पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर में बर्बर सैन्य-पुलिस हिंसा के अंतरराष्ट्रीय निहितार्थ
पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर में बर्बर सैन्य-पुलिस हिंसा के अंतरराष्ट्रीय निहितार्थ
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
पीओजेके में समय-समय पर सामने आने वाली हिंसा, दमन, विरोध-प्रदर्शन और मानवाधिकार संबंधी आरोप केवल स्थानीय घटनाएं नहीं हैं, बल्कि इनके कई अंतरराष्ट्रीय आयाम भी हैं। चूंकि पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (PoJK) में हाल के दिनों में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई हिंसक झड़पों ने भारत सहित अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित किया है। इसलिए सबने कड़ी प्रतिक्रिया दी है, क्योंकि विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार कई लोगों की मौत हुई, तथा बड़ी संख्या में लोग घायल हुए तथा गिरफ्तारियां और इंटरनेट प्रतिबंध जैसी कार्रवाइयाँ भी की गईं। लिहाजा यह स्थिति अंतरराष्ट्रीय चिंता का भी सबब बन चुकी है।
जहां तक भारत की सधी हुई कड़ी प्रतिक्रिया की बात है तो भारत सरकार ने इस घटना पर सधी हुई कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कथित पुलिस बर्बरता और प्रदर्शनकारियों की मौतों पर चिंता जताते हुए कहा कि पाकिस्तान पीओके में अपने प्रशासनिक और राजनीतिक विफलताओं को छिपाने के लिए दमन का रास्ता अपना रहा है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी इस स्थिति पर ध्यान देने और मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए पाकिस्तान को जवाबदेह ठहराने की मांग की है।
जहां तक अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया की बात है तो एमनेस्टी इंटरनेशनल (Amnesty International) ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई, गिरफ्तारियों और इंटरनेट बंदी पर चिंता व्यक्त की तथा शांतिपूर्ण संवाद की आवश्यकता पर बल दिया। वहीं, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और कुछ कश्मीरी अधिकार कार्यकर्ताओं ने भी पीओके में मानवाधिकारों की स्थिति पर सवाल उठाए हैं और निष्पक्ष जांच की मांग की है। जबकि
प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने घटनाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आर्थिक असंतोष और नागरिक अधिकारों से जुड़े व्यापक संकट के रूप में प्रस्तुत किया है।
लिहाजा, पीओजेके में होने वाली बर्बर हिंसा के मायने केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसके प्रभाव मानवाधिकार, भारत-पाकिस्तान संबंध, चीन की रणनीतिक परियोजनाओं, क्षेत्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति तक फैलते हैं। इसलिए ऐसी घटनाओं को केवल स्थानीय नहीं, बल्कि व्यापक भू-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में भी देखा जाता है। आइए इसे विस्तार से इसके अंतरराष्ट्रीय मायने समझते हैं:-
पहला, मानवाधिकारों का गम्भीर वैश्विक मुद्दा: यदि किसी क्षेत्र में नागरिकों पर अत्यधिक बल प्रयोग, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध या राजनीतिक दमन के आरोप लगते हैं, तो यह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और वैश्विक मंचों का विषय बन जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ तथा एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थान ऐसे मामलों पर नजर रखते हैं।
दूसरा, पाकिस्तान की बर्बर अंतरराष्ट्रीय छवि पर प्रभाव:
पीओजेके में अस्थिरता या हिंसा की खबरें अमेरिकी-चीनी पिल्ले पाकिस्तान के उस दावे को चुनौती दे सकती हैं कि वहां के लोग संतुष्ट और लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत रह रहे हैं। इससे उसकी कूटनीतिक स्थिति प्रभावित हो सकती है।
तीसरा, भारत-पाकिस्तान के द्विपक्षीय संबंधों पर असर:
इंडिया और पाकिस्तान के बीच कश्मीर पहले से ही एक संवेदनशील मुद्दा है। पीओजेके में हिंसा की घटनाएं दोनों देशों के राजनीतिक विमर्श और कूटनीतिक आरोप-प्रत्यारोप को और तेज कर सकती हैं।
चौथा, चीन की रणनीतिक चिंताएं: पीओजेके से होकर सीपीईसी (China-Pakistan Economic Corridor) का महत्वपूर्ण हिस्सा गुजरता है। लिहाजा क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ने पर चीन की आर्थिक और सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी बढ़ सकती हैं।
