On International Justice Day, the Yaksha question of the irony of protracted justice
अंतर्राष्ट्रीय न्याय दिवस पर दीर्घसूत्री न्याय की विडंबना का यक्ष प्रश्न https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-6262725213669814 @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक अंतर्राष्ट्रीय न्याय दिवस (17 जुलाई) केवल न्याय की महत्ता का स्मरण कराने का अवसर नहीं है, बल्कि यह स्वयं से एक कठिन प्रश्न पूछने का भी दिन है—क्या वर्षों बाद मिला न्याय वास्तव में न्याय कहलाता है? वाकई आज दुनिया के अनेक देशों की तरह भारत में भी करोड़ों मुकदमे लंबित हैं। अनेक वादियों की पूरी उम्र अदालतों के चक्कर लगाते-लगाते बीत जाती है। कई मामलों में निर्णय तब आता है जब पीड़ित या आरोपी इस दुनिया में ही नहीं रहते। ऐसे में न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है और इस खास दिवस पर प्रासंगिक भी। आखिर हमें यह समझना ही होगा कि 21वीं सदी के भारत की न्यायिक व्यवस्था की सफलता इस बात से नहीं आंकी जाएगी कि उसने कितने ऐतिहासिक फैसले दिए, बल्कि इस बात से आंकी जाएगी कि उसने आम नागरिक को कितनी जल्दी, कितनी निष्पक्षता से और कितनी कम लागत में...