Bankipur By-Election 2026: Sudden change in BJP candidate raises burning questions?
बांकीपुर उपचुनाव 2026: भाजपा उम्मीदवार के यकायक बदलाव से उभरने लगे सुलगते सवाल?
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
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भोजपुरी में एक कहावत है- लइका मालिक, बूढ़ दीवान, मामला बिगड़े साँझ बिहान। यानी कि जिस घर का लड़का मालिक होता है और बूढ़ा व्यक्ति दीवान मतलब सलाहकार की भूमिका में आ जाता है तो वहां अच्छे और कार्यकुशल सुझावों पर भी विलंब से निर्णय होने के चलते मामला साँझ यानी शाम से सुबह तक कभी भी उलझ यानी बिगड़ जाता है। यदि पुरानी कुछ बातों को भूला भी दिया जाए तो हाल ही में बांकीपुर उपचुनाव में भाजपा द्वारा घोषित उम्मीदवार अभिषेक कुमार सिन्हा (बंटी) का नामांकन वापस लेकर नीरज कुमार सिन्हा को उम्मीदवार बनाए जाने से पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की काफी किरकिरी हुई है।
चूंकि उनका चयन प्रधानमंत्री मोदी के स्तर पर यकायक हुआ है, इसलिए उँगली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ भी उठी। बात इतनी सी नहीं है, बल्कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और उनके चहेते मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की सियासी रणनीति भी अचानक सवालों के घेरे में आ गई। यही वजह है कि नई दिल्ली से लेकर पाटलिपुत्र/पटना के सियासी गलियारों में राजनीतिक चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। लोग एक दूसरे से यह जानना चाह रहे हैं कि आखिर बांकीपुर उपचुनाव की उठापटक में हुए "उम्मीदवार बदल" के निर्णायक निर्णय में किसका पलड़ा भारी रहा- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का या केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और बिहार के मुख्यमंत्री सह गृहमंत्री सम्राट चौधरी का!
यक्ष प्रश्न है कि बांकीपुर उपचुनाव में भाजपा को अपने ही घोषित उम्मीदवार को बदलने की नौबत क्यों आई? क्या यह राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रदेश अध्यक्ष की विफलता नहीं है? क्या यह प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री या दोनों को गुमराह करके बदनाम करने की कोई नई चाल तो नहीं है? या फिर कुछ और बात है, एक तहकीकात तो बनती है, ताकि भविष्य में ऐसे फैसलों से बचा जा सके। वाकई बांकीपुर उपचुनाव में भाजपा द्वारा पहले अभिषेक कुमार (बंटी) को उम्मीदवार बनाना और फिर उनका नाम वापस लेकर नीरज कुमार सिन्हा को उम्मीदवार घोषित करना स्वाभाविक रूप से कई सवाल खड़े करता है। आधिकारिक तौर पर अभिषेक कुमार ने "पारिवारिक कारणों" का हवाला देकर नामांकन वापस लिया है।
हालांकि राजनीतिक हलकों और मीडिया चर्चाओं में कुछ संभावित कारणों की चर्चा है, जिन्हें केवल अटकलों या विश्लेषण के रूप में ही देखा जाना चाहिए। चूंकि राष्ट्रीय व सूबाई मीडिया के राजनीतिक विश्लेषण में कुछ संभावित पहलुओं पर चर्चा हो रही है जो लाजिमी है और इसप्रकार से हैं:-
