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डोरस्टेप बैंकिंग सर्विस का उठाइए फायदा, बचिए ब्रांच जाने से और रहिए कोरोना काल में सुरक्षित

डोरस्टेप बैंकिंग सर्विस का उठाइए फायदा, बचिए ब्रांच जाने से और रहिए कोरोना काल में सुरक्षित  @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार कहा जाता है कि बैंक और उसके ग्राहक के सम्बन्ध जितने स्पष्ट और सुसंगत यानी कि सरल व सुगम्य होंगे, उनके पारस्परिक कारोबारी सम्बन्ध भी उतने ही अधिक प्रगाढ़ और लाभदायक होंगे। खासकर बढ़ते ऑनलाइन युग में कोरोना काल की अप्रत्याशित दहशत और सोशल डिस्टेंसिंग के बढ़ते प्रचलन के बाद सरकारी और निजी क्षेत्र के बैंकों ने अपने-अपने ग्राहकों के दरवाजे पर यानी डोरस्टेप बैंकिंग सर्विस प्रदान करने का जो बीड़ा उठाया है, उसकी जितनी प्रशंसा की जाए वह कम है। इसलिए उसका फायदा सभी जरूरतमंद ग्राहक ले सकते हैं।  सच कहा जाए तो डीएसबी सर्विस कामकाजी लोगों, महिलाओं और बुजुर्गों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। क्योंकि कोरोना काल में किसी को भी सम्बन्धित ब्रांच में जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी और घर पर ही उनका कार्य सम्पन्न करवा दिया जाएगा। इसके अलावा, बैंकिंग से लेन-देन में बैंक तक पहुंचने या वहां से वापस घर लौटने के बीच में जो लूट या छिनतई का सम्भावित खतरा बना रहता है, उससे भी एक ह...

शक्ति के विकेंद्रीकरण और चुनाव सुधार का यक्ष प्रश्न

शक्ति के विकेंद्रीकरण और चुनाव सुधार का यक्ष प्रश्न  # कमलेश पांडे/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार शक्ति के विकेंद्रीकरण के बिना ग्राम स्वराज और चुनाव सुधार की परिकल्पना व्यर्थ है। वजह यह कि क्रिमिनल जस्टिस और विलम्बित न्याय प्रणाली से लोकतांत्रिक संवाद की प्रक्रिया न केवल धीमी, बल्कि प्रभावित भी हो रही है। लगभग सभी बुद्धिजीवी इस बात को लेकर आगाह करते रहते हैं कि सत्तागत सांठगांठ से किसी का भी हित नहीं सधेगा। जनहित तो कदापि नहीं। इसलिए हर जिम्मेदार संस्था और अधिकारियों को चुनावों में स्टेट फंडिंग या फिर समतुल्य प्रावधानों के बारे में गम्भीरता पूर्वक सोचना होगा, विचार करना होगा।  ऐसा इसलिए कि धनबल और बाहुबल बहुत कम लोगों के पास है, जिससे हमारा लोकतंत्र कमजोर हो रहा है। समाज में बहुत से लोग हैं जिनके पास न धन है, न बाहुबल है, जिससे एक धनी अथवा बाहुबली व्यक्ति के चुनाव जीतने की संभावना अधिक बलवती हो जाती है।  लिहाजा, राजनीतिक दल भी किसी भी तरह से चुनाव जीतने और सत्ता हथियाने की गरज से ऐसे लोगों को  टिकट देकर आगे बढ़ाते हैं, जिससे पूरी व्यवस्था ही सवालों के घेरे में खड़ी है। सच...

