यदि परमाणु हथियार संपन्न देशों की जरा-सी चूक से परमाणु बम आतंकियों के हाथ लग गए तो क्या होगा? सोचे दुनिया!

यदि परमाणु हथियार संपन्न देशों की जरा-सी चूक से परमाणु बम आतंकियों के हाथ लग गए तो क्या होगा? सोचे दुनिया!



@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

वर्ष 2025 के पूर्वार्द्ध में आतंकवाद से पीड़ित और परमाणु हथियारों से संपन्न देश भारत ने जब अपने चिरपरिचित प्रतिद्वंद्वी व परमाणु हथियार संपन्न देश पाकिस्तान पर जोरदार हमला किया तो दुनिया सन्न रह गई। चोटिल पाकिस्तान की मांग पर भारत ने आनन-फानन में सीजफायर किया। 

वहीं, इस घटना के एक महीने बाद ही जब इजरायल ने ईरान पर घातक हमला किया और उसके परमाणु मंसूबों को मटियामेट कर दिया, तो वैश्विक विरादरी में उठते सवालों का एक लाइन में उत्तर दिया कि आतंकवादी उत्पादक देशों को वह परमाणु हथियार नहीं बनाने देगा। यदि ऐसे देश अपने नापाक इरादों में सफल भी हो गए तो वह उन्हें विनष्ट कर देगा। लेकिन रणनीतिक चूक से अपने देश के नागरिकों को परमाणु हमले का शिकार नहीं बनने देगा। 

इसलिए अब यह सवाल मौजूँ है कि यदि परमाणु हथियार संपन्न देशों की जरा-सी चूक से परमाणु बम आतंकियों के हाथ लग गए तो क्या होगा? सोचे दुनिया! देखा जाए तो समकालीन दुनिया में जिस तरह से परमाणु हथियार सम्पन्न देशों की दादागिरी चल रही है, उससे दूसरे पंक्ति के देश परेशान हैं। खासकर यूएनओ से वीटो प्राप्त पांच प्रमुख देशों यानी अमेरिका, रूस, चीन, इंग्लैंड और फ्रांस के बीच की जो आपसी प्रतिद्वंद्विता चल रही है, वह दुनियावी लोकतंत्र के लिए कोई शुभ संकेत नहीं है।

खासकर पूंजीवादी देश अमेरिका-इंग्लैड-फ्रांस और साम्यवादी देश रूस-चीन के जो वैश्विक गुट, पहले नाटो-सीटो और अब नाटो बनाम ब्रिक्स समूह बने हैं, उससे संयुक्त राष्ट्र संघ भी अब बेमानी प्रतीत होता है। वहीं अमेरिका व यूरोपीय संघ का मनमुटाव तथा भारत को सहयोग व समर्थन को लेकर रूस-चीन की पारस्परिक वैमनस्यता भी किसी से छिपी हुई बात नहीं है।

ऐसा तल्ख सवाल इसलिए कि भारत, जर्मनी, जापान, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, कनाडा, मैक्सिको जैसे दूसरी पंक्ति के महत्वपूर्ण देश भी अब आर्थिक व सैन्य शक्ति के मामले में तेजी से उभरे हैं, फिर भी इन्हें या इनमें से कुछ को संयुक्त राष्ट्र वीटो क्लब में शामिल नहीं किया जा रहा है, जो दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। ऐसा किये जाने के बिना न तो आतंकवाद काबू में होगा, न ही द्विपक्षीय युद्ध नियंत्रित होगा और न ही अखिल विश्व में शांति-सुव्यवस्था स्थापित होगी।
यही अंतरराष्ट्रीय सच्चाई है।

सच कहूं तो दुनिया के थानेदार अमेरिका और उसका उत्तराधिकारी बनने के लिए लालायित चीन के साम्राज्यवादी हितों की पूर्ति के लिए आतंकवादी हिंसा, द्विपक्षीय युद्ध और गुणवत्ताहीन विकास को जायज नहीं ठहराया जा सकता है। चूंकि अमेरिका नाटो भीतर ही भीतर को शह देकर पहले सोवियत संघ को बर्बाद किया और अब यूक्रेन को शह दिलवाकर रूस को कमजोर करना चाहता है। इसलिए वह दुनिया के निष्पक्ष देशों के कठघरे में खड़ा है।

