After all, why are peace agreements between America and Iran being broken again and again? Who is responsible?

आखिर अमेरिका और ईरान के शांति समझौते बार बार क्यों टूट जा रहे हैं? जिम्मेदार कौन?
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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

ईसाई मुल्कों का अगुवा अमेरिका और इस्लामिक देशों का कथित अगुवा ईरान के बीच होने वाले शांति समझौते बार-बार यानी ब्रेक के बाद टूट जा रहे हैं। यह स्थिति वैश्विक शांति और प्रगति के लिए अच्छी नहीं समझी जा सकती है।सवाल है कि आखिर इन शांति समझौतों के टूटने की क्या वजह है? क्या कतर, पाकिस्तान और कुवैत जैसे मुल्क इनके बीच मध्यस्थता करवाने में विफल हो चुके हैं? या फिर अमेरिका-ईरान के अंतरराष्ट्रीय दांवपेंच इनकी समझ से बाहर हैं! 

राजनीतिक व कूटनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इसका  कारण केवल एक घटना नहीं, बल्कि दशकों से चली आ रही गहरी अविश्वास की राजनीति है। इसके पीछे जी-7 और ब्रिक्स के अलावा ओआईसी देशों की खल नीति का  भी बड़ा हाथ है। भोजपुरी में एक कहावत है- "जबरा मारे, रोवन न दे।" यानी कि मजबूत व्यक्ति किसी की लक्षित पिटाई करता है तो रोने भी नहीं देता है। यही हाल अमेरिका ने ईरान का कर रखा है।

 हालांकि, ईरान भी अमेरिका को पानी पिला रहा है लेकिन अन्य एशियाई राष्ट्र द्विपक्षीय प्रतिद्वंद्वियों की चक्की में गेहूँ के साथ घुन की तरह पिसते रहने को अभिशप्त हैं। हाल के महीनों में भी परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों और होरमुज़ जलडमरूमध्य को लेकर बने समझौते टिक नहीं सके। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

पहला, परमाणु कार्यक्रम: अमेरिका चाहता है कि ईरान यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) पर लगभग पूर्ण रोक लगाए, जबकि ईरान इसे अपना संप्रभु अधिकार मानता है। यही सबसे बड़ा गतिरोध है। 

दूसरा, आर्थिक प्रतिबंध: ईरान पहले प्रभावी ढंग से प्रतिबंध हटाने की गारंटी चाहता है, जबकि अमेरिका चरणबद्ध राहत की बात करता है। दोनों की प्राथमिकताएँ अलग हैं। तीसरा, होरमुज़ जलडमरूमध्य: हाल के तनाव में यह मुद्दा परमाणु कार्यक्रम जितना ही महत्वपूर्ण बन गया है। समझौते की भाषा और उसकी अलग-अलग व्याख्या ने नए विवाद पैदा किए। 

चौथा, इज़राइल और क्षेत्रीय सुरक्षा: अमेरिका के लिए इज़राइल की सुरक्षा अहम है, जबकि ईरान क्षेत्र में अपने प्रभाव और सहयोगी समूहों को रणनीतिक सुरक्षा का हिस्सा मानता है। इससे वार्ता बार-बार प्रभावित होती है।
घरेलू राजनीति: दोनों देशों की आंतरिक राजनीति भी समझौते को कठिन बनाती है। किसी भी पक्ष द्वारा अधिक रियायत देने पर घरेलू विरोध बढ़ सकता है। 

सुलगता वैश्विक सवाल है कि इस बदतर स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन? अमेरिका या ईरान या फिर दोनों! इसका सीधा उत्तर यह नहीं है कि केवल एक पक्ष दोषी है।
अमेरिका पर आरोप लगता है कि वह समझौतों के बाद भी नए प्रतिबंध लगाता है या अपनी शर्तें बदलता है। जबकि ईरान पर आरोप है कि उसने अपने परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय गतिविधियों को पूरी तरह सीमित नहीं किया तथा कई बार समझौतों की अपनी व्याख्या अपनाई। 

इसलिए अधिकांश अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि समझौते इसलिए टूटते हैं क्योंकि दोनों पक्षों के बीच विश्वास की भारी कमी, अलग-अलग रणनीतिक हित और बदलते भू-राजनीतिक हालात किसी भी समझौते को टिकाऊ नहीं बनने देते। खास बात यह है कि इजरायल जबतक इन समझौतों में शामिल नहीं होता, तबतक कुछ भी कहना मुश्किल है। 

वहीं ओआईसी के सदस्य देश भी इस मामले में परोक्ष दोहरी चाल चल रहे हैं, ताकि अमेरिका व उसके देशों से अरब व खाड़ी देशों का पीछा छूटे और यहां के मुल्क रूस, चीन और भारत की सरपरस्ती में अपना बहुमुखी विकास कर सकें। इस नजरिए से रूस-चीन और भारत-फ्रांस(यूरोपीय संघ) की भूमिका भी संतुलनकारी साबित हो सकती है।

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