ग्राम स्वराज की बात आखिर आगे बढ़े तो कैसे, जानिए इसे

ग्राम स्वराज की बात आखिर आगे बढ़े तो कैसे, जानिए इसे # कमलेश पांडे/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार महात्मा गांधी ने अपनी हत्या के एक दिन पहले अपनी डायरी में आजादी, स्वराज, पंचायत, देश को जाना कहां है और जाएगा किधर आदि जो बातें आदतन लिखी हैं, उससे भविष्य के भारत को लेकर उनकी भावना का पता चलता है। इसलिए इसे उनका अंतिम वसीयत कहा जाता है। विकास के तमाम दावों के बीच आज भी गांव की तस्वीर और बापू की छवि देखने के बाद जो सवाल हमारे दिल में कौंधते हैं, उससे यही महसूस होता है कि आखिरकार कैसे इस विषमता को दूर किया जा सकता है।  महात्मा गांधी ने तब कहा था कि भले ही हमारा देश आजाद हो गया है, लेकिन 7 लाख गांव आज भी गुलाम हैं। जब तक ग्रामीण जनता को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आजादी नहीं मिलती, तबतक अनौपचारिक चुनावों का कोई भी महत्व नहीं रह जाता। कुछ यही वजह रही होगी कि तब भी उन्होंने कांग्रेस को भंग करने की वकालत करते हुए लोक सेवक संघ बनाने का सुझाव समकालीन सहयोगियों को दिया था। उन्होंने कहा था कि हर गांव में 5 लोगों की पंचायत बने, जो देश को आगे ले जाए। इसे ही उनकी ग्राम स्वराज की परिकल्पना करार दिया जात...

धूल भरी आंधी और बदलते मौसम की दोहरी मार झेल रहे दमा के मरीज

धूल भरी आंधी और बदलते मौसम की दोहरी मार झेल रहे दमा के मरीज @ कमलेश पांडे/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार यदि आप दमा के मरीज हैं तो बदलते मौसम में सावधान रहिए। इस वक्त जो धूल भरी आंधी चल रही है, वह आपकी परेशानी बढ़ा सकती है। दरअसल, हाल ही में यशोदा सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल कौशांबी में तकरीबन सौ से भी ज्यादा लोगों ने अपनी फेफड़ों की स्वास्थ्य जांच एक निःशुल्क परामर्श शिविर में करवाई है, जिसके विश्लेषण के बाद यह तथ्य प्रकाश में आया है कि बदलते मौसम में धूल भरी आंधियों के चलने से श्वांस एलर्जी एवं बिगड़े हुए दमे के मरीजों की संख्या बढ़ी है, जिससे दिल्ली-एनसीआर वासियों का चिंतित होना स्वाभाविक है। इस बारे में वरिष्ठ सांस एवं फेफड़ा रोग विशेषज्ञ डॉक्टर के के पांडे, डॉक्टर अर्जुन खन्ना एवं डॉक्टर अंकित सिन्हा की टीम से परामर्श करने के बाद मरीजों ने फेफड़ों के संक्रमण, सांस फूलने, दमा एलर्जी एवं खर्राटे की बीमारियों से निजात पाने के उपाय पूछे एवं उपचार समझे। डॉक्टरों ने बताया कि इस शिविर के माध्यम से इन बीमारियों के कुछ नवीनतम ट्रेंड का भी पता चला है, जिसे संज्ञान में रखकर ही मरीजों को आवश्यक परामर्श...

हिममानव 'यति' की मौजूदगी पर पड़ी वक्त की धूल एकबार फिर छंटी

 हिममानव 'यति' की मौजूदगी पर पड़ी वक्त की धूल एकबार फिर छंटी @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार सनातन संस्कृति साहित्य से जुड़ीं मिथक करार दी जाने वाली कतिपय बातों पर जब आधुनिक सोच वाली संस्थाएं भी 'सच्चाई' की मुहर लगाती प्रतीत होती हैं, तो निःसन्देह कभी विश्व गुरु होने के एहसास को वर्तमान में भी साकार करने की संभावनाओं को बल मिलता है। क्योंकि समकालीन सरकार की प्राथमिकताएं भी कुछ ऐसी ही हैं, जिससे इस दिशा में की गई कोई भी सकारात्मक कोशिश एक बड़ी मुहिम में तब्दील हो सकती है और वह दिन दूर नहीं जब वे अपनी बुलंदियों तक पहुंच जाएं। शायद इसलिए भी भारतीय सेना द्वारा हाल ही में हिम मानव की मौजूदगी को लेकर की गई टिप्पणी और साझा की गई तस्वीर का अपना महत्व है। एक बार फिर यह सवाल मुखर हो चुका है कि क्या हिमालय पर वाकई हिम मानव विचरता है? प्रश्न यह भी है कि आखिरकार उसके अस्तित्व के निशान दुनिया मात्र को कब कब मिले हैं? इससे जुड़ी हुई एक बात यह भी कि क्या हिम मानव या येती या शेरपा का धरती पर अस्तित्व है? क्योंकि, सेना द्वारा साझा की गईं कुछ हालिया तस्वीरों से इस मिथकीय मानवीय प्रज...

