After all, what should serve as proof of citizenship in India—something that leaves no room for ambiguity?

आखिर भारत में क्या हो नागरिकता का प्रमाण जो जिसमें दुविधा न हो?

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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ  पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

भारत में नागरिकता प्रमाण को लेकर हाल की शुरू हुई बहस ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है कि यदि पासपोर्ट, आधार, वोटर आईडी और पैन कार्ड भी नागरिकता के अंतिम प्रमाण नहीं हैं, तो फिर ऐसा कौन-सा दस्तावेज़ हो जो पूरे देश में सर्वमान्य हो? यक्ष प्रश्न है। मेरे विचार से भारत को एक एकीकृत "राष्ट्रीय नागरिकता प्रमाणपत्र" (National Citizenship Certificate) या डिजिटल नागरिकता रजिस्टर की दिशा में गंभीरता से विचार करना चाहिए। 
यदि मंडल/प्रमंडल, जिला, अनुमंडल, ब्लॉक प्रशासन और शहरी क्षेत्रों में नगर निगम, नगरपालिका, नगर परिषद, नगर पंचायत, तथा ग्रामीण क्षेत्रों में जिला परिषद, पंचायत समिति, पंचायत और वार्ड स्तर पर स्पष्ट डेटा बने तो बहुतेरे भ्रष्टाचार पर स्वतः लगाम लग जायेगा। वस्तुतः इस बाबत प्रशासनिक दुविधा भ्रष्ट प्रवृत्ति वालों को कई तरह की अन्यान्य सुविधाएं प्रदान कर रही हैं, खासकर मतदाता सूची या लाभुक सूची बनाने में बहुत घालमेल है, जिससे जनतांत्रिक क्षति स्वाभाविक है।

इसके पक्ष में कुछ तर्क हैं: पहला, स्पष्टता और कानूनी निश्चितता: आज नागरिकता साबित करने के लिए जन्म प्रमाणपत्र, माता-पिता के दस्तावेज़, निवास संबंधी रिकॉर्ड आदि का सहारा लेना पड़ता है। कोई एक सार्वभौमिक दस्तावेज़ नहीं है। 

दूसरा, प्रशासनिक सरलता: सरकारी योजनाओं, चुनावी प्रक्रियाओं, पासपोर्ट, सरकारी नौकरियों और संपत्ति संबंधी मामलों में बार-बार अलग-अलग दस्तावेज़ प्रस्तुत करने की आवश्यकता कम हो जाएगी।

तीसरा, अवैध घुसपैठ और फर्जी पहचान पर नियंत्रण: 
नागरिक और निवासी (resident) के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित हो सकेगा। आधार स्वयं नागरिकता का प्रमाण नहीं है क्योंकि यह निवासियों को भी जारी किया जा सकता है। 

चौथा, डिजिटल भारत के अनुरूप व्यवस्था: जैसे आधार पहचान का माध्यम बना, वैसे ही सुरक्षित डिजिटल नागरिकता प्रमाणपत्र बनाया जा सकता है, जिसमें मजबूत गोपनीयता और न्यायिक सुरक्षा हो। 

हालाँकि इसके साथ कुछ सावधानियाँ भी जरूरी होंगी:
जिनके पास पुराने रिकॉर्ड नहीं हैं, उनके अधिकार प्रभावित न हों। खासकर गरीब, ग्रामीण और वंचित वर्गों को दस्तावेज़ीकरण में सहायता मिले। अपील और सुधार की पारदर्शी व्यवस्था हो। नागरिकता सत्यापन राजनीतिक या प्रशासनिक मनमानी का साधन न बने।

नीतिगत दृष्टि से सबसे व्यावहारिक मॉडल यह हो सकता है कि जन्म पंजीकरण को 100% अनिवार्य और सार्वभौमिक बनाया जाए तथा उसी के आधार पर नागरिकता का एक स्थायी डिजिटल प्रमाण विकसित किया जाए। इससे भविष्य में नागरिकता संबंधी विवाद काफी हद तक समाप्त हो सकते हैं। 

कम शब्दों में कहूँ तो भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में एक ऐसा नागरिकता प्रमाण होना चाहिए जो पूरे देश में सर्वत्र मान्य, कानूनी रूप से अंतिम, डिजिटल रूप से सुरक्षित और नागरिक अधिकारों की रक्षा करने वाला हो। अभी की स्थिति में ऐसा कोई एक सार्वभौमिक दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं है, और यही भ्रम का मूल कारण है। यह हमारी संसद, सरकार और न्यायपालिका, तीनों की नाकामी नहीं तो क्या है? आप ख़ुद सोचिये, समझिए, सर्वमान्य हल दीजिए।

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