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India must move beyond the politics of reservation: we need social justice as well as justice for merit!

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आरक्षण की राजनीति से आगे बढ़े भारत: सामाजिक न्याय भी चाहिए, प्रतिभा का न्याय भी! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारत में आरक्षण पर बहस जितनी पुरानी है, उतनी ही अधूरी भी। हर कुछ वर्षों में देश दो खेमों में बंट जाता है—एक तरफ वे लोग होते हैं जो आरक्षण को सामाजिक न्याय की अनिवार्य व्यवस्था मानते हैं और दूसरी तरफ वे लोग जो इसे प्रतिभा, प्रतिस्पर्धा और समान अवसर के विरुद्ध बताते हैं। लेकिन क्या भारत की जटिल सामाजिक वास्तविकता को इतनी आसानी से दो खानों में बांटा जा सकता है?जवाब होगा, शायद नहीं। मसलन आज आवश्यकता इस बात की है कि आरक्षण को न तो पवित्र राजनीतिक प्रतीक मानकर हर सवाल से ऊपर रखा जाए और न ही देश की तमाम समस्याओं का कारण बताकर खारिज कर दिया जाए। आरक्षण की समीक्षा, उसके राजनीतिक दुरुपयोग, क्रीमी लेयर, वास्तविक वंचितों तक लाभ की पहुंच, प्रतिभा और समान अवसर—इन सभी पर खुली और तथ्यपरक बहस होनी चाहिए।  मेरी स्पष्ट सलाह है कि हमारे राजनेतागण, नौकरशाह, न्यायविद और पेशेवर बुद्धिजीवीगण इस सुलगते सवाल पर संतुलित और निष्पक्ष नजरिया अपनाए...

Is India now sending a 'follow the rules or leave the way' message to global tech companies?

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क्या भारत अब वैश्विक टेक कंपनियों के लिए ‘नियम मानो या रास्ता छोड़ो’ वाला संदेश दे रहा है? @ कमलेश पांडेय / वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारत सरकार ने इंस्टाग्राम, वाट्सएप और फेसबुक का संचालन करने वाली कंपनी मेटा की मनमानी को अब नियंत्रित करने का निर्णय लिया है। इसी के दृष्टिगत उसे यह चेतावनी भी दी है कि उसे भारतीय कानूनों का पालन करना ही होगा। यही नहीं, सरकार ने मेटा से अपने एल्गोरिदम को लेकर भी जवाब तलब किया है।  https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-6262725213669814 इसका तातपर्य है कि अब मेटा को यह सुनिश्चित करना होगा कि इस सरकारी निर्देश का वास्तव में पालन हो, क्योंकि मेटा अथवा अन्य इंटरनेट मीडिया कंपनियां एलगोरिदम का मनमाना उपयोग करती हैं। एआइ के आगमन के बाद उनके लिए ऐसा करना और आसान हो गया है। इसलिए सवाल उठने लगे हैं कि  क्या भारत अब वैश्विक टेक कंपनियों के लिए ‘नियम मानो या रास्ता छोड़ो’ वाला संदेश दे रहा है? वस्तुतः वैश्विक इंटरनेट कंपनियां एक विशेष एजेंडे का प्रचार-प्रसार करती हैं। अब इंटरनेट मीडिया कंपनियां यह ...