आतंकवाद, नक्सलवाद और अंडरवर्ल्ड की साझी चुनौती पर अब निर्णायक चोट की दरकार

 आतंकवाद, नक्सलवाद और अंडरवर्ल्ड की साझी चुनौती पर अब निर्णायक चोट की दरकार @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार आतंकवाद, नक्सलवाद और अंडरवर्ल्ड यानी कि संगठित अपराध जैसे रक्तबीजों के मूल स्वरूप को समझे बिना इनका खात्मा कदापि नहीं किया जा सकता है। लेकिन सवाल फिर वही कि आखिरकार इसे समझेगा कौन, विधायिका या कार्यपालिका या फिर दोनों। क्योंकि इस संदर्भ में न्यायपालिका, मीडिया और सिविल सोसाइटी की भूमिका या तो बिल्कुल हाशिये पर पहुंच चुकी है, या फिर क्रमशः बाद में ही मुखर होती दिखाई दे रही है!  मसलन, यह एक ऐसा जटिल सवाल है जो लगभग चार या फिर सात दशकों से अपना माकूल जवाब तलाश रहा है। लेकिन मिल रही है चुनाव दर चुनाव सियासी उलटबासी। इसलिए मन में यह पूरक सवाल कौंध रहा है कि आखिर व्यवस्थागत खामियों के बीच हमलोग कबतक गिनते रहेंगे अपने ही वीर जवानों की क्षत विक्षत शरीरें। कब थमेगा ये अंतहीन सिलसिला। क्या आंतरिक भूभाग पर जारी खूनी झड़पों का कोई सर्वमान्य हल निकल पायेगा, और यदि नहीं तो बनावटी विद्रोह के फनों को कुचलेगा कौन? दो टूक कहें तो जिन पर इन बातों को समझने तथा औरों को भी समझाने की ...

सरकार के सक्रिय उपायों के कारण लगने लगा है बैंक घोटालों का पता

सरकार के सक्रिय उपायों के कारण लगने लगा है बैंक घोटालों का पता  # ऐसे मामलों की मीडिया रिपोर्टिंग में भी दर्ज की गई है वृद्धि  @ कमलेश पांडे/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार केंद्र में दूसरी बार सत्तारूढ़ हुई मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में बैंकों की ऐसी नकेल कसी की, धीरे धीरे कई सारे गड़बड़झाले प्रकाश में आते गए। मोदी सरकार पार्ट टू में ही बैंकों के खिलाफ सख्ती जारी रहेगी। सरकार की पूरी कोशिश होगी कि बैंकों को अभिजात्य वर्गीय लोगों के शिकंजे से निकालकर आमलोगों की चौखट तक पहुंचा दिया जाए। गत दिनों जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक, बैंकों द्वारा घोटालों की संख्या में वृद्धि के आरबीआई के आंकड़ों को मीडिया के कुछ हिस्सों में हाल के वर्षों में बैंकों में बढ़ते घोटालों की एक तस्वीर के रूप में चित्रित किया गया है। जिसके लिए मोदी सरकार नहीं, बल्कि मनमोहन सरकार या उनकी पूर्ववर्ती सरकारें जिम्मेदार हैं। मौजूदा सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह आंकड़ा रिपोर्टिंग के वर्ष का है, न कि घोटालों के होने या ऋण मंजूर होने या फिर  वचन-पत्र इत्यादि के वर्ष का, जो कि कई मामलों में पुरानी अवधि का है। ...