'कॉकरोच जनता पार्टी' के जंतर-मंतर प्रदर्शन से उपजते हुए सुलगते सवाल!

'कॉकरोच जनता पार्टी' के जंतर-मंतर प्रदर्शन से उपजते हुए सुलगते सवाल!
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

देश की राजधानी नई दिल्ली स्थित जंतर-मंतर पर कथित "कॉकरोच जनता पार्टी" (CJP) का जन-प्रदर्शन केवल एक विरोध-प्रदर्शन नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति में उभर रही डिजिटल-युवा राजनीति की अग्नि-परीक्षा भी माना जा सकता है। भले ही इस आंदोलन की मुख्य मांग, छात्रों से जुड़ी शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा सम्बन्धी अनियमितताओं और युवाओं के लिए अधिकाधिक अवसर जुटाने आदि से जुड़ी हुई हों। 
फिलहाल इस प्रदर्शन का सबसे बड़ा सियासी संदेश यह है कि शिक्षा, रोजगार और युवाओं की आकांक्षाएं फिर से राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आने लगी हैं। यदि यह असंतोष व्यापक सामाजिक समर्थन प्राप्त करता है, तो इसका प्रभाव केवल शिक्षा नीति तक सीमित नहीं रहेगा; बल्कि यह भविष्य की चुनावी राजनीति और राजनीतिक नेतृत्व की प्राथमिकताओं को भी प्रभावित कर सकता है।

कुल मिलाकर, ऐसे प्रदर्शन का वास्तविक राजनीतिक महत्व इस बात पर निर्भर करेगा कि संगठन के मुद्दे क्या हैं, उसके पीछे कितना जनसमर्थन है, और क्या वह प्रतीकात्मक विरोध से आगे बढ़कर कोई ठोस राजनीतिक प्रभाव पैदा कर पाता है। वहीं, इससे जुड़े नेताओं का भावी राजनीतिक मकसद भी केंद्र में सत्तारूढ़ नरेंद्र मोदी सरकार व बीजेपी की विभिन्न राज्य सरकारों को अपदस्थ करना है। ऐसा उनके द्वारा उठाए हुए मुद्दों से प्रतीत होता है।

यही वजह है कि सीजेपी की शुरू हुई राजनीतिक मुहिम के प्रमुख सियासी मायने तलाशे जा रहे हैं, जो निम्नलिखित हो सकते हैं:- पहला, युवा असंतोष का राजनीतिक रूपांतरण: यदि बेरोजगारी, भर्ती और परीक्षा संबंधी शिकायतें लंबे समय तक बनी रहती हैं, तो वे केवल प्रशासनिक मुद्दे नहीं रह जाते, बल्कि राजनीतिक मुद्दे बन जाते हैं। CJP इसी असंतोष को संगठित रूप देने का प्रयास करती दिखाई दे रही है। 

दूसरा, सोशल मीडिया बनाम जमीनी राजनीति की परीक्षा: इस आंदोलन ने ऑनलाइन बड़ी लोकप्रियता हासिल की है, लेकिन जंतर-मंतर का प्रदर्शन यह जांचने का अवसर है कि डिजिटल समर्थन वास्तविक जनसंगठन में कितना बदल पाता है। भारतीय राजनीति में यह एक महत्वपूर्ण कसौटी मानी जाती है। तीसरा, मोदी सरकार के लिए चेतावनी संकेत: यदि युवाओं का एक वर्ग शिक्षा और रोजगार के मुद्दों पर लामबंद होता है, तो यह केंद्र सरकार के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकता है। विशेषकर तब, जब आंदोलन किसी एक राज्य या जातीय समूह तक सीमित न होकर राष्ट्रीय मुद्दों को उठाने लगे। 

चौथा, विपक्ष के लिए अवसर: विपक्षी दल इस प्रकार के आंदोलनों को सरकार की आलोचना के मंच के रूप में देख सकते हैं। हालांकि यदि विपक्ष बहुत अधिक हस्तक्षेप करता है, तो आंदोलन की "स्वतंत्र" छवि प्रभावित होने का जोखिम भी रहता है। पांचवां, व्यंग्य से आंदोलन तक की यात्रा: रिपोर्टों के अनुसार CJP की शुरुआत व्यंग्यात्मक सोशल मीडिया अभियान के रूप में हुई थी, लेकिन अब वह वास्तविक धरना-प्रदर्शन आयोजित कर रही है। यह दिखाता है कि इंटरनेट-आधारित राजनीतिक अभिव्यक्ति कभी-कभी वास्तविक राजनीतिक गतिविधि में बदल सकती है। 