पहली, उम्मीदवार की पृष्ठभूमि पर मिली नई जानकारी से उभरी चिंताएं: कुछ मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि उम्मीदवार से जुड़े एक संभावित विवाद की जानकारी नामांकन के बाद सामने आने पर पार्टी ने जोखिम लेने के बजाय उम्मीदवार बदलना ही बेहतर समझा। चूंकि नामांकन के बाद कुछ ऐसी सूचनाएं सामने आईं जिन्हें पार्टी चुनावी दृष्टि से जोखिमपूर्ण मान रही थी। हालांकि इस पर भाजपा की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
दूसरी, स्थानीय संगठन की असहमति: कुछ विश्लेषकों का मानना है कि पटना महानगर और बांकीपुर के स्थानीय नेताओं का एक वर्ग घोषित उम्मीदवार के पक्ष में पूरी तरह सहज नहीं था। यदि ऐसा था, तो चुनाव प्रबंधन प्रभावित होने की आशंका रही होगी।
तीसरी, जीत की संभावना (Winnability): भाजपा बांकीपुर को अपनी परंपरागत मजबूत सीट मानती है। यदि आंतरिक सर्वे या फीडबैक में उम्मीदवार को लेकर नकारात्मक संकेत मिले हों, तो अंतिम समय में बदलाव को बेहतर विकल्प माना गया होगा।
चौथी, विपक्ष को मुद्दा बनने से रोकना: यदि पार्टी को लगा कि उम्मीदवार से जुड़ा कोई विवाद चुनाव प्रचार के दौरान बड़ा मुद्दा बन सकता है, तो उसने पहले ही उम्मीदवार बदलकर संभावित नुकसान कम करने की कोशिश की हो सकती है।
पांचवीं, क्या यह नेतृत्व की विफलता है?: इसके दो पक्ष हैं-यदि उम्मीदवार की पूरी जांच के बाद ही नाम घोषित हुआ था और बाद में वही कारण बदलने की वजह बना, तो प्रारंभिक जांच प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
लेकिन यदि नामांकन के बाद कोई नई और महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई, तो उम्मीदवार बदलना संगठन की त्वरित प्रतिक्रिया भी माना जा सकता है।
छठी, क्या यह संगठन की विफलता है?: यदि किसी उम्मीदवार को केंद्रीय चुनाव समिति तक मंजूरी मिलने के बाद बदलना पड़े, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि प्रारंभिक जांच (due diligence) पूरी तरह हुई थी या नहीं। इस दृष्टि से आलोचक इसे संगठनात्मक कमी मान सकते हैं। या फिर यह नुकसान सीमित करने की रणनीति थी?
सातवीं, नुकसान नियंत्रित (damage control) करने की रणनीति : यह भी तर्क दिया जा सकता है कि यदि नामांकन के बाद कोई नई जानकारी सामने आए और पार्टी तुरंत निर्णय लेकर उम्मीदवार बदल दे, तो इसे नुकसान नियंत्रित (damage control) करने की रणनीति भी माना जा सकता है। ऐसी स्थिति में बाद में बड़ा विवाद झेलने की बजाय तत्काल निर्णय लेना नेतृत्व की सक्रियता भी माना जा सकता है।
आठवीं, सबकुछ सामान्य है या असामान्य, चिता की बात:
यहां यह कहना कि यह केवल राष्ट्रीय अध्यक्ष या प्रदेश अध्यक्ष की विफलता है, उपलब्ध तथ्यों के आधार पर अभी जल्दबाजी होगी। वहीं यह कहना भी उचित नहीं होगा कि सब कुछ सामान्य था। दोनों संभावनाओं के बीच सच्चाई इस बात पर निर्भर करेगी कि उम्मीदवार बदलने की वास्तविक वजह क्या थी, जिसे भाजपा ने सार्वजनिक रूप से विस्तार से नहीं बताया है।
नौवीं, संगठनात्मक जवाबदेही का यक्ष प्रश्न: ऐसे में यदि भविष्य में यह स्पष्ट हो जाए कि विवादित जानकारी पहले से उपलब्ध थी और जांच में चूक हुई, तो संगठनात्मक जवाबदेही का प्रश्न अधिक मजबूती से उठेगा। लेकिन यदि जानकारी बाद में सामने आई और उसी आधार पर निर्णय लिया गया, तो इसे जोखिम प्रबंधन के रूप में भी देखा जा सकता है।
