आखिर कबतक मिलेंगे 'सनातनी राष्ट्रवाद' से जुड़े ज्वलंत सवालों के निर्णायक जवाब? समझिए

आखिर कबतक मिलेंगे 'सनातनी राष्ट्रवाद' से जुड़े ज्वलंत सवालों के निर्णायक जवाब? समझिए
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

भारतीय सनातनी राष्ट्रवाद से जुड़े ज्वलंत सवालों, यथा- 
संपूर्ण गोवंश हत्याबंदी कानून, समान नागरिक संहिता, राष्ट्रीय नागरिकता पंजी (NRC), पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) मुक्ति, अविरल गंगा-निर्मल गंगा, बांग्लादेशी घुसपैठिए भगाना, कैलाश मानसरोवर मुक्ति, स्वदेशी और विकेंद्रीकरण, जनसंख्या नियंत्रण कानून, शिक्षा का भारतीयकरण, रुपये को मजबूत करना,चीन से आयात घटाना आदि पर हमारे देश में राजनीति तो बहुत हुई, लेकिन ऐसे ज्वलंत राष्ट्रीय मुद्दों पर केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी द्वारा पिछले 12 वर्षों में भी मनोवांछित परिणाम नहीं दिया जाना आमलोगों के दिलोदिमाग को उद्वेलित कर रहा है। 
आम तौर पर देखा जा रहा है कि जो लोग भाजपा समर्थक नहीं हैं, उनका मनोमिजाज अब आमलोगों को इन्हीं धधकते हुए मसलों पर उकसा रहा है कि आखिर क्यों भाजपा नीत एनडीए सरकार ऐसा नहीं कर पाई, जबकि विपक्ष में रहते हुए उसने इन मुद्दों को खूब हवा दी और सत्ता तक न केवल पहुंची, बल्कि अपनी नीतियों से विपक्ष का सुफड़ा साफ करते हुए मजबूती पूर्वक आगे बढ़ रही है? 

राजनीतिक मामलों के जानकार बताते हैं कि भले ही भाजपा और उसके कई सहयोगी दलों में इन मुद्दों पर मतभेद रहा हो, लेकिन जब ऐसे ही समान मतभेद वाले मुद्दों जैसे- जम्मू-कश्मीर से धारा 370 की समाप्ति मोदी सरकार करवा सकती है, सपनों में भी अकल्पनीय राम मंदिर, अयोध्या का निर्माण निर्विघ्नता पूर्वक करवा सकती है, तीन तलाक के मुद्दों पर मुस्लिम महिलाओं के हक में निर्णय दिलवा सकती है, तो फिर अन्य धधकते हुए दर्जनाधिक सवालों पर उसके बदलते पैंतरे के पीछे का सियासी, प्रशासनिक और सामाजिक-आर्थिक रहस्य भी समझना-समझाना जरूरी जान पड़ता है।

यही वजह है कि इन दर्जनाधिक सुलगते सवालों पर एक नजर मारना आवश्यक प्रतीत होता है, ताकि इनके मौलिक कारण और अपेक्षित निदान के उपायों पर जनमत को जागरूक किया जा सके। चूंकि ये तमाम प्रश्न राजनीतिक, वैचारिक और नीतिगत विषयों से जुड़े हुए हैं, इसलिए इन मुद्दों पर अलग-अलग लोगों और संगठनों की भिन्न-भिन्न राय हो सकती है। बावजूद इसके, ऐसे दूरगामी राष्ट्रीय हित से समझौता करना विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका सबके लिए घातक है। 

यह बात दीगर है कि आरएसएस व उसके आनुषांगिक संगठनों की भावना के  अनुरूप भाजपा के रणनीतिकारों द्वारा टुकड़े में फैसले लिए जा रहे हैं, अलग-अलग करवाई दिखाई भी दे रही है, जिनका काम ही सवालों की कार्पेट बम्बार्डिंग करके भाजपा समर्थकों को दिग्भ्रमित करके अपना राजनीतिक हित साधना हो तो हमारे जैसे तटस्थ लोगों के विचार से इन्हें एक विश्लेषणात्मक दृष्टि से देखना उचित होगा।