छठा, क्या यह नया जेपी आंदोलन या अन्ना आंदोलन है?: अभी ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। क्योंकि जेपी आंदोलन और अन्ना हज़ारे आंदोलन के पीछे व्यापक संगठनात्मक ढांचा, दीर्घकालिक जनभागीदारी और राष्ट्रीय राजनीतिक प्रभाव था। जबकि CJP अभी उस स्तर पर पहुंची है या नहीं, यह आने वाले महीनों में स्पष्ट होगा।

वहीं, यदि “अनिबन्धित कॉकरोच जनता पार्टी” एक व्यंग्यात्मक, प्रतीकात्मक या सीमांत राजनीतिक संगठन के रूप में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रही है, तो उसके कुछ संभावित सियासी मायने इस प्रकार समझे जा सकते हैं:- 
पहला, व्यवस्था-विरोधी संदेश: कॉकरोच को अक्सर ऐसी प्रजाति माना जाता है जो कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहती है। यदि कोई संगठन स्वयं को इस प्रतीक से जोड़ता है, तो वह यह संदेश दे सकता है कि आम जनता तमाम आर्थिक, सामाजिक और प्रशासनिक दबावों के बावजूद संघर्षरत है।

दूसरा, मुख्यधारा राजनीति पर व्यंग्य: ऐसा नाम पारंपरिक दलों और राजनीतिक संस्कृति पर कटाक्ष का माध्यम हो सकता है। इससे यह संदेश दिया जा सकता है कि स्थापित दल जनता की समस्याओं से दूर हो चुके हैं। तीसरा, मीडिया का ध्यान आकर्षित करने की रणनीति: असामान्य नाम और प्रदर्शन शैली अक्सर मीडिया कवरेज पाने का आसान तरीका बनती है। छोटे या गैर-पंजीकृत संगठन इसी माध्यम से अपनी बात राष्ट्रीय विमर्श में लाने का प्रयास करते हैं।

चौथा, जन-असंतोष की अभिव्यक्ति: यदि प्रदर्शन महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार या प्रशासनिक विफलताओं जैसे मुद्दों पर है, तो यह व्यापक जन-असंतोष का प्रतीकात्मक रूप माना जा सकता है। पांचवां, लोकतांत्रिक स्पेस का उपयोग: जंतर-मंतर लंबे समय से विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक समूहों के विरोध-प्रदर्शनों का केंद्र रहा है। वहां प्रदर्शन करना इस बात का संकेत है कि संगठन लोकतांत्रिक तरीकों से अपनी बात रखना चाहता है।
छठा, चुनावी राजनीति में प्रवेश की तैयारी: कई छोटे संगठन पहले आंदोलन और प्रदर्शन के माध्यम से पहचान बनाते हैं, फिर राजनीतिक विस्तार या चुनावी भागीदारी की ओर बढ़ते हैं।

# राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव के समर्थन और विपक्षी दलों से उनके आह्वान के मायने समझिए

यदि राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव इस आंदोलन का समर्थन करते हैं और विपक्षी दलों से इसे समर्थन देने या इससे जुड़ने का आह्वान करते हैं, तो उसके कई संभावित राजनीतिक अर्थ निकाले जा सकते हैं। लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि अर्थ परिस्थिति, बयान की भाषा और विपक्ष की वास्तविक प्रतिक्रिया पर निर्भर करेंगे।- पहला मायने: छात्र और युवा मुद्दों का राजनीतिकरण नहीं, बल्कि राजनीतिक मुख्यधारा में प्रवेश: यह आंदोलन परीक्षा अनियमितताओं, पेपर लीक, भर्ती प्रक्रियाओं और युवाओं की नाराजगी को केंद्र में रखकर उभरा है। यदि विपक्ष इसका समर्थन करता है, तो ये मुद्दे सोशल मीडिया या सड़क तक सीमित न रहकर संसद और चुनावी राजनीति का विषय बन सकते हैं। 

