यदि विपक्षी दलों का समर्थन सीजेपी के युवा आंदोलन को मिला तो दिवास्वप्न होगा धराशायी
यदि विपक्षी दलों का समर्थन सीजेपी के युवा आंदोलन को मिला तो दिवास्वप्न होगा धराशायी
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
सीजेपी का जंतर-मंतर आंदोलन परवान चढ़ चुका है। इससे उत्साहित विपक्षी समाजवादी सियासत के थिंक टैंक, सामाजिक आंदोलनधर्मियों के बौद्धिक ईंधन और मशहूर राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने जिस योजनाबद्ध तरीके से कॉकरोच जनता पार्टी ₹सीजेपी) के युवा आंदोलन को समर्थन दिया है, वह काबिलेतारीफ है। साथ ही एक सियासी शतरंजी चाल चलते हुए श्री यादव ने विपक्षी दलों से भी इस यूथ मूवमेंट को समर्थन देने या इससे जुड़ने का आह्वान किया है, जिसके कई संभावित राजनीतिक अर्थ/निहितार्थ निकाले जाने लगे हैं।
लेकिन हमें यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि एक तो उन्होंने भारतीय विपक्ष की प्रकृति और प्रवृति के विपरीत जाकर जिस राजनीतिक उदारता की अपेक्षा जताई है, वह गूलर का फूल मानिंद है। इसलिए उसके अर्थ परिस्थिति, बयान की भाषा और विपक्ष की वास्तविक प्रतिक्रिया पर निर्भर करेंगे। जबकि जानकार बताते हैं कि सीजेपी का यह स्वतःस्फूर्त डिजिटल आंदोलन, जो अब सरजमीं पर भी धमक आया है, छात्र और युवा मुद्दों का राजनीतिकरण नहीं, बल्कि राजनीतिक मुख्यधारा में प्रवेश है।
सीजेपी का यह आंदोलन परीक्षा अनियमितताओं, पेपर लीक, भर्ती प्रक्रियाओं और युवाओं की नाराजगी को केंद्र में रखकर उभरा है। इसलिए यदि विपक्ष इसका समर्थन करता है, तो ये मुद्दे सोशल मीडिया या सड़क तक सीमित न रहकर संसद और चुनावी राजनीति का विषय बन सकते हैं।
चूंकि भारत का विपक्ष अक्सर एक साझा राष्ट्रीय मुद्दे की तलाश में रहता है, तो बेरोजगारी, शिक्षा और भर्ती प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता ऐसे मुद्दे हैं जिन पर विभिन्न दल एक साथ आ सकते हैं।
इसलिए समर्थन का आह्वान विपक्षी एकजुटता की कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है। हालांकि, विपक्षी दल इससे दूर रहना चाहते हैं ताकि आंदोलन की गैर-दलीय छवि पर असर न पड़े। दरअसल, अब तक यह आंदोलन स्वयं को युवा-आधारित और व्यवस्था-विरोधी मंच के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। लिहाजा, यदि विपक्षी दल खुलकर इसके साथ खड़े होते हैं, तो सत्तापक्ष इसे विपक्ष-प्रेरित अभियान बताने की कोशिश कर सकता है।
बताया जाता है कि यदि आंदोलन को सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों और विपक्षी दलों का समर्थन मिलता है, तो सरकार के लिए इसे केवल सोशल मीडिया ट्रेंड या सीमित विरोध बताना कठिन हो सकता है। इससे शिक्षा और रोजगार से जुड़े मुद्दों पर जवाबदेही की मांग बढ़ सकती है। समझा जाता है कि यदि योगेंद्र यादव जैसे सार्वजनिक बुद्धिजीवी किसी युवा आंदोलन का समर्थन करते हैं, तो कुछ लोग इसकी तुलना जेपी आंदोलन या अन्ना हज़ारे आंदोलन से करने लगेंगे। हालांकि अभी उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह कहना बहुत जल्दबाजी होगी कि यह आंदोलन उस स्तर की राजनीतिक शक्ति या जनाधार हासिल कर चुका है।
दिलचस्प बात तो यह है कि यदि विपक्ष खुलकर साथ आता है, तो सत्तापक्ष इस आंदोलन को स्वतःस्फूर्त युवा असंतोष के बजाय विपक्ष समर्थित राजनीतिक अभियान के रूप में पेश कर सकता है। फलस्वरूप भारतीय राजनीति में आंदोलनों की वैधता पर संघर्ष अक्सर उतना ही महत्वपूर्ण होता है जितना आंदोलन का मूल मुद्दा। कुल मिलाकर, योगेंद्र यादव के समर्थन और विपक्षी दलों से उनके संभावित आह्वान का सबसे बड़ा राजनीतिक अर्थ यह होगा कि युवा असंतोष का प्रश्न एक सामाजिक मुद्दे से आगे बढ़कर राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन जाए। लेकिन इससे आंदोलन मजबूत होगा या उसकी गैर-दलीय विश्वसनीयता कम होगी, यह आगे की घटनाओं पर निर्भर करेगा।
