In the world of advertising, AI has posed an exciting challenge to human creativity.

विज्ञापन की दुनिया में एआई ने इंसानी क्रिएटिविटी के समक्ष पैदा की एक उत्साहबर्द्धक चुनौती
@ डॉ. संघर्ष शर्मा, फाइन आर्ट्स जॉर्नलिस्ट
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विज्ञापन की लोकलुभावन दुनिया ने हमेशा से ही अपने समय की तकनीकी तरक्की को प्रदर्शित किया। यह अपने दौर में हुए बदलावों का प्रतिबिंब भी समझा गया, जो यह दिखाता रहा कि तकनीकी दुनिया कितनी तेजी से हमारे जनजीवन का अभिन्न अंग बनती जा रही है। पहले मौखिक प्रचार-प्रसार में सहयोगी बने यंत्रों, फिर हाथ से बने पोस्टरों और अब अखबारों में छपने वाली चित्ताकर्षक तस्वीरों से लेकर डिफरेंट फोटोग्राफी के विभिन्न प्रासंगिक अंदाजों, टीवी विज्ञापनों और डिजिटल मार्केटिंग तक के हर नए आविष्कार ने, देश-प्रदेश के समाज के समक्ष व्यवहारिक उत्पादों और प्रासंगिक विचारों को पेश करने के तरीके को बदल दिया। बहरहाल इस बदलाव को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आगे बढ़ा रहा है। 

सवाल है कि विज्ञापन की दुनिया में एआई ने इंसानी क्रिएटिविटी के समक्ष एक उत्साहबर्द्धक चुनौती पैदा की है या फिर उसे तराशकर उम्मीद से भी आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त किया है, विचारणीय पहलू है। आपने गौर किया होगा कि AI तेज़ी से विज्ञापन की दुनिया में आया है। इसके बहुउपयोग से कंपनियाँ कुछ ही मिनटों में मनमाफिक तस्वीरें, वीडियो, स्लोगन, प्रोडक्ट फोटोग्राफी और यहाँ तक कि पूरे विज्ञापन अभियान की योजना भी तैयार कर सकती हैं। जानकारों की मानें तो जिस काम के लिए पहले फोटोग्राफरों, ग्राफिक डिजाइनरों, चित्रकारों, कॉपीराइटर्स, स्टाइलिस्टों और मार्केटिंग प्रोफेशनल्स की मिली-जुली कोशिशों की ज़रूरत होती थी, उसे अब अक्सर कुछ टेक्स्ट प्रॉम्प्ट्स (निर्देशों) से ही तैयार किया जा सकता है।

एआई तकनीक की शानदार तरक्की के हैं कई फायदे 

देखा जाए तो एआई तकनीक की इस शानदार तरक्की के कई ऐसे फायदे हैं जिनसे इनकार नहीं किया जा सकता। इससे प्रोडक्शन का समय और लागत दोनों कम होती है, और कंपनियों को क्रिएटिविटी के नए और अनोखे मौके भी मिलते हैं। लेकिन इन फायदों के साथ एक अहम सवाल भी उठता है, वह यह कि उन कलाकारों के लिए इसका क्या मतलब है जिनकी क्रिएटिविटी लंबे समय से विज्ञापन का मुख्य आधार रही है? वस्तुतः इसका जवाब न तो आसान है और न ही पूरी तरह निश्चित। बस इतना ही कहा जा सकता है कि AI कला का दुश्मन नहीं है, बल्कि इसके बेरोकटोक इस्तेमाल से क्रिएटिविटी की दुनिया में ऐसे बदलाव आ सकते हैं जिन पर गंभीरता पूर्वक सोचने की ज़रूरत है।

# विज्ञापन जगत में हमेशा ही रही है इंसानी क्रिएटिविटी की ज़रूरत 

विज्ञापन जगत में हमेशा से ही इंसानी क्रिएटिविटी की ज़रूरत रही है, जो अब अपेक्षाकृत खत्म सी होती प्रतीत हो रही है, लेकिन यह संभव नहीं है, क्योंकि तकनीक कभी भी मानवीय मस्तिष्क, उसकी सृजनात्मकता का विकल्प बन ही नहीं सकती है। कहना न होगा कि हर यादगार विज्ञापन के पीछे एक इंसानी कहानी दर्ज होती है। विज्ञापन की एक असरदार तस्वीर सिर्फ़ आकर्षक नहीं होती, बल्कि वह भावनाएं जगाती है, भरोसा बनाती है, संस्कृति को दिखाती है और ऐसे विचार लोगों तक पहुँचाती है जो उनसे जुड़ते हैं।

