कांग्रेस नीत इंडिया गठबंधन से आप द्वारा नाता तोड़ने के सियासी मायने भारतीय राजनीति के लिए बेहद अहम
कांग्रेस नीत इंडिया गठबंधन से आप द्वारा नाता तोड़ने के सियासी मायने भारतीय राजनीति के लिए बेहद अहम
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
कांग्रेस नीत इंडिया गठबंधन से दिल्ली की मूल क्षेत्रीय पार्टी 'आप' (अब राष्ट्रीय पार्टी) यानी आम आदमी पार्टी के द्वारा नाता तोड़ने के सियासी मायने भारतीय राजनीति के लिए बेहद अहम हैं, क्योंकि इससे भाजपा नीत एनडीए और कांग्रेस नीत यूपीए (इंडिया गठबंधन) के मुकाबले निस्तेज होते क्षेत्रीय दलों के संगठन थर्ड फ्रंट (टीएफ) यानी तीसरे मोर्चे की सियासत में पुनः जान आ जाएगी। समझा जाता है कि नेशनल प्लान फेल होने के बाद अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी ने अब एकला चलो का नारा दे दिया है। लिहाजा, उसके पीछे जड़ों की ओर लौटकर लोकल फोकस की रिवाइवल स्ट्रैटेजी भी एक बड़ी वजह मानी जा रही है।
यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि भारत के विभिन्न राज्यों में ऐसे कई क्षेत्रीय दल मौजूद हैं जो कांग्रेस और भाजपा से एक समान दूरी बनाए रखने के पक्षधर रहे हैं। हालांकि, राजनीतिक मजबूरीवश और अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वियों को मात देने के लिए उन्होंने पहले एनडीए, फिर यूपीए का साथ दिया और अपनी सुविधा के मुताबिक गठबंधन बदलते रहते हैं। वहीं, कुछ ऐसे भी दल हैं जो राष्ट्रवाद के चलते भाजपा के खेमे में और धर्मनिरपेक्षता के कारण कांग्रेस के खेमे में सदैव बने रहते हैं। लेकिन इनके साथ भी भाजपा या कांग्रेस के रणनीतिकार ब्रेक के बाद जो खेल करते रहते हैं, वो इन्हें नागवार गुजरती है।
राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि भाजपा और कांग्रेस पूंजीपतियों की समर्थक पार्टियां हैं। इनका देशव्यापी सियासी आधार भी मजबूत है। चूंकि ये दोनों पार्टियां समय मिलते ही अपने गठबंधन सहयोगियों को निगलने की फिराक में रहती हैं, इसलिए क्षेत्रीय दल भी खुलकर इनके साथ जाने से परहेज करते हैं। जबकि राजनीतिक मजबूरीवश इनमें से किसी एक का या परिस्थितियों वश दोनों का साथ देने को ततपर रहते हैं, बशर्ते कि गिव एंड टेक की बात पक्की हो जाए। वहीं, इसमें नानुकूर होते ही मेढ़क कूद लगाने से परहेज भी नहीं करते हैं। चूंकि क्षेत्रीय दलों का आधार स्थानीयता यानी भाषा-संस्कृति होती है और इनकी आर्थिक नीतियां समाजवादी प्रवृत्ति वाली होती हैं, इसलिए गरीब किसान-मजदूर-कारीगर के बीच इनकी पैठ जल्दी बन जाती है। इसी से दिवा-स्वप्न दिखाने वाले राष्ट्रीय दलों को इनसे कड़ी टक्कर मिलती है। ये जिस राष्ट्रीय दल के साथ होते हैं, उनकी गठबंधन सरकार केंद्र में बनती है। इसलिए चतुर राष्ट्रीय दल इन्हें हमेशा पटाये रखते हैं।
