Which of the five most celebrated third-generation BJP leaders has the brightest political prospects? Understand this seriously.
आखिर भाजपा की तीसरी पीढ़ी के पांच बहुचर्चित नेताओं में से किसकी सियासी संभावनाएं हैं बुलंद, समझिए गम्भीरता से
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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
भारतीय जनता पार्टी की तीसरी पीढ़ी के नेताओं में यूँ तो कई छुपे रुस्तम हैं, जो समय के रथ पर सवार होकर सामने आएंगे, लेकिन फिलवक्त जो सर्वाधिक चर्चा में हैं, उनमें उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, असम के मुख्यमंत्री हिमंता विश्व शर्मा, बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुभेन्दु अधिकारी की अपनी अपनी राजनीति शैली और सियासी संभावनाएँ हैं। चूंकि सबने अपने अपने स्वतंत्र तरीके से अपना अपना क्षेत्रीय कद मजबूत किया है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से तालमेल बिठाकर अपना राष्ट्रीय राजनीतिक कद बढ़ाया है।
इसलिए इनमें से मोदी-शाह का समयानुकूल व मनोनुकूल सर्वश्रेष्ठ उत्तराधिकारी कौन बन सकता है, यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन यह फैसला भी जब होगा तो पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के फैसले की तरह चौंकाने वाला ही होगा।फिर भी सियासी पालने में राजनीतिक पूत के पांव से जो संकेत मिल रहे हैं, उसके दृष्टिगत इतना भर कहा जा सकता है कि यदि इन नेताओं को भारतीय जनता पार्टी की "तीसरी पीढ़ी" (अर्थात मोदी-शाह युग के बाद राष्ट्रीय नेतृत्व की संभावित कतार) के रूप में देखा जाए, तो सभी की अपनी-अपनी विशिष्ट ताकतें और सीमाएँ हैं।
यहां पर हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भाजपा में प्रधानमंत्री पद का उत्तराधिकारी केवल जनलोकप्रियता से नहीं, बल्कि संगठन, संसदीय दल, गठबंधन क्षमता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ तालमेल जैसे अनेक कारकों से तय होता है। इसलिए बात शुरू करते हैं जनसंख्या के आधार पर देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से जिन्हें सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री होने का राजनीतिक लाभ मिलेगा। साथ ही कानून-व्यवस्था और हिंदुत्व की स्पष्ट पहचान, जनसभाओं में करिश्माई अपील और राष्ट्रीय पहचान उनका बोनस पॉइंट बन सकता है। लेकिन जहां तक उनकी सीमाएँ की बात है तो उनकी शैली अपेक्षाकृत ध्रुवीकरण वाली मानी जाती है, इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर विविध सामाजिक और क्षेत्रीय समूहों को साथ लाने की चुनौती अधिक हो सकती है।
जहां तक जनसंख्या के आधार पर देश के दूसरे बड़े राज्य महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की बात है तो एक कुशल प्रशासक, समझौतावादी दूरदर्शी राजनेता और संगठनात्मक रणनीतिकार के रूप में उन्होंने खुद को साबित किया और अपनी अचूक रणनीति के बल पर अपने प्रदेश में भाजपा को छोटे भाई के स्थान से बड़े भाई का दर्जा दिला दिया। ऐसा इसलिए कि गठबंधन राजनीति और विभिन्न दलों के साथ काम करने का उनका तीक्ष्ण अनुभव उन्हें अलग व अनोखा स्थान प्राप्त करवाता है। अपेक्षाकृत संतुलित और तकनीकी प्रशासनिक छवि होने के साथ साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अटूट विश्वास उन्हें हासिल है। हालांकि, उनकी सीमाएं यह है कि जन-करिश्मा योगी की तुलना में उन्हें कम आंका/माना जाता है, हालांकि संगठन में उनकी स्वीकार्यता मजबूत है।