दूसरा मायने: विपक्ष के लिए साझा मंच की तलाश: भारत का विपक्ष अक्सर एक साझा राष्ट्रीय मुद्दे की तलाश में रहता है। बेरोजगारी, शिक्षा और भर्ती प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता ऐसे मुद्दे हैं जिन पर विभिन्न दल एक साथ आ सकते हैं। इसलिए समर्थन का आह्वान विपक्षी एकजुटता की कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है। तीसरा मायने: आंदोलन की गैर-दलीय छवि पर असर: अब तक यह आंदोलन स्वयं को युवा-आधारित और व्यवस्था-विरोधी मंच के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। यदि विपक्षी दल खुलकर इसके साथ खड़े होते हैं, तो सत्तापक्ष इसे विपक्ष-प्रेरित अभियान बताने की कोशिश कर सकता है। 

चौथा मायने: सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ना: यदि आंदोलन को सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों और विपक्षी दलों का समर्थन मिलता है, तो सरकार के लिए इसे केवल सोशल मीडिया ट्रेंड या सीमित विरोध बताना कठिन हो सकता है। इससे शिक्षा और रोजगार से जुड़े मुद्दों पर जवाबदेही की मांग बढ़ सकती है। पाँचवाँ मायने: 1974 और 2011 जैसी तुलना की शुरुआत: योगेंद्र यादव जैसे सार्वजनिक बुद्धिजीवी यदि किसी आंदोलन का समर्थन करते हैं, तो कुछ लोग इसकी तुलना जेपी आंदोलन या अन्ना हज़ारे आंदोलन से करने लगेंगे। हालांकि अभी उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह कहना बहुत जल्दबाजी होगी कि यह आंदोलन उस स्तर की राजनीतिक शक्ति या जनाधार हासिल कर चुका है। 

छठा मायने: सत्तापक्ष की प्रतिवाद रणनीति: यदि विपक्ष खुलकर साथ आता है, तो सत्तापक्ष इस आंदोलन को स्वतःस्फूर्त युवा असंतोष के बजाय विपक्ष समर्थित राजनीतिक अभियान के रूप में पेश कर सकता है। भारतीय राजनीति में आंदोलनों की वैधता पर संघर्ष अक्सर उतना ही महत्वपूर्ण होता है जितना आंदोलन का मूल मुद्दा।
कुल मिलाकर, योगेंद्र यादव के समर्थन और विपक्षी दलों से उनके संभावित आह्वान का सबसे बड़ा राजनीतिक अर्थ यह होगा कि युवा असंतोष का प्रश्न एक सामाजिक मुद्दे से आगे बढ़कर राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन जाए। लेकिन इससे आंदोलन मजबूत होगा या उसकी गैर-दलीय विश्वसनीयता कम होगी, यह आगे की घटनाओं पर निर्भर करेगा।

# विभिन्न जनांदोलनों के हश्र को ऐसे समझिए
यक्ष प्रश्न है कि देश में जब-जब कोई मजबूत सरकार बनती है, कुछ वर्ष टिकती है तो उसे उखाड़ फेंकने के लिए जनआंदोलन शुरू हो जाते हैं। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ सम्पूर्ण क्रांति (1975), पीएम डॉ मनमोहन सिंह के खिलाफ अन्ना आंदोलन (2010) और अब प्रधानमंत्री सेवक नरेंद्र मोदी के खिलाफ सोशल मीडिया से उपजी "कॉकरोच जनता पार्टी" (CJP) की युवा क्रांति (2026)! जो बेरोजगार युवाओं के बारे में सीजेआई की एक विवादास्पद टिप्पणी के बाद डिजिटल इंटरनेट माध्यम पर पैदा होकर नई दिल्ली की सरजमीं पर आ धमकी है! 

