How will India become a world power while battling the tactics of the US and China? (आखिर अमेरिका व चीन की चालों से जूझते हुए विश्व शक्ति कैसे बनेगा भारत? समझिए)
आखिर अमेरिका व चीन की चालों से जूझते हुए विश्व शक्ति कैसे बनेगा भारत? समझिए (How will India become a world power while battling the tactics of the US and China?)
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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
भारत को अमेरिका और चीन के मुकाबले यदि विश्व महाशक्ति बनना है तो उसे सार्क देशों, आशियान देशों और अरब-खाड़ी देशों यानी भारतीय उपमहाद्वीपीय देशों, दक्षिण-पूर्वी एशिया के आशियान देशों, अरब-खाड़ी के इस्लामिक देशों से मजबूत रणनीतिक, आर्थिक और सामरिक/सैन्य गठबंधन की संभावनाओं को तलाशने पड़ेंगे। वहीं मध्य एशियाई देशों और पूर्वी एशियाई देशों से भी मजबूत प्रतिरक्षात्मक व रणनीतिक सम्बन्ध विकसित करने होंगे।
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ऐसा इसलिए कि हर पीड़ित देश अमेरिका/चीन की क्षुद्र वैश्विक चालों से परेशान है और सोवियत संघ के विघटन के विघटन के बाद उन्हें रूस पर्याप्त संरक्षण नहीं दे पा रहा है। ऐसे में भारत यदि चीन को छोड़कर शेष ब्रिक्स देशों, अफ्रीकी देशों, दक्षिण अमेरिकी देशों, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा को साधकर अपनी स्थिति काफी मजबूत बना सकता है। बस भारत को अमेरिकी-चीनी महत्वाकांक्षाओं से परे जाकर मानवतावादी और अन्य प्राणियों के लिए हित कर बातें सोचनी हैं। यही हमारी सांस्कृतिक विरासत भी है।
वैश्विक कूटनीतिक विशेषज्ञ भी बताते हैं कि यदि भारत को आने वाले दशकों में अमेरिका और चीन जैसी वैश्विक महाशक्ति के रूप में उभरना है, तो केवल अपनी आर्थिक वृद्धि और सैन्य शक्ति बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उसे अपने पड़ोसी क्षेत्र और विस्तारित पड़ोस में भी प्रभावशाली, भरोसेमंद और दीर्घकालिक साझेदारियों का नेटवर्क भी बनाना होगा। इस दृष्टि से दक्षिण एशिया (SAARC), दक्षिण-पूर्व एशिया (ASEAN) और अरब-खाड़ी क्षेत्र भारत की रणनीति के प्रमुख स्तंभ बन सकते हैं। इसके लिए भारत को निम्नलिखित दृष्टिकोण से सधी चालें चलनी पड़ेंगी:-
पहला, सार्क देशों के साथ गहरे गठबंधन की आवश्यकता:
South Asian Association for Regional Cooperation (SAARC) के सदस्य देशों में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मालदीव और अफगानिस्तान शामिल हैं। यहां की संभावनाओं को यदि देखा जाए तो यह क्षेत्र 2 अरब से अधिक आबादी वाला विशाल बाजार है, जो क्षेत्रीय व्यापार और आपूर्ति श्रृंखलाओं का भी निर्माण करने में सहायक साबित होगा। साथ ही, ऊर्जा, जल, परिवहन और डिजिटल कनेक्टिविटी में सहयोग बढ़ाने के साथ साथ यहां पर परोक्ष अमेरिकी सहयोग से चीन के बढ़ते प्रभाव का संतुलन भी स्थापित हो सकेगा। हालांकि, इस राह में चुनौतियां बहुत आएंगी। खासकर भारत-पाकिस्तान तनाव, छोटे देशों में चीन की बढ़ती आर्थिक उपस्थिति, राजनीतिक अस्थिरता और सीमा विवाद को हल करने के लिए रामचरितमानस की सुप्रसिद्ध उक्ति "बिनु भय होहिं न प्रीति" को अपनी विदेश नीति का मुख्य हथियार बनाना पड़ेगा। शायद अमेरिका/चीन भी यही करते आए हैं। ऐसे में सीधा सवाल है कि भारत को क्या करना चाहिए? तो सरल जवाब होगा कि पहले BIMSTEC जैसे वैकल्पिक मंचों को और मजबूत करना चाहिए। फिर कभी हमारे ही अंग रहे पड़ोसी देशों में बुनियादी ढांचागत निवेश बढ़ाना चाहिए। साथ ही क्षेत्रीय मुक्त व्यापार व्यवस्था पर काम करना चाहिए। यहां से जुड़ी शिक्षा, स्वास्थ्य और डिजिटल सेवाओं में नेतृत्व करना चाहिए।
दूसरा, ASEAN देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी:
Association of Southeast Asian Nations (ASEAN) विश्व की सबसे गतिशील आर्थिक शक्तियों में से एक है। यहां से जुड़ा भारत के लिए लाभ यह है कि
