तो क्या इजरायल और ईरान के बीच शुरू हुए युद्ध में तरफदारी करके तीसरे विश्वयुद्ध का आगाज करेंगे बाहुबली देश?
तो क्या इजरायल और ईरान के बीच शुरू हुए युद्ध में तरफदारी करके तीसरे विश्वयुद्ध का आगाज करेंगे बाहुबली देश?
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
आखिरकार इजरायल ने गत दिनों ईरान की राजधानी तेहरान पर हमला करके उसके परमाणु कार्यक्रम को निशाना बनाया, जिसके बाद ईरान ने भी मजबूती पूर्वक इजरायल पर पलटवार करके उसे धन-जन की क्षति पहुंचाई। इससे पश्चिम एशिया के दो कट्टर विरोधियों के बीच एक व्यापक युद्ध की शुरुआत हो गई। देखा जाए तो इसे 1980 के दशक में इराक के साथ हुए युद्ध के बाद ईरान पर अब तक का सबसे बड़ा हमला माना जा रहा है, जिसमें इजरायल ने ईरान के मुख्य परमाणु संवर्धन केंद्र को भी निशाना बनाया।
समझा जा रहा है कि इजरायल द्वारा ईरान पर रणनीतिक हमला किए जाने से उन दोनों के समर्थक देशों की चुनौतियां बढ़ चुकी हैं। चर्चा है कि ईरान के समर्थन में रूस-चीन-नॉर्थ कोरिया उतरने वाले हैं, ताकि खाड़ी देशों में अमेरिकी प्रभुत्व पर ब्रेक लग सके और उसके शह पर जारी इजरायल की दादागिरी को धूल में मिला सकें। ऐसे में इन सारी चीजों को देखने के बाद इस बात की चर्चा तेज हो चली है कि क्या रूस और चीन एक साथ आएंगे। क्या इस्लामिक देश पुनः विभाजित ही रहेंगे? क्या भारत पुनः तटस्थ बना रहेगा?
इजरायल की इस रणनीतिक कार्रवाई का दुनिया के कई पश्चिमी देशों ने समर्थन किया है और ईरान को हिदायत दी है। चेक रिपब्लिक ने इजराइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों को जायज ठहराया है। उसके विदेश मंत्री ने कहा कि यह हमला ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं और इजराइल को समाप्त करने की सोच रखने वाले संगठनों को दिए जा रहे समर्थन का जवाब है। चेक विदेश मंत्रालय ने इसे वाजिब प्रतिक्रिया करार देते हुए कहा कि इजराइल को अपने अस्तित्व की रक्षा करने का पूरा हक है।
वहीं, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि इजराइल को आत्मरक्षा का अधिकार है, लेकिन उसे और सभी पक्षों को संयम बरतना चाहिए। मैक्रों ने आगाह किया कि मध्य पूर्व पहले से ही तनावपूर्ण स्थिति में है और किसी भी नए टकराव से क्षेत्रीय स्थिरता खतरे में पड़ सकती है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी अपील की कि हालात को काबू में रखने के लिए मिलकर काम करें और तनाव को और न बढ़ने दें।
वहीं, जर्मन विदेश मंत्री जोहान वेडफुल के अनुसार, जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन ने मध्य पूर्व में तनाव कम करने के प्रयास में ईरान के साथ उसके परमाणु कार्यक्रम के संबंध में तत्काल वार्ता करने की इच्छा व्यक्त की है। जबकि, इटली की राजधानी रोम से भी शांति की अपील आई है। इटली सरकार ने दोनों देशों से कहा है कि वे युद्ध और टकराव का रास्ता छोड़कर बातचीत की ओर लौटें। रोम ने यह भी चेतावनी दी कि यह टकराव सिर्फ क्षेत्रीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक शांति के लिए भी खतरा बन सकता है। इटली का मानना है कि कूटनीतिक समाधान ही एकमात्र रास्ता है जो मध्य पूर्व को और बड़ी तबाही से बचा सकता है।
वहीं, अब गिरगिट की तरह रंग बदलते हुए दुनिया के थानेदार अमेरिका ने बोला है कि इस अप्रत्याशित हमले में उसकी कोई भूमिका नहीं है। हालांकि उसकी यह बात जमीनी सच्चाई से परे है! क्योंकि इजरायल को उसका खुला समर्थन शुरू से ही हासिल है। इसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ही तो अमेरिका अब अब्राहम परिवार के यहूदी, ईसाई व मुस्लिम देशों के बीच एकता स्थापित करने की बात करता है।