यूँ तो सत्तापक्ष के खिलाफ विपक्षी दलों के छिटपुट आंदोलन ब्रेक के बाद चलते रहते हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर असरदार आंदोलनों के रूप में उनकी गणना प्रायः नहीं हो पाती है! इसी प्रकार से राज्य स्तर पर भी छिटपुट आंदोलन होते रहते हैं, लेकिन उनका राष्ट्रीय असर प्रायः गौण रहता आया है। हालांकि, यह भी सार्वजनिक चिंता बात है कि इन सभी आंदोलनों में युवाओं-बेरोजगारों को बतौर लोकतांत्रिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया, क्योंकि उनमें राजनीतिक-सामाजिक अनुभवों की कमी होती है। 

लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि सम्पूर्ण क्रांति के प्रणेता लोकनायक जयप्रकाश के सियासी चेलों ने, ईमानदारी के मसीहा अन्ना हजारे के सामाजिक से राजनीतिक बने अनुगामियों ने सत्ता मिलते ही क्या-क्या सियासी कुकर्म नहीं किये, यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है। चाहे जातीय-क्षेत्रीय-धार्मिक आरोप-प्रत्यारोप की बात हो, या फिर भ्रष्टाचार और अपराध को बढ़ावा देने की फितरत, इनकी घटिया हरकतों से कांग्रेस के पुराने राजनीतिक पाप लगभग फीके पड़ गए। 

हद तो यह कि ऐसे सभी दल अंततः कांग्रेस की बैशाखी पर ही टिके रहने को अभिशप्त हो गए। यही वजह है कि इनके पास जनता के समक्ष कुछ ठोस प्रस्तुत करने को नहीं है। उड़ीसा में बीजद नेता पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और बिहार में जदयू नेता और पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने सही-गलत निर्णयों से समाजवाद की बची-खुची इज्जत भी मिट्टी पलीद कर दी।

इसलिए अब सीजेपी के रूप में जेन-जी के स्वतःस्फूर्त सोशल मीडिया मुहिम को पर्दे के पीछे से धरातलीय आंदोलन का शक्ल देने-दिलवाने की जो चालें पेशेवर आंदोलनकारियों और विपक्षी नेताओं के स्वघोषित मुखौटों ने जी चली हैं, उनके असरदार चेहरे के रूप में सामने आए राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव, सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक, छत्तीसगढ़ की एक पंजीकृत पार्टी के प्रमुख अमित जोगी आदि और उनके प्रत्यक्ष-परोक्ष सहयोगी भविष्य में 'अरविंद केजरीवाल' की तरह कौन सा गुल खिलाएंगे और तथाकथित सफलता मिलने के बाद अपने स्वघोषित सहयोगियों के खिलाफ कौन सा राजनीतिक व्यवहार करेंगे, ऐसे उदाहरण भारतीय राजनीति में भरे पड़े हैं। इसलिए देश के बुद्धिजीवियों का पुनः चिंतित होना स्वाभाविक है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो जिस तरह से एक वर्ग को इन आंदोलनों से दस कदम दूर रहने की नसीहत दी गई, उससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि इनके सलाहकार प्रोफेशनल हैं और उन्हें पता है कि अल्पसंख्यक समाज की भागीदारी बढ़ते ही, बहुसंख्यक समाज दूर होता चला जायेगा। 

# क्या इन आंदोलनों के पीछे किसी विदेशी शक्ति का हाथ तो नहीं हैं?

वहीं, आमलोगों के मन में भी यह आशंका सदैव बनी रहती है कि कहीं इन आंदोलनों के पीछे कोई विदेशी सहयोगी तो नहीं हैं, क्योंकि सम्पूर्ण क्रांति की उपज प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई पर सीआईए के एजेंट होने के राजनीतिक आरोप और अन्ना आंदोलन जनित एनजीओ क्रांति की उपज मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर कनाडाई खालिस्तानियों के शुभचिंतक होने के जो सियासी आरोप लगे, उसकी कहानियां राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय जब तब बनी रहती हैं। इसलिए सीजेपी के मौजूदा आंदोलन के बारे में भी आमलोगों के दिलोदिमाग में कुछ ऐसे ही सुलगते सवाल हैं, जिनका जवाब भारत की खुफिया एजेंसियां या फिर आने वाला वक्त ही दे सकता है।

