By calling Bihar's Samrat Chaudhary a 'criminal CM', Prashant Kishor is distorting his own political thinking!

बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को 'अपराधी सीएम' कहकर प्रशांत किशोर अपनी सियासी सोच कर रहे हैं विकृत!

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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

जन सुराज पार्टी के संस्थापक और बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र के नवनिर्वाचित विधायक प्रशांत किशोर द्वारा बिहार के तेजतर्रार मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को बार-बार अपराधी मुख्यमंत्री बताया जाना बिहार के उन करोड़ों मतदाताओं का अपमान है, जिन्होंने उनके प्रगतिशील युवा नेतृत्व में भरोसा जताया, भाजपा सहित एनडीए को ऐतिहासिक जीत दिलवाते हुए 202 सीटों तक पहुंचाया, और पहले उपमुख्यमंत्री के साथ गृहमंत्री और फिर मुख्यमंत्री तक बनवाया। यह सबकुछ अनायास संभव नहीं हुआ बल्कि भाजपा की सोची समझी सधी हुई राष्ट्रवादी ओबीसी सियासी रणनीति के तहत हुआ, जिसके मुख्य रणनीतिकार केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह खुद थे।
यह कौन नहीं जानता कि बिहार में पूर्व मुख्यमंत्री व जदयू नेता नीतीश कुमार के बाद राजद-जदयू-भाजपा की त्रिविध सियासी का अनुभव रखने वाले दमदार राजनेता सम्राट चौधरी ही हैं, जिन्होंने न केवल नीतीश कुमार का राजनीतिक विश्वास पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी से भी ज्यादा हासिल किया, बल्कि भाजपा और जदयू की सियासत के लिए अकेले बड़ी चुनौती समझे जाने वाले राजद नेता पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद, और उनके पूर्व उपमुख्यमंत्री पुत्र तेजस्वी यादव को राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक बनाने में बढ़चढ़ कर भूमिका निभाई, जिसका पुरस्कार उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में मिला।
बिहार के लोगों को पता है कि पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी सवर्ण विरोधी भगवा नेता थे और पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के भाजपाई एजेंट समझे जाते थे। वह दस साल से ज्यादा उपमुख्यमंत्री रहे, लेकिन भाजपा को वह राजनीतिक सफलता नहीं दिलवा पाए, जो सवर्ण प्रेमी भगवा नेता सम्राट चौधरी ने हंसते खेलते भाजपा को दिलवा दी और पहली बार मुख्यमंत्री पद भी अपने नेतृत्व में दिलवा दिया, जो भाजपा के लिए गर्व का विषय होना चाहिए।
यह कौन नहीं जानता कि स्व. सुशील मोदी के वर्चस्व काल में भाजपा के सवर्ण नेताओं को संगठन से सदन तक करीने से निपटवाया जाता था, जिससे सदन व संगठन में सवर्ण प्रतिनिधित्व घटता चला गया। हालांकि जब सम्राट चौधरी का राजनीतिक वर्चस्व बढ़ा तो संगठन से सदन तक सवर्णों का प्रतिनिधित्व बढ़ा, जो भाजपा की संतुलित राष्ट्रवादी सियासत के लिए गर्व का विषय है। शायद इसलिए वह तेजस्वी यादव और प्रशांत किशोर के निशाने पर हैं, लेकिन इससे उनका कुछ बिगड़ने वाला नहीं है।
जाने-अनजाने में प्रशांत किशोर और लालू प्रसाद के राजनीतिक कुनबों द्वारा तारापुर, मुंगेर के यशस्वी विधायक सम्राट चौधरी को अपराधी करार देकर तारापुर वासियों का जो अपमान किया जा रहा है, यह राजनेताओं के लिए शर्म की बात है। यह कौन नहीं जानता कि तेजस्वी यादव या प्रशांत किशोर को सदन तक पहुंचवाने में किनका हाथ है और उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि क्या है, किसी से छिपी हुई बात नहीं है। 

राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप तो चलते रहते हैं, लेकिन मुख्यमंत्री पद पर आसीन व्यक्ति यानी सम्राट चौधरी को अपराधी मुख्यमंत्री कहना भारतीय संविधान और न्यायपालिका को मुंह चिढ़ाने जैसा है, क्योंकि उनके विरुद्ध कोई अपराध न्यायालय में न तो साबित हुआ है और न ही होने की संभावना है। इसलिए सवाल है कि मुख्यमंत्री को निशाने पर लेकर क्या प्रशांत किशोर खुद मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं। यदि ऐसा है तो धैर्य पूर्वक शालीन सियासत करें और यह याद रखें कि जिस दिन उनके जैसे ब्राह्मण नेता के मुख्यमंत्री बनने की स्थिति बनेगी, उसी दिन बिहार के सारे दलित-ओबीसी-अल्पसंख्यक नेता उनके विरोधी बन जाएंगे, जैसी की परिस्थिति पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री डॉ जगन्नाथ मिश्रा ने झेली थी।

इसलिए सवाल है कि आखिर जनसुराज और राजद के निशाने पर सम्राट चौधरी ही क्यों हो हैं? शायद इसलिए कि उनके रहते अब भाजपा को पछाड़ना किसी नेता के बूते की बात नहीं है! बांकीपुर में भी सम्राट चौधरी नहीं, बल्कि कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा हारे हैं, जो कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के करीबियों में शुमार किये जाते हैं। अब आप समझ सकते हैं कि यदि विजय कुमार सिन्हा एक्सीडेंटल पैराशूट मुख्यमंत्री बना भी दिए गए होते तो भाजपा का भविष्य क्या होता?