तो क्या यह समझा जाए कि यह महज संयोग ही है कि इजरायली हमलों से ठीक पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर कहा था कि अमेरिका ईरान के साथ कूटनीतिक समाधान के लिए प्रतिबद्ध है।
उधर, बिना समय गंवाए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने स्पष्ट किया है कि इजरायल ने ईरान पर एकतरफा कार्रवाई की है और अमेरिका इसमें शामिल नहीं है। अमेरिका केवल अपने सैनिकों की सुरक्षा सुनिश्चित कर रहा है। साथ ही उसने अमेरिकी हितों या कर्मियों को निशाना बनाकर किसी भी प्रकार की कार्रवाई किए जाने के ईरान के दुस्साहस को लेकर चेतावनी भी दी है।
वहीं, यरुशलम स्थित संयुक्त राज्य अमेरिका के दूतावास ने अपने नागरिकों के लिए सुरक्षा अलर्ट जारी किया। जिसमें कहा गया है कि, "वर्तमान सुरक्षा स्थिति को देखते हुए अमेरिकी दूतावास ने अपने सभी सरकारी कर्मचारियों और उनके परिवार के सदस्यों को अगले आदेश तक सुरक्षित स्थानों पर रहने का निर्देश दिया है।"
दिलचस्प रूप से, इसी बीच अमेरिका और ईरान के बीच ओमान में रविवार 15 जून को छठे दौर की परमाणु बातचीत होनी थी, लेकिन इस हमले ने पूरे क्षेत्र को एक बार फिर हालातों को उलट दिया है। उधर ईरान ने भी अब यह ऐलान कर दिया है कि इस मुद्दे पर अमेरिका से कोई बातचीत नहीं होगी।
अमेरिका ने स्पष्ट लहजे में ईरान से कहा है कि वो पूर्वाग्रह प्रेरित होकर अमेरिकी सैन्य ठिकानों या अमेरिकी दूतावासों व नागरिकों को निशाना न बनाए। इससे स्पष्ट है कि अमेरिका ने इस पूरे हमले से खुद को चतुराई पूर्वक अलग कर लिया है। इससे साफ है कि अमेरिका नहीं चाहता है कि इजरायल-ईरान झड़प के बाद तीसरा विश्व युद्ध भड़के और उसे लेने के देने पड़ जाएं या फिर उसकी सैन्य कमजोरी दुनिया के सामने आए। यदि युद्ध हुआ तो उसके कई नए दोस्त, जैसे भारत उसके पक्ष में नजर नहीं आएंगे।
इधर, बदलते घटनाक्रम पर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि, "इससे पहले कि देर हो जाए ईरान डील कर ले। मैंने ईरान को सौदा करने के लिए कई मौके दिए। मैंने उन्हें सबसे सख्त शब्दों में कहा- बस करो, लेकिन वे डील को पूरा नहीं कर पाए।" लिहाजा, ट्रंप ने चेतावनी देते हुए कहा है कि, "संयुक्त राज्य अमेरिका दुनिया में अब तक का सबसे बेहतरीन और सबसे घातक सैन्य हथियार बनाता है और इजरायल के पास इसका भंडार है। इसलिए आने वाले समय में और भी कुछ बड़ा हो सकता है।" अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी ईरान को परमाणु हथियार न देने की बात दोहराई है। ट्रंप ने यह भी कहा कि ईरान में जो लोग इस परमाणु डील का विरोध कर रहे थे, वे अब जिंदा नहीं हैं। बयान को अमेरिका की कड़ी कूटनीतिक दबाव रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
उधर, हिजबुल्लाह ने ईरान के साथ गद्दारी करते हुए जंग के बीच में ही खामेनेई का साथ छोड़ दिया है, क्योंकि लेबनान सरकार ने हिजबुल्लाह से साफ तौर पर कहा है कि वह इस जंग में शामिल न हो। वहां की सरकार को आशंका है कि अगर हिजबुल्लाह ने इजराइल पर हमला किया, तो लेबनान को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। इजराइली जवाबी कार्रवाई में राजधानी बेरुत और दक्षिणी इलाकों पर बमबारी की आशंका जताई जा रही है। लेबनान पहले ही आर्थिक और राजनीतिक संकट से जूझ रहा है और अब युद्ध की आंच से खुद को दूर रखने की रणनीति अपना रहा है।