चाहे पुराने समय के सदाबहार पोस्टर हों, मशहूर प्रिंट विज्ञापन हों या भावनाओं को छूने वाले टीवी कैंपेन, सफल से सफलतम विज्ञापन हमेशा ही इंसानी परिकल्पना पर निर्भर रहे हैं। ऐसा इसलिए कि कलाकार अपने काम में बारीकी से देखने की क्षमता, सहानुभूति, सांस्कृतिक समझ और निजी अनुभव को भी पिरोया/शामिल करते हैं। अलबत्ता इन गुणों को सिर्फ़ एल्गोरिदम से नहीं मापा जा सकता। जिस तरह से पीढ़ियों से पेंटर्स, इलस्ट्रेटर्स, फ़ोटोग्राफ़र्स, कैलिग्राफ़र्स, ग्राफ़िक डिज़ाइनर्स और आर्ट डायरेक्टर्स ने दृश्य (विज़ुअल) और श्रव्य कम्युनिकेशन को आकार दिया है, वह काबिलेतारीफ है क्योंकि उनके काम में न सिर्फ़ तकनीकी कौशल दिखता है, बल्कि बरसों की पढ़ाई, प्रयोग और भावनाओं का स्पष्ट इज़हार भी झलकता है।

# विज्ञापन में AI का बढ़ता दखल चिंतित करता है और उत्साहित भी

यही वजह है कि विज्ञापन में AI का बढ़ता दखल चिंतित भी करता है और उत्साहित भी। अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप इसके किस पक्ष को देखना पसंद करेंगे। दरअसल आज AI टूल्स साधारण लिखित निर्देशों से विज्ञापन के लिए असली जैसी दिखने वाली तस्वीरें बना सकते हैं, फ़ैशन ब्रांड्स वर्चुअल मॉडल बनाते हैं, रेस्टोरेंट असली डिश बनाए बिना खाने की तस्वीरें तैयार करते हैं, और कंपनियाँ जेनरेटिव AI का इस्तेमाल करके प्रोडक्ट की पैकेजिंग, लोगो और प्रमोशनल वीडियो डिज़ाइन करती हैं। कहने का तातपर्य यह कि जिन कामों के लिए पहले हफ़्तों की प्लानिंग की ज़रूरत होती थी, वे अब कुछ ही घंटों में पूरे हो सकते हैं। लिहाजा बिज़नेस इन टूल्स को पसंद करते हैं क्योंकि इनसे तेज़ी, एक जैसा काम और कम प्रोडक्शन लागत मिलती है।

# सीमित बजट वाले स्टार्ट-अप्स और छोटे बिज़नेस के लिए AI ने दिए हैं कई मौके  

जानकारों की मानें तो सीमित बजट वाले स्टार्ट-अप्स और छोटे बिज़नेस के लिए, AI ने ऐसे मौके दिए हैं जो पहले नहीं मिल पाते थे। एंटरप्रेन्योर अब पूरी क्रिएटिव टीम रखे बिना प्रमोशनल मटीरियल डिज़ाइन कर सकते हैं। डिज़ाइन का यह लोकतंत्रीकरण AI की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। हालाँकि, तकनीक से होने वाले हर फ़ायदे के साथ नई ज़िम्मेदारियाँ भी आती हैं। इसलिए इस आसानी की छिपी हुई कीमत भी चुकाने को हमें तैयार रहना चाहिए। इससे जहाँ कंपनियों को कम लागत का फ़ायदा होता है, वहीं कई क्रिएटिव प्रोफ़ेशनल्स को बढ़ती अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है।

एक फ़ैशन कैंपेन जिसमें पहले फ़ोटोग्राफ़र, मॉडल, मेकअप आर्टिस्ट, स्टाइलिस्ट, लाइटिंग टेक्नीशियन और एडिटर की ज़रूरत होती थी, उसे अब डिजिटल रूप से तैयार किया जा सकता है। वहीं, प्रोडक्ट फ़ोटोग्राफ़ी की जगह AI से बनी तस्वीरें ले सकती हैं। विज्ञापन के लिए इलस्ट्रेशन किसी कलाकार को काम पर रखे बिना बनाए जा सकते हैं। इन बदलावों से क्रिएटिविटी पूरी तरह खत्म नहीं होती, लेकिन क्रिएटिव रोज़गार के मौके कम हो सकते हैं। आर्ट स्कूल और डिज़ाइन इंस्टीट्यूट में जाने वाले युवा ग्रेजुएट्स के लिए यह चिंता की बात है। वे सोचते हैं कि क्या ऑटोमेटेड समाधानों की ओर तेज़ी से बढ़ते बाज़ार में उनके बरसों से विकसित किए गए कलात्मक कौशल की अहमियत बनी रहेगी।