जहां तक जनसंख्या के आधार पर देश के तीसरे बड़े राज्य बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की बात है तो उन्हें उत्तरप्रदेश के सियासी जुड़वां भाई के रूप में समझे जाने वाले बिहार का नेतृत्व करने का लाभ मिलेगा। वह बिहार में भाजपा के प्रमुख ओबीसी चेहरों में से एक हैं और सामाजिक समीकरणों और संगठन दोनों में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। इन्होंने अपनी मेहनत व लगन से बिहार में छोटा भाई समझी जाने वाली भाजपा को बड़ा भाई का दर्जा और अपने कुशल नेतृत्व में मुख्यमंत्री का पद भी दिलवाया, जो कि उनके सियासी रूप से महारत प्राप्त करने का स्पष्ट संकेत है। ऐसे में यदि बिहार में भाजपा दीर्घकालिक सफलता प्राप्त करती है, तो उनका राष्ट्रीय महत्व बढ़ सकता है। अब वो जदयू को जितना छोटा करेंगे, उनका राजनीतिक कद उतना ही बढ़ेगा।
जहां तक प्रधानमंत्री पद पर दावेदारी की बात है तो ओबीसी का मजबूत चेहरा होने की वजह से योगी आदित्यनाथ, देवेंद्र फडणवीस, हिमंता विश्व शर्मा और सुभेन्दु अधिकारी जैसे सवर्ण नेताओं पर अक्सर भारी पड़ेंगे। चूंकि उनका मिजाज लोकोपकारी है, और सियासी अंदाज मोदी-शाह जैसा, इसलिए समय की कसौटी पर सम्राट ही बतौर शहंशाह खरे उतरें तो किसी को अचंभा नहीं होना चाहिए। हालांकि उनकी संक्षिप्त सीमाएँ ये हैं कि अभी उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक जनाधार और शासन का लंबा अनुभव अर्जित करना है, जो बाकी है।
चूंकि 2029 में भी मोदी वापस आने वाले हैं, इसलिए अपनी तैयारियों के लिए उन्हें काफी मौका भी मिल जाएगा। अपराधियों के खिलाफ उन्होंने जो सख्ती दिखाई है, वही आज की सख्त जरूरत भी है। हालांकि, उन्हें भी ओबीसी के नागनाथों, और दलितों के सांपनाथों से बचकर रहना होगा। सवर्णों पर परवत्ता और पोस्ट परवत्ता वाली पकड़ निरंतर मजबूत करनी होगी, अन्यथा बिहार बड़ा मौका चूक जाएगा।
जहां तक जनसंख्या के आधार पर देश के चौथे बड़े राज्य पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी की बात है तो उन्होंने अपने राज्य में भाजपा को चुनौती पूर्ण सफलता दिलवाई है। जिसके बाद ही वह पश्चिम बंगाल में भाजपा के प्रमुख विपक्षी चेहरे के रूप में उभरे हैं। चूंकि वह जमीनी संगठन और आक्रामक चुनावी राजनीति में दक्ष है, इसलिए यदि बंगाल में भाजपा का विस्तार जारी रहता है, तो उनकी भावी भूमिका और महत्वपूर्ण हो सकती है। उन्हें बस अपने पड़ोसी राज्यों के मुख्यमंत्री साथियों को साधकर चलना है, ताकि पूर्वी भारत का सम्पूर्ण व समावेशी विकास हो सके। चूंकि पूर्वी भारत का महानगर कोलकाता ही है, इसलिए उनकी नैतिक व भौतिक जिम्मेदारी ज्यादा बढ़ जाती है।जहां तक उनकी सीमाएँ का सवाल है तो उनकी राष्ट्रीय भूमिका अभी अपेक्षाकृत सीमित है।