समझा जाता है कि अधिकांश क्षेत्रीय दलों का जन्म पहले कांग्रेस विरोध के नाम पर हुआ है, जिन्होंने पहले जनसंघ और फिर भाजपा को मजबूत किया। लेकिन जैसे ही भाजपा ने काँग्रेस विरोधी केंद्रीय मोर्चे की तीन-तीन बार (जनता पार्टी, जनता दल, संयुक्त मोर्चा आदि) विफलता देखी, उसके बाद उसने आगे बढ़कर कांग्रेस विरोधी केंद्रीय मोर्चे को नेतृत्व देना शुरू किया। इसी नीयत से उसने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए का गठन किया, जिसमें उसे प्रारंभिक असफलता के बाद भरपूर और भारी सफलता मिली। इसी के बूते 2014 और 2019 में भाजपा को अकेले पूर्ण बहुमत मिला और देश-प्रदेश में तीसरे मोर्चे की सियासत की राजनीतिक अर्थी उठने लगी। इससे छटपटाये छोटे-छोटे दलों ने कांग्रेस की अगुवाई में जब इंडिया गठबंधन बनाया, तभी बीजेपी के अकेले पूर्ण बहुमत पर रोक लगी और 2024 में पुनः वह एनडीए की बैशाखी वाली सरकार पर जा टिकी। इससे भाजपा का अपराजेय मोदी-शाह गुट वाला अहंकार भी चूर-चूर हो गया।
यही वजह है कि इंडिया गठबंधन को खंड खंड करवाना मोदी सरकार का परोक्ष एजेंडा बन चुका है। पहले मुंबई में शिवसेना ने कांग्रेस को आंख दिखाई, फिर यूपी में समाजवादी पार्टी ने, और बिहार में राजद यही कर रहा है। पश्चिम बंगाल में टीएमसी भी काँग्रेज़ को नजरअंदाज करके चलती हैं और इंडिया गठबंधन को खुद नेतृत्व देना चाहती है। अन्य कई राज्यों में ऐसी ही स्थिति है। लेकिन हाल ही में संसद के मॉनसून सत्र से पहले आहूत 'इंडिया' गठबंधन की बैठक से पहले ही आम आदमी पार्टी ने इससे अलग होने का ऐलान कर दिया। यह अबतक का सबसे बड़ा सियासी धमाका है, जिससे तीसरे मोर्चे के पक्षधर नेताओं की राजनीतिक बाछें खिल उठीं हैं।
बता दें कि 'इंडिया' गठबंधन ने 'ऑपरेशन सिंदूर' के मुद्दे पर संसद का विशेष सत्र बुलाने के लिए संयुक्त पत्र लिखा था। इसलिए बैठक से ठीक पहले 'इंडिया' गठबंधन से आम आदमी पार्टी का अलग होना विपक्ष की सियासत के लिए एक मजबूत झटका माना जा रहा है। वहीं, 'आप' की इस अप्रत्याशित पहल से इस बात की सियासी उम्मीद भी जगी है कि अन्य राज्यों में भी कांग्रेस से राजनीतिक मोलभाव करने वाले क्षेत्रीय दलों का मनोबल बढ़ेगा और वे भी इंडिया गठबंधन से अपना नाता तोड़ते चले जाएंगे। खासकर यूपी में समाजवादी पार्टी, बिहार में राजद, पश्चिम बंगाल में टीएमसी, महाराष्ट्र में एनसीपी, जम्मू-कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस, तमिलनाडु में डीएमके आदि के साथ कांग्रेस का गठबंधन टूटने के आसार प्रबल हैं।
बता दें कि लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने मिलकर चुनाव लड़ा था। हालांकि, इसकी भारी कीमत आप ने दिल्ली की अपराजेय सत्ता गंवा कर चुकाई। दिलचस्प तो यह है कि जब आप ने कांग्रेस से ही दिल्ली और पंजाब की सत्ता छीनी थी, तो फिर उसने कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन में शामिल होने की गलती क्यों की? तो इसका जवाब होगा कि आप नेताओं पर भाजपा के कसते शिकंजे, उन्हें लगातार जेल में ठूसे जाने, उन पर तरह-तरह के मुकदमे लादे जाने, आप के ऊर्जावान कार्यकर्ताओं में फूट डालकर लाभ उठाने जैसे व्यापक प्रभाव से बचने के लिए आप रणनीतिकारों ने बचकाना राजनीतिक फैसला किया था, जिसमें अब भूल सुधार करके उन्होंने अपनी राजनीतिक परिपक्वता दिखाई है।
आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने एक समाचार एजेंसी के साथ बातचीत में दो टूक ऐलान किया है कि "आम आदमी पार्टी अब इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं है।" वहीं, उनकी इस टिप्पणी की टाइमिंग पर भी गौर फरमाया जाने लगा है, क्योंकि संजय सिंह की टिप्पणी ऐसे समय पर आई है, जब शनिवार यानी 19 जुलाई को संसद के मॉनसून सत्र से पहले 'इंडिया' गठबंधन की बैठक होनी थी। दरअसल, इससे पहले 'इंडिया' गठबंधन ने 'ऑपरेशन सिंदूर' के मुद्दे पर संसद का विशेष सत्र बुलाने के लिए संयुक्त पत्र लिखा था। आम आदमी पार्टी ने तब भी विपक्षी दलों के इस फ़ैसले से किनारा कर लिया था और अब तो स्पष्ट ऐलान भी कर चुकी है। पार्टी ने इसके लिए कांग्रेस को ज़िम्मेदार ठहराया है।