पांचवां, दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय सुरक्षा: किसी भी संवेदनशील सीमा क्षेत्र में लंबे समय तक अस्थिरता बनी रहने से क्षेत्रीय सुरक्षा, आतंकवाद-निरोधक प्रयासों और सीमापार तनावों पर प्रभाव पड़ सकता है। इस कारण प्रमुख शक्तियां स्थिति पर नजर बनाए रखती हैं।
छठा, कश्मीर विमर्श का नया आयाम: पीओजेके में विरोध-प्रदर्शन या हिंसा की घटनाएं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह बहस भी जन्म देती हैं कि कश्मीर के विभिन्न हिस्सों में लोगों की वास्तविक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आकांक्षाएं क्या हैं। इससे कश्मीर संबंधी वैश्विक विमर्श अधिक जटिल हो जाता है।
# इसके राजनीतिक और कूटनीतिक मायने निम्नलिखित हैं:
1. पाकिस्तान की आंतरिक चुनौतियाँ उजागर हुई हैं — स्थानीय जनता के बीच शासन, आर्थिक स्थिति और राजनीतिक अधिकारों को लेकर असंतोष सामने आया है।
2. भारत को कूटनीतिक अवसर मिला है — नई दिल्ली पीओके में मानवाधिकार और लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रश्न को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अधिक मजबूती से उठा सकती है।
3. कश्मीर विमर्श में नया आयाम — लंबे समय से भारत जिस मुद्दे को उठाता रहा है कि पीओके के लोगों को पर्याप्त राजनीतिक अधिकार नहीं मिले हैं, उसे इस घटनाक्रम से नया बल मिला है।
4. अंतरराष्ट्रीय दबाव की संभावना — यदि हिंसा और दमन के आरोप बढ़ते हैं तो पाकिस्तान पर मानवाधिकारों के पालन को लेकर बाहरी दबाव बढ़ सकता है।
कुल मिलाकर, पीओके की यह हिंसा केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह गई है, बल्कि मानवाधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और भारत-पाकिस्तान संबंधों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनती जा रही है।
अंततोगत्वा यह कहा जा सकता है कि इसके व्यापक राजनीतिक मायने ये हैं कि यदि पीओके में नागरिक असंतोष और दमन के आरोप बढ़ते हैं, तो Pakistan की लोकतांत्रिक छवि, मानवाधिकार रिकॉर्ड और कश्मीर पर उसकी अंतरराष्ट्रीय दलीलों को चुनौती मिल सकती है। इसी कारण मुनीर की भूमिका पर बहस केवल सुरक्षा नीति तक सीमित नहीं है, बल्कि मानवाधिकार और राजनीतिक वैधता के प्रश्नों से भी जुड़ गई है।
# आखिर मुनीर की तुलना डायर से क्यों की जा रही है?
जनरल (अब फील्ड मार्शल) Asim Munir को "जनरल डायर" कहे जाने का संदर्भ हाल में पीओके में हुए प्रदर्शनों पर सुरक्षा बलों की कार्रवाई से जुड़ा है। यह तुलना कोई आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय निष्कर्ष नहीं है, बल्कि कुछ भारतीय राजनीतिक और सुरक्षा विश्लेषकों द्वारा की गई आलोचनात्मक टिप्पणी है।
जनरल डायर कौन थे?: Reginald Dyer ब्रिटिश भारतीय सेना के अधिकारी थे, जिन्होंने 1919 के Jallianwala Bagh Massacre में निहत्थी भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दिया था। यह घटना औपनिवेशिक दमन का प्रतीक मानी जाती है।
मुनीर की तुलना डायर से क्यों की जा रही है?: आलोचकों का आरोप है कि पीओके में आर्थिक और नागरिक अधिकारों की मांग कर रहे प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध अत्यधिक बल प्रयोग किया गया, जिसमें कई लोगों की मौत और बड़ी संख्या में घायल होने की खबरें आईं। इसी आधार पर पूर्व जम्मू-कश्मीर डीजीपी एस.पी. वैद ने कहा कि "पीओके आज जलियांवाला बाग जैसा दिख रहा है और आसिम मुनीर जनरल डायर की तरह व्यवहार कर रहे हैं।"
उनके तर्क मुख्यतः तीन बिंदुओं पर आधारित हैं: निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग के आरोप। विरोधी संगठनों पर प्रतिबंध और गिरफ्तारियां। असंतोष को राजनीतिक संवाद के बजाय सुरक्षा समस्या के रूप में देखना।
सवाल है कि क्या यह सर्वमान्य दृष्टिकोण है?: नहीं। यह एक राजनीतिक और नैतिक तुलना है, कोई न्यायिक या आधिकारिक निष्कर्ष नहीं। पाकिस्तान सरकार और सेना आमतौर पर ऐसे अभियानों को कानून-व्यवस्था बनाए रखने और हिंसा रोकने की कार्रवाई बताती हैं, जबकि आलोचक इन्हें दमनकारी कदम मानते हैं।
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