जहाँ तक मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की बात है तो यदि कोई नेता सत्ता में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा हो, तो विपक्ष का स्वाभाविक लक्ष्य वही बनता है। इसके संभावित कारणों में निम्नलिखित वजहें शामिल हो सकते हैं: पहला, वे बिहार में भाजपा और एनडीए के प्रमुख चेहरों में से एक हैं। दूसरा, 
सरकार की नीतियों और प्रदर्शन का बचाव करने की जिम्मेदारी उनके ऊपर रहती है। तीसरा, चुनावी और सामाजिक समीकरणों में उनकी सक्रिय भूमिका उन्हें विपक्ष के लिए प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बनाती है। यही वजह है कि किसी उपचुनाव या बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के बाद विपक्ष सत्तापक्ष के प्रमुख नेताओं पर अधिक आक्रामक रुख अपनाता है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को इसलिए विपक्ष का कोपभाजन बनना पड़ता है।

अब सवाल है कि सार्वजनिक रूप से क्या उन्हें "अपराधी" कहना उचित है? क्या केवल राजनीतिक आरोपों या भाषणों के आधार पर किसी व्यक्ति खासकर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को "अपराधी" कहना उचित नहीं है। कानूनी मामलों के जानकार बताते हैं कि किसी भी व्यक्ति को अपराधी तभी कहा जा सकता है जब सक्षम न्यायालय ने किसी आपराधिक मामले में उसे दोषी ठहराया हो। हालांकि, लोकतांत्रिक राजनीति में आरोप और प्रत्यारोप आम हैं, लेकिन वे न्यायिक निर्णय का विकल्प नहीं हैं।

इसलिए: यदि किसी नेता पर आरोप लगाए गए हैं, तो उन्हें आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए। बिना न्यायालय के दोषसिद्धि के किसी को अपराधी घोषित करना तथ्यात्मक और कानूनी दृष्टि से उचित नहीं है। चूंकि राजनीतिक आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन वह प्रमाण और विधिक प्रक्रिया के दायरे में होनी चाहिए। इस प्रकार, यह कहना कि जनसुराज या राजद सम्राट चौधरी को राजनीतिक रूप से निशाना बना रहे हैं, एक राजनीतिक विश्लेषण हो सकता है; लेकिन उन्हें बिना न्यायिक दोषसिद्धि के "अपराधी" कहना उचित नहीं माना जाएगा।

सवाल है कि ऐसे आरोपों से मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के वयोवृद्ध पिता शकुनि चौधरी, पूर्व मंत्री, बिहार, उनकी धर्मपत्नी और समझदार बच्चों पर क्या गुजरती होगी, समझा जा सकता है। यही स्थिति तारापुर वासियों की है।
यदि यह कहा जाए कि "सम्राट चौधरी भाजपा की कमजोरी नहीं, बल्कि उन विभिन्न मजबूत स्तंभों में से अग्रगण्य हैं जिन्होंने एनडीए को मैनेज करके समाजवादी बिहार में "'राष्ट्रवादी कमल शासन' स्थापित किया है", तो यह एक राजनीतिक मत (opinion) है, जो भाजपाइयों और एनडीए के साथियों को बेहद प्रिय है।

ऐसा इसलिए कि बिहार में एनडीए के घटक दलों के बीच समन्वय बनाए रखने में सम्राट चौधरी की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है। संगठन और सरकार के बीच तालमेल बनाने की जिम्मेदारी उन्होंने बखूबी निभाई है और आगे भी निभाएंगे। उन्होंने विभिन्न सामाजिक वर्गों तक भाजपा की पहुंच बढ़ाने का प्रयास किया है जो जारी है।
चुनावी रणनीति और गठबंधन प्रबंधन में उनकी सक्रिय भूमिका की चर्चा होती रही है।

यह ठीक है कि एनडीए की सफलता केवल एक नेता की वजह से नहीं मानी जा सकती; बल्कि इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, भाजपा का संगठन, सहयोगी दलों का समर्थन, कार्यकर्ताओं की मेहनत और स्थानीय नेतृत्व के साथ ही सभी की भूमिका गणनीय होती है।लिहाजा किसी भी चुनावी जीत या हार का श्रेय या जिम्मेदारी केवल एक व्यक्ति को देना राजनीतिक विश्लेषण को अत्यधिक सरल बना देता है।

निष्कर्षत: यह कहना अधिक संतुलित होगा कि सम्राट चौधरी बिहार भाजपा और एनडीए के प्रमुख नेताओं में से एक हैं और गठबंधन प्रबंधन में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। वो भाजपा, एनडीए व ओबीसी राजनीति के "इकलौता मजबूत स्तंभ" हैं जो सवर्णों में भी अच्छे खासे लोकप्रिय और विश्वसनीय हैं। यह एक राजनीतिक मूल्यांकन है, जिस पर अलग-अलग दलों, विश्लेषकों और मतदाताओं की राय भिन्न हो सकती है, लेकिन हमने जो महसूस किया, पाठकों को सच्चाई परोस दी। बुरा मानो या भला, आपके चिंतन पर निर्भर करता है।

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