दसवीं, भाजपा ने कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी, इसलिए सबकुछ भविष्य पर निर्भर: चूंकि बांकीपुर उपचुनाव में उम्मीदवार बदलने के पीछे के "अंदरूनी कारणों" पर अभी तक भाजपा ने कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी है। इसलिए किसी एक कारण को तथ्य के रूप में कहना उचित नहीं होगा। हालांकि इस समय उपलब्ध सार्वजनिक तथ्यों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है कि उम्मीदवार परिवर्तन का वास्तविक कारण क्या था। इसलिए किसी विशेष व्यक्ति, गुट या नेतृत्व पर निश्चित आरोप लगाना तथ्यों से परे होगा। यदि भविष्य में आधिकारिक दस्तावेज़, विश्वसनीय रिपोर्ट या संबंधित पक्षों के बयान सामने आते हैं, तब अधिक ठोस निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।
# आखिर राजनीति के अंतःपुर में क्या क्या चर्चाएं चल रही हैं, किस खेमे में कौन सी सुस्वादु खिचड़ी पक रही है, यह अंदाजा भी आपको होना चाहिए
वहीं, एक अन्य चौपाली चर्चा के मुताबिक भाजपा का या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का, क्योंकि दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा के बिहार की सत्ता में आने के बाद से पहले मुख्यमंत्री बदल यानी नीतीश कुमार की जगह पर सम्राट चौधरी का राज्याभिषेक और अब बांकीपुर उपचुनाव में उम्मीदवार बदल यानी भाजपा द्वारा पूर्व में घोषित उम्मीदवार अभिषेक कुमार सिन्हा (बंटी) का नामांकन वापस लेकर नीरज कुमार सिन्हा को उम्मीदवार बनाए जाने
को सामान्य घटनाक्रम नहीं ठहराया जा सकता है। यह बिहार एनडीए के आपसी दांवपेच से भी अभिप्रेरित हो सकता है। चूंकि बिहार के कद्दावर नेता इन दिनों हाशिए पर चले गए हैं, इसलिए वो नहीं चाहते कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी जैसे सुलझे हुए नेता सफल हों, क्योंकि इनकी सफलता से उनका सियासी भविष्य उलझ जाएगा।
तभी तो कभी नीतीश कुमार की सेहत को मीडिया में उछाला गया, फिर सम्राट चौधरी के खिलाफ विजय कुमार सिन्हा की तैयारी को बेवजह तूल दिलवाया गया, उसके बाद तिवारी एनकाउंटर के बहाने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को बदनाम करने की मुहिम चलाई-चलवाई गई, और अब पार्टी के सर्वेसर्वा नितिन नवीन के गृह क्षेत्र और खुद उनकी ही छोड़ी हुई सीट जहां से वे और उनसे पहले उनके पिताजी दशकों से विधायक रह चुके हैं, उस सीट पर उम्मीदवार बदल अभियान के पीछे की सियासत को समझना/समझाना जरूरी है। यह राजनीतिक पत्रकारों के लिए शोध का विषय है कि यह सबकुछ महज संयोग है या किसी शातिर राजनेता के इशारे पर चल रहा अनुप्रयोग दर अनुप्रयोग, क्योंकि सवाल बिहार के विकास और राजनीतिक भविष्य दोनों का। आजादी के 8 दशक में भी बिहार को प्रधानमंत्री पद नहीं मिलना भी चिंता का सबब है। इसलिए हर परिस्थिति को अनुकूल बनाइए, अनुकूल परिस्थितियों को प्रतिकूल बताने, बनाने से बाज आइए।
