ओआईसी के 57 मुस्लिम देशों ने पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाना बंद नहीं किया तो भारत-इजरायल देंगे कड़ा जवाब!
ओआईसी के 57 मुस्लिम देशों ने पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाना बंद नहीं किया तो भारत-इजरायल देंगे कड़ा जवाब!
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
वैश्विक आतंकवाद के जनक पाकिस्तान, ईरान और तुर्किये के इशारे पर इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) से जुड़े तकरीबन 57 देशों का यहूदी देश इजरायल और हिन्दू देश भारत के प्रति जो सांप्रदायिक व पक्षपाती रवैया है, उस पर दुनिया के थानेदार अमेरिका और उसका विकल्प बनने की चाहत रखने वाले चीन की इस्लामिक रस्साकशी तो समझ में आती है, लेकिन रूस इतने अहम अंतरराष्ट्रीय धार्मिक व सांप्रदायिक गठबंधन के खिलाफ क्यों नहीं मुखर हो रहा है, यह वैश्विक कूटनीतिक चिंता का विषय है। जबकि भारत विरोधी इतनी बड़ी गोलबंदी के खिलाफ विपक्षी पार्टियों का जो रवैया है, वह भी चिंता की बात है। उम्मीद है कि ओआईसी के 57 मुस्लिम देशों ने पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाना बंद नहीं किया तो भारत-इजरायल मिलकर कड़ा जवाब देने की अंतरराष्ट्रीय तैयारी कर सकते हैं।
वहीं, पाकिस्तान समर्थक अमेरिका-इंग्लैंड और भारत विरोधी चीन की खतरनाक कूटनीतिक चालों को समझने में भारत सरकार यदि विफल है और इनके खिलाफ सशक्त कूटनीतिक, आर्थिक और सैन्य पलटवार करने में यदि असफल रहती है तो भारत के भविष्य से इतनी बड़ी गद्दारी कुछ हो ही नहीं सकती है। इसलिए आये दिन बदलती वैश्विक सांप्रदायिक परिस्थितियों का तकाजा है कि यहां की विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और खबरपालिका इन गम्भीर स्थितियों पर संज्ञान ले, और आपसी रजामंदी से पाकिस्तान-बंगलादेश और उनके भारतीय शुभचिंतकों के खिलाफ इतनी बड़ी पुलिस और सैन्य कार्रवाई करे कि इन्हें शह देने वाले अमेरिका और चीन की नानी मर जाए।इसके लिए प्रथम दृष्टया हमें इजरायल और रूस को साधना होगा, अन्यथा भारत को भी बड़ी क्षति उठानी पड़ सकती है।
देखा जाए तो ओआईसी की जो वैश्विक सांप्रदायिक गोलबंदी है, उससे मध्ययुगीन धर्मयुद्ध की याद तरोताजा हो जाती है। आज वैश्विक वर्चस्व स्थापित करने के लिए अमेरिका और चीन ने लगभग साढ़े चार दर्जन मुस्लिम राष्ट्रों को आपस में बांट लिया है। इधर भारत की अप्रत्याशित तरक्की और रूस के प्रति उसकी वफादार निष्ठा भी इन देशों को खटक रही है। इसलिए अपनी भविष्य की चुनौतियों से निबटने के लिए ये दोनों वैश्विक षड्यंत्र कारी देश जिस पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान यानी बंगलादेश को भारत विरोधी मोहरा बनाने के लिए लालायित हैं, उनका अस्तित्व समाप्त करने के बारे में सोचना भारतीय नेतृत्व की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। वहीं, स्पष्ट ऐलान कर देना चाहिए कि अब यदि भारत पर एक भी हमला होगा तो हमलावर के खिलाफ परमाणु बम का ही उपयोग किया जाएगा, ताकि बार बार ऑपरेशन सिन्दूर की नौबत नहीं आए। इससे इन दोनों देशों के समर्थकों को भी अपने भविष्य को लेकर आशंकाएं जन्मेंगी और फिर ये अपनी नापाक हरकतों से बाज आ जाएंगे।
ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ कि गत दिनों तुर्किये में ओआईसी की हुई इस्ताम्बुल बैठक में 57 मुस्लिम देशों ने भारत-पाक सिंधु जल संधि को कायम रखने की जो अपील की और भारत की सैन्य कार्रवाई पर चिंता जताई, वह एकतरफा आह्वान/कार्रवाई नहीं तो क्या है? आखिर पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान में हुए हिन्दुओं, बौद्धों, जैनों, सिखों आदि के आतंकी उत्पीड़न पर ओआईसी का रवैया और आतंकवादियों के वैश्विक उत्पादन और निर्यात पर उसकी खामोशी इस बात की चुगली कर रही है कि वह मध्ययुगीन धर्मयुद्ध के हालात पुनः पैदा करना चाह रहा है। इस दिशा में उन्हें अमेरिका और चीन दोनों का साथ मिल रहा है।
कूटनीतिक 'सूत्रों' के मुताबिक, यहां अमेरिका की योजना है कि भारत को इस्लामिक देशों से भिड़ाकर और पाकिस्तान के बचाव में उतरे चीन के खिलाफ भारत को उकसा कर दोनों के बीच भीषण युद्ध छिड़वाकर दोनों के वैश्विक विकास को अवरुद्ध किया जा सकता है, लेकिन मदान्ध चीन इस अमेरिकी षड्यंत्र को समझ पाने में विफल है। हिन्दू राष्ट्र भारत पर इस्लामिक कब्जा करवाने के बाद अमेरिका फिर चीन के खिलाफ मुस्लिम देशों को भड़कएगा और उसे भी बर्बाद करके अमेरिकी-यूरोपीय देशों की वैश्विक बादशाहत को अक्षुण्ण रखेगा।
उल्लेखनीय है कि तुर्किए के इस्तांबुल में आयोजित इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) की दो दिवसीय बैठक एक बार फिर से पाकिस्तान की पक्षपातपूर्ण कूटनीति का मंच बन गई। जिसमें 57 मुस्लिम देशों के संगठन ओआईसी की विदेश मंत्रियों की परिषद (सीएफएम) ने अपने साझा बयान में जहां एक ओर भारत-पाक के बीच हुए सिंधु जल समझौते (आईडब्ल्यूटी) को जारी रखने की बात कही, वहीं दूसरी ओर भारत की सैन्य कार्रवाई और कश्मीर नीति को लेकर भी एकतरफा टिप्पणी की। इस प्रकार ओआईसी ने अपने साझा बयान में साफ कर दिया कि वह पाकिस्तान के रुख का पूरी तरह समर्थन करता है और भारत से अधिकतम संयम बरतने की उम्मीद करता है। इससे साफ है कि यह संगठन पाकिस्तान की घृणित कार्रवाई का समर्थन करता है और चाहता है कि भारत उसके प्रति आक्रामक न बने। क्योंकि इन देशों को भारत की मजबूत वैश्विक हैसियत और ताकत तथा अपनी कमजोरियों का एहसास भी है। यही बन्दरघुड़की देकर तो इन्होंने 80 सालों तक भारत को भरमाए रखा, लेकिन उम्मीद है कि मोदी सरकार इनका भी भ्रम अपनी सटीक रणनीति से तोड़ देगी, जो वैश्विक जरूरत भी है। इसको इजरायल का भी साथ मिलेगा।
बता दें कि इस बैठक के बाद जारी औपचारिक बयान में ओआईसी ने दो टूक कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच वर्ष 1960 में हुई सिंधु जल संधि का दोनों पक्षों को सख्ती से पालन करना चाहिए। इस ऐतिहासिक समझौते को किसी भी परिस्थिति में तोड़ा नहीं जाना चाहिए। दोनों पक्षों को इस पर अमल करते रहना चाहिए। दरअसल, यह टिप्पणी ऐसे समय पर आई है जब भारत ने 22 अप्रैल को पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु संधि को लेकर अपना रुख सख्त कर लिया था और पाकिस्तान का पानी रोकने का इशारा किया था। पाकिस्तान ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई थी और युद्ध जैसी धमकी दी थी। तीन महीने से इस मुद्दे पर दोनों देशों के बीच टकराव बना हुआ है।
वहीं, ओआईसी के सीएफएम ने बयान में कहा है कि, “हमें दक्षिण एशिया में बढ़ती सैन्य गतिविधियों पर गहरी चिंता है। भारत द्वारा पाकिस्तान में कई स्थानों पर किए गए सैन्य हमले क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ा सकते हैं। ओआईसी ने दोनों पक्षों से उत्तेजक कार्रवाईयों से बचने और अधिकतम संयम बरतने का आग्रह किया है। यह स्पष्ट रूप से भारत को लक्ष्य कर दिया गया संकेत है, क्योंकि पाकिस्तान ओआईसी का स्थायी सदस्य है और लंबे समय से इसे भारत के खिलाफ राजनयिक हथियार की तरह प्रयोग करता रहा है। उसके इस बयान के पीछे अमेरिकी-चीनी कूटनीति का भी हाथ हो सकता है कि दक्षिण एशिया में भारत के सैन्य व आर्थिक उभार से इनकी नानी मर रही है।
