युद्ध क्या है? क्यों होता है? क्या आतंकवाद नियंत्रण के मसले पर तीसरा विश्व युद्ध हो सकता है?
युद्ध क्या है? क्यों होता है? क्या आतंकवाद नियंत्रण के मसले पर तीसरा विश्व युद्ध हो सकता है? भारत की इसमें क्या भूमिका होगी?
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
युद्ध एक पाश्विक प्रवृति है जो आहार श्रृंखला से जुड़ी हुई है। मांसाहारी मनुष्यों में भी अब यह घिनौनी प्रवृति परवान चढ़ने लगी है। इससे स्पष्ट है कि युद्ध एक सशस्त्र संघर्ष है जो दो या दो से अधिक समूहों या राष्ट्रों के बीच होता है, जिसमें वे अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए बल का प्रयोग करते हैं।
समसामयिक विश्व में रूस-यूक्रेन युद्ध, इजरायल-फिलिस्तीन युद्ध, भारत-पाकिस्तान युद्ध, चीन-ताइवान युद्ध और इजरायल-ईरान युद्ध ही कुछ ऐसे युद्ध हैं, जो यूएनओ की वीटो शक्ति से लैस और आपस में गुट में बंटे अमेरिका-इंग्लैंड-फ्रांस बनाम रूस-चीन को तीसरे विश्व युद्ध में धकेल सकते हैं।
वहीं, परमाणु शक्ति संपन्न गुटनिरपेक्ष देश भारत और उसके समर्थक तीसरी दुनिया के देश यह तय करेंगे कि प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध की तरह युद्ध विराम होगा या फिर तीसरा विश्व युद्ध मानव जाति के सर्वनाश का कारण बनेगा, क्योंकि परमाणु बमों का जमकर इस्तेमाल संभव है।
बहरहाल, ये परमाणु बम आतंकवादियों के हाथ नहीं लग जाएं, इसके लिए भारत और इजरायल दोनों चिंतित हैं। वहीं, पाकिस्तान का परमाणु बम आतंकियों के हाथ नहीं लगे, इससे अमेरिका चिंतित है।
वैसे तो अमेरिका को आतंकवादियों का पिता कहना ज्यादा उचित होगा, क्योंकि उसने आतंकवादियों की मां पाकिस्तान के सैन्य-गर्भ से विभिन्न आतंकी समूहों को पैदा किया है। तालिबानियों की तरह उन्हें हथियार, पैसा और प्रशिक्षण देकर अपना साम्राज्यवादी और कारोबारी मकसद साधा है। बोको हरम, अलकायदा, आईएसआईएस, लश्करे तैयबा जैसे दुर्दांत आतंकी संगठनों की अरब-यूरोशियाई फंडिंग भी किसी से छिपी हुई बात नहीं है।
लेकिन जब इसी राह पर पहले सोवियत संघ और अब रूस-चीन भी चलने लगे तो अमेरिका भी आतंकवाद पीड़ित देश बन गया और इजरायल भी सर्वाधिक आतंकवादी पीड़ित राष्ट्र बन गया। उधर, जब इस्लामिक आतंकियों को पैदा करके पाकिस्तान अमेरिका का प्रिय बन गया तो उसका पड़ोसी ईरान भी कट्टर मुस्लिम आतंकी पैदा करके रूस-चीन का प्रिय पात्र बन गया। उधर तुर्किये भी इस्लामिक आतंकवादी पैदा करके यूरोपीय देशों का प्यारा बन गया।
इस प्रकार अधिकांश अरब देशों, खाड़ी देशों, पश्चिम व मध्य एशियाई देशों में आतंकवाद एक गुप्त प्रशासनिक उद्योग बन गया, और डिप्लोमैटिक सहूलियतों के सहारे यह पूरी दुनिया को तस्करी के मार्फ़त मुहैया कराया जाने लगे। इससे तेज हुई हिंसा-प्रतिहिंसा से पूरी दुनिया कराह उठी है। आज अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, इटली, रूस, चीन, जापान, उत्तर कोरिया, ऑस्ट्रेलिया जैसे संपन्न देश भी आतंकवाद से प्रभावित हैं। अब ये देश अपने समर्थकों को अच्छा आतंकवादी और अपने विरोधियों को बुरा आतंकवादी कहने लगे हैं।
देखा जाए तो अफगानिस्तान में आतंकी तालिबानियों का शासन है। पाकिस्तानी सेना भी आतंकियों के जनाजों को सलामी देती है। भारत के खिलाफ पाकिस्तान का और इजरायल के खिलाफ अरब देशों का सांप्रदायिक विष-वमन किसी से छिपी हुई बात नहीं है। इधर, पाकिस्तानी-अमेरिकी सांठगांठ से भारत और उधर चीन-रूस अभिप्रेरित बढ़ती इस्लामिक महत्वाकांक्षाओं से कतिपय यूरोपीय-अफ्रीकी-एशियाई-अमेरिकी देश भी अब आतंकवाद से पीड़ित देशों की कतार में खड़े हो गए हैं।