वहीं, अमेरिका ने जिस साम्यवादी चीन को रूस-भारत के गठजोड़ के खिलाफ पूंजी व तकनीकी समर्थन देकर मजबूत किया और भरपूर लाभ कमाया, अब वही चीन जब रूस से सांठगांठ करके अमेरिका के विरुद्ध भस्मासुर बनकर उसे ही तबाह करने की रणनीति बनाई तो जैसी करनी, वैसी भरनी वाली  कहावत चरितार्थ हो गई। इसलिए दुनिया के देश अब इस बात के भी मजे ले रहे हैं।

हालांकि, अनपेक्षित प्रतिक्रिया मिलने से अमेरिका के कान तो खड़े हुए। फिर उसने आतंक पीड़ित होने के बाद दगाबाज पाकिस्तान के बजाय भारत से अच्छे रिश्ते बनाए और चीन के खिलाफ चक्रब्युह बुनने लगा। चीन के प्रतिद्वंद्वी ताइवान को सहयोग, दक्षिण चीन सागर से जुड़े देशों के साथ चीनी विवाद और तिब्बत के सवालों को तूल देना शुरू किया। फिर अमेरिका, भारत, ऑस्ट्रेलिया व जापान के चतुर्गुट बने और भारत की इसमें कम दिलचस्पी देखकर अमेरिका, जापान व ऑस्ट्रेलिया के त्रिगुट भी बने।

लेकिन भारत ने जब रूस जैसे अपने सदाबहार दोस्त से दगाबाजी नहीं की और हर वैश्विक मसले पर रूस की तरफदारी की। साथ ही शत्रु देश चीन के खिलाफ भी सूझबूझ वाला रवैया अपनाया तो अमेरिका को यह बात बेहद नागवार गुजरी। चूंकि इसी कशमकश में अमेरिका, भारत के साथ हथियारों की डील नहीं कर पाया और दोनों प्रतिद्वंद्वी देशों के बीच युद्ध करवाने में भी कामयाब नहीं हुआ। इसलिए वह अपने शातिर मकसद में नाकामयाब रहा। इससे विफरते हुए अब उसने भारत पर आरोप लगाया कि उसने, उसका साथ तहेदिल से नहीं दिया। इसलिए वह पुनः पाकिस्तान को चारा डालने लगा है। 

लिहाजा, अब पाकिस्तान पूर्व की भांति अमेरिका-चीन के बीच सफल बिचौलिया बनकर उभरा है। वहीं, ओआईसी से डील सुनिश्चित करने के लिए भी अमेरिका को पाकिस्तान की जरूरत है। इसलिए उम्मीद है कि अब अफगानिस्तान, ईरान, चीन, भारत, तुर्किये से जुड़े मामलों को अमेरिकी हितों के मुताबिक ढालने में पाकिस्तान उसकी पूरी मदद करेगा और उसकी रणनीति के मुताबिक चलेगा, न कि चीन के। इसलिए वह उसके परमाणु हथियारों पर भी काबिज हो चुका है।

इधर, भारत ने पाकिस्तान जैसे परमाणु हथियार संपन्न देश की सफल ठुकाई करके अपनी सैन्य क्षमता का अव्वल प्रदर्शन किया है। इससे अमेरिका-चीन दोनों की बेचैनी बढ़ी है। पाकिस्तान तो अपने हश्र पर आंसू बहाने को अभिशप्त है। इस मामले में भी अमेरिका व यूरोपीय देशों की दबंगई भारत को रास नहीं आई। इसलिए इजरायल को साधकर उसने आतंकवादी उन्मूलन अभियान तेज करवा दिया है। इससे अमेरिका-चीन हक्के-बक्के रह गए हैं, क्योंकि अब आमने-सामने खुलकर आना होगा।

यहां पर एक सुलगता हुआ सवाल उठता है कि आखिर भारत को इसी तरह की धमकी देने वाले पाकिस्तान के परमाणु बम पर अमेरिकी व यूरोपीय देशों की चुप्पी क्यों है? आखिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक ही प्रवृत्ति के दो अलग अलग मामलों पर दोहरा मापदंड क्यों? इजरायल भारत का दोस्त है। इसलिए उसकी सफलता पर भारतीयों को गर्व है। लेकिन पाकिस्तान को प्राप्त अमेरिका, चीन, इंग्लैंड का शह व समर्थन चिंताजनक है। क्योंकि पाकिस्तान के परमाणु बम वहां के आतंकवादियों के हाथ के हाथ लग सकते हैं। आतंकवाद भी पाकिस्तानी सेना का एक गुप्त एजेंडा है, जिसकी कलई अब खुल चुकी है।