वहीं गौर करने वाली बात है कि फिलिस्तीन में सक्रिय आतंकी संगठन हमास ने शुक्रवार को ईरान पर हुए इजरायली हमलों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ईरान आज गाजा के लड़ाकों का साथ देने की कीमत चुका रहा है। ईरान ने सालों से इजराइल के खिलाफ लड़ रही फलस्तीनी सशस्त्र ताकतों को सैन्य और वित्तीय समर्थन दिया है। वहीं, अक्टूबर 2023 से जारी युद्ध के दौरान भी तेहरान ने हमास को लगातार समर्थन दिया था। इसलिए ईरान की मौजूदा स्थिति उसी संघर्षपूर्ण प्रतिबद्धता का नतीजा है, जिसे वह फिलिस्तीनियों की आजादी के लिए निभाता आया है।
लिहाजा, हमास ने ईरान पर इजराइल के सैन्य और परमाणु ठिकानों पर किए गए हमलों की कड़ी निंदा की। साथ ही उसने चेतावनी दी कि यह कार्रवाई एक खतरनाक उकसावा है जो पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर सकती है। संगठन ने इस हमले को पश्चिम एशिया की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताया और कहा कि यह इजराइल की आक्रामक नीति का विस्तार है, जिससे पूरे इलाके में तनाव और टकराव की आशंका बढ़ गई है।
इसी प्रकार जहां एक ओर रूस ने इजराइल द्वारा ईरान पर किए गए हवाई हमलों को अवैध और बिना उकसावे वाला बताया है। रूसी विदेश मंत्रालय ने कहा कि किसी संप्रभु राष्ट्र, उसके नागरिकों और परमाणु ढांचे पर हमला करना संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन है। रूस ने इस हमले को पूरी तरह अस्वीकार्य बताया और अंतरराष्ट्रीय शांति के लिए खतरा करार दिया। वहीं, दूसरी ओर चीन ने ईरान पर इजरायली हमलों को लेकर गहरी चिंता जताई है और उन्होंने शांति की अपील की है।
चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने कहा है कि, "चीन ईरान पर इजरायल के हमले पर बारीकी से ध्यान दे रहा है और इस कार्रवाई से होने वाले गंभीर परिणामों को लेकर बहुत चिंतित है। चीन ईरान की संप्रभुता, सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता के उल्लंघन का विरोध करता है और विरोधाभासों के बढ़ने और संघर्ष के विस्तार का विरोध करता है।" उन्होंने आगे कहा कि, "क्षेत्रीय स्थिति के तापमान में अचानक वृद्धि किसी भी पक्ष के हित में नहीं है, इसलिए चीन सभी संबंधित पक्षों से क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को बढ़ावा देने और तनावपूर्ण स्थिति को और अधिक बढ़ने से रोकने के लिए और अधिक काम करने का आह्वान करता है।"
वहीं, अफ्रीकी यूनियन (एयू) ने ईरान पर इजराइल के भीषण हमले पर गहरी चिंता जताई है। यूनियन के चेयरपर्सन महमूद अली यूसुफ ने बयान जारी कर कहा कि इजराइल द्वारा तेहरान समेत 100 से अधिक ठिकानों पर किया गया हमला मध्य पूर्व में हिंसा को और भड़का सकता है। उन्होंने तुरंत संघर्ष विराम की अपील करते हुए सभी पक्षों से संयम बरतने को कहा। यूसुफ ने यह भी चेताया कि मौजूदा हालात अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकते हैं।
वहीं, अमेरिकी उम्मीदों के विपरीत चीनी शह पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने इजराइल द्वारा ईरान पर किए गए हमले की कड़ी निंदा की है। उन्होंने इस हमले को “गैर-उकसावे वाला” और “गंभीर रूप से गैर-जिम्मेदाराना” करार देते हुए कहा कि इससे पहले से अस्थिर क्षेत्र और अधिक खतरे में पड़ सकता है। शरीफ ने हमले में जान गंवाने वालों के प्रति गहरी संवेदना जताई और अंतरराष्ट्रीय समुदाय तथा संयुक्त राष्ट्र से अपील की कि वे स्थिति को और बिगड़ने से रोकने के लिए तुरंत प्रभावी कदम उठाएं।