जानकारों का स्पष्ट कहना है कि आप ने 'इंडिया' गठबंधन से बाहर निकलने का फ़ैसला लोकसभा चुनाव में असफलता, सियासी रणनीतिक मतभेदों और पहले में लोकसभा चुनाव 2024 में और फिर दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 में मिली अप्रत्याशित हार से उपजी अन्य राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के कारण लिया है, जिसमें 2027 में पंजाब में अपनी सरकार बचाने और आगामी गुजरात विधानसभा के दौरान अपनी सियासी स्थिति और अधिक मजबूत बनाने का सियासी स्वप्न भी शामिल हैं।
विस्मय की बात तो यह है कि संजय सिंह के बयान में कांग्रेस के प्रति एकतरफा नाराज़गी साफ़ देखी गई। उनका कहना है कि, "इंडिया गठबंधन अपनी बैठक करके जो निर्णय करना चाहता है वह कर ले। क्योंकि इंडिया गठबंधन कोई बच्चों का खेल नहीं है। आप बताइए, उन्होंने लोकसभा चुनाव के बाद कोई मीटिंग की है? उस गठबंधन को आगे बढ़ाने की कोई पहल की?" वहीं, गठबंधन में कांग्रेस की भूमिका पर सवाल उठाते हुए संजय सिंह ने कहा है कि "कभी अखिलेश यादव के ख़िलाफ़ कोई टिप्पणी, कभी उद्धव ठाकरे के ख़िलाफ़ टिप्पणी, कभी ममता बनर्जी के ख़िलाफ़ कोई टिप्पणी! हैरतअंगेज है।" स्वाभाविक है कि आप इसी सियासी छीछालेदर से बचने के लिए यह दूरदर्शिता भरा फैसला लिया है।
उन्होंने सवालिया लहजे में पूछा है कि "इंडिया गठबंधन जिस रूप में एकजुट होकर चलना चाहिए था, उसका सबसे बड़ा दल कौन है? कांग्रेस पार्टी है। कांग्रेस पार्टी ने सबसे बड़े दल की भूमिका निभाई क्या? सबसे बड़ा सवाल यह है।" हालांकि, कांग्रेस नेता उदित राज ने अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी पर एक बार फिर बड़ा हमला बोलते हुए कहा है कि भाजपा और आरएसएस के कारण ही 'आप' का जन्म हुआ। इसलिए अब पुनः अरविंद केजरीवाल बाहर से भाजपा की मदद कर सकते हैं। वह दलित विरोधी हैं और सामाजिक न्याय के भी खिलाफ हैं।
उदित राज ने ‘आप’ सांसद संजय सिंह के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अन्ना हजारे एक व्यक्ति थे और अरविंद केजरीवाल का एक एनजीओ था, लेकिन पर्दे के पीछे से ताकत देने वाले बीजेपी, आरएसएस, बजरंग दल, वीएचपी और एबीवीपी थे। बीजेपी ने उन्हें एक सजाया-संवारा आंदोलन और मंच दिया और इस तरह उनका (आप) जन्म हुआ। इसलिए ‘आप’ की विचारधारा बीजेपी और आरएसएस की है। लिहाजा, हमारी विचारधाराएं मेल नहीं खातीं, लेकिन संविधान बचाने के लिए हम एक साथ आए। अब यह उन पर निर्भर है कि वे गठबंधन छोड़ना चाहते हैं या नहीं। हो सकता है कि वे भविष्य में फिर से इंडिया अलायंस में शामिल हों, लेकिन उनके हटने का मतलब यह नहीं है कि इंडिया अलायंस कमजोर हो गया है।
