अमेरिकी नेतृत्व वाले नाटो देशों के रक्षा बजट में इजाफे से रूस-चीन पर बढ़ेगा दबाव, भारत के हथियारों की बढ़ेगी बिक्री
अमेरिकी नेतृत्व वाले नाटो देशों के रक्षा बजट में इजाफे से रूस-चीन पर बढ़ेगा दबाव, भारत के हथियारों की बढ़ेगी बिक्री
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
आए दिन बदलते ग्लोबल जियो पॉलिटिक्स का मजबूती पूर्वक मुकाबला करने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व वाले अंतरराष्ट्रीय संगठन "नाटो" के नेताओं ने गत दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दबाव में अपने रक्षा खर्च में भारी वृद्धि करने पर सहमति जताई है। साथ ही किसी भी सदस्य देश पर हमला होने पर एक-दूसरे की मदद करने की अपनी ''अडिग प्रतिबद्धता'' व्यक्त की है। बता दें कि नए लक्ष्य को अगले 10 वर्षों में हासिल किया जाना है।
हाल ही में हेग में संपन्न हुई नाटो शिखर सम्मेलन में संगठन के 32 नेताओं ने आपसी सहमति के बाद कहा कि, ''सहयोगी देश 2035 तक रक्षा और सुरक्षा संबंधी व्यय के साथ-साथ मुख्य रक्षा आवश्यकताओं पर अपने-अपने सालाना सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का पांच प्रतिशत निवेश करने के लिए प्रतिबद्ध हैं ताकि हमारे व्यक्तिगत और सामूहिक दायित्व सुनिश्चित हो सकें।''
वहीं, उत्तर अमेरिकी और यूरोपीय देशों ने आशंका जताई है कि 2022 में यूक्रेन पर आक्रमण के बाद रूस उनकी सुरक्षा के लिए एक खतरा बन गया है। इसलिए नेताओं ने नाटो की इस सामूहिक सुरक्षा गारंटी के प्रति अपनी 'अडिग प्रतिबद्धता' को भी रेखांकित किया कि अगर किसी एक देश पर हमला होता है तो उसे सभी पर हमला माना जाएगा।
गौरतलब है कि ट्रंप ने नाटो के सदस्यों से दो टूक कहा है कि यदि वे खर्च लक्ष्य पूरा करने में विफल रहते हैं तो वह उनकी रक्षा नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि 'मैं जिंदगियां बचाने के लिए प्रतिबद्ध हूं। मैं जीवन और सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध हूं।''
लेकिन तभी जब नाटो देश जीडीपी का 3.5 प्रतिशत मुख्य रक्षा पर खर्च करेंगे। इससे अमेरिका पर ज्यादा आर्थिक दबाव नहीं पड़ेगा।
गौरतलब है कि नया व्यय लक्ष्य अगले 10 वर्षों में हासिल किया जाना है। यह लक्ष्य जीडीपी के दो प्रतिशत के मौजूदा लक्ष्य से कहीं अधिक है। बताया जाता है कि नाटो देश अपने जीडीपी का 3.5 प्रतिशत मुख्य रक्षा पर खर्च करेंगे जैसे कि सेना और हथियार। और, शेष डेढ़ प्रतिशत व्यापक रक्षा-संबंधी उपायों, जैसे कि साइबर सुरक्षा, पाइपलाइनों की सुरक्षा और भारी सैन्य वाहनों को संभालने के लिए सड़कों और पुलों के प्रबंधन पर खर्च करेंगे।
यूँ तो सभी नाटो सदस्यों ने लक्ष्य को सुनिश्चित करने वाले एक बयान का समर्थन किया है, लेकिन स्पेन ने घोषणा की है कि उसे लक्ष्य को पूरा करने की आवश्यकता नहीं है और वह बहुत कम खर्च करके अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा कर सकता है। हालांकि, स्पेन की इस टिप्पणी पर ट्रंप ने कड़ी आपत्ति जताई है।
यही वजह है कि नाटो महासचिव मार्क रूट ने माना कि कुछ देशों के लिए अतिरिक्त धन जुटाना आसान नहीं है, लेकिन ऐसा करना बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा कि, ''मेरे सहयोगियों को पूरा विश्वास है कि रूस की ओर से इस खतरे को देखते हुए और मौजूदा अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा की स्थिति को देखते हुए और कोई विकल्प नहीं है।''
वहीं, इजरायल और ईरान के बीच युद्ध का वर्णन करते समय ट्रंप ने 'अपशब्दों' का प्रयोग किया था। इसका जिक्र करते हुए रूट ने ट्रंप की तुलना एक ऐसे पिता से की जो स्कूल प्रांगण में छात्रों के बीच झगड़े में हस्तक्षेप करता है। उधर, फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब ने कहा कि यह गठबंधन विकसित हो रहा है।