वहीं, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तय्यिप एर्दोगान ने आज अपने ईरानी समकक्ष मसूद पेजेशकियन से फोन पर कहा कि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू क्षेत्र में आग लगाने और ईरान पर हमले करके परमाणु वार्ता को विफल करने की कोशिश कर रहे हैं।
वहीं, संयुक्त राष्ट्र परमाणु निगरानी संस्था "आईएईए" की गवर्निंग बोर्ड की विशेष बैठक इजराइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों को लेकर बुलाई जा रही है। हालांकि ईरान बोर्ड का सदस्य नहीं है, फिर भी उसने बैठक की मांग की है। ईरान की इस मांग का रूस, चीन और वेनेजुएला जैसे सदस्य देशों ने समर्थन दिया है। इस बैठक का उद्देश्य हमलों के प्रभाव और वैश्विक परमाणु सुरक्षा पर चर्चा करना है।
बताया जाता है कि ईरान ने इजराइल द्वारा उसके परमाणु ठिकानों और वैज्ञानिकों पर हमलों को लेकर संयुक्त राष्ट्र परमाणु निगरानी संस्था "आईएईए" की चुप्पी पर कड़ी आपत्ति जताई है। ईरान की परमाणु ऊर्जा संस्था ने "आईएईए" की खामोशी को इजराइल के साथ “मिलीभगत” करार दिया और कहा कि यह एजेंसी की विफलता का प्रमाण है। बयान में इसे "आईएईए" की पक्षपाती भूमिका का नतीजा बताया गया। इसके जवाब में "आईएईए" प्रमुख राफेल ग्रोसी ने कहा कि किसी भी देश की परमाणु सुविधाओं को कभी निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए, जो अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन है।
रूसी समाचार एजेंसियों के अनुसार, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने आज एक नए टेलीफोन कॉल में ईरान और इजरायल के बीच संघर्ष पर चर्चा की, जहां पुतिन ने ईरान पर इजरायल के हमलों की निंदा की। वहीं, बीजिंग के विदेश मंत्रालय के अनुसार, चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने आज अपने इजरायली और ईरानी समकक्षों के साथ अलग-अलग फोन कॉल में तेहरान के “वैध अधिकारों और हितों” के लिए समर्थन दिया।
वहीं, गुटनिरपेक्ष देश भारत ने कहा है कि वह ईरान और इजरायल के बीच हाल के घटनाक्रमों को लेकर बहुत चिंतित है और उभरते हालात पर ‘बारीकी से नजर’ रख रहा है। नई दिल्ली ने दोनों देशों से किसी भी तरह के तनाव बढ़ाने वाले कदमों से बचने का आग्रह किया है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा है कि क्षेत्र में सभी भारतीय नागरिकों को सावधानी बरतने, सुरक्षित रहने और स्थानीय सुरक्षा परामर्श का पालन करने की सलाह दी गई है।अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) ने भी इन हमलों की पुष्टि की है।
भारत के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी करते हुए कहा है कि, ‘‘हम ईरान और इजरायल के बीच हाल के घटनाक्रमों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हैं। हम परमाणु स्थलों पर हमलों से संबंधित खबरों के साथ ही उभरती स्थिति पर बारीकी से नजर रख रहे हैं।’’ वहीं, पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने की पृष्ठभूमि में भारत ने ‘दोनों पक्षों से किसी भी तरह के तनाव बढ़ाने वाले कदमों से बचने’ का आग्रह किया है और दो टूक कहा है कि ‘‘तनाव कम करने के लिए कूटनीति और संवाद के मौजूदा माध्यमों का इस्तेमाल करना चाहिए।’’
भारत ने इस बात पर जोर दिया है कि वह दोनों देशों के साथ ‘करीबी और मित्रवत संबंध’ रखता है और तनाव कम करने के वास्ते ‘हरसंभव मदद देने के लिए तैयार है। दोनों देशों में हमारे मिशन भारतीय समुदाय के संपर्क में हैं। क्षेत्र में सभी भारतीय नागरिकों को सतर्कता बरतने, सुरक्षित रहने और स्थानीय सुरक्षा परामर्शों का पालन करने की सलाह दी जाती है।