सवाल है कि कहीं यह सीजेपी युवा क्रांति भी संपूर्ण क्रांति या अन्ना आंदोलन की तरह ही अमेरिकी डीप स्टेट का कोई गुप्त एजेंडा तो नहीं है? हालांकि, ऐसा दावा करने के लिए ठोस, सार्वजनिक और सत्यापित साक्ष्य चाहिए, जो अनुपलब्ध है, लेकिन आरोप हवा में तैरते हुए प्रासंगिक बने हुए हैं। अभी तक न तो तथाकथित "अनिबन्धित कॉकरोच जनता पार्टी" के बारे में कोई व्यापक रूप से स्थापित जानकारी है, न ही यह प्रमाण है कि उसका संबंध किसी अमेरिकी "डीप स्टेट" या विदेशी गुप्त एजेंडे से है।

जहाँ तक जेपी आंदोलन और अन्ना हज़ारे आंदोलन का प्रश्न है, इनके बारे में भी समय-समय पर विभिन्न राजनीतिक धाराओं ने विदेशी प्रभाव, विदेशी फंडिंग या अंतरराष्ट्रीय हितों की भूमिका के आरोप लगाए हैं। लेकिन इतिहासकारों, शोधकर्ताओं और उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड में ऐसे आरोपों पर सर्वसम्मत निष्कर्ष नहीं है कि वे आंदोलन किसी अमेरिकी "डीप स्टेट" द्वारा संचालित थे।

किसी भी आंदोलन का आकलन करते समय कुछ प्रश्न अधिक उपयोगी होते हैं: यथा- उसका वित्तपोषण कहाँ से हो रहा है? नेतृत्व कौन कर रहा है? उसके घोषित उद्देश्य क्या हैं?क्या उसके दावों और गतिविधियों में पारदर्शिता है?
क्या उसके पीछे किसी विदेशी सरकार, संस्था या नेटवर्क के प्रमाणित संबंध हैं? यदि इन प्रश्नों के उत्तर प्रमाणों के साथ उपलब्ध हों, तभी किसी विदेशी एजेंडे की बात विश्वसनीय रूप से कही जा सकती है।

यूँ तो राजनीति में "डीप स्टेट" शब्द अक्सर एक व्याख्यात्मक या आरोपात्मक अवधारणा के रूप में प्रयोग होता है। इसलिए किसी भी आंदोलन को विदेशी षड्यंत्र बताने या पूरी तरह स्वदेशी मान लेने से पहले साक्ष्यों की जांच आवश्यक है। बिना प्रमाण के ऐसे निष्कर्ष अटकल की श्रेणी में आते हैं, तथ्य की नहीं।

# आपस में ही शह-मात देने को अभिशप्त विपक्षी नेताओं और सियासी रूप से धराशायी होती जा रही उनकी पार्टियों के हश्र को समझिए 
 राजनीतिक मामलों के जानकार बताते हैं कि आपस में ही शह-मात देने को अभिशप्त विपक्ष और एक के बाद एक सियासी रूप से धराशायी होती जा रही कांग्रेस व उसके नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी और उसके नेता पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, तृणमूल कांग्रेस और उसकी नेत्री पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, दिल्ली गंवा चुकी आप और उसके नेता पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, राजद और उसके नेता पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव, शिव सेना यूबीटी और उसके नेता पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे, एनसीपी और उसके नेता शरद पवार, डीएमके और उसके नेता स्टालिन, इनैलो और उसके नेता चौटाला बन्धु आदि अब राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक हो चले हैं।

इसके उलट भाजपा रणनीतिकारों ने क्षेत्रीय दलों और उनके गठबंधन में फुट डालो-शासन करो वाला दांव चलकर सबकुछ अपने पक्ष में कर लिया। कांग्रेस से छिटके और सम्पूर्ण क्रांति व अन्ना आंदोलन से उपजे जिन नेताओं ने भाजपा का दामन समय रहते ही थाम लिया, उनकी राजनीतिक इज्जत तो बच गई, अन्यथा जो उनकी भद्द पिटी, कहा नहीं जा सकता। जिस तरह से भाजपा और उसके नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह एक-एक करके सभी मशहूर विपक्षी नेताओं व उनकी पार्टियों को राजनीतिक रूप से तोड़ते जा रहे हैं और भाजपा को सियासी बुलंदियों के शिखर पर पहुंचा दिया है। 

