India must move beyond the politics of reservation: we need social justice as well as justice for merit!
आरक्षण की राजनीति से आगे बढ़े भारत: सामाजिक न्याय भी चाहिए, प्रतिभा का न्याय भी! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारत में आरक्षण पर बहस जितनी पुरानी है, उतनी ही अधूरी भी। हर कुछ वर्षों में देश दो खेमों में बंट जाता है—एक तरफ वे लोग होते हैं जो आरक्षण को सामाजिक न्याय की अनिवार्य व्यवस्था मानते हैं और दूसरी तरफ वे लोग जो इसे प्रतिभा, प्रतिस्पर्धा और समान अवसर के विरुद्ध बताते हैं। लेकिन क्या भारत की जटिल सामाजिक वास्तविकता को इतनी आसानी से दो खानों में बांटा जा सकता है?जवाब होगा, शायद नहीं। मसलन आज आवश्यकता इस बात की है कि आरक्षण को न तो पवित्र राजनीतिक प्रतीक मानकर हर सवाल से ऊपर रखा जाए और न ही देश की तमाम समस्याओं का कारण बताकर खारिज कर दिया जाए। आरक्षण की समीक्षा, उसके राजनीतिक दुरुपयोग, क्रीमी लेयर, वास्तविक वंचितों तक लाभ की पहुंच, प्रतिभा और समान अवसर—इन सभी पर खुली और तथ्यपरक बहस होनी चाहिए। मेरी स्पष्ट सलाह है कि हमारे राजनेतागण, नौकरशाह, न्यायविद और पेशेवर बुद्धिजीवीगण इस सुलगते सवाल पर संतुलित और निष्पक्ष नजरिया अपनाए...