वहीं, कांग्रेस पर वार करते हुए ‘आप’ सांसद संजय सिंह ने बताया कि आम आदमी पार्टी साल 2011 में हुए अन्ना आंदोलन की उपज है, जो उस समय की कांग्रेस सरकार के ख़िलाफ़ जबर्दस्त भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन था। आप पार्टी ने ख़ुद को बीजेपी और कांग्रेस दोनों से अलग, एक नई और ईमानदार राजनीतिक ताक़त के तौर पर पेश किया। लेकिन 2024 में 'इंडिया' गठबंधन में शामिल होने के बाद आप का यह स्टैंड पीछे चला गया जिसमें वह बीजेपी और कांग्रेस दोनों से समान दूरी बनाए रखती थी। यह रणनीतिक समझौता पार्टी के लिए नुक़सानदायक साबित हुआ।
एक बात और, ऐसे अप्रत्याशित चुनावी नतीजों के लिए पार्टी के नेता और कार्यकर्ता राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस से गठबंधन को ही जिम्मेदार बता रहे थे। लिहाजा आम आदमी पार्टी के स्थानीय नेता भी लगातार यह बात कहते आ रहे थे कि पंजाब की सियासत के लिए जरूरी है कि पार्टी कांग्रेस से दूर खड़ी नजर आए। साल 2022 के गुजरात विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी अकेले ही मैदान में उतरी थी। आम आदमी पार्टी तब पांच ही सीटें जीत सकी थी, लेकिन उसका वोट शेयर 13.1 फीसदी रहा था। इसका नतीजा यह हुआ कि 2017 के चुनाव में 42.2 फीसदी वोट शेयर के साथ 77 सीटें जीतने वाली कांग्रेस 2022 में महज 17 सीटों पर सिमट गई और उसका वोट शेयर भी 14.5 फीसदी की गिरावट के साथ 27.7 फीसदी पर आ गया। जबकि बीजेपी का वोट शेयर 2017 में 50 के मुकाबले 3.3 फीसदी बढ़कर 2022 में 53.3 फीसदी पहुंच गया। जाहिर है, आम आदमी पार्टी को उन मतदाताओं के ही वोट मिले, जो कांग्रेस को मिलते थे।
आप सांसद संजय सिंह ने आगे बताया कि, लोकसभा चुनाव 2024 में झटका लगने के बाद असली झटका 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में लगा, जो आप का सबसे मज़बूत गढ़ माना जाता था। 2015 और 2020 में 60 से ज़्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी सिर्फ़ 22 सीटों पर सिमट गई। अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र जैन जैसे बड़े बड़े नेता भी अपनी अपनी सीटें हार गए। आप ने इस अप्रत्याशित हार के लिए कांग्रेस की सक्रिय भूमिका को एक बड़ा फ़ैक्टर बताया था, जबकि कांग्रेस का कहना था कि वह मज़बूती से विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए स्वतंत्र है। हरियाणा में भी तो आप ने यही किया था, जिससे लहर होने के बावजूद कांग्रेस वहां पुनः सत्ता में नहीं आ पाई।
समझा जाता है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले हरियाणा में भी विधानसभा चुनाव हुए थे। यहां कई सर्वे में कांग्रेस को बढ़त दिखाई गई थी, लेकिन नतीजे ठीक इसके उलट आए और बीजेपी ने सत्ता बरक़रार रखी। तब हरियाणा में आप ने 80 से ज़्यादा सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। इसके बावजूद यहां पार्टी का खाता भी नहीं खुला और दो प्रतिशत से भी कम मत मिले थे। चूंकि आप से सम्मानजनक गठबंधन करने को कांग्रेस यहां तैयार नहीं हुई थी, इसलिए प्रतिक्रिया स्वरूप आप वहां कांग्रेस को झटके देने में सफल रही। वाकई, कांग्रेस की यह हार एक झटके के रूप में देखी गई।
