@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (Ethanol Blended Petrol - EBP) को लेकर जनमानस में कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। भले ही केंद्र सरकार और उसके मुलाजिम इस नीति के पक्ष में लगातार तर्क देते आए हैं, लेकिन कुछ मुद्दों पर लोगों और विशेषज्ञों को लगता है कि पर्याप्त स्पष्टता नहीं दी गई है। मजे की बात तो यह है कि एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल पर उठने वाले सवालों का जवाब देने की प्राथमिक जिम्मेदारी अलग-अलग संस्थाओं की है, जो इस प्रकार हैं:-
पहली, भारत सरकार: नीति बनाने, उसके उद्देश्यों और प्रभावों को स्पष्ट करने की मुख्य जिम्मेदारी सरकार की है।
दूसरी, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय: एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम, उसके वैज्ञानिक आधार और नीति संबंधी प्रश्नों का उत्तर देने वाला प्रमुख मंत्रालय।
तीसरी, भारतीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस नियामक बोर्ड तथा तेल विपणन कंपनियां: ईंधन की गुणवत्ता, उपलब्धता और उपभोक्ताओं से जुड़े तकनीकी पहलुओं पर जानकारी देने की जिम्मेदारी निभाती हैं।
चौथी, वाहन निर्माता कंपनियां: किन वाहनों में E20 या अन्य मिश्रित ईंधन सुरक्षित है, इंजन पर क्या प्रभाव पड़ सकता है और वारंटी से जुड़े सवालों का जवाब देना उनकी जिम्मेदारी है।
पांचवीं, स्वतंत्र वैज्ञानिक संस्थान और विशेषज्ञ: इंजन प्रदर्शन, उत्सर्जन, माइलेज और दीर्घकालिक प्रभावों पर निष्पक्ष अध्ययन प्रस्तुत कर सकते हैं।
यदि जनता के मन में माइलेज, इंजन की आयु, वाहन की वारंटी, खाद्य सुरक्षा या किसानों को होने वाले लाभ जैसे प्रश्न हैं, तो सबसे विश्वसनीय उत्तर सरकार द्वारा सार्वजनिक किए गए आंकड़ों, स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययनों और वाहन निर्माताओं के तकनीकी दस्तावेजों से मिलने चाहिए।
वाकई लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी सार्वजनिक नीति पर सवाल उठना स्वाभाविक है। उतना ही आवश्यक है कि सरकार और संबंधित संस्थाएं पारदर्शी आंकड़ों, परीक्षण रिपोर्टों और तथ्यों के आधार पर उनका स्पष्ट उत्तर दें, ताकि नागरिक स्वयं सूचित निर्णय ले सकें।
यह ठीक है कि एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। सरकार इस नीति के पक्ष में लगातार तर्क देती रही है, लेकिन कुछ मुद्दों पर लोगों और विशेषज्ञों को लगता है कि पर्याप्त स्पष्टता नहीं दी गई है। इसलिए प्रतिपक्षी नेताओं व उनके समर्थकों का यह आरोप कि सरकार "माकूल जवाब नहीं दे रही" एक राजनीतिक दृष्टिकोण हो सकता है; क्योंकि सरकार का कहना है कि उसने कई सवालों के उत्तर नीति दस्तावेजों और संसद में दिए हैं।
कतिपय मुख्य सवाल और सरकार का पक्ष इस प्रकार समझिए-
पहला, क्या एथेनॉल से इंजन को नुकसान होता है?
लोगों की चिंता है कि पुराने वाहनों में रबर, प्लास्टिक और धातु के पुर्जों पर प्रभाव पड़ सकता है तथा माइलेज घट सकता है। जबकि सरकार का पक्ष है कि अधिकांश नए वाहन E20 ईंधन के अनुरूप बनाए जा रहे हैं और वाहन निर्माता भी ऐसे मॉडल ला रहे हैं।
दूसरा, क्या माइलेज कम होता है?
लोगों का कहना है कि एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता पेट्रोल से कम होती है, इसलिए समान मात्रा में ईंधन पर कुछ कमी आ सकती है। वहीं सरकार का तर्क है कि इससे आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम होगी, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक लाभ मिलेगा।
तीसरा, क्या खाद्यान्न सुरक्षा प्रभावित होगी?
आलोचकों का कहना है कि गन्ने और मक्का का अधिक उपयोग ईंधन में होने से खाद्य कीमतों पर असर पड़ सकता है। जबकि सरकार का कहना है कि एथेनॉल उत्पादन के लिए अधिशेष कृषि उपज, शीरा (Molasses) और अन्य स्वीकृत स्रोतों का उपयोग किया जाता है तथा खाद्य सुरक्षा का ध्यान रखा जाता है।
चौथा, क्या उपभोक्ताओं को पर्याप्त जानकारी दी गई?
यह भी सवाल उठता है कि सभी वाहन E20 के अनुकूल नहीं हैं और उपभोक्ताओं को स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए। हालांकि विशेषज्ञों का सुझाव है कि पेट्रोल पंपों और वाहन कंपनियों द्वारा अधिक पारदर्शी जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
बहस का मूल बिंदु यह है कि एथेनॉल मिश्रण का उद्देश्य तेल आयात कम करना, किसानों को अतिरिक्त बाजार उपलब्ध कराना और उत्सर्जन घटाना है। वहीं आलोचक चाहते हैं कि सरकार स्वतंत्र परीक्षणों के आंकड़े, वास्तविक माइलेज, इंजन पर दीर्घकालिक प्रभाव, लागत-लाभ विश्लेषण और खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव जैसे विषयों पर अधिक विस्तृत एवं सार्वजनिक डेटा प्रस्तुत करे।
इसलिए यह मुद्दा केवल तकनीकी नहीं, बल्कि आर्थिक, कृषि और ऊर्जा नीति से भी जुड़ा है। बेहतर होगा कि इस पर निष्पक्ष आंकड़ों और स्वतंत्र अध्ययनों के आधार पर चर्चा हो, ताकि उपभोक्ताओं और किसानों—दोनों के हितों का संतुलन सुनिश्चित किया जा सके।
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