So, will the dream of "Islamic imperialism" be shattered after the Iran-US agreement? And what will happen to Israel then? (तो क्या ईरान-अमेरिका समझौते के बाद 'इस्लामिक साम्राज्यवाद' का सपना खटाई में पड़ जाएगा? और फिर इजरायल का क्या होगा?)

तो क्या ईरान-अमेरिका समझौते के बाद 'इस्लामिक साम्राज्यवाद' का सपना खटाई में पड़ जाएगा? और फिर इजरायल का क्या होगा?
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

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दुनियादारी का ज्ञान रखने वाले लोग अब यह जानना समझना चाह रहे हैं कि बहुप्रतीक्षित अमेरिका-ईरान समझौते के बाद अब 'इस्लामिक साम्राज्यवाद' के सपने का क्या होगा? क्या वह खटाई में पड़ जाएगा और 'अब्राहम परिवार' की अंतरराष्ट्रीय एकता मजबूत होगी? और यदि ऐसा हुआ तो फिर इजरायल की उन आक्रामक नीतियों का क्या होगा? जो कि उसकी हिफाजत के लिए बेहद जरूरी समझी जाती हैं।
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ऐसे में यह निष्कर्ष निकालना कि किसी संभावित अमेरिका–ईरान समझौते के बाद "इस्लामिक साम्राज्यवाद" का सपना समाप्त हो जाएगा, वैश्विक कूटनीति और धार्मिक/आध्यात्मिक महत्वाकांक्षा का काफी सरलीकरण होगा। क्योंकि इस्लामी दुनिया स्वयं एकरूप नहीं है; उसमें सुन्नी–शिया, अरब–गैर अरब, राजशाही–गणतंत्र और राष्ट्रवादी हितों के अनेक विभाजन हैं, जिन्हें पाटे बिना इस्लामिक साम्राज्यवाद का सपना कभी भी पूरा नहीं किया जा सकता है।

इस दृष्टिकोण से निम्नलिखित कुछ प्रमुख बिंदु पर चर्चा आवश्यक है ताकि पाठकों की स्वस्थ समझदारी विकसित हो सके।
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पहला, ईरान का प्रभाव कम हो सकता है, लेकिन समाप्त नहीं: यदि अमेरिका और Iran के बीच स्थायी समझौता होता है, तो ईरान पर आर्थिक प्रतिबंधों में राहत मिल सकती है और उसे क्षेत्रीय टकराव की बजाय आर्थिक विकास पर अधिक ध्यान देना पड़ सकता है। इससे उसके कुछ प्रॉक्सी नेटवर्कों की सक्रियता घट सकती है, लेकिन ईरान की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएँ पूरी तरह खत्म होंगी, यह मानना जल्दबाजी होगी।

दूसरा, "इस्लामिक एकता" की राजनीति की सीमाएँ: वास्तव में मुस्लिम देशों के बीच ही अनेक प्रतिस्पर्धाएँ हैं:- एक, Saudi Arabia बनाम Iran; दो, Turkey की अलग क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएँ; तीन, अरब देशों और गैर-अरब मुस्लिम देशों के अलग हित। इसलिए किसी एक "इस्लामिक साम्राज्य" की अवधारणा व्यावहारिक राजनीति में पहले से ही कमजोर रही है।

तीसरा, क्या अब्राहम परिवार की एकता मजबूत होगी?:
जिसे अक्सर Abraham Accords के संदर्भ में देखा जाता है, उसे कुछ मजबूती मिल सकती है यदि: ईरान और पश्चिम के बीच तनाव घटे, क्षेत्रीय युद्धों का खतरा कम हो,
आर्थिक सहयोग बढ़े। लेकिन दूसरी ओर, Israel–फिलिस्तीन विवाद अभी भी सबसे बड़ी बाधा है। जब तक यह मुद्दा पूरी तरह नहीं सुलझता, तब तक यहूदी, ईसाई और मुस्लिम समुदायों के बीच व्यापक राजनीतिक एकता की बात सीमित ही रहेगी।

चौथा, वैश्विक प्रभाव: यदि अमेरिका–ईरान संबंध सामान्य होते हैं तो पश्चिम एशिया में स्थिरता बढ़ सकती है, तेल बाजार अपेक्षाकृत शांत हो सकते हैं, भारत जैसे देशों को ऊर्जा और व्यापार में लाभ मिल सकता है, चीन और रूस को अपनी पश्चिम एशिया नीति में नए समीकरण बनाने पड़ सकते हैं।
# यक्ष प्रश्न: आखिर इस समझौते के बाद इजरायल का क्या होगा?