पहला, संपूर्ण गोवंश हत्याबंदी कानून: इसके अब तक लागू नहीं हो पाने के अलग-अलग कारण हैं, जैसे- भारत में पशुपालन, कृषि और चमड़ा उद्योग से जुड़े आर्थिक हित का सवाल है। भारतीय संविधान की संघीय व्यवस्था के तहत राज्यों के अधिकार अलग-अलग निर्धारित हैं। विभिन्न राज्यों में सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण भिन्न हैं।
इसलिए जहां तक इसके स्थायी निदान की बात है तो इस कानून को लागू करवाने के लिए राज्यों के बीच सहमति निर्माण आवश्यक है। इस हेतु गोसंरक्षण के साथ गोआधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिए जाने की जरूरत है। इसके अलावा अनुपयोगी पशुओं के रखरखाव की व्यवहारिक व्यवस्था करने की दरकार है। चूंकि यह सब एक साथ कर पाना मोदी प्रशासन के लिए टेढ़ी खीर साबित हो सकती है, इसलिए सरकार का टालमटोल वाला रवैया स्वाभाविक है।

दूसरा, समान नागरिक संहिता (UCC): इसके अब तक लागू नहीं हो पाने के अलग-अलग कारण हैं, जैसे- विभिन्न धार्मिक समुदायों के व्यक्तिगत कानून, राजनीतिक और सामाजिक सहमति का अभाव और न्यायिक तथा संवैधानिक जटिलताएँ। इसलिए जहां तक इसके स्थायी निदान की बात है तो इस कानून को लागू करवाने के लिए 
चरणबद्ध सुधार, व्यापक सामाजिक संवाद और सभी समुदायों के प्रतिनिधियों की भागीदारी आवश्यक है। चूंकि  भाजपा की उत्तराखंड सरकार, गुजरात सरकार और असम सरकार ने अपने-अपने प्रदेशों में इसे लागू कर दिया है, इसलिए अन्य राज्यों की सरकारों और केंद्र सरकार पर भी बहुसंख्यक लोग इस बात का दवाब बना रहे हैं कि यूसीसी को अविलम्ब लागू किया जाए।

तीसरा, राष्ट्रीय नागरिकता पंजी (NRC): इसके अब तक लागू नहीं हो पाने के अलग-अलग कारण हैं, जैसे- विशाल जनसंख्या और दस्तावेज़ीकरण की कठिनाइयाँ, मानवीय और प्रशासनिक चुनौतियाँ, राजनीतिक विवाद आदि। इसलिए जहां तक इसके स्थायी निदान की बात है तो इस कानून को लागू करवाने के लिए डिजिटल नागरिकता रिकॉर्ड, पारदर्शी सत्यापन प्रणाली और सीमावर्ती क्षेत्रों में विशेष निगरानी करनी होगी।

चौथा, पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) मुक्ति: इसके अब तक मुक्त नहीं हो पाने के अलग-अलग कारण हैं, जैसे- यह केवल राजनीतिक नहीं बल्कि सामरिक और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का विषय है। चूंकि भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं, इसलिए इनके बीच संघर्ष का जोखिम ज्यादा है। चूंकि पीओके में पाक की चालाकी से वैश्विक शक्तियों के हित भी जुड़े हुए हैं। इसलिए भारत सरकार ने भले ही संसद में पीओके को अपना अंग बताकर इसे हर हाल में वापस लेने का संकल्प व्यक्त कर चुकी हो, अपने स्तर पर विगत तीन दशकों से सक्रिय भी हो, लेकिन वह इस अतिशय संवेदनशील मुद्दे पर फूंक-फूंक कर कदम बढ़ा रही है और जनसमर्थन बनाये रखने के लिए ब्रेक के बाद आक्रामक बयानबाजी करती-करवाती रहती है। जहां  तक इसके स्थायी निदान की बात है तो इसको वापस पाने  के लिए आर्थिक और सामरिक शक्ति में वृद्धि, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक दबाव और सीमावर्ती क्षेत्रों का तीव्र विकास करना होगा।

पांचवां, अविरल और निर्मल गंगा: इसके अब तक स्वच्छ नहीं हो पाने के अलग-अलग कारण हैं, जैसे- औद्योगिक प्रदूषण, नगरों का सीवेज, सहायक नदियों का प्रदूषण गंगा में शामिल होकर इसे भी प्रदूषित करते रहना। राजीव गांधी से लेकर नरेंद्र मोदी ने इसे साफ करने पर अरबों रुपये पानी की तरह बहाए, लेकिन राम जी की मैली गंगा अविरल और निर्मल नहीं हो पाई। इसलिए जहां तक इसके स्थायी निर्मलीकरण की बात है तो इसको ऐसा करवाने के लिए 
सीवेज उपचार संयंत्रों का पूर्ण संचालन, औद्योगिक प्रदूषण विसर्जन पर कठोर दंड और जनभागीदारी आधारित नदी संरक्षण की योजनाओं पर बल दिया जाना आवश्यक प्रतीत होता है।