ओआईसी की इस बैठक में भारत के लिए एक और चिंता की बात यह रही कि कश्मीर मुद्दे पर भी संगठन ने पाकिस्तान के पक्ष को पूरी तरह दोहराया और कहा कि, “हम संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों, ओआईसी के रुख और कश्मीरी लोगों की इच्छाओं के अनुरूप, कश्मीर के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन करते हैं।” यह बयान भारत की उस नीति के खिलाफ है जिसमें कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा माना गया है और किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को अस्वीकार किया जाता है। इसलिए भारत को यह बता देना चाहिए कि वह इजरायल के यहूदियों के अधिकारों का समर्थन करता है और अमेरिकी-चीनी प्रताड़ना के वक्त वह किसी भी इस्लामिक देश का साथ नहीं देगा। अभी ईरान पर हुए अमेरिकी आक्रमण पर जैसी खामोशी की चादर भारत ने ओढ़ रखी थी, यही हमारी नीति बन जाएगी।
कहना न होगा कि इस्लामिक सहयोग संगठन की यह बैठक इसलिए भी चर्चा में रही क्योंकि इसमें पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार के साथ पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर भी तुर्किए पहुंचे। मुनीर ने वहां तुर्किए के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोआन से मुलाकात की, जो कि बैठक के आधिकारिक एजेंडे से इतर एक सामरिक रणनीतिक कदम माना जा रहा है। माना जा रहा है कि इस मुलाकात का असर ओआईसी के अंतिम बयान की भाषा पर भी पड़ा, जिसमें भारत के खिलाफ तीखा रुख अपनाया गया।
कहना न होगा कि ओआईसी का यह ताजा रुख भारत के लिए राजनयिक रूप से असहज करने वाला है। इससे एक ओर भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खुद को वैश्विक नेता और विकास साझेदार के रूप में पेश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर ओआईसी जैसे संगठनों में लगातार पाकिस्तान की पक्षपातपूर्ण पैरवी के चलते उसे विरोध का सामना करना पड़ रहा है। वहीं, सिंधु जल समझौते जैसे पुराने और स्थिर समझौतों को भी अब भू-राजनीतिक टकराव के केंद्र में लाया जा रहा है, जिससे दक्षिण एशिया में अशांति और अधिक गहराने की आशंका बन रही है।
कहना न होगा कि पाकिस्तान हर बार मुंह की खाने के बावजूद अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी कारगुजारियों से बाज नहीं आता है। ताजा मामला संयुक्त राष्ट्र का है, जहां पाकिस्तान ने आतंकवाद से जंग को लेकर अपनी पीठ थपथपाने की कोशिश की तो भारत ने उसी पोल ही खोल दी। भारत ने पाकिस्तान के एजेंडे पर दुष्प्रचार कर रहे मुस्लिम देशों के संगठन पर भी करारा प्रहार किया है।
यूएन में भारत के प्रतिनिधि पार्वथानेनी हरीश ने कहा कि जो देश खुद आतंकवादी संगठनों और उसके आकाओं को पालता-पोसता हो, वो दूसरों को नसीहत न दे। पहलगाम आतंकी हमले में पाकिस्तान ने जो किया, उसे पूरी दुनिया ने देखा है। विश्व इस कत्लेआम को भूला नहीं है। पाकिस्तान लगातार आतंकियों को ट्रेनिंग और हथियार मुहैया करा रहा है। ऑपरेशन सिंदूर में मारे गए आतंकियों के जनाने में पाकिस्तानी सेना और सरकार के लोग आखिरी नमाज पढ़ते नजर आते हैं। इसलिए अब समय आ गया है कि संयुक्त राष्ट्र पूर्वाग्रह और दोहरेपन से बाहर आए। आतंकवाद को पोसने वाले देशों को बेनकाब कर दंडित किया जाए। सीमापार आतंकवाद में पाकिस्तान से उसके सारे पड़ोसी मुल्क परेशान हैं।