# क्या कलाकारों की मौलिकता और उनके मालिकाना हक का सवाल यथावत रहेगा? 

क्या उनकी मौलिकता और मालिकाना हक का सवाल यथावत रहेगा? क्योंकि AI से जुड़े सबसे चर्चित मुद्दों में से एक है इसके ज्ञान का स्रोत। चूंकि जेनरेटिव AI सिस्टम पहले से मौजूद इमेज, इलस्ट्रेशन, पेंटिंग, फ़ोटोग्राफ़ और डिज़ाइन के विशाल कलेक्शन का विश्लेषण करके सीखते हैं, फिर हमें सिखलाते हैं। हालाँकि इन डेटासेट का मकसद विज़ुअल पैटर्न सिखाना होता है, लेकिन कई कलाकारों का तर्क है कि उनके काम को बिना इजाज़त, बिना क्रेडिट दिए या बिना मुआवज़े के इस्तेमाल किया गया है। इससे अहम नैतिक और कानूनी सवाल उठते हैं।

सवाल है कि अगर AI से बनी कोई इमेज किसी जीवित कलाकार की खास शैली से बहुत मिलती-जुलती है, तो उस पर किसका हक होगा? क्या असली बनाने वाले को पहचान या मुआवज़ा मिलना चाहिए? जब इंसानों के बनाए आर्टवर्क पर ट्रेन किए गए एल्गोरिदम से क्रिएटिविटी पैदा होती है, तो कॉपीराइट कानून को कैसे प्रतिक्रिया देनी चाहिए? ये सवाल अंतरराष्ट्रीय बहस का विषय बने हुए हैं और दुनिया भर में उभरती कॉपीराइट नीतियों को आकार दे रहे हैं।

# क्या AI इंसानी क्रिएटिविटी की जगह ले सकता है?

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पैटर्न पहचानने और मौजूदा जानकारी के आधार पर अलग-अलग तरह के आउटपुट बनाने में बहुत माहिर है। यह शैलियों की नकल कर सकता है, विज़ुअल एलिमेंट को मिला सकता है और तकनीकी रूप से शानदार कंपोज़िशन बना सकता है। हालाँकि, क्रिएटिविटी रंगों और आकृतियों को व्यवस्थित करने से कहीं ज़्यादा है। एक पेंटर अपनी निजी यादों को दिखाता है। एक फ़ोटोग्राफ़र एक ऐसा पल कैद करता है जिसे दोबारा नहीं बनाया जा सकता। एक इलस्ट्रेटर असल ज़िंदगी के अनुभवों से पैदा होने वाली भावनाओं को दिखाता है। एक एडवरटाइज़िंग डिज़ाइनर सांस्कृतिक संदर्भ, सामाजिक मूल्यों और इंसानी मनोविज्ञान को समझता है। इंसानों के ये गहरे गुण आसानी से मशीन में डाउनलोड नहीं किए जा सकते। AI क्रिएटिविटी में मदद कर सकता है, लेकिन असली कलात्मक अभिव्यक्ति इंसानी कल्पना से ही निकलती है।

# असल दुनिया के कुछ उदाहरण को समझिए

एडवरटाइज़िंग इंडस्ट्री में AI का असर पहले से ही दिख रहा है। कॉस्मेटिक्स बनाने वाली कंपनी महंगी स्टूडियो फ़ोटोग्राफ़ी के बजाय AI का इस्तेमाल करके प्रोडक्ट की एकदम सही इमेज बना सकती है। ट्रैवल एजेंसी असल जगहों पर फ़ोटोग्राफ़र भेजे बिना ऐसे काल्पनिक नज़ारे बना सकती है जो असली लगते हैं। फ़ैशन रिटेलर पारंपरिक फ़ोटो शूट करने के बजाय वर्चुअल AI-जनरेटेड मॉडल का इस्तेमाल करके कपड़ों का विज्ञापन कर सकता है। रेस्टोरेंट तेज़ी से खाने की ऐसी आदर्श इमेज बना रहे हैं जो कंप्यूटर-जनरेटेड माहौल के बाहर कभी मौजूद ही नहीं थीं। ये उदाहरण दिखाते हैं कि AI कैसे प्रोडक्शन की लागत को काफी कम कर सकता है। साथ ही, ये यह भी दिखाते हैं कि अगर इंसानी क्रिएटिविटी को पूरक बनाने के बजाय लगातार बदला जाता रहा, तो फ़ोटोग्राफ़र, स्टाइलिस्ट, डिज़ाइनर, फ़ूड आर्टिस्ट और इलस्ट्रेटर के लिए मौके कैसे कम हो सकते हैं।