छठा, बांग्लादेशी घुसपैठ रोकना: देश के उत्तरपूर्वी राज्यों- यथा- असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम और पश्चिम बंगाल की भारतीय सीमा पर बांग्लादेशी घुसपैठ को रोकना किसी भी सरकार के लिए चुनौती पूर्ण कार्य रहा है, जिसके  अलग-अलग कारण बताए जाते हैं, जैसे- लंबी और जटिल सीमा, आर्थिक कारणों से अवैध प्रवासन, स्थानीय राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौतियाँ आदि। इसलिए जहां तक इसके स्थायी निदान की बात है तो इस घुसपैठ को पूरी तरह से रोकवाने के लिए स्मार्ट बॉर्डर प्रबंधन, सीमा निगरानी तकनीक और पड़ोसी देशों के साथ सहयोग बढ़ाए जाने पर गम्भीरता पूर्वक प्रयास किया जाना चाहिए। जब से इन राज्यों में भाजपा सरकार बनी है, तब से इन घुसपैठियों की दुश्वारियों में भी बढ़ोतरी हुई है। इसलिए कुछ कुछ यह धंधा हतोत्साहित भी हुआ है।

सातवां, कैलाश मानसरोवर मुक्ति: इसके अब तक मुक्त नहीं हो पाने के अलग-अलग कारण हैं, जैसे- कभी भारत का भूभाग समझा जाने वाला तिब्बत का यह क्षेत्र वर्तमान में  चीन के नियंत्रण वाले तिब्बत में तब्दील किया जा चुका है।
चूंकि यह अत्यंत ही संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय विषय है। लिहाजा, सैन्य समाधान की लागत और जोखिम बहुत बड़े हैं। इसलिए जहां तक इसके स्थायी मुक्ति की बात है तो इसको मुक्त करवाने के लिए तीर्थयात्रा सुविधाओं का विस्तार, कूटनीतिक संवाद और सांस्कृतिक और धार्मिक संपर्कों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। आमलोगों के दिलोदिमाग में यह सवाल सुलगता रहता है कि जब शिव भगवान ही हमारे देवता हैं, तो फिर इस महत्वपूर्ण तिब्बत क्षेत्र का चीन में शामिल हो जाना भारत के तत्कालीन  नेताओं की कमजोरी है, लेकिन वर्तमान नेतृत्व द्वारा इस भूल में सुधार करना सनातनी राष्ट्रवाद के लिए यक्ष प्रश्न है।

आठवां, स्वदेशी और विकेंद्रीकरण: हमारे देश और देशवासियों की आर्थिक समुन्नति के लिए स्वदेशी और विकेंद्रीकरण के मूलमंत्र की उपेक्षा के पीछे बहुराष्ट्रीय पूंजीपतियों की प्रमुख भूमिका है, जिसके लिए देशी पूंजीपति बतौर एजेंट काम करते हैं। इसलिए इस महत्वपूर्ण विचार, जिससे जनसरोकार का वास्ता है, के अब तक लागू नहीं हो पाने के कारण अलग-अलग हैं, जैसे- वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भरता, राज्यों और केंद्र के बीच वित्तीय संतुलन और प्रतिस्पर्धी उत्पादन क्षमता की चुनौती।
इसलिए जहां तक इसके स्थायी निदान की बात है तो इस महत्वपूर्ण और दूरगामी महत्व वाले जनहितैषी विचारों को लागू करवाने के लिए स्थानीय उद्योगों को प्रोत्साहन, 
ग्राम एवं जिला स्तर पर आर्थिक सशक्तीकरण और 
तकनीकी आत्मनिर्भरता की जरूरत है।

नौवां, जनसंख्या नियंत्रण कानून: इसके अब तक लागू नहीं हो पाने के अलग-अलग कारण हैं, जैसे- विभिन्न राज्यों में जनसंख्या वृद्धि दर में भारी अंतर, संवैधानिक और सामाजिक चिंताएँ, तथा राजनीतिक सहमति का अभाव।
इसलिए जहां तक इसके स्थायी निदान की बात है तो इस कानून को लागू करवाने के लिए महिला शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार, और परिवार नियोजन जागरूकता पर बल दिया जाने लगा है। भाजपा की मोदी सरकार के गृहमंत्री अमित शाह ने सीमावर्ती इलाकों में हो रही जनसंख्या घनत्व की वृद्धि और जनसांख्यकीय परिवर्तन की जांच और अपेक्षित कार्रवाई के लिए विशेषज्ञों की एक टीम गठित कर दी है।