यही वजह है कि हरियाणा की हार के बाद दोनों दलों (कांग्रेस और आप) के बीच आरोप-प्रत्यारोप का एक लंबा दौर चला। माना जाता है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में अपनी सक्रिय दिखाकर कांग्रेस ने हरियाणा का बदला ले लिया। तभी तो सियासी गलियारों में चर्चा है कि हरियाणा चुनाव के दौरान ही इंडिया गठबंधन को लेकर कांग्रेस और आप के मतभेद दिखने लगे थे। जो दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद और तल्ख हो चुके थे। इसलिए संजय सिंह का बयान तो महज औपचारिकता मात्र है। अनौपचारिक रूप से तो आम आदमी पार्टी तो लोकसभा चुनाव के बाद से ही इंडिया गठबंधन से बाहर हो गई थी। खास बात यह है कि दोनों के बीच कभी रिश्ते अच्छे नहीं थे, सिर्फ़ गठबंधन की वजह से उन्हें साथ आना पड़ा।
सर्वाधिक गौर करने वाली बात यह है कि आज आप जिन-जिन राज्यों में मज़बूत है, वहां एक समय कांग्रेस सत्ता में हुआ करती थी। चाहे वह दिल्ली हो या पंजाब। इसके अलावा, आप गोवा और गुजरात में मजबूत हो रही है, जहां कांग्रेस स्पीड ब्रेकर का काम कर रही है। भले ही 2024 का लोकसभा चुनाव दोनों ने एक साथ लड़ा लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ। उल्टे पंजाब में कांग्रेस ने आप पर संसदीय बढ़त ले ली। यहां की 14 लोकसभा सीटों में सत्ताधारी आप को महज 3 सीट मिली, जबकि प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस 7 सीटें जीतने में कामयाब हो गई। यह इंडिया गठबंधन में आप के शामिल होने का पहला साइड इफेक्ट्स था। वहीं, दिल्ली में कांग्रेस व आप में 3:4 अनुपात के बावजूद एक भी सीट किसी को नहीं मिलना इस बात के संकेत थे कि आप समर्थक जनता को भी ये बेमेल गठबंधन पसंद नहीं।
चूंकि दिल्ली की सूबाई सत्ता और एमसीडी की सत्ता गंवा देने के बाद अब आदमी पार्टी भी राजनीतिक संकट से गुज़र रही है और सिर्फ़ पंजाब में उसकी सरकार है। यही वजह है कि अब वह सिर्फ क्षेत्रीय राजनीति पर फ़ोकस करना चाहती है, न कि राष्ट्रीय राजनीति पर। जबकि इंडिया गठबंधन का उद्देश्य राष्ट्रीय राजनीति पर असर डालना है।"
एक महत्वपूर्ण बात और, साल 2027 में पंजाब में विधानसभा चुनाव हैं, जहां पर आप का सीधा मुक़ाबला कांग्रेस से है। इस सीमावर्ती संवेदनशील राज्य में मुख्य विपक्ष कांग्रेस ही है, ऐसे में आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं के लिए भी राष्ट्रीय स्तर पर साथ की वजह से भ्रम की स्थिति बनी हुई थी। चूंकि पंजाब में 2027 की शुरुआत में ही विधानसभा चुनाव होने हैं। इसलिए दिल्ली की हार के बाद आम आदमी पार्टी के सामने भगवंत मान की सरकार के खिलाफ पांच साल की एंटी इनकम्बेंसी से पार पाकर अब अपने इस इकलौते किले को बचाना सबसे बड़ी प्राथमिकता है। इसलिए कांग्रेस के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन से अलग होना आप की सियासी मजबूरी भी बताई जाती है।
चूंकि पंजाब के चुनाव आम आदमी पार्टी के लिए भविष्य की दिशा तय करने वाले भी माने जा रहे हैं। खुद अरविंद केजरीवाल भी दिल्ली विधानसभा चुनाव हारने के बाद से ही पंजाब में ज्यादा सक्रिय हैं और पार्टी नहीं चाहेगी कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का साथ लोकसभा चुनाव की तरह विधानसभा चुनाव में भी उसके लिए नुकसानदेह साबित हो। लोकसभा चुनाव में पंजाब के दोनों प्रतिद्वंद्वी इंडिया ब्लॉक में थे, लेकिन सूबे में एक-दूसरे के खिलाफ ताल ठोकी थी। तब पंजाब की 13 में से सात सीटें कांग्रेस ने जीतीं और सत्ताधारी दल आप महज तीन सीटें ही जीत सका था। आम आदमी पार्टी ने तब सभी 13 सीटें जीतने का लक्ष्य तय किया था।