बता दें कि फिनलैंड, रूस की सीमा से सटा हुआ है और दो साल पहले ही यह नाटो में शामिल हुआ था। उन्होंने कहा, ''मुझे लगता है कि हम एक नए नाटो के उदय को देख रहे हैं, जिसका अर्थ है एक अधिक संतुलित नाटो और एक ऐसा नाटो जिसमें अधिक यूरोपीय जिम्मेदारी है।''
वहीं, ट्रंप ने अपने यूक्रेनी समकक्ष वोलोदिमिर जेलेंस्की से मुलाकात के बाद संकेत दिया कि वह यूक्रेन को और अधिक पैट्रियट वायु-रक्षा मिसाइलें देने पर विचार करेंगे, जिन पर कीव, रूसी हमलों से खुद को बचाने के लिए निर्भर करता है। दोनों नेताओं ने इस शिखर सम्मेलन के क्रम में हुई संक्षिप्त मुलाकात के दौरान कहा कि एक ऐसे युद्ध की दृष्टि से यह एक सकारात्मक कदम है जो अब अपने चौथे वर्ष में है। ट्रंप ने इस युद्ध को ''अन्य युद्धों की तुलना में अधिक कठिन'' बताया।
समझा जा रहा है कि अमेरिका व यूरोप विरोधी रूस, चीन, उत्तरकोरिया, ईरान, अफगानिस्तान और इनके समर्थक इस्लामिक देशों और अमेरिका-यूरोप समर्थक रहे पाकिस्तान की दोगली चालों से नाटो देश भयभीत रहते हैं।
इस स्थिति को नियंत्रित/संतुलित करने के लिए इनलोगों ने विगत 25 वर्षों तक भारत पर डोरे डाले, लेकिन भारत किसी की जाल में नहीं फंसा।
समझा जा रहा है कि गुटनिरपेक्ष देश भारत के चतुर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बहुत पहले ही भांप लिया था कि एक न एक दिन अमीर देशों का समूह रूस-चीन-उत्तरकोरिया-ईरान-अफगानिस्तान आदि से पंगा लेंगे। लेकिन भारत को इनके द्विपक्षीय कुचक्र में नहीं फंसना है बल्कि खुद को आर्थिक और सैन्य दृष्टि से अपेक्षा से अधिक मजबूत बना लेना है। भारत आज आर्थिक दृष्टि से विश्व की चौथी शक्ति बन चुका है और जल्द ही तीसरी शक्ति बन जाएगा। वहीं, सैन्य दृष्टि से भी भारत ने आशातीत तरक्की की है। यही वजह है कि अमेरिका या चीन के गुट में शामिल होने के बजाए वह अपना एक अलग गुट बना रहा है, जिसका एकमात्र लक्ष्य है- न तो किसी से घनिष्ठ दोस्ती और न ही किसी से जानलेवा बैर। यानी जियो और जीने दो। तीसरी दुनिया के देशों यानी ग्लोबल साउथ की तरह।
बताया जाता है कि नाटो देशों की नई रणनीति अब जहां रूस-चीन गुट पर भारी पड़ सकती है, वहीं भारत को इससे बहुत कारोबारी आर्डर मिलने के आसार हैं। इससे भारत मालामाल भी हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिज्ञ बताते हैं कि जिस तरह से नाटो देशों ने अपना डिफेंस बजट दोगुना करने का फैसला लिया है, उससे पूरे विश्व में अब हथियारों की नई होड़ शुरू होगी। ऐसा इसलिए कि यूरोपीय देश जमकर हथियार खरीदना चाहेंगे, जिनकी नजर भारत पर होगी। क्योंकि सबसे सस्ते और भरोसेमंद हथियार का उत्पादन सिर्फ भारत में ही हो रहा है।
दरअसल, ग्लोबल पॉलिटिक्स के नक्शे पर एक ऐसा बदलाव होता दिख रहा है, जो अब चीन ही नहीं, बल्कि रूस के भी होश उड़ा देगा। क्योंकि नाटो देशों ने अपने डिफेंस बजट में 5 फीसदी तक की बढ़ोतरी का ऐलान किया है। इससे दुनिया भर में हथियारों की होड़ शुरू होगी। जिसके दृष्टिगत अब ये अमीर देश अरबों डॉलर हथियार खरीदने पर खर्च करेंगे। भारत के लिए यह लाभकारी स्थिति होगी। क्योंकि नाटो देश न तो चीन से हथियार खरीदेंगे और न ही रूस से। ऐसा इसलिए कि दोनों को वे दुश्मन मुल्क की तरह ट्रीट करते हैं।
यही वजह है कि उनके जेहन में यह प्रश्न पैदा होगा कि आखिर वे अपने हथियार कहां से खरीदेंगे? चूंकि अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन आदि देश से बेहतर हथियार फिलवक्त भारत में बन रहे हैं, जहां हथियारों की न सिर्फ क्वालिटी बेहतर है, बल्कि वे विश्वसनीय भी हैं और ऑपरेशन सिंदूर जैसे द्विपक्षीय जंग में आजमाए भी जा चुके हैं। इससे भी बड़ी बात यह है कि भारत में बने हथियार दुनिया के मुकाबले काफी सस्ते हैं। ऐसे में नाटो की हथियार दौड़ में भारत का सुपरस्टार बनना तय है। यदि ऐसा हुआ तो इससे अरबों डॉलर की डील्स होंगी और भारत के लिए नौकरियों के लाखों मौके पैदा होंगे।