दसवां, शिक्षा का भारतीयकरण: देश में अब तक शिक्षा का भारतीयकरण नहीं हो पाने के अलग-अलग कारण हैं, जैसे-
औपनिवेशिक काल से चली आ रही संरचनाएँ, उच्च शिक्षा का वैश्विक स्वरूप और पाठ्यक्रम परिवर्तन की धीमी प्रक्रिया। इसलिए जहां तक शिक्षा का भारतीयकरण करने की बात है तो इसके लिए भारतीय ज्ञान परंपरा का समावेश, मातृभाषा आधारित शिक्षा और कौशल व शोध केंद्रित सुधार करने की दरकार है।

ग्यारहवां, रुपये को मजबूत करना: अब तक भारतीय रुपये को मजबूत नहीं कर पाने के अलग-अलग कारण हो सकते हैं, जैसे- व्यापार घाटा, ऊर्जा आयात पर निर्भरता और वैश्विक वित्तीय परिस्थितियाँ आदि। इसलिए जहां तक इस अहम नीतिगत समस्या के स्थायी निदान की बात है तो इसके लिए निर्यात वृद्धि, विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार और ऊर्जा आत्मनिर्भरता जैसे लक्ष्य को हासिल किए जाने की जरूरत है।

बारहवां, चीन से आयात घटाना: भारत, अपने सबसे बड़े शत्रु देश चीन के साथ लगभग 100 करोड़ अमेरिकी डॉलर के घाटे का व्यापार करता है। इसलिए अब तक चीन से आयात नहीं घटा पाने के अलग-अलग कारण हैं, जैसे-
इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी में निर्भरता, लागत प्रतिस्पर्धा और आपूर्ति श्रृंखला का गहरा एकीकरण आदि। इसलिए जहां तक चीन से आयात घटाने जैसे अहम रणनीतिक निर्णयों को लेकर स्थायी निदान स्वरूप इन बातों को लागू करवाने के लिए घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने, वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत विकसित करने और अनुसंधान एवं विकास में निवेश करने की जरूरत है।

लिहाजा, समग्र निष्कर्ष स्वरूप राजनीतिक मामलों के विश्लेषक बताते हैं कि इन अधिकांश मुद्दों पर भाजपा या किसी भी सरकार के सामने तीन बड़ी बाधाएँ दिखाई देती हैं: पहली, संवैधानिक और संघीय सीमाएँ क्योंकि कई विषय राज्यों से जुड़े हैं। दूसरी, आर्थिक और प्रशासनिक वास्तविकताएँ, क्योंकि नीतियाँ बनाना अपेक्षाकृत आसान
है, लेकिन लागू करना कठिन होता है। और तीसरी, 
अंतरराष्ट्रीय और कूटनीतिक बाधाएँ, क्योंकि पीओके  (PoK), कैलाश मानसरोवर, चीन व्यापार जैसे विषय केवल घरेलू निर्णयों से हल नहीं होते। यही वजह है कि भाजपाई रणनीतिकारों की प्राथमिकता सूची में उपर्युक्त मुद्दों के होने के बावजूद अबतक कोई निर्णायक हल नहीं मिल पाया है, जिससे क्षुद्र लोग उसकी राष्ट्रवादी निष्ठा पर सवाल उठा रहे हैं, जबकि ऐसा करने वालों से राष्ट्रवाद का नाता दूर दूर तक दिखाई नहीं देता है।

इसलिए समर्थकों की दृष्टि से चुनौती यह है कि घोषित लक्ष्यों को अपेक्षित गति से पूरा नहीं किया जा सका, जबकि आलोचकों की दृष्टि में इनमें से कुछ लक्ष्य स्वयं विवादास्पद या व्यावहारिक रूप से कठिन हैं। वास्तविकता यह है कि इन दोनों के बीच कई मुद्दों पर आंशिक प्रगति हुई है, लेकिन "मनोवांछित परिणाम" तक पहुंचने के लिए दीर्घकालिक राजनीतिक सहमति, आर्थिक शक्ति और प्रशासनिक क्षमता तीनों की आवश्यकता होती है।

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