एक बात और, दिल्ली विधानसभा चुनावों में हार के बाद आम आदमी पार्टी ने पिछले महीने पंजाब और गुजरात की दो अहम सीटों पर अपने दम पर उपचुनाव जीतकर एक राजनीतिक मैसेज भी दिया है। इससे उसकी सियासी हौसला भी बढ़ा है। दरअसल, पंजाब में आप ने लुधियाना वेस्ट सीट पर कांग्रेस को हराया, जबकि गुजरात के विसावदर क्षेत्र में उसने बीजेपी को हराकर जीत दर्ज की। चूंकि गुजरात में बीजेपी पिछले दो दशकों से सत्ता में है, इसलिए उसे हराना अब आप का मकसद है। जानकारों का मानना है कि आप के अकेले लड़ने से उसे अपना वोटबैंक मज़बूत करने और कांग्रेस-बीजेपी दोनों के मुक़ाबले ख़ुद को एक भरोसेमंद विकल्प के रूप में पेश करने में मदद मिली है।
इसलिए तो कहा जा रहा है कि आम आदमी पार्टी पंजाब-गुजरात की मजबूरी के कारण कांग्रेस से दूर दिखना चाहती है और बीजेपी के साथ वह जा नहीं सकती। चूंकि बीजेपी की केंद्र में सरकार है और उसके विरोध की सियासत में वह पीछे दिखना भी नहीं चाहेगी। ऐसे में इंडिया ब्लॉक में न होकर भी आम आदमी पार्टी इंडिया ब्लॉक के साथ ही जाएगी। हां, उसकी एक रणनीति कांग्रेस के साथ सार्वजनिक रूप से मंच साझा नहीं करने की हो सकती है। ‘आप’ की भावी सियासी भूमिका पर संजय सिंह ने कहा कि पार्टी हमेशा से ही सत्तारूढ़ दल/गठबंधन भाजपा नीत एनडीए का कड़ा विरोध करती रही है। अब हम पूरी ताकत से ऐसा करेंगे। उन्होंने कहा कि हम संसदीय मुद्दों पर टीएमसी-डीएमके जैसी समान विचारधारा वाली पार्टियों का समर्थन लेते हैं और उनको समर्थन देते भी हैं।
वहीं, सियासी चर्चा यह भी है कि संसद का मॉनसून सत्र 21 जुलाई 2025 से शुरू होने जा रहा है। इसमें केंद्र सरकार कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पेश करने और उसे पारित कराने की योजना बना रही है, जबकि विपक्ष इस दौरान पहलगाम हमले से लेकर बिहार में वोटर लिस्ट संशोधन जैसे मुद्दों को उठाने की तैयारी कर रहा है। ऐसे में राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह केंद्र सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ बोलते रहे हैं और विपक्ष की मुखर आवाज़ों में से एक माने जाते हैं। लेकिन आप के गठबंधन से अलग होने में क्या विपक्षी एकता में दरार आ सकती है? तो जवाब होगा, शायद नहीं।
इस बारे में अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए संजय सिंह ने कहा है कि संसद में जो मुद्दे उठाए जाएंगे, उनमें वह टीएमसी और डीएमके के साथ हैं, मगर कांग्रेस का साथ नहीं देना चाहते हैं। इस प्रकार से राष्ट्रीय फलक पर देखें तो विपक्षी एकता के लिए यह सही नहीं हुआ है। विपक्ष एकजुट रहकर ही भाजपा को हरा सकता है। चाहे संसद के अंदर हो या चुनावी मैदान में। सबसे बड़ा दल होने के नाते यह कांग्रेस की ज़िम्मेदारी है कि वह हर दल को साथ लेकर चले। राष्ट्रीय स्तर पर इसका सबसे बड़ा फ़ायदा कांग्रेस को ही होगा।
आप सांसद संजय सिंह ने ज़ोर देकर कहा कि उनकी पार्टी संसद में बीजेपी सरकार की नीतियों का विरोध करती रहेगी। संजय सिंह कहते हैं कि, "दिल्ली में बुलडोज़र चलाया गया। हमारे यूपी-बिहार के लोगों के मकानों और दुकानों को तोड़ा गया। उत्तर प्रदेश में पांच हज़ार स्कूल बंद किए गए। ये सब मुद्दे उठाएंगे। इसके अलावा प्लेन क्रैश, ऑपरेशन सिंदूर और बिहार में एसआईआर से जुड़े मुद्दों पर संसद में सवाल पूछेंगे।" उल्लेखनीय है कि इसी मुद्दे पर पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल दिल्ली की सियासी पीच पर पुनः लौट चुके हैं और भाजपा सरकार पर फिर से हमलावर