इससे देश के भाजपा विरोधी उद्योगपति, राजनेता, समाजसेवी, विभिन्न पेशेवर और उनके विदेशी आका भी परेशान दिख रहे हैं। जिस तरह से भारत में भगवा पार्टी भाजपा और उसकी मातृ संगठन आरएसएस अपनी राजनीतिक-सामाजिक जड़ें गहरी जमाते जा रहे हैं, और विपक्षी दलों की अल्पसंख्यक गोलबंदी, दलित गोलबंदी और ओबीसी गोलबंदी की हवा निकाल दी है, वह अब राजनीतिक शोध का विषय बन चुका है। वहीं, मोदी-शाह की जोड़ी ने भारत को सैन्य ताकत और आर्थिक-कूटनीतिक शक्ति के रूप से निरंतर मजबूत बनाते जा रहे हैं, जिससे दुनियाभर के डीप स्टेट में भी हड़कंप मचा हुआ है।

यही वजह है कि विपक्षियों से नाउम्मीद हो चुकी जमात ने सोशल मीडिया के 'कुरुक्षेत्र' में ही भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी को सियासी मात देने की जो जेन-जी रणनीति अमल में लायी गयी, उसको आंशिक सफलता मिलते ही जमीनी आंदोलन का बिगुल फूंक दिया। आपने देखा होगा कि पहले भारत के पड़ोसी देशों- श्रीलंका, बंगलादेश, नेपाल में जेन-जी आंदोलन का परीक्षण किया गया और वहां सफल होते ही अब भारत पर थोपने की तैयारी परवान चढ़ी हुई है। 

वहीं, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को जिस तरह से टारगेट पर लिया गया है, उसका एकमात्र मकसद सवर्ण युवाओं को आकर्षित करना है। वहीं, सोशल मीडिया पेज 'सीजेपी' के संस्थापक और आंदोलन के प्रमुख चेहरा माने जाने वाले अभिजीत दीपके द्वारा हवाई अड्डा पर संविधान निर्माता डॉ भीम राव अम्बेडकर से जुड़े प्रतीक को दिखाने का साफ मकसद है कि वो मोदी सरकार की चूलें हिलाना चाहते हैं और इसी मकसद से उन्होंने अपने मुद्दे भी चुने।आपको याद होगा कि 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले संविधान बदलने का शिगूफा छोड़कर ही इंडिया गठबंधन ने बीजेपी को कमजोर किया, जिससे वह एनडीए की बैशाखी पर टिके रहने को अभिशप्त हो गई। 

# क्या सीजेपी भारत में जेन-जी क्रांति का सूत्रपात कर सकती है?

सवाल है कि क्या सीजेपी भारत में जेन-जी क्रांति का सूत्रपात कर सकती है? तो इसका संक्षिप्त उत्तर है- हाँ, संभावना है; लेकिन अभी यह कहना बहुत जल्दबाज़ी होगी कि CJP भारत में "जेन ज़ेड क्रांति" का सूत्रपात कर चुकी है। वर्तमान में CJP की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उसने बेरोजगारी, परीक्षा घोटालों, महंगाई और अवसरों की कमी जैसे मुद्दों पर बड़ी संख्या में युवाओं का ध्यान आकर्षित किया है। कुछ ही दिनों में करोड़ों सोशल मीडिया फॉलोअर्स जुटाना अपने आप में असाधारण घटना है। 

सवाल है कि आखिर किन कारणों से यह जेन-जी आंदोलन बन सकता है? तो जवाब होगा कि युवाओं की साझा पीड़ा भारत की बड़ी युवा आबादी रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं और करियर अनिश्चितता से जूझ रही है। CJP ने इन्हीं मुद्दों को अपनी पहचान बनाया है। वहीं, जहां तक इनकी नई राजनीतिक भाषा की बात है तो यह आंदोलन पारंपरिक भाषणों के बजाय मीम्स, व्यंग्य और सोशल मीडिया संस्कृति का उपयोग करता है। यही जेन ज़ेड की संचार शैली भी है।