इससे स्पष्ट है कि तेजी बदलते विश्व में आतंकवाद एक साम्राज्यवादी पूंजीवादी वैश्विक एजेंडा बन चुका है जिसका मकसद लोकतंत्र को कमजोर करते हुए समाजवाद का गला घोंटना है। नक्सलवाद, अंडरवर्ल्ड प्रेरित संगठित अपराध, जातीय सेना, सांप्रदायिक दंगे, क्षेत्रीय दल, लैंगिक विभेद आदि इसके ही अलग-अलग एजेंडे हैं, जिसके वित्त पोषण के लिए क्रिप्टो करेंसी, हवाला रैकेट, हथियार तस्करों, ड्रग्स रैकेटियर्स, मानव तस्करी जैसे विभिन्न गैरकानूनी कार्यों को भी प्रशासनिक संरक्षण देने-दिलाने हेतु अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय, प्रादेशिक व इलाकाई लॉबिंग होती है और मोटी कमाई की लालच में सफेदपोश राजनेता और शातिर पुलिस अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी व सैन्य अधिकारी भी इस गोरखधंधे में शामिल रहते हैं। तभी तो यह लाइलाज जनतांत्रिक बीमारी बन चुकी है।
यौद्धिक मामलों के जानकार बताते हैं कि युद्ध विभिन्न कारणों से होते हैं, जैसे क्षेत्रीय विवाद, राजनीतिक मतभेद, आर्थिक हित, या विचारधारात्मक मतभेद आदि। युद्धों के कई कारण हो सकते हैं, जिनमें क्षेत्रीय विवाद शामिल हैं-जैसे- विभिन्न देशों के बीच सीमा, पानी, या अन्य संसाधनों पर नियंत्रण के लिए युद्ध हो सकता है। वहीं, राजनीतिक मतभेद के चलते भी दो देशों के बीच सरकार, शासन प्रणाली या नीतियों पर असहमति युद्ध का कारण बन सकते हैं। वहीं, आर्थिक हित के चलते, जैसे देशों के बीच व्यापार, व्यापार मार्गों, या प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण के लिए युद्ध हो सकता है।
वहीं, विचारधारात्मक मतभेद के चलते भी दो देशों के बीच धार्मिक, राजनीतिक या सामाजिक विचारधाराओं पर असहमति युद्ध का कारण बन सकती है। जबकि निज राष्ट्रीय गौरव और शक्ति बढ़ाने के लिए भी कुछ देश अपने पड़ोसियों या प्रतिद्वंद्वियों से युद्ध कर सकते हैं। वहीं भारत जैसा शांतिप्रिय देश अपनी आत्मरक्षा के लिए, यानी एक देश अपने क्षेत्र, लोगों या संप्रभुता की रक्षा के लिए युद्ध कर सकता है।
वहीं, किसी अन्याय, अपमान या आक्रमण का बदला लेने के लिए भी एक देश अपने प्रतिद्वंद्वी से युद्ध कर सकता है। इसलिए संघर्षरत देशों के बीच युद्धों के कारणों को समझना भी महत्वपूर्ण है ताकि हम उन्हें रोकने और शांति स्थापित करने के लिए काम कर सकें। अबतक भारत यही करता आया है, क्योंकि वह गुटनिरपेक्ष देश है। मोदी प्रशासन ने इस नजरिए से राष्ट्रीय गौरव को और बढ़ाया है।
दुनियावी इस्लामिक आतंकवाद से भारत और इजरायल दोनों पीड़ित हैं। दोनों देश आतंकवादियों का सफाया चाहते हैं। इसलिए वो घनिष्ठ मित्र भी हैं। दोनों देश तकनीकी और राष्ट्रीय संसाधनों से सुसज्जित व सुरक्षित हैं। भारत द्वारा पाकिस्तान के खिलाफ 'ऑपरेशन सिंदूर' चलाया जाना और इजरायल के द्वारा ईरान के खिलाफ ‘ऑपरेशन राइजिंग लॉयन’ चलाया जाना यह स्पष्ट करता है कि आतंकवादी अब दुनिया में कहीं रह लें, लेकिन एशिया में वो सुरक्षित नहीं बच सकते। यदि वो अपनी हरकतें बन्द नहीं करेंगे और ग्रेटर इजरायल और ग्रेटर इंडिया की चक्की तले अब पिस जाएंगे। भले ही इजरायल अमेरिका परस्त देश है और भारत रूस परस्त राष्ट्र, लेकिन आतंकवाद उन्मूलन की दिशा में दोनों की निर्णायक पहल सराहनीय है, क्योंकि मानवता के मर्दन की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती।