भारत के अल्पसंख्यक नेता व सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि ईरान में 1,595 भारतीय छात्र फंसे हुए हैं, जिनमें तेहरान विश्वविद्यालय के 140 मेडिकल छात्र शामिल हैं। इसके अलावा, इराक में 183 भारतीय तीर्थयात्री फंसे हुए हैं। इसलिए मैंने संयुक्त सचिव आनंद प्रकाश से संपर्क किया है और फंसे हुए लोगों का विवरण साझा किया है। तत्काल निकासी की आवश्यकता है।
वहीं, ईसाई धर्म प्रमुख पोप लियो 14वां (XIV) ने शनिवार को इजरायल-ईरान युद्ध पर किये गए अपने पोस्ट में गत शनिवार को कहा कि, “ईरान और इज़राइल की स्थिति काफी खराब हो गई है। मैं जिम्मेदारी और तर्क के लिए अपनी अपील को नवीनीकृत करता हूं। न्याय, बंधुत्व और आम भलाई पर आधारित स्थायी शांति बनाने के लिए, परमाणु खतरों से मुक्त एक सुरक्षित दुनिया बनाने की प्रतिबद्धता को आपसी सम्मान और ईमानदार बातचीत के माध्यम से आगे बढ़ाया जाना चाहिए। किसी को भी कभी भी दूसरे के अस्तित्व को खतरे में नहीं डालना चाहिए। सभी देशों का कर्तव्य है कि वे शांति के उद्देश्य का समर्थन करें, सुलह के रास्ते शुरू करें और ऐसे समाधानों को बढ़ावा दें जो सभी के लिए सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करें!”
बता दें कि एक तरफ जहां रूस ने ईरान को प्रत्यक्ष सहयोग व संरक्षण देने की सहमति दी है, तो दूसरी तरफ चीन के साथ भी ईरान की एक डील भी सामने आई है। मसलन, एक रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान ने चीन से जो मिसाइल ईंधन डील की है, उसके तहत चीन ने ईरान को हजारों टन मिसाइल ईंधन का ऑर्डर दिया। इसमें अमोनियम परक्लोरेट भी शामिल है ताकि वह बडे़ पैमाने पर बैलिस्टिक मिसाइले बना सके। इस ईंधन से ईरान 800 से ज्यादा बैलिस्टिक मिसाइलें तैयार करेगा।
उधर, दुनिया के अमेरिका-यूरोप विरोधी देशों को आशंका है कि चूंकि अमेरिका के दुनिया भर में करीब 80 एयरबेस फैले हुए हैं, जिसके मार्फ़त वह अपने दुश्मन देशों में अशांति फैलाने के लिए विद्रोहियों को हर तरीके की मदद देता रहता है। अपनी इसी घातक रणनीति के तहत अमेरिका, चीन के पास ताइवान को, उत्तर कोरिया के सामने दक्षिण कोरिया को, रूस को घेरने के लिए यूक्रेन को और भारत को घेरने के लिए पाकिस्तान को, परदे के पीछे से मदद देता रहता है। जिससे इन सभी देशों का जीना हराम किए हुए हैं। इसके पहले लीबिया, वियतनाम, इराक, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बंगलादेश आदि में अमेरिकी कारगुजारियां किसी से छिपी हुई नहीं है।
यही वजह है कि अब चीन और रूस के पास अमेरिका से बदला लेने का एक अच्छा अवसर मिला है, जिससे वह चतुराई पूर्वक बच निकलने के फिराक में है। दरअसल, अरब देश में एक्टिव होने वाला नया न्यूक्लियर ट्राइएंगल यानी रूस-चीन-ईरान जैसे देश मिडिल ईस्ट में अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती देने में तो पूरी तरह से सक्षम हैं ही, वहीं इजराइल की दादागिरी पर फुल स्टॉप लगाने का दम भी रखते हैं।
जानकारों की मानें तो पहाड़ों में भी ईरान के परमाणु ठिकाने हैं, जिसे अमेरिकी मदद के बिना इजरायल खत्म नहीं कर पाएगा। उनका कहना है कि इजरायल सिर्फ ईरानी
परमाणु ठिकाने को ही नहीं, बल्कि उसकी खुमैनी सरकार को भी हटाना चाहता है। इसलिए इतना खतरनाक हालात पैदा किए हुए है। जाहिर है कि बिना अमेरिका, यूरोप व एशिया के नाटो देशों के इशारे के वह ऐसी हिमाकत कदापि नहीं कर सकता है।
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