वहीं, पुराने दलों से निराशा कई युवा केवल सत्तापक्ष ही नहीं, बल्कि पारंपरिक विपक्ष से भी असंतुष्ट दिखाई देते हैं। CJP स्वयं को इसी राजनीतिक रिक्तता का प्रतिनिधि बताती है। जबकि अंतरराष्ट्रीय उदाहरण हाल के वर्षों में दक्षिण एशिया के कई देशों में युवा-नेतृत्व वाले आंदोलनों ने राजनीति को प्रभावित किया है। हालांकि हर देश की परिस्थितियाँ अलग होती हैं। 

लेकिन क्रांति के रास्ते में बड़ी बाधाएँ भी हैं: वह यह कि सोशल मीडिया फॉलोअर और वास्तविक कार्यकर्ता एक ही चीज़ नहीं हैं। आंदोलन का संगठनात्मक ढाँचा अभी प्रारंभिक अवस्था में है। नेतृत्व, वित्तपोषण, स्थानीय इकाइयाँ और दीर्घकालिक रणनीति अभी पूरी तरह स्थापित नहीं दिखती। भारतीय राजनीति में स्थायी प्रभाव के लिए गाँव, कस्बे, छात्र संगठन, ट्रेड यूनियन और सामाजिक समूहों तक पहुँच बनानी पड़ती है। 

राजनीतिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या CJP केवल डिजिटल असंतोष है, या वह संगठित जनशक्ति में बदल सकती है? यदि आने वाले महीनों में यह आंदोलन विभिन्न राज्यों में स्थानीय इकाइयाँ खड़ी करता है, युवाओं के ठोस मुद्दों पर निरंतर अभियान चलाता है, और किसी एक व्यक्ति या सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर निर्भर नहीं रहता, तो यह भारत की पहली व्यापक जेन ज़ेड राजनीतिक धारा बन सकता है।

इतिहास बताता है कि जेपी आंदोलन, अन्ना हज़ारे आंदोलन और हाल के कई युवा आंदोलनों की वास्तविक शक्ति सड़कों, संस्थाओं और सामाजिक नेटवर्कों से आई थी, केवल सोशल मीडिया से नहीं। इसलिए CJP के लिए निर्णायक परीक्षा अभी शुरू हुई है, समाप्त नहीं हुई।हालांकि, यह ध्यान देने योग्य है कि CJP अभी एक उभरता हुआ और अपेक्षाकृत नया संगठन/आंदोलन है। इसकी औपचारिक राष्ट्रीय कार्यकारिणी, प्रदेश अध्यक्षों या विस्तृत संगठनात्मक ढांचे की सार्वजनिक जानकारी अभी सीमित है। इस पार्टी के आधिकारिक प्रवक्ताओं, यथा- सौरव दास, विजेता दहिया और आशुतोष रांका आदि पर ही आगे की रणनीति बहुत कुछ निर्भर करेगी।



#  "राजनैतिकदुनिया डॉट ब्लॉग्स्पॉट डॉट कॉम" वैचारिक क्रांति का अग्रदूत है, इसलिए जनसहयोग अपेक्षित

बृहत्तर भारत, शांतिप्रिय विश्व की अवधारणा को मजबूत करने की मुहिम को समर्पित "राजनैतिकदुनिया डॉट ब्लॉग्स्पॉट डॉट कॉम" वैचारिक क्रांति का अग्रदूत है। विश्व व्यापी जनजागृति के निमित्त इसका लिंक फेसबुक, एक्स (ट्वीटर), लिंक्डइन, थ्रेड्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, व्हाट्सएप आदि पर भी साझा किया जाता है, जो हर वक्त उपलब्ध है। 

जबतक अखंड भारत नया आकार नहीं लेगा और पूर्वी एशिया एवं पश्चिमी एशिया में भारत का वसुधैव कुटुंब कम वाला भाव मजबूत नहीं होगा, तबतक विश्वव्यापी संकट हमें प्रभावित/प्रताड़ित करते रहेंगे। लिहाजा, मजबूत और विस्तृत भारत का निर्माण हमारा भी लक्ष्य होना चाहिए। बिल्कुल पड़ोसी चीन की तरह। तिब्बत के बिना भी भारत असुरक्षित ही रहेगा। 

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