The crucial questions surrounding slogans like 'We want freedom'!


'हमें चाहिए आजादी' जैसे नारों से जुड़े यक्ष प्रश्न!
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

हमारे देश में जब “हमें चाहिए आजादी” जैसे नारे लगते हैं, तो राजनीतिक, प्रशासनिक और न्यायिक खामोशी के बीच कई सुलगते सवाल भी पैदा होते हैं। इसलिए बेहतर होगा कि हमारे प्रधानमंत्री लाल किले के प्राचीर से प्रशासन और न्यायपालिका को यह संदेश दें कि राजनीति और राष्ट्रनीति में तफरका स्थापित करने में कार्यपालक प्रशासन के स्थायित्व की बहुत बड़ी भूमिका और जिम्मेदारी दोनों है। वह इसे बखूबी निभाए।

इसलिए राष्ट्रनीति को राजनीति से ऊपर रखने की व्यवस्था विदेश नीति की भांति ही हो, अन्यथा आने वाली पीढ़ियां कार्यपालक प्रशासन के स्थायित्व पर भी सवाल उठाने से नहीं हिचकेंगी। यही नहीं, इनके जातीय, धार्मिक और भाषाई मिजाज पर भी गौर करने की जरूरत है, अन्यथा "हमें चाहिए आजादी” जैसे नारे लगते रहेंगे, राष्ट्रद्रोही तत्व फलते-फूलते रहेंगे और एक दिन भारत माता को भी असमय दम तोड़ना पड़ेगा, क्योंकि पाकिस्तान परस्त इस्लामिक देशों के ख्वाब भी यही हैं, जिन्हें अमेरिका-चीन दोनों के शह हासिल हैं। 

अलबत्ता, "हमें चाहिए आजादी” जैसे नारों के सामने कई ऐसे यक्ष प्रश्न खड़े होते हैं, जिनका उत्तर केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि संविधान, लोकतंत्र, राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक अधिकारों की कसौटी पर देना होगा। “हमें चाहिए आजादी” के यक्ष प्रश्न इस प्रकार हैं:-

सवाल: आजादी किससे चाहिए?

जवाब: गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, भेदभाव और अन्याय से—या भारत राष्ट्र से?

सवाल: आजादी किसके लिए चाहिए?

जवाब: पूरे समाज के लिए, किसी वंचित वर्ग के लिए या किसी विशेष राजनीतिक/विचारधारात्मक समूह के लिए?

सवाल: क्या असहमति को देशद्रोह कहना उचित है?

जवाब: लोकतंत्र में सरकार की आलोचना और राष्ट्र की संप्रभुता को चुनौती—क्या दोनों को एक ही नजर से देखा जा सकता है?

सवाल: क्या राष्ट्रविरोधी गतिविधि और राष्ट्रविरोधी विचार में फर्क है?

जवाब: यदि कोई व्यक्ति हिंसा नहीं करता, लेकिन किसी अलग राजनीतिक व्यवस्था की कल्पना करता है, तो कानून की सीमा कहाँ से शुरू होती है?

सवाल: क्या राजनीतिक दल वोट के लिए ऐसे नारों का समर्थन कर सकते हैं?

जवाब: लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा और राजनीतिक अवसरवाद के बीच सीमा कौन तय करेगा?

सवाल: यदि नारे के पीछे विदेशी धन, संगठन या हिंसक नेटवर्क हो तो?

जवाब: क्या तब भी उसे महज “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” कहकर छोड़ दिया जाना चाहिए?

सवाल: प्रशासन कब हस्तक्षेप करे?

जवाब: केवल नारे लगने पर या तब, जब नारे के साथ हिंसा, उकसावे अथवा संगठित आपराधिक गतिविधि के प्रमाण मिलें?

सवाल: न्यायपालिका की कसौटी क्या हो?

जवाब: राष्ट्र की सुरक्षा या नागरिक की स्वतंत्रता—या संविधान दोनों के बीच संतुलन का रास्ता देता है?

सुलगता सवाल: क्या स्वतंत्र भारत में “आजादी” की मांग अपने-आप में विरोधाभास है? या यह इस बात का संकेत है कि स्वतंत्रता के बावजूद समाज के किसी हिस्से को वास्तविक समान अवसर नहीं मिला?