इसके अलावा, भारत ने इससे पहले इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) को भी लताड़ लगाई और कश्मीर के मुद्दे पर जारी बयान को लेकर उसे घेरा। पाकिस्तान की शह पर ओआईसी ने कश्मीर में मानवाधिकार के उल्लंघन का आरोप लगाया। इसमें भारत को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की। भारत ने कहा कि झूठ सौ बार भी बोला जाए तो वो सच की जगह नहीं ले सकता। इसलिए इस्लामिक संगठन पाकिस्तान के बहकावे में ऐसे गलत तथ्यों वाले बयान देना बंद करे। दरअसल, ओआईसी में ज्यादातर मुस्लिम देश हैं। लिहाजा, पाकिस्तान इस मंच का इस्तेमाल भारत विरोधी दुष्प्रचार में करने के लिए करता है।
वहीं, सशस्त्र संघर्ष में बच्चों का हाल के मुद्दे पर खुली बहस में हरीश ने कहा, पाकिस्तान इस मामले में सबसे बड़ा आरोपी है। बलूचिस्तान में बच्चों का क्या हाल है, ये किसी से छिपा नहीं है। सीमापार आतंकवाद के साथ वो अपने देश में भी बच्चों-महिलाओं और मजलूमों पर जुल्म ढा रहा है। आतंकवाद के साये से बच्चों को बचाने की जरूरत है, लेकिन पड़ोसी मुल्क उन्हें उसी गर्त में धकेल रहा है।
याद दिला दें कि मध्ययुगीन धर्मयुद्ध, जिसे क्रूसेड भी कहा जाता है, 11वीं से 13वीं शताब्दी के दौरान पश्चिमी यूरोप के ईसाईयों द्वारा पवित्र भूमि (फिलिस्तीन और यरूशलेम) को मुस्लिम नियंत्रण से वापस लेने के लिए शुरू किए गए सैन्य अभियानों की एक श्रृंखला थी। ये अभियान पोप अर्बन द्वितीय के आह्वान पर शुरू हुए थे, जिन्होंने ईसाइयों से यरूशलेम को मुक्त कराने का आग्रह किया था। धर्मयुद्ध धार्मिक उत्साह और पवित्र भूमि को पुनः प्राप्त करने की इच्छा से प्रेरित थे। यरूशलेम ईसाइयों और मुसलमानों दोनों के लिए पवित्र था, और दोनों पक्ष इसके नियंत्रण के लिए लड़े। कई धर्मयुद्ध अभियान हुए, जिनमें से सबसे प्रसिद्ध 1096 से 1291 के बीच हुए। धर्मयुद्धों ने मध्ययुगीन यूरोप और मध्य पूर्व को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया, लेकिन वे अपने मुख्य उद्देश्य में सफल नहीं हुए, क्योंकि यरूशलेम अंततः मुस्लिम नियंत्रण में वापस आ गया।
कुछ प्रमुख धर्मयुद्ध इस प्रकार हैं- प्रथम धर्मयुद्ध: 1096-1099, जिसमें यरूशलेम पर ईसाइयों का कब्जा हो गया।
द्वितीय धर्मयुद्ध: 1147-1149, जो असफल रहा और यरूशलेम पर मुस्लिम नियंत्रण बना रहा। तृतीय धर्मयुद्ध:
1189-1192, जिसमें फ्रेडरिक बारब्रोसा, फिलिप द्वितीय और रिचर्ड द लायनहार्ट जैसे शासकों ने भाग लिया।
चतुर्थ धर्मयुद्ध: 1202-1204, जो कॉन्स्टेंटिनोपल (पूर्वी रोमन साम्राज्य की राजधानी) पर कब्जा करने के साथ समाप्त हुआ। अन्य धर्मयुद्ध: बच्चों का धर्मयुद्ध (1212), एल्बिजेंसियन धर्मयुद्ध (1209-1229)। धर्मयुद्ध एक जटिल और विवादास्पद विषय है, जिसने मध्ययुगीन इतिहास और संस्कृति पर गहरा प्रभाव डाला है। इतिहास पुनः खुद को दोहरा रहा है और आधुनिक युग में इजरायल के अलावा अब भारत के खिलाफ भी मुस्लिम देशों का संगठन एकजुट हो रहा है, जो उनके पाप के घड़े भर जाने का द्योतक है।
उम्मीद है कि ओआईसी के 57 मुस्लिम देशों ने पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाना बंद नहीं किया तो भारत-इजरायल मिलकर कड़ा जवाब देने की अंतरराष्ट्रीय तैयारी कर सकते हैं। ग्रेटर इजरायल, ग्रेटर इंडिया और ग्रेटर रूस की स्थापना के लिए यह बहुत शुभ मुहूर्त भी हो सकता है। क्योंकि सोवियत संघ का वारिस रूस पुनः अपनी सीमाओं को प्राप्त कर सकता है। भारत और इजरायल दोनों को रूस को भरोसे में लेकर आगे बढ़ना चाहिए।
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