जिस तरह से इजरायल ने गत 12 जून 2025 दिन शुक्रवार सुबह ईरान पर भीषण हमले किए हैं। उससे इजरायल और ईरान आमने-सामने आ गए हैं। दोनों ने एक-दूसरे पर हमले किए हैं। इजरायल के ईरान पर हमले के साथ इस संघर्ष की शुरुआत हुई, जिससे क्षेत्रीय शांति भी खतरे में पड़ी है। वहीं, इजरायल का कहना है कि उसने ईरान को परमाणु बम बनाने से रोकने के लिए ये हमले किए हैं। 

जिस तरह से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हमलों के लिए इजरायल की पीठ थपथपाते हुए कहा है कि इससे उनके प्रशासन को ईरान के साथ परमाणु समझौता करने में मदद मिलेगी। उसी तरह की बात उन्होंने भारत के नए मित्र के रूप में भारत-पाकिस्तान सीमित सैन्य संघर्ष के समय क्यों नहीं की? इससे भारत-अमेरिका की नई दोस्ती भी अब खटाई में पड़ चुकी है। यही वजह है कि डोनाल्ड ट्रंप के इस रुख पर एक भारतीय कूटनीति विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने सवाल उठाते हुए उनको कटघरे में खड़ा किया है, क्योंकि पाकिस्तान को परमाणु बम बनाने और उसे सैन्य रूप से मजबूत करने में अमेरिका ने हमेशा उसकी मदद की है। इसलिए चेलानी ने ट्रंप को सुनाते हुए कहा है कि अमेरिका का रवैया सबके लिए एक जैसा नहीं है। यही बात चीन पर भी लागू होती है, जो कि उसका नया अभिभावक बनने का दावा करता है।

दरअसल, ब्रह्मा चेलानी ने अपने एक ट्वीट में लिखा है कि, 'डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट रूप से कहा है कि ईरान के पास परमाणु बम नहीं हो सकता है यानी वह ईरान को परमाणु बम बनाने से किसी भी सूरत में रोकेंगे। दूसरी ओर भारत को रोकने के लिए अमेरिका (और चीन ) ने आतंकवाद का निर्यात करने वाले पाकिस्तान को परमाणु बम बनाने में मदद की। हाल ही में ट्रंप ने भारत के साथ संघर्ष के दौरान भी पाकिस्तान को बचाने का भी काम किया।'

आश्चर्यजनक बात तो यह है कि ब्रह्मा चेलानी ने अपने ट्वीट के साथ न्यूयॉर्क टाइम्स का एक दस्तावेज भी शेयर किया, जिसमें बताया गया है कि कैसे 1960-70 के दशक से ही पाकिस्तान के परमाणु बनाने के ऐलान पर अमेरिका ने ना सिर्फ चुप्पी साधी बल्कि उसे पूरी मदद भी की (और चीन से भी करवाई!)। इस दस्तावेज में 1970 के दशक में पाकिस्तानी राष्ट्रपति जुल्फिकार भुट्टो के 'रोटी नहीं खाएंगे लेकिन परमाणु बम बनाएंगे' जैसे नारों पर अमेरिका की खामोशी और बाद में भी इस्लामाबाद को वॉशिंगटन की मदद का जिक्र है।

वहीं, ईरान पर इजरायल के हमलों को लेकर अमेरिका ने कहा है कि उसको इसकी जानकारी थी। अमेरिकी अधिकारी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कहा कि अमेरिका को इन हमलों के बारे में पहले से ही जानकारी दी गई थी, लेकिन अमेरिका की इन हमलों में कोई सैन्य भागीदारी नहीं है। अमेरिका की प्राथमिकता अमेरिकी नागरिकों और सैनिकों की सुरक्षा है।

उल्लेखनीय है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को परमाणु कार्यक्रम पर समझौता करने के लिए कहा है। साथ ही धमकी दी है कि अगर ईरान समझौते के लिए नहीं मानता है तो इजराइल और भी कड़ा हमला कर सकता है। ट्रंप ने हालिया समय में बार-बार ईरान पर परमाणु समझौता का जोर डाला है। इस समझौते में ट्रंप ईरान की बातों को नजरअंदाज करते हुए अपना ही प्रस्ताव थोपने की कोशिश करते दिखे हैं। अब वह ईरान को बर्बाद करने की भी धमकी दे रहे हैं। इस मसले पर रूस-चीन की चुप्पी उनकी कमजोरी है या भावी रणनीति, यह तो वक्त ही बताएगा। जबकि भारत ने दोनों देशों के बीच मध्यस्थता करने की पेशकश कर दी है और संघर्षविराम की कोशिशों में जुट गया है। आखिर दोनों जो उसके मित्र हैं, कोई कम कोई ज्यादा!