यदि अमेरिका और Iran के बीच कोई व्यापक और टिकाऊ समझौता होता है, तो उसका प्रभाव Israel पर सकारात्मक और नकारात्मक—दोनों रूपों में पड़ सकता है। इस दृष्टि से
इजरायल की कतिपय संभावित चिंताएँ स्वाभाविक हैं जो निम्नलिखित हैं:-

पहला, ईरान को आर्थिक राहत मिलने की आशंका: यदि प्रतिबंधों में ढील मिलती है, तो इजरायल के कुछ रणनीतिक विशेषज्ञों को आशंका हो सकती है कि ईरान की आर्थिक और सैन्य क्षमता बढ़ेगी। इजरायल लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसके क्षेत्रीय प्रभाव को अपनी प्रमुख सुरक्षा चुनौती मानता रहा है।

दूसरा, अमेरिका की प्राथमिकताओं में बदलाव: यदि वाशिंगटन और तेहरान के संबंध बेहतर होते हैं, तो इजरायल को लग सकता है कि अमेरिका अब क्षेत्रीय तनाव कम करने को प्राथमिकता देगा और उसकी कुछ सुरक्षा चिंताओं को पहले जैसी प्राथमिकता नहीं मिलेगी।

# इजरायल के लिए संभावित लाभ

जहां तक इजरायल के लिए संभावित लाभ की बात है तो यह निम्नलिखित है- 

पहला, युद्ध का खतरा घट सकता है यदि समझौते से ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर प्रभावी निगरानी स्थापित होती है और क्षेत्रीय तनाव कम होता है, तो इजरायल पर प्रत्यक्ष सैन्य खतरा भी घट सकता है।

दूसरा, अरब देशों से रिश्ते मजबूत हो सकते हैं: क्षेत्र में स्थिरता आने पर इजरायल और कई अरब देशों के बीच आर्थिक, तकनीकी और सुरक्षा सहयोग बढ़ सकता है। इससे Abraham Accords जैसी पहल को नया आधार मिल सकता है।

# सबसे बड़ा प्रश्न: फिलिस्तीन

इजरायल के लिए अब भी सबसे बड़ा प्रश्न फिलिस्तीन बना हुआ है। लिहाजा, इजरायल का भविष्य केवल ईरान-अमेरिका समझौते से तय नहीं होगा। बल्कि उससे भी बड़ा मुद्दा Palestinian Territories और फिलिस्तीनी प्रश्न है।
यदि इजरायल-फिलिस्तीन तनाव जारी रहता है, तो अरब देशों के साथ संबंधों के विस्तार की एक सीमा बनी रहेगी।
यदि किसी राजनीतिक समाधान की दिशा बनती है, तो इजरायल की क्षेत्रीय स्वीकार्यता काफी बढ़ सकती है।

इसलिए दीर्घकालिक तस्वीर यह उभरकर सामने आती है कि, संभव है ऐसे समझौते के बाद इजरायल की रणनीति "सैन्य रोकथाम" (deterrence) से अधिक "कूटनीतिक और आर्थिक एकीकरण" की ओर बढ़े। लेकिन यह इस बात पर निर्भर करेगा कि समझौता कितना मजबूत है, ईरान उसकी शर्तों का कितना पालन करता है, और अमेरिका की मध्य-पूर्व नीति किस दिशा में जाती है।

लिहाजा, यह कहना अधिक उचित होगा कि अमेरिका–ईरान समझौते से इजरायल कमजोर या मजबूत—किसी एक दिशा में स्वतः नहीं जाएगा। उसका प्रभाव समझौते की शर्तों, ईरान के व्यवहार, और इजरायल-फिलिस्तीन संबंधों पर निर्भर करेगा।

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि अमेरिका–ईरान समझौता होने पर ईरान की टकराववादी रणनीति में कमी आ सकती है और क्षेत्रीय तनाव घट सकते हैं, लेकिन इससे न तो समूची "इस्लामिक राजनीति" समाप्त होगी और न ही स्वतः कोई व्यापक "अब्राहमिक एकता" स्थापित हो जाएगी। वास्तविकता यह है कि धर्म से अधिक राष्ट्रों के रणनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा हित अंतरराष्ट्रीय राजनीति को संचालित करते हैं।


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