सामरिक मामलों के जानकार बताते हैं कि नाटो के इस फैसले का पहला और सबसे बड़ा असर यह होगा कि अमीर देशों के बीच अब अत्याधुनिक और ज्यादा शक्तिशाली हथियारों की होड़ शुरू होगी। ऐसा इसलिए कि रक्षा बजट में बढ़ोतरी का सीधा मतलब है कि ये देश नई सैन्य तकनीकों, हथियार प्रणालियों और सुरक्षा इन्फ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश करेंगे। इसके लिए उन्हें बड़ी मात्रा में हथियारों की खरीद करनी होगी।
बताया जाता है कि पारंपरिक रूप से नाटो देश अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन जैसे अपने ही पड़ोसियों से ही हथियार खरीदते रहे हैं, लेकिन हाल के वर्षों में लागत और डिलिवरी में देरी की वजह से ये देश अब नए विकल्पों की ओर देख रहे हैं, जिसमें भारत उन्हें सर्वाधिक उपयोगी विकल्प नजर आ रहा है। समझा जा रहा है कि पश्चिमी देशों के बाद रूस और चीन भले हथियारों के बड़े उत्पादक हों, लेकिन नाटो देशों के लिए इनसे हथियार खरीदना रणनीतिक और राजनीतिक रूप से असंभव है। ऐसे में भारत एक भरोसेमंद और सस्ता विकल्प बनकर इनके दिलोदिमाग में उभरा है।
हथियारों के कारोबारी व उनके एजेंट्स बताते हैं कि भारत के पीएम नरेंद्र मोदी ने वर्षों पहले ही इस मौके को भांप लिया था। तभी तो उन्होंने आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया की शुरुआत की। इसी का सकारात्मक परिणाम है कि भारत अब सिर्फ हथियारों का खरीदार नहीं, बल्कि निर्यातक/एक्सपोर्टर बन चुका है। भारत में बने हथियार जैसे कि ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल, आकाश मिसाइल सिस्टम, पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर, तेजस फाइटर जेट और स्वदेशी ड्रोन दुनिया भर में अपनी क्वालिटी के लिए पहचाने जा रहे हैं। चूंकि ये हथियार न सिर्फ एडवांस हैं, बल्कि इनके रखरखाव में लागत भी काफी कम आ रही है। इसलिए ये खरीददारों की पहली पसंद बन चुके हैं। सबसे बड़ी बात यह कि पश्चिमी देशों के मुकाबले ये बेहद सस्ते हैं।
एक विदेशी मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, यूरोप के कई देशों ने भारत से सीधे हथियार खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। क्योंकि सरकारी सहयोग व प्रश्रय पाकर भारत की रक्षा कंपनियों और सरकारी संस्थाओं ने अब यूरोप, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका में भी अपनी गहरी पैठ बना ली है। हाल ही में भारत ने फिलीपींस को भी अपनी ब्रह्मोस मिसाइल की पहली खेप भेजी है। इसके अलावा वियतनाम, इंडोनेशिया, ब्राजील और कुछ यूरोपीय देशों से भी बातचीत चल रही है। स्पष्ट है कि कई देश अभी भी लाइन में खड़े हैं।
वहीं, यदि नाटो देश भारत से हथियारों की खरीद शुरू करते हैं, तो इससे भारत को न केवल अरबों डॉलर की कमाई होगी, बल्कि डिफेंस प्रोडक्शन में भी क्रांति आएगी। इससे लाखों नई नौकरियां पैदा होंगी। प्रत्यक्ष रूप से फैक्ट्रियों में और अप्रत्यक्ष रूप से सप्लाई चेन, लॉजिस्टिक्स, रिसर्च और डेवलपमेंट में लाखों रोजगार के मौके पैदा होंगे। यह भारत को वैश्विक ताकत बनने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा। चाहे अमेरिका हो या रूस, ये हथियारों के दम पर ही पूरी दुनिया में राज कर रहे हैं। इसलिए अब भारत भी इस क्षेत्र में एक और बड़ा प्लेयर बनकर उभरेगा, जो अपने हिसाब से ऐसी वैश्विक रणनीति तय करेगा,जिससे सबका भला सुनिश्चित हो।
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