ऐसे में सुलगता हुआ सवाल है कि इन वीटो प्राप्त देशों की आपसी प्रतिद्वंद्विता में बढ़ते आतंकवाद की चक्की में आखिर छोटे देश क्यों पिसे/कुचले जा रहे हैं? वहीं, जिस तरह से अमेरिका ने इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन, लीबिया के तानाशाह कर्नल गद्दाफी और सीरिया के तानाशाह असद की फजीहत करवाई और अब ईरान के उम्रदराज प्रमुख खुमैनी को निपटाने की पृष्ठभूमि तैयार कर चुका है, उसमें पाकिस्तान-अफगानिस्तान का नम्बर कब आएगा, यक्ष प्रश्न है। या फिर इस श्रृंखला में अगला नम्बर किस देश का आएगा, कौतूहल का विषय है।

देखा जाए तो इजरायल और ईरान के बीच अब तक की सबसे खतरनाक लड़ाई लड़ी जा रही है। इसी बीच एक टीवी को दिए एक इंटरव्यू में अजार ने कहा कि 'जब आपके पास कट्टरपंथ का कॉम्बिनेशन होता है, जो संयुक्त राष्ट्र के दूसरे सदस्य को खत्म करने की ख्वाहिश पैदा करता है और उसके लिए आप सामूहिक विनाश के हथियार बनाते हैं, तो यह कुछ ऐसा है जिसका सामना करना होगा। उन्होंने ईरान के सैन्य और परमाणु प्रतिष्ठानों पर इजरायली हमले के समय और वजह बताते हुए कहा कि ईरान दुनिया को बेवकूफ बना रहा है। तेहरान गुप्त तरीके से यूरेनियम को उस स्तर तक समृद्ध करने के लिए काम कर रहा है, जहां वह परमाणु हथियार बनाने की क्षमता रखने के कगार पर है। तेल अवीव अब और इंतजार नहीं कर सकता। उनके बयानों से साफ है कि उन्हें अमेरिका व यूरोपीय देशों का पूरा सहयोग व समर्थन प्राप्त है।

यही वजह है कि इजरायली राजदूत ने तेहरान को खुली चेतावनी दी है कि अगर उसने इतिहास से नहीं सीखा तो उसका अंजाम भी सद्दाम हुसैन, असद और गद्दाफी की तरह ही होगा। जिस तरह से इजरायल ने हवाई हमले में ईरान के शीर्ष सैन्य नेतृत्व को खत्म दिया था, अब उसकी प्रतिक्रिया में ईरान भी जवाबी कार्रवाई कर रहा है। ईरान ने बड़ी संख्या में मिसाइलें दागी हैं, जो इजरायली शहरों के अंदर गिरी हैं।

इस बीच भारत में इजरायली राजदूत रूवेन अजार ने धमकी दी है कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने की इच्छा को छोड़कर बातचीत करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। ऐसा न करने पर ईरान के सामने तबाही खड़ी है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि ईरान को इतिहास की किताबों से सीखना चाहिए। मध्य पूर्व के तीन मुस्लिम शासकों का हवाला देते हुए अजार ने ईरान को भी वैसा ही अंजाम भुगतने की धमकी दी। उन्होंने कहा, 'सद्दाम हुसैन ने परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश की थी। असद शासन ने परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश की थी। वहीं गद्दाफी ने भी परमाणु हथियार पाने की हिमाकत  की थी। नतीजा वही रहा। अमेरिका ने सबको उनकी सही जगह पर भेज दिया। अब ईरान व खुमैनी की वही दुर्गति होगी।

अजार ने तो यहां तक कहा कि ईरान के मामले में स्थिति और भी खराब है। इस बार यह कोशिश (परमाणु हथियार बनाने की कोशिश) एक कट्टरपंथी शासन की ओर से आ रही है, जिसने बार-बार ऐलान किया है कि वे इजरायल राज्य को खत्म करना चाहते हैं। वे तथाकथित 'ट्यूमर कैंसर' को हटाना चाहते हैं। वे 'छोटे शैतान' इजरायल से छुटकारा पाना चाहते हैं, ताकि 'बड़े शैतान' अमेरिका से लड़ सकें।'

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