आप मानें या न मानें, लेकिन आतंकवाद, नक्सलवाद, संगठित अपराध, जातीय युद्ध, धार्मिक दंगे, क्षेत्रीय वर्चस्व की भावना, लोकतांत्रिक पकड़ के लिए बाहुबलियों को बढ़ावा देना आदि अब अंतरराष्ट्रीय पूंजीवादी एजेंडा बन चुका है। पाश्चात्य जनतांत्रिक कानूनों से इन्हें संरक्षण भी मिलता है, क्योंकि अधिकांश लोकतांत्रिक देश यूएनओ, विश्व बैंक व अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की शर्तों के चलते उन्हें अपना लेते हैं। वहीं, हथियार निर्माता कम्पनियां ऐसे साहित्यिक उत्पादन, मीडिया प्रचार और इन्हें प्रोत्साहित करने वाले एनजीओ, ट्रस्ट, सामाजिक-राजनीतिक संगठनों को मोटी फंडिंग करती है, ताकि आपसी झड़प बढ़ने पर हथियार, गोली-बम और एहतियाती सुरक्षा उपकरणों की डिमांड बढ़ती है।
प्राचीन कालीन महाभारत युद्ध, मध्यकालीन धर्मयुद्ध और आधुनिक प्रथम विश्वयुद्ध-द्वितीय युद्ध आदि की बात छोड़
भी दें तो अमेरिका और सोवियत संघ में छिड़े शीत युद्ध, भारत-पाकिस्तान युद्ध, भारत-चीन युद्ध, ईरान-इराक युद्ध, पाकिस्तान-पूर्वी पाकिस्तान (बंगलादेश) युद्ध, रूस-जापान युद्ध, चीन-जापान युद्ध, विभिन्न यूरोपीय देशों के आपसी युद्ध, अमेरिकी देशों के सैन्य झड़पों के पीछे औद्योगिक क्रांति से उपजे साम्राज्यवाद और तकनीकी क्रांति से विकसित पूंजीवाद की बड़ी भूमिका रही है।
वहीं सूचना क्रांति के दौर में अमेरिका-लीबिया युद्ध, अमेरिका वियतनाम युद्ध, अमेरिका-इराक युद्ध में हथियार कम्पनियों की भूमिका खलनायक वाली है। रूस-अफगानिस्तान युद्ध, पाकिस्तान-अफगानिस्तान युद्व, ईरान-पाकिस्तान झड़प, आर्मेनिया-अजरबैजान युद्ध के पीछे भी यही लॉबी है। इसलिए वैश्विक शांति के लिए राष्ट्र संघ और संयुक्त राष्ट्र संघ की विफलताओं से सबक लेते हुए हमें नई विश्व व्यवस्था बनानी होगी।
इसमें गुटनिरपेक्ष देश भारत की भूमिका उसके बदलते ताकत के रूप में सुनिश्चित करनी होगी। तभी विश्वयुद्ध थमेगा। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्पष्ट कर चुके हैं कि यह भगवान बुद्ध की शांति का दौर है, युद्ध का नहीं! पाकिस्तान द्वारा थोपे गए लोमहर्षक आतंकी हिंसा के बाद उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के रूप में जिस सीमित व निर्णायक युद्ध का आगाज किया, वह पूरी दुनिया के लिए एक सकारात्मक युद्ध मॉडल समझा जा सकता है। आतंकवाद उन्मूलन के लिए इसे यथोचित प्रशासनिक कार्रवाई भी कहा जा सकता है।
वहीं, अमेरिका-यूरोपीय देशों द्वारा यूक्रेन, पाकिस्तान और ताइवान को अनैतिक संरक्षण दिए जाने से रूस, भारत व चीन का चिंतित होना स्वाभाविक है। वहीं, चीन को भारत से जुड़े पाकिस्तान, बंगलादेश, तिब्बत, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, नेपाल, भूटान, म्यांमार, श्रीलंका, मालदीव के मामले में दखल नहीं देना चाहिए। अन्यथा भारत भी मजबूरी बस तिब्बत, ताइवान, दक्षिण चीन सागर से जुड़े फिलीपींस, ताइवान, दक्षिण कोरिया व जापान को सहयोग देकर उसकी नींद हराम रखेगा।
इसलिए रूस के सही सुझाव को मानकर ही अमेरिका व यूरोपीय देशों के कुचक्र से निबटा जा सकता है। अन्यथा तीसरा विश्व युद्ध अमेरिका-यूरोपीय देश संरक्षित इस्लामिक देशों और रूस-चीन संरक्षित मुस्लिम देशों के बीच ही होगा। भारत की तटस्थता उसे पूरी दुनिया में सर्वाधिक शक्तिशाली बनायेगी, क्योंकि बसुधैव कुटुंबकम, सर्वे भवंतु सुखिनः, सत्य-अहिंसा की नीति की आज ग्लोबल डिमांड बढ़ती जा रही है। इस पूरे वैश्विक षड्यंत्र का समूल नाश करने में भारतीय प्रतिभाएं भी सक्षम हैं। इसलिए उनकी दुनियावी डिमांड बढ़ेगी।
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