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सामरिक संतुलन स्थापित होगा। चीन पर अत्यधिक निर्भरता कम करने वाली वैश्विक कंपनियों को आकर्षित करने का अवसर मिलेगा। समुद्री सुरक्षा और व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी। सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स और उच्च तकनीक सहयोग मिलेगा, क्योंकि इससे जुड़े प्रमुख साझेदार देशों में Vietnam, Indonesia, Singapore और Philippines आदि महत्वपूर्ण हैं। जहां तक इनसे जुड़े सामरिक लाभ की बात है तो भारत की "Act East Policy" और ASEAN की "Indo-Pacific Outlook" मिलकर चीन के प्रभाव को संतुलित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। इसलिए भारत को इस अवसर का सर्वोच्च लाभ उठाने के दृष्टिगत विदेश नीति में धार देनी चाहिए।
तीसरा, अरब-खाड़ी देशों के साथ व्यापक गठबंधन: अंतरराष्ट्रीय अनुभव बताता है कि खाड़ी क्षेत्र भारत की ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और प्रवासी भारतीयों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। लिहाजा यहां के प्रमुख साझेदार देशों यथा-
United Arab Emirates, Saudi Arabia, Qatar
Oman से प्रगाढ़ सम्बन्ध बनाने चाहिए। क्योंकि यहां से
भारत को मिलने वाले लाभ में ऊर्जा सुरक्षा, पेट्रो-डॉलर निवेश, रक्षा और समुद्री सुरक्षा सहयोग, खाद्य सुरक्षा एवं लॉजिस्टिक्स नेटवर्क आदि महत्वपूर्ण हैं। वहीं यहां से
उभरती संभावनाएं के दृष्टिगत भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC), संयुक्त रक्षा उत्पादन और
हरित ऊर्जा और हाइड्रोजन साझेदारी महत्वपूर्ण हैं। लेकिन हमें ईरान, तुर्किये, इराक जॉर्डन, कुवैत, यमन आदि पर भी सतत रणनीतिक नजर होगी और इनमें यह विश्वास पैदा करना होगा कि अमेरिका-यूरोप के मुकाबले भारत और भारतीय हिन्दू-मुसलमान उनके ज्यादा हितकर साबित होंगे।
चौथा, सैन्य और सामरिक दृष्टिकोण: भारत को केवल आर्थिक साझेदारी नहीं बल्कि सामरिक नेटवर्क भी विकसित करना होगा। इस हेतु आवश्यक कदम उठाने पड़ेंगे- जैसे, हिंद महासागर में नौसैनिक सहयोग बढ़ाना,
संयुक्त सैन्य अभ्यास, रक्षा निर्यात बढ़ाना, साइबर सुरक्षा और अंतरिक्ष सहयोग आदि। साथ ही भारत यदि दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और खाड़ी क्षेत्र के देशों के साथ विश्वास आधारित सुरक्षा ढांचा विकसित कर सके तो वह एक व्यापक क्षेत्रीय शक्ति केंद्र बन सकता है।
पांचवां, क्या यह अमेरिका और चीन के विकल्प के रूप में उभर सकता है?: जवाब है हां, बशर्ते कि इस पर पूरी तरह से फोकस किया जाए। ऐसा करके भारत पहले एक "तीसरा शक्ति केंद्र" (Third Pole) अवश्य बन सकता है। फिर रूसी सहयोग से उसे विश्व शक्ति बनते देर नहीं लगेगी। बस, इसके लिए भारत को 8-10% वार्षिक आर्थिक वृद्धि बनाए रखनी होगी। अपने विनिर्माण क्षेत्र को चीन के स्तर तक विकसित करना होगा। अपनी तकनीकी और रक्षा आत्मनिर्भरता बढ़ानी होगी। पड़ोसी देशों के साथ विश्वास का वातावरण बनाना होगा। वहीं, क्षेत्रीय नेतृत्व को प्रभुत्व नहीं बल्कि साझेदारी के रूप में प्रस्तुत करना होगा।
निष्कर्षस्वरूप यह कहा जा सकता है कि 21वीं सदी में भारत की महाशक्ति बनने की राह केवल दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और हैदराबाद से नहीं गुजरेगी। बल्कि यह काठमांडू, ढाका, कोलंबो, माले, हनोई, जकार्ता, अबू धाबी और रियाद से होकर भी जाएगी। ऐसे में यदि भारत SAARC, ASEAN और खाड़ी देशों के साथ मजबूत आर्थिक-सामरिक नेटवर्क बना लेता है, तो वह न केवल चीन के प्रभाव को संतुलित कर सकेगा, बल्कि वैश्विक राजनीति में एक स्वतंत्र और प्रभावशाली शक्ति केंद्र के रूप में भी उभर सकता है। इससे वसुधैव कुटुंबकम और सर्वे भवंतु सुखिनः जैसी पुरातन उदात्त सोच को भी नया बहुआयामी महत्व मिलेगा।
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