वहीं, राजनीतिक मामलों के जानकार बताते हैं कि आपस में ही शह-मात देने को अभिशप्त विपक्ष और एक के बाद एक सियासी रूप से धराशायी होती जा रही पार्टियां, खासकर कांग्रेस व उसके नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी और उसके नेता पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, तृणमूल कांग्रेस और उसकी नेत्री पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, दिल्ली गंवा चुकी आप और उसके नेता पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, राजद और उसके नेता पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव, शिव सेना यूबीटी और उसके नेता पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे, एनसीपी और उसके नेता शरद पवार, डीएमके और उसके नेता स्टालिन, इनैलो और उसके नेता चौटाला बन्धु आदि अब राजनीतिक रूप से सत्तापक्ष के समक्ष अप्रासंगिक हो चले हैं।
इसके उलट भाजपा रणनीतिकारों ने क्षेत्रीय दलों और उनके गठबंधन में फूट डालो-शासन करो वाला दांव चलकर सबकुछ अपने पक्ष में कर लिया है। वहीं कांग्रेस से छिटके और सम्पूर्ण क्रांति व अन्ना आंदोलन से उपजे जिन नेताओं ने समय रहते ही भाजपा का दामन थाम लिया, उनकी राजनीतिक इज्जत तो बच गई, अन्यथा भाजपा विरोधियों की जो सियासी भद्द पिटी, उसके बारे में कहा नहीं जा सकता। कहना न होगा कि जिस तरह से भाजपा और उसके नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह एक-एक करके सभी मशहूर विपक्षी नेताओं व उनकी पार्टियों को राजनीतिक रूप से तोड़ते जा रहे हैं और भाजपा को सियासी बुलंदियों के शिखर पर पहुंचा दिया है, उसका अपना महत्व है।
इससे देश के भाजपा विरोधी उद्योगपति, राजनेता, समाजसेवी, विभिन्न पेशेवर और उनके विदेशी आका भी परेशान दिख रहे हैं। क्योंकि जिस तरह से भारत में भगवा पार्टी भाजपा और उसकी मातृ संगठन आरएसएस अपनी राजनीतिक-सामाजिक जड़ें गहरी जमाते जा रही हैं, और विपक्षी दलों की अल्पसंख्यक गोलबंदी, दलित गोलबंदी और ओबीसी गोलबंदी की हवा निकालती जा रही हैं, वह अब राजनीतिक शोध का विषय बन चुका है। वहीं, मोदी-शाह की जोड़ी ने भारत को सैन्य ताकत और आर्थिक-कूटनीतिक शक्ति के रूप से निरंतर मजबूत बना डाला है, जिससे दुनियाभर के डीप स्टेट में हड़कंप मचा हुआ है।
यही वजह है कि विपक्षियों से नाउम्मीद हो चुकी जमात ने सोशल मीडिया के 'कुरुक्षेत्र' में ही भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी की कुशल पेशेवर टीम को सियासी मात देने की जो जेन-जी रणनीति अमल में लायी गयी, उसको आंशिक सफलता मिलते ही जमीनी आंदोलन का बिगुल फूंक दिया। आपने देखा होगा कि पहले भारत के पड़ोसी देशों- श्रीलंका, बंगलादेश, नेपाल में जेन-जी आंदोलन का परीक्षण किया गया और वहां सफल होते ही अब भारत पर थोपने की तैयारी परवान चढ़ी हुई है।
वहीं, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को जिस तरह से टारगेट पर लिया गया है, उसका एकमात्र मकसद सवर्ण युवाओं को आकर्षित करना है। वहीं, सोशल मीडिया पेज 'सीजेपी' के संस्थापक और आंदोलन के प्रमुख चेहरा माने जाने वाले अभिजीत दीपके द्वारा हवाई अड्डा पर संविधान निर्माता डॉ भीम राव अम्बेडकर से जुड़े प्रतीक को दिखाने का साफ मकसद है कि वो मोदी सरकार की चूलें हिलाना चाहते हैं और इसी मकसद से उन्होंने अपने मुद्दे भी चुने।आपको याद होगा कि 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले संविधान बदलने का शिगूफा छोड़कर ही इंडिया गठबंधन ने बीजेपी को कमजोर किया, जिससे वह एनडीए की बैशाखी पर टिके रहने को अभिशप्त हो गई।
इसलिए भाजपा सचेत है। उसने सीजेपी के आंदोलन प्लान में कोई बाधा उतपन्न नहीं की है। इससे जनता की मनोवृत्ति पर भी सकारात्मक असर हुआ है।
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