जवाब: ?????

सवाल: और सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न—क्या हम इतने परिपक्व लोकतंत्र बन पाए हैं कि “देशद्रोह” का आरोप लगाने से पहले प्रमाण मांगें और “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” की आड़ में वास्तविक राष्ट्रविरोधी गतिविधि को भी पहचान सकें?यही असली यक्ष प्रश्न है।

जवाब: ??????

मसलन, 15 अगस्त पर “हमें चाहिए आजादी” सुनकर हमें केवल नाराज या उत्तेजित होने के बजाय यह पूछना चाहिए—आजादी की मांग के पीछे पीड़ा है, राजनीतिक असहमति है, विचारधारा है या कोई हिंसक/अलगाववादी परियोजना?क्योंकि हर असहमति देशद्रोह नहीं होती—और हर देशद्रोही साजिश केवल असहमति भी नहीं होती।

# क्या राजनीतिक दलों का इन्हें समर्थन देना या प्रशासन और न्यायपालिका द्वारा विषयगत गम्भीरता को नजरअंदाज करना न्यायोचित है?

नहीं—न तो राजनीतिक दलों द्वारा ऐसे नारों या आंदोलनों को आंख मूंदकर समर्थन देना उचित है, न प्रशासन और न्यायपालिका द्वारा वास्तविक गंभीरता को नजरअंदाज करना। लेकिन इसके साथ एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संतुलन भी जरूरी है।

एक, राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी: राजनीतिक दलों को विरोध और असहमति का अधिकार है। वे सरकार की नीतियों के खिलाफ आंदोलनों का समर्थन भी कर सकते हैं। लेकिन समर्थन की भी एक संवैधानिक सीमा है। यदि किसी आंदोलन में केवल “व्यवस्था से आजादी”, सामाजिक न्याय, रोजगार, भ्रष्टाचार या किसी नीति के विरोध की मांग है, तो उसे समर्थन देना लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा हो सकता है। लेकिन यदि किसी संगठन या आंदोलन का वास्तविक उद्देश्य हिंसा, आतंकवाद, अलगाववाद या भारत की संप्रभुता और अखंडता को कमजोर करना है, तो राजनीतिक लाभ के लिए उसका समर्थन करना बेहद गंभीर विषय होगा।

दो, प्रशासन की भूमिका—न अतिसक्रियता, न निष्क्रियता
प्रशासन को दो गलतियों से बचना चाहिए: हर तीखे राजनीतिक नारे को राष्ट्रविरोधी गतिविधि मान लेना।
और दूसरी ओर, संदिग्ध गतिविधियों को केवल “राजनीतिक विरोध” कहकर छोड़ देना। सही रास्ता है इंटेलिजेंस, साक्ष्य और कानून के आधार पर कार्रवाई। नारे के पीछे कौन है, धन कहाँ से आ रहा है, संगठन की गतिविधियां क्या हैं, हिंसा या आतंकी नेटवर्क से कोई संबंध है या नहीं—इनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

तीन, न्यायपालिका को क्या करना चाहिए?: न्यायपालिका का काम किसी विचारधारा का पक्ष लेना नहीं, बल्कि संविधान और कानून की कसौटी पर राज्य की कार्रवाई तथा नागरिक के अधिकार—दोनों की जांच करना है। इसलिए अदालत को यह देखना चाहिए कि:क्या केवल असहमति या नारा है? या क्या उसके साथ हिंसा, उकसावा, आतंकवादी गतिविधि अथवा वास्तविक अलगाववादी कार्रवाई का प्रमाण भी है? यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है।

चार, सबसे बड़ा खतरा राजनीतिक दोहरे मापदंड का है: यदि सत्ता पक्ष किसी नारे को “राष्ट्रविरोध” कहे और विपक्ष उसी नारे को “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” कहकर बचाए—या इसका उलटा करे—तो इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास कमजोर होता है। राष्ट्रहित किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी किसी दल का विशेषाधिकार नहीं।