# एक-दूसरे की जगह लेने के बजाय मिलकर काम करने का भविष्य

इतिहास बताता है कि टेक्नोलॉजी शायद ही कभी कला को खत्म करती है; बल्कि, यह कलाकारों के काम करने के तरीके को बदल देती है। उदाहरणतया, जिस तरह से फोटोग्राफी ने पेंटिंग को खत्म नहीं किया, डिजिटल इलस्ट्रेशन ने ड्राइंग को खत्म नहीं किया, ग्राफिक डिज़ाइन सॉफ्टवेयर ने डिज़ाइनरों की जगह नहीं ली। इसी तरह से AI को कलाकारों के विकल्प के तौर पर नहीं, बल्कि एक और रचनात्मक साधन के तौर पर देखा जाना चाहिए। यदि जिम्मेदारी से एआई के इस्तेमाल किए जाने पर बल दिया जाए तो AI नए आइडिया सोचने, कॉन्सेप्ट डेवलप करने, रंगों को आज़माने, बैकग्राउंड बनाने और बार-बार किए जाने वाले प्रोडक्शन के कामों में मदद कर सकता है, जिससे कलाकार मौलिकता और कहानी कहने पर ज़्यादा ध्यान दे सकें। इसलिए, विज्ञापन का भविष्य इंसानी समझ और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बीच मुकाबले के बजाय उनके आपसी सहयोग पर आधारित होना चाहिए।

# AI के दौर में कलाकारों की सुरक्षा है एक यक्ष प्रश्न 

AI के दौर में कलाकारों की सुरक्षा एक यक्ष प्रश्न है, क्योंकि जैसे-जैसे एआई (AI) रचनात्मक उद्योगों में गहराई से शामिल हो रहा है, कुछ सिद्धांतों पर ध्यान देना बेहद ज़रूरी है:- पहला, कॉपीराइट और बौद्धिक संपदा का सम्मान करें।दूसरा, जब कलाकारों के काम का इस्तेमाल AI ट्रेनिंग के लिए किया जाए, तो उनसे अनुमति लें। तीसरा, जब विज्ञापन AI से बनाए जाएं, तो पारदर्शिता बनाए रखें। चौथा, निष्पक्ष लाइसेंसिंग और मुआवज़े की व्यवस्था बनाएं। पांचवां, कला शिक्षा और रचनात्मक पेशों में निवेश जारी रखें। छठा, यह समझें कि सांस्कृतिक विरासत इंसानी रचनात्मकता से ही सुरक्षित रहती है। सच कहूं तो कोई भी टेक्नोलॉजी सबसे सफल तब होती है जब वह उन लोगों का सम्मान करती है जिनकी जानकारी और रचनात्मकता उस तरक्की को मुमकिन बनाती है।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस विज्ञापन के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण विकासों में से एक है। यह बेहतरीन दक्षता, कम लागत और रचनात्मक संभावनाएं देता है जिनकी कल्पना भी एक दशक पहले तक नहीं की जा सकती थी। फिर भी, इसका बढ़ता प्रभाव हमें यह भी याद दिलाता है कि तकनीकी तरक्की कभी भी इंसानी कल्पना की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। विज्ञापन का मतलब सिर्फ़ देखने में आकर्षक तस्वीरें बनाना नहीं है। इसका मतलब है कहानियां सुनाना, भावनाएं ज़ाहिर करना, सांस्कृतिक पहचान बनाना और लोगों के बीच सार्थक संबंध बनाना। वस्तुतः ये उपलब्धियां इंसानी अनुभव पर आधारित हैं, जो हमेशा बेशकीमती बनी रहेंगी।

इसलिए, विज्ञापन के भविष्य में AI को एक मूल्यवान रचनात्मक सहायक के तौर पर अपनाना चाहिए और साथ ही कलाकारों के अनोखे योगदान को भी बनाए रखना चाहिए। जो समाज इनोवेशन और मौलिकता दोनों को महत्व देता है, वह यह पक्का करेगा कि टेक्नोलॉजी रचनात्मकता की जगह लेने के बजाय उसकी सेवा करे।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तस्वीरें बना सकता है, लेकिन इंसानी कलाकार ही उन्हें अर्थ, भावना और सांस्कृतिक महत्व देता है। लिहाजा कलाकारों की सुरक्षा का मतलब सिर्फ़ एक पेशे की सुरक्षा नहीं है—यह उस रचनात्मक भावना को बचाए रखने के बारे में भी है जो हमारी साझा इंसानियत को परिभाषित करती है।

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