अभी तक उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता है कि यह फैसला सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी या आरएसएस भक्त/मोदी अनुगामी कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा, पूर्व उपमुख्यमंत्री के हस्तक्षेप से हुआ, प्रमाणित नहीं है। क्योंकि ऐसी किसी आधिकारिक पुष्टि या विश्वसनीय रिपोर्ट का अभाव है। वहीं, राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के खासमखास एमएलसी, राष्ट्रीय प्रवक्ता व केंद्रीय मीडिया उपप्रभारी संजय मयूख और केंद्रीय भाजपा के पदाधिकारी ऋतुराज सिन्हा, पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद आदि के रहते हुए भी भाजपा नेतृत्व गुमराह हुआ, यह अंदरूनी जांच का विषय है, क्योंकि उम्मीदवार बदल अभियान से शीर्ष नेताओं की छवि और साख दोनों प्रभावित हुई है।
वहीं, राजनीतिक गलियारों में कुछ ऐसी ही चर्चाएँ (गॉसिप) चल रही हैं, जिन्हें तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि अटकलों के रूप में ही देखा जाना चाहिए। इनमें प्रमुख बातें हैं:- कुछ लोगों का मानना है कि उम्मीदवार चयन के बाद स्थानीय संगठन और प्रभावशाली नेताओं के एक वर्ग ने आपत्ति जताई, जिसकी ऊपर में सांकेतिक चर्चा की जा चुकी है, के बाद ही पार्टी ने नुकसान की आशंका देखते हुए अपना फैसला बदला। वहीं, दूसरी चर्चा यह है कि बांकीपुर भाजपा की प्रतिष्ठित सीट है और यहां जनसुराज पार्टी के सर्वेसर्वा प्रशांत किशोर के चुनाव लड़ने से मुकाबला हाई-प्रोफाइल हो गया। इसलिए पार्टी ने अंतिम समय में अधिक सर्वमान्य चेहरे पर दांव लगाया।
एक और अटकल यह है कि शीर्ष नेतृत्व तक स्थानीय फीडबैक पहुंचा, जिसके बाद संगठन ने तुरंत निर्णय बदल दिया। हालांकि इसमें मोदी, शाह, नबीन, चौधरी या सिन्हा के व्यक्तिगत हस्तक्षेप का कोई सार्वजनिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है अंदरूनी चर्चाओं के सिवाय। क्योंकि भाजपा में सभी निर्णय या तो सामूहिक फैसले से होते हैं या फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विवेक से, जिसके पीछे राष्ट्र कल्याण, लोक कल्याण और पार्टी कल्याण की त्रिविध भावना अंतर्निहित/छिपी होती है, जैसा कि उनके निकटस्थ लोग अनौपचारिक बातचीत में बताते आए हैं, जो वक्त की कसौटी पर शतप्रतिशत खरा उतरती हुई आई है। भाजपा की विश्वव्यापी सफलता का मूल भी यही रणनीति है।
ऐसे में भले ही आधिकारिक तौर पर आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में केंद्रीय मीडिया उपप्रभारी व राष्ट्रीय प्रवक्ता संजय मयूख के साथ आये निवर्तमान पार्टी प्रत्याशी अभिषेक कुमार सिन्हा ने "पारिवारिक कारणों" का हवाला देकर नामांकन वापस लेने की बात कही है और भाजपा ने नए उम्मीदवार की घोषणा कर दी। इसलिए निष्कर्ष यही है कि उम्मीदवार बदलना एक असाधारण राजनीतिक घटना थी। जिसके पीछे आंतरिक संगठनात्मक कारणों और चुनावी रणनीति की संभावना मजबूत मानी जा रही है।
लेकिन यह दावा कि मोदी, शाह, नबीन, चौधरी, या सिन्हा आदि प्रभावशाली नेताओं या फिर भाजपा या आरएसएस के हस्तक्षेप से ही यह निर्णय हुआ, वर्तमान में सार्वजनिक रूप से प्रमाणित नहीं है। यह बात दीगर है कि बांकीपुर उपचुनाव में उम्मीदवार बदलने की घटना को केवल "पारिवारिक कारण" कहकर समझना कठिन है। दरअसल, राजनीति में अक्सर ऐसे फैसलों के पीछे कई स्तरों पर कारण काम करते हैं। हालांकि, इनमें से कई बातें सार्वजनिक रूप से प्रमाणित नहीं हैं, इसलिए उन्हें विश्लेषण और राजनीतिक चर्चा के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