जहां तक पूर्वोत्तर की सात बहन राज्यों के प्रवेश राज्य और अगुवा भाई असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की बात है तो वो पूर्वोत्तर में भाजपा के विस्तार के प्रमुख रणनीतिकार बन चुके हैं। उनका आक्रामक चुनावी अभियान और प्रशासनिक सक्रियता काबिलेतारीफ है। साथ ही पूर्वोत्तर के बाहर भी राष्ट्रीय मुद्दों पर उनकी मुखर उपस्थिति उनकी राष्ट्रीय सम्भवनाओं को अभिव्यक्त करने को काफी है। लेकिन उनकी अपनी सीमाएँ है और वे यह कि अभी उनकी मुख्य राजनीतिक शक्ति पूर्वोत्तर तक अधिक केंद्रित है, हालांकि उनका राष्ट्रीय कद लगातार बढ़ा है।
उपर्युक्त तथ्यों और तर्कों के दृष्टिगत यदि मोदी के समयानुकूल उत्तराधिकारी कौन के बाबत यदि केवल इन पाँच नेताओं (हालांकि इसकी सूची बहुत लंबी है) की तुलना की जाए, तो अलग-अलग मानदंडों पर अलग निष्कर्ष निकल सकते हैं: जैसे- जनाधार और राष्ट्रीय पहचान के मद्देनजर योगी आदित्यनाथ, प्रशासनिक संतुलन और गठबंधन क्षमता के नजरिए से देवेंद्र फडणवीस, भविष्य के उभरते कद्दावर क्षेत्रीय नेता के तौर पर सम्राट चौधरी, उज्ज्वल भविष्य के दृष्टिगत निखरते मजबूत सूबाई नेता के तौर पर शुभेंदु अधिकारी और चुनावी रणनीति और संगठन विस्तार के मुताबिक हिमंता बिस्वा सरमा का नाम अग्रगण्य है। सच्चाई भी यही है कि उपर्युक्त पांचों नेताओं की व्यक्तिगत अलौकिक सियासी विशेषताएं हैं, जिससे भाजपा को सर्वव्यापी मजबूती मिली है।
यदि प्रश्न यह है कि वर्तमान परिस्थितियों में सबसे मजबूत दावेदार कौन दिखते हैं, तो राजनीतिक विश्लेषकों की चर्चाओं में प्रायः योगी आदित्यनाथ, देवेंद्र फडणवीस और हिमंता बिस्वा सरमा को सबसे आगे माना जाता है। वहीं, यदि भाजपा भविष्य में मजबूत वैचारिक और जनाधार वाले नेतृत्व को प्राथमिकता देती है, तो योगी आदित्यनाथ की दावेदारी स्वाभाविक रूप से मजबूत दिखाई देती है। जबकि यदि प्राथमिकता सर्वस्वीकार्य, प्रशासनिक और गठबंधन-उन्मुख नेतृत्व की होती है, तो देवेंद्र फडणवीस एक मजबूत विकल्प माने जा सकते हैं।
वहीं, हिमंता बिस्वा सरमा संगठन और चुनावी रणनीति के कारण तेजी से राष्ट्रीय महत्व प्राप्त कर रहे हैं, लेकिन उनके सामने अभी राष्ट्रीय जनाधार का विस्तार एक महत्वपूर्ण चुनौती है। खास बात यह है कि ओबीसी पॉलिटिक्स के दौर में राष्ट्रीय फलक पर भी उभरते बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की दावेदारी को भी हल्के में नहीं लिया जा सकता है। जिस तरह से बिहार के मुख्यमंत्री के चयन के मामले में उन्होंने अपने व्यक्तिगत प्रबंधन से सबको चौंका दिया, शायद यही स्थिति आगे भी दोहराई जा सकता है। मैन मैनेजमेंट में उनका अपना अंदाज रहा है जहां मौके पर चौका लगाने में वो कतई नहीं चूकते हैं।
अंततः यह कहा जा सकता है कि भाजपा में नेतृत्व का चयन केवल लोकप्रियता से नहीं, बल्कि संगठन, संसदीय बहुमत, सहयोगी दलों की स्वीकार्यता और उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। इसलिए आज किसी एक नेता को नरेंद्र मोदी का निश्चित उत्तराधिकारी घोषित करना संभव नहीं है, हालांकि वर्तमान परिदृश्य में योगी आदित्यनाथ, देवेंद्र फडणवीस, हिमंता बिस्वा सरमा और सम्राट चौधरी सबसे प्रमुख संभावित दावेदारों में गिने जाते हैं।
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