अंततोगत्वा, स्वतंत्रता दिवस के संदर्भ में यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। भारत को ऐसा लोकतंत्र चाहिए जहां सरकार की आलोचना करने की पूरी गुंजाइश हो, लेकिन देश की संप्रभुता और सुरक्षा के विरुद्ध वास्तविक षड्यंत्र को राजनीतिक संरक्षण न मिले। इसलिए कसौटी एक ही होनी चाहिए: नारे नहीं, साक्ष्य देखिए। विचार नहीं, हिंसक कार्रवाई देखिए। राजनीतिक पहचान नहीं, कानून का समान अनुप्रयोग देखिए। यही लोकतंत्र और राष्ट्रीय सुरक्षा—दोनों के बीच सही संतुलन है।
# स्वतंत्रता दिवस: 'हमें चाहिए आजादी' जैसे नारों के निहितार्थ समझिए 

“हमें चाहिए आज़ादी” जैसे नारे सुनते ही उसे सीधे देशद्रोही साजिश मान लेना भी सही नहीं है और उसे पूरी तरह निर्दोष मान लेना भी। असली सवाल है—आज़ादी किससे, किसके लिए और किस उद्देश्य से? इस नारे के तीन अलग-अलग अर्थ हो सकते हैं:- 

पहला, लोकतांत्रिक असहमति: बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, भेदभाव, प्रशासनिक दमन या किसी नीति के विरोध में “आजादी” का अर्थ व्यवस्था में सुधार और अधिकारों की मांग हो सकता है। लोकतंत्र में ऐसी मांग अपने-आप में देशद्रोह नहीं है।

दूसरा, राजनीतिक/विचारधारात्मक आंदोलन: कुछ समूह “आजादी” का इस्तेमाल व्यवस्था परिवर्तन, स्वायत्तता या किसी विशेष राजनीतिक उद्देश्य के लिए कर सकते हैं। तब नारे को उसके पूरे संदर्भ, संगठन और गतिविधियों के साथ समझना जरूरी है।

तीसरा, वास्तविक अलगाववादी या हिंसक एजेंडा: यदि “आजादी” का अर्थ भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को हिंसक तरीके से समाप्त करना, आतंकवादी संगठन को समर्थन देना या हिंसा के लिए उकसाना है, तो मामला बिल्कुल अलग और गंभीर हो जाता है।

खासकर यदि स्वतंत्रता दिवस पर ऐसा कोई करे तो इसका अर्थ और संवेदनशील हो जाता है? जानिए क्यों?

15 अगस्त भारत की राष्ट्रीय स्वतंत्रता और संप्रभुता का प्रतीक है। इसलिए इसी दिन यदि कोई समूह “हमें चाहिए आजादी” का नारा लगाता है, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि वह 1947 की आजादी की बात कर रहा है या भारत से किसी दूसरी तरह की आजादी की?
लेकिन केवल नारे के शब्दों से निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। किसने नारा लगाया, कहाँ लगाया, किस संदर्भ में लगाया, किसके समर्थन में लगाया और उसके बाद क्या गतिविधियां हुईं—इन सबका प्रमाण जरूरी है।

“देशद्रोह” शब्द का इस्तेमाल भी सावधानी से होना चाहिए
किसी नारे को पसंद न करना और उसका कानूनी रूप से अपराध होना दो अलग बातें हैं। भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व्यापक है, लेकिन यह पूर्ण नहीं है। हिंसा के लिए उकसावा, अलगाववादी हिंसक गतिविधियों को बढ़ावा, आतंकवादी गतिविधियों का समर्थन या भारत की संप्रभुता/अखंडता को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियां अलग कानूनी प्रश्न पैदा करती हैं।

इसलिए स्वतंत्रता दिवस पर सबसे जरूरी सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “नारा देशद्रोही है या नहीं?”, बल्कि यह होना चाहिए कि “इस नारे के पीछे वास्तविक मांग क्या है और क्या उसके पीछे संवैधानिक लोकतांत्रिक असहमति है या हिंसक/अलगाववादी एजेंडा?” यही अंतर लोकतांत्रिक असहमति और राष्ट्रविरोधी साजिश के बीच की वास्तविक रेखा तय करता है।

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