दिखाई दिए, जबकि कांग्रेस किसी उल्लेखनीय भूमिका में नजर नहीं आई।
इसलिए राजनीतिक विश्लेषक भी बताते हैं कि इंडिया गठबंधन नाम के लिए ज़रूर है, लेकिन राज्यों में गठबंधन के सहयोगी दलों के बीच स्पष्ट टकराव देखा जा सकता है। इससे धर्मनिरपेक्ष मतदाताओं में भी गलत संदेश जाता है।जिस तरह से पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी चुनावी राजनीति में कांग्रेस से दूरी बनाए हुई हैं लेकिन गठबंधन में शामिल हैं। इसी प्रकार पंजाब में लोकसभा चुनाव के दौरान आप और कांग्रेस साथ नहीं आए और 4 सीट भाजपा व अन्य दलों के हाथों गंवा दी। उधर, यूपी के उपचुनाव में अखिलेश यादव अकेले लड़े और मुंहकी खाए। बिहार में राजद से कांग्रेस की सियासी खटपट कोई नई बात नहीं है।जम्मूकश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस में गठबंधन है।इस गठबंधन को जीत भी मिली, लेकिन कांग्रेस जम्मूकश्मीर सरकार में शामिल नहीं हुई। कारण अंदरूनी खटपट। समझा जाता है कि कांग्रेस पार्टी ख़ुद को केंद्र में रखना चाहती है लेकिन राज्यों में गठबंधन के नेता कांग्रेस के नेतृत्व को स्वीकार नहीं करते हैं। इसलिए मुझे भी ऐसा लगता है यह गठबंधन धीरे-धीरे कमज़ोर होगा और फिर अगले चुनाव के लिए नए समीकरण बनेंगे। सम्भवतया तीसरा मोर्चा ही पुनः मजबूती पूर्वक उभरेगा।
बता दें कि बिहार में इस साल के आख़िर में विधानसभा चुनाव होने हैं, जहां राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के नेतृत्व वाले महागठबंधन जिसमें कांग्रेस व वामपंथी दल शामिल हैं, और बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए के बीच सीधी टक्कर है। वहीं, आम आदमी पार्टी ने कहा है कि वह बिहार चुनाव अकेले लड़ेगी। उधर, स्थानीय दल जनसुराज (चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की नवगठित पार्टी) भी चुनावी ताल ठोक चुकी है, जिसकी उपेक्षा दोनों गठबंधन को भारी पड़ेगी। यदि जनसुराज और आप मिल जाते हैं, क्योंकि उनका सियासी डीएनए एक है, तो इससे इंडिया गठबंधन को कितनी क्षति होगी, बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के चुनाव परिणामों से ही इस बात का पता चल जाएगा। वहीं 2026, 2027 और 2028 में विभिन्न राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों की सियासी रूपरेखा भी विहार विधानसभा चुनाव के परिणाम तय कर देंगे।
इस बात में कोई दो राय नहीं कि पार्टी विद डिफरेंस का दावा करने वाली भाजपा के बाद आप ही एक ऐसी पार्टी है जो भारतीय निम्न मध्यम वर्ग और मध्यम वर्ग के मुद्दों को रणनीतिक तरजीह देती है। वहीं जनसुराज का सियासी अभ्युदय भी उसी की नीतियों के अनुरूप है, चाहे आप जैसी सियासी सफलता जनसुराज को मिले या नहीं। ऐसे में यदि उत्तर भारत में आप और पूर्वी भारत में जनसुराज को सियासी मजबूती मिलती है, पारस्परिक समझदारी बढ़ती है तो भाजपा-कांग्रेस विरोधी तीसरे मोर्चे के लिए यह किसी सियासी ऑक्सीजन से कम नहीं होगा।
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