After all, how will the potential clash of regional interests among China, India, and Iran/Israel in Asia be averted?
आखिर एशिया में चीन, भारत और ईरान/इजरायल के क्षेत्रीय हितों में संभाव्य टकराव रुकेगा कैसे?
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
एशिया को खरबूजे की तरह काटकर यहां के प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने वाले अमेरिका-यूरोप के ताकतवर पश्चिमी देशों के लिए भारत और ईरान का मजबूती पूर्वक उभरना न केवल चौंकाने वाला अंतरराष्ट्रीय अध्याय है, बल्कि अबतक उन्हें चीन से जो रणनीतिक चुनौती मिल रही थी, उसे यदि भारत और ईरान दोनों का रणनीतिक साथ मिल गया, क्योंकि रूस की यही रणनीति है, तो ब्रिक्स को आशातीत मजबूती मिलेगी और जी-7 की अंतरराष्ट्रीय दादागिरी पर ब्रेक लगेगा।
यही वजह है कि अमेरिकी डीप स्टेट परेशान है। उसे 20वीं सदी के इंग्लैंड की मानिंद 21वीं सदी में अमेरिकी सितारा भी डूबता हुआ नजर आने लगा है। ऐसा इसलिए कि पड़ोसियों से बात बात में विवाद को बढ़ाने वाला चीन वैश्विक विवादों में सौम्य प्रतिरोध की जो रणनीति अपना रहा है, उससे रूस, भारत और ईरान के साथ साथ इनके समर्थकों की सहानुभूति भी चीन के साथ बढ़ रही है। वहीं, ठीक इसके उलट दुनिया का तथाकथित थानेदार अमेरिका अपने सिरफिरे राष्ट्रपति की ऊटपटांग बातों, मनमाने फैसलों और उसे मिल रहे परोक्ष भारतीय शह के बावजूद कूटनीतिक महासागर में उसका अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक बेड़ा भी डूबता प्रतीत हो रहा है।
इसलिए अमेरिका-यूरोप की चाहत है कि साम, दाम, दंड और भेद लगाकर, रूस को पटाकर एन केन प्रकारेण ईरान, भारत और चीन को परस्पर उलझाया जाए। इसमें अमेरिका, पाकिस्तान को शिखंडी की तरह इस्तेमाल कर रहा है, क्योंकि उसे पता है कि भारत पाकिस्तान की पिटाई हद से ज्यादा नहीं करेगा, जबकि पाकिस्तान की आईएसआई चीन को बरगलाकर बंगलादेश, नेपाल, म्यांमार, श्रीलंका, मालदीव, अफगानिस्तान आदि में नित्य नए नए बखेड़े खड़ा करवाता रहेगा। उधर, ईरान के खिलाफ इजराइल को भी उसके पड़ोसियों को भड़काने का जिम्मा दिया गया है। लगभग यही रणनीति चीन के खिलाफ ताइवान और आशियान के कुछ मुखर देशों को सौंपी गई है।
यही वजह है कि भारत की खुफिया एजेंसी रॉ इस बात पर गम्भीरता पूर्वक कार्य कर रही है कि रूस व इजरायल के सहयोग से एशिया में चीन, भारत और ईरान/इजरायल के क्षेत्रीय हितों में टकराव को जहां तक संभव हो सके, टलवाते रहा जाए। क्योंकि उसे अंदरूनी आशंका है कि कहीं अमेरिका, कहीं रूस और कहीं फ्रांस के हित जब टकराएंगे तो उनकी कूटनीतिक खीझ भारत के ऊपर भी निकल सकती है। हाँ, अंतरराष्ट्रीय मजबूरी बस रूस तो ऐसा नहीं चाहेगा, लेकिन अमेरिका व फ्रांस पर ज्यादा भरोसा किसी अनहोनी को शह देने जैसा भी हो सकता है।
जब हमने इस विषय की आंतरिक पड़ताल की तो समझाया गया कि यह संभावित टकराव पूरी तरह समाप्त हो जाएगा, ऐसा निकट भविष्य में कहना कठिन है। लेकिन इसे नियंत्रित और सीमित अवश्य किया जा सकता है। इसके पीछे तीन प्रमुख कारण हैं: पहला यह कि तीनों देशों के हित अलग-अलग हैं। जहां भारत का मुख्य लक्ष्य हिंद महासागर, सीमा सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विकास है। वहीं, चीन एशिया में अपनी आर्थिक, सैन्य और भू-राजनीतिक शक्ति का विस्तार चाहता है। जबकि ईरान पश्चिम एशिया में अपना क्षेत्रीय प्रभाव और सुरक्षा चाहता है। उधर, इज़रायल भी अपनी सुरक्षा, ईरानी प्रभाव को सीमित करने और तकनीकी-सैन्य बढ़त बनाए रखने पर केंद्रित है। यही वजह है कि इन उद्देश्यों में कई जगह स्वाभाविक टकराव है।
दूसरा, जटिल प्रश्न है कि आखिर ऐसा सम्भाव्य टकराव कैसे कम हो सकता है? तो बताया गया कि नियमित कूटनीतिक संवाद और बैक-चैनल वार्ता, आर्थिक परस्पर निर्भरता बढ़ाना, समुद्री सुरक्षा और आतंकवाद-विरोधी सहयोग,सीमा विवादों के लिए स्पष्ट नियम और संकट-प्रबंधन तंत्र के अलावा बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग, जैसे शंघाई सहयोग संगठन, ब्रिक्स और संयुक्त राष्ट्र का उपयोग करके इस लक्ष्य को साधा जा सकता है।
तीसरा, रणनीतिक सवाल है कि क्या अमेरिका, रूस और फ्रांस ऐसा होने देंगे? तो जवाब होगा कि यह प्रश्न "होने देंगे" से अधिक "उनके हित क्या हैं?" का है। चूंकि संयुक्त राज्य अमेरिका सामान्यतः ऐसा शक्ति-संतुलन चाहता है जिसमें कोई एक देश पूरे एशिया पर प्रभुत्व न स्थापित कर सके। इसलिए वह कई बार सहयोग भी करता है और कई बार प्रतिस्पर्धा को भी बढ़ावा देता है। वहीं, रूस भारत, चीन और ईरान—तीनों के साथ संबंध बनाए रखना चाहता है। उसका प्रयास अक्सर संतुलन बनाने का होता है, हालांकि उसके अपने सामरिक हित भी हैं। वहीं, फ्रांस हिंद-प्रशांत में सक्रिय है और भारत सहित कई देशों के साथ रक्षा एवं समुद्री सहयोग बढ़ा रहा है। उसका उद्देश्य भी क्षेत्रीय स्थिरता और अपने रणनीतिक हितों की रक्षा है।
निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी मित्र या स्थायी शत्रु कम होते हैं; स्थायी राष्ट्रीय हित अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए एशिया में प्रतिस्पर्धा और सहयोग दोनों साथ-साथ चलते रहेंगे। भारत, चीन, ईरान, इज़रायल, अमेरिका, रूस और फ्रांस—सभी प्रत्यक्ष युद्ध से बचना चाहेंगे क्योंकि उससे वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक स्थिरता को भारी नुकसान होगा। लेकिन सीमित प्रतिस्पर्धा, प्रभाव-क्षेत्र की होड़ और कूटनीतिक खींचतान निकट भविष्य में जारी रहने की संभावना अधिक है।
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