The social and political implications of the questions constantly raised regarding the RSS's registration and funding. (आरएसएस के रजिस्ट्रेशन और फंडिंग के बारे हमेशा सवाल उठने के सामाजिक व राजनीतिक मायने)
आरएसएस के रजिस्ट्रेशन और फंडिंग के बारे हमेशा सवाल उठने के सामाजिक व राजनीतिक मायने
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
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जो लोग अमूमन देश भक्त संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (Rashtriya Swayamsevak Sangh) के रजिस्ट्रेशन, फंडिंग और वित्तीय पारदर्शिता को लेकर समय-समय पर सवाल उठाते हैं, वही लोग आरएसएस (RSS) जैसी अन्य वैचारिक संस्थाएं जैसे, Jamaat-e-Islami Hind जैसी धार्मिक-सामाजिक संस्था, Vishwa Hindu Parishad जैसे सांस्कृतिक संगठन, विभिन्न चर्च, गुरुद्वारा और मंदिर ट्रस्ट, वक्फ संस्थाएं के अलावा लाखों एनजीओ, सोसाइटियां और धर्मार्थ ट्रस्ट जैसी संस्थाओं के बारे में
रणनीतिक चुप्पी साध लेते हैं, आखिर ऐसा क्यों? क्या इसके पीछे कोई सामाजिक, राजनीतिक वजह है या साम्प्रदायिक कारण है?
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जानकार बताते हैं कि ऐसे सिर्फ आरएसएस के बारे में
उठने वाले सियासी मौसमी सवालों के केवल कानूनी ही नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक और राजनीतिक मायने भी हैं। कई बार तो इन्हें सांप्रदायिक रूप देने की भी कुत्सित कोशिश की जाती है। तो आइए, सबसे पहले समझते हैं इसके सामाजिक मायने, जो निम्नलिखित हैं-
पहला, पारदर्शिता बनाम विश्वास की बहस: एक पक्ष का तर्क है कि करोड़ों लोगों तक प्रभाव रखने वाले किसी भी बड़े संगठन को अपनी आय, व्यय और प्रशासनिक ढांचे की जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए। जबकि दूसरा पक्ष मानता है कि आरएसएस एक स्वैच्छिक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है, जिसकी गतिविधियाँ सार्वजनिक हैं, इसलिए उस पर अत्यधिक निगरानी की मांग अनुचित है।
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दूसरा, नागरिक समाज की जवाबदेही का प्रश्न: यह बहस केवल आरएसएस तक सीमित नहीं रहती, बल्कि धार्मिक ट्रस्टों, चर्च संगठनों, वक्फ संस्थाओं, एनजीओ और अन्य सामाजिक संगठनों की जवाबदेही तक पहुँच जाती है।
इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या सभी प्रभावशाली संस्थाओं के लिए एक समान पारदर्शिता मानदंड होने चाहिए।
तीसरा, सामाजिक ध्रुवीकरण: आरएसएस समर्थक इसे संगठन की छवि पर हमला मानते हैं। जबकि आलोचक इसे लोकतांत्रिक जवाबदेही का स्वाभाविक हिस्सा बताते हैं। परिणामस्वरूप यह मुद्दा अक्सर वैचारिक और सामाजिक ध्रुवीकरण को बढ़ा देता है।
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जहां तक इसके राजनीतिक मायने की बात है तो वह इस प्रकार है:-
पहला, वैचारिक संघर्ष का प्रतीक: आरएसएस भारतीय राजनीति में केवल एक सामाजिक संगठन नहीं, बल्कि एक प्रभावशाली वैचारिक धारा का प्रतिनिधि माना जाता है।
इसलिए उसके वित्त और संरचना पर सवाल अक्सर व्यापक वैचारिक संघर्ष का हिस्सा बन जाते हैं।
दूसरा, भाजपा-आरएसएस संबंधों पर बहस: चूँकि Bharatiya Janata Party और आरएसएस के ऐतिहासिक संबंध रहे हैं, इसलिए विपक्षी दल अक्सर आरएसएस की पारदर्शिता के प्रश्न को राजनीतिक जवाबदेही से जोड़ते हैं। वहीं भाजपा समर्थक इसे राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से प्रेरित अभियान बताते हैं।
तीसरा, चुनावी विमर्श का हिस्सा: ऐसे मुद्दे चुनावी मौसम में अधिक उभरते हैं क्योंकि वे समर्थक और विरोधी दोनों वर्गों को सक्रिय करते हैं। इससे राजनीतिक दल अपने-अपने वैचारिक आधार को मजबूत करने का प्रयास करते हैं।
वहीं, व्यापक लोकतांत्रिक प्रश्न यह है कि इस पूरे विवाद का मूल जड़ यह है कि "क्या बड़े सामाजिक, धार्मिक, वैचारिक और राजनीतिक प्रभाव वाले सभी संगठनों के लिए समान स्तर की वित्तीय और प्रशासनिक पारदर्शिता अनिवार्य होनी चाहिए?" यदि उत्तर "हाँ" है, तो यह सिद्धांत केवल आरएसएस ही नहीं बल्कि अन्य धार्मिक ट्रस्टों, वक्फ बोर्डों, चर्च संस्थाओं, आश्रमों, एनजीओ और अन्य बड़े सामाजिक संगठनों पर भी समान रूप से लागू होना चाहिए।
बहरहाल, निष्कर्ष स्वरूप यही कहा जा सकता है कि आरएसएस की फंडिंग और रजिस्ट्रेशन पर उठने वाले सवालों का महत्व केवल संगठन विशेष तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत में पारदर्शिता, जवाबदेही, नागरिक समाज की भूमिका, वैचारिक प्रतिस्पर्धा और लोकतांत्रिक संस्थाओं के मानकों पर चल रही व्यापक बहस का हिस्सा है। इसलिए इस विषय को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बजाय संस्थागत जवाबदेही और समान नियमों के दृष्टिकोण से भी देखा जाता है तो राष्ट्रीय सेहत के लिए श्रेयस्कर रहेगा। वही कुछ लोग इसी मुद्दे को हवा देकर अपनी तथाकथित सेक्यूलर राजनीति चमकाना चाहते हैं, जिसे अब जनता भी बखुबी समझती है।
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