बहरहाल, संभावित राजनीतिक संकेत इस प्रकार हैं:-
बांकीपुर उपचुनाव भाजपा की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुका है, क्योंकि यह सीट वर्षों से भाजपा का मजबूत गढ़ समझी जाती रही है और पूर्व विधायक व वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष नितिन नवीन, राज्यसभा सदस्य से भी जुड़ी रही है। ऐसे में यहां हार का संदेश पूरे बिहार में जा सकता है। वहीं, अभूतपूर्व चुनावी रणनीतिकार और जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर के खुद ही मैदान में उतरने से इस उपचुनाव का महत्व बढ़ गया। बताया जाता है कि यदि मुकाबला सामान्य होता, तो शायद उम्मीदवार नहीं बदला जाता। लेकिन प्रशांत किशोर के चुनाव लड़ने से भाजपा ने जोखिम कम करने की कोशिश की होगी।
जहाँ तक स्थानीय असंतोष की चर्चा की बात है तो कई मीडिया रिपोर्टों में पार्टी के अंदर उम्मीदवार चयन को लेकर असहमति और विरोध की चर्चा हुई है। यह भी कहा गया कि अंतिम समय में मिले फीडबैक ने नेतृत्व को निर्णय बदलने पर मजबूर किया। हालांकि भाजपा ने इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की। ऐसे में स्वाभाविक सवाल है कि क्या पार्टी के विघ्नहर्ता व सिद्धि विनायक समझे जाने वाले विवेकवान राजनीतिज्ञ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीधे हस्तक्षेप किया और उम्मीदवार बदल का निर्णय तत्क्षण हो गया? हालांकि अभी तक ऐसा कोई विश्वसनीय सार्वजनिक प्रमाण नहीं मिला है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यक्तिगत रूप से उम्मीदवार बदलने का निर्देश दिया। हाँ, इतना जरूर कहा जा सकता है कि भाजपा में महत्वपूर्ण चुनावी निर्णय अक्सर केंद्रीय नेतृत्व, प्रदेश नेतृत्व और संगठन के सामूहिक परामर्श से लिए जाते हैं। इसलिए मोदी, शाह या आरएसएस के सीधे हस्तक्षेप का दावा करना उपलब्ध तथ्यों से परे होगा।
जहाँ तक राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और प्रदेश संगठन पर असर की बात है तो राजनीतिक विश्लेषकों की नजर इस बात पर भी है कि यदि प्रारंभिक उम्मीदवार किसी प्रभावशाली नेता की पसंद थे, तो अंतिम समय में बदलाव उस नेता की राजनीतिक पकड़ पर सवाल खड़े कर सकता है। लेकिन इसकी पुष्टि किसी आधिकारिक स्रोत ने नहीं की जा सकती है। हाँ, इन घटनाक्रमों से यह संकेत अवश्य मिलता है कि भाजपा ने चुनावी जोखिम को कम करने के लिए अंतिम समय में रणनीतिक बदलाव किया। लेकिन "मोदी के सीधे हस्तक्षेप" या किसी एक नेता को जिम्मेदार ठहराने वाला निष्कर्ष उपलब्ध प्रमाणों से समर्थित नहीं है।
यदि राजनीतिक दृष्टि से देखें, तो इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी परीक्षा अब 30 जुलाई के मतदान और परिणाम होंगे। यदि भाजपा सीट आसानी से बचा लेती है, तो उम्मीदवार बदलने का निर्णय सफल रणनीति माना जाएगा। यदि परिणाम अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा, तो यही फैसला पार्टी के भीतर लंबे समय तक चर्चा और आत्ममंथन का विषय बन सकता है।
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