखाई देते हैं। इसलिए CJP स्वयं को इसी राजनीतिक रिक्तता का प्रतिनिधि बताती है। जबकि अंतरराष्ट्रीय उदाहरण चुगली करते हैं कि हाल के वर्षों में दक्षिण एशिया के कई देशों में युवा-नेतृत्व वाले आंदोलनों ने राजनीति व सत्तागत शीर्ष नेतृत्व को प्रभावित किया है। यह बात अलग है कि हर देश की परिस्थितियाँ अलग होती हैं और भारत को उनके बीच खड़ा करके तुलना नहीं की जा सकती है।
यही नहीं, इस युवा जेन-जी क्रांति के रास्ते में कई बड़ी बाधाएँ भी हैं:- पहला यह कि सोशल मीडिया फॉलोअर और वास्तविक कार्यकर्ता एक ही चीज़ नहीं हैं। दूसरा, आंदोलन का संगठनात्मक ढाँचा अभी प्रारंभिक अवस्था में है। तीसरा, नेतृत्व, वित्त पोषण, स्थानीय इकाइयाँ और दीर्घकालिक रणनीति अभी पूरी तरह स्थापित नहीं दिखती। चौथा, भारतीय राजनीति में स्थायी प्रभाव के लिए गाँव, कस्बे, छात्र संगठन, ट्रेड यूनियन और सामाजिक समूहों तक पहुँच बनानी पड़ती है, जहां तक पहुंचने में सीजेपी को नाको चने चबाने पड़ेंगे।
इसलिए राजनीतिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या CJP केवल डिजिटल असंतोष है, या वह संगठित जनशक्ति में बदल सकती है? राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि यदि आने वाले महीनों में यह आंदोलन विभिन्न राज्यों में स्थानीय इकाइयाँ खड़ी करता है, युवाओं के ठोस मुद्दों पर निरंतर अभियान चलाता है, और किसी एक व्यक्ति या सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर निर्भर नहीं रहता, तो यह भारत की पहली व्यापक जेन ज़ेड राजनीतिक धारा बन सकता है।
वहीं, इतिहास भी बताता है कि जेपी आंदोलन, अन्ना हज़ारे आंदोलन और हाल के कई युवा आंदोलनों की वास्तविक शक्ति सड़कों, संस्थाओं और सामाजिक नेटवर्कों से आई थी, केवल सोशल मीडिया से नहीं। इसलिए CJP के लिए निर्णायक परीक्षा अभी शुरू हुई है, समाप्त नहीं हुई।हालांकि, यह ध्यान देने योग्य है कि CJP अभी एक उभरता हुआ और अपेक्षाकृत नया संगठन/आंदोलन है। इसकी औपचारिक राष्ट्रीय कार्यकारिणी, प्रदेश अध्यक्षों या विस्तृत संगठनात्मक ढांचे की सार्वजनिक जानकारी अभी सीमित है। जिसे मजबूत आधार देने का दारोमदार इस पार्टी के आधिकारिक प्रवक्ताओं, यथा- सौरव दास, विजेता दहिया और आशुतोष रांका आदि पर है और इनकी ही आगे की रणनीति बहुत कुछ निर्भर करेगा।
समझा जाता है कि सीजेपी, युवा असंतोष का राजनीतिक रूपांतरण है। इसलिए यदि बेरोजगारी, भर्ती और परीक्षा संबंधी शिकायतें लंबे समय तक बनी रहती हैं, तो वे केवल प्रशासनिक मुद्दे नहीं रह जाते, बल्कि राजनीतिक मुद्दे बन जाते हैं। CJP इसी असंतोष को संगठित रूप देने का प्रयास करती दिखाई दे रही है। वह सोशल मीडिया से निकलकर जमीनी राजनीति की परीक्षा देनी शुरू कर दी है।भले ही इस आंदोलन ने ऑनलाइन बड़ी लोकप्रियता हासिल की है, लेकिन जंतर-मंतर का प्रदर्शन यह जांचने का अवसर है कि डिजिटल समर्थन वास्तविक जनसंगठन में कितना बदल पाता है। भारतीय राजनीति में यह एक महत्वपूर्ण कसौटी मानी जाती है।
सीजेपी, मोदी सरकार के लिए एक चेतावनी संकेत भी है, क्योंकि यदि युवाओं का एक वर्ग शिक्षा और रोजगार के मुद्दों पर लामबंद होता है, तो यह केंद्र सरकार के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकता है। विशेषकर तब, जब आंदोलन किसी एक राज्य या जातीय समूह तक सीमित न होकर राष्ट्रीय मुद्दों को उठाने लगे। इसी नजरिए से यह युवा आंदोलन विपक्ष के लिए एक अवसर भी बन सकता है।क्योंकि विपक्षी दल भी इस प्रकार के युवा आंदोलनों को सरकार की आलोचना के मंच के रूप में देख सकते हैं। हालांकि यदि विपक्ष बहुत अधिक हस्तक्षेप करता है, तो आंदोलन की "स्वतंत्र" छवि प्रभावित होने का जोखिम भी रहता है।
चूंकि इस आंदोलन ने व्यंग्य से आंदोलन तक की यात्रा तेज कर दी है, तो यह चर्चा भी है कि CJP की शुरुआत व्यंग्यात्मक सोशल मीडिया अभियान के रूप में हुई थी, लेकिन अब वह वास्तविक धरना-प्रदर्शन आयोजित कर रही है, जो दिखाता है कि इंटरनेट-आधारित राजनीतिक अभिव्यक्ति कभी-कभी वास्तविक राजनीतिक गतिविधि में बदल सकती है। लोग यह भी जानने को उत्सुक हैं कि क्या यह नया जेपी आंदोलन या अन्ना आंदोलन है?
तो जवाब होगा कि अभी ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। क्योंकि जेपी आंदोलन और अन्ना हज़ारे आंदोलन के पीछे एक व्यापक संगठनात्मक ढांचा, दीर्घकालिक जनभागीदारी और राष्ट्रीय राजनीतिक प्रभाव था। जबकि CJP अभी उस स्तर पर पहुंची है या नहीं, यह आने वाले महीनों में स्पष्ट होगा।
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