तीन भारतीयों की मौत के बाद 'अमेरिका-भारत' के रणनीतिक रिश्तों पर उठने लगे सवाल?

तीन भारतीयों की मौत के बाद 'अमेरिका-भारत' के रणनीतिक रिश्तों पर उठने लगे सवाल?
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

ओमान तट के पास अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में भारतीय नाविकों की मौत केवल एक मानवीय त्रासदी नहीं है, बल्कि इसके गहरे कूटनीतिक, सामरिक और आर्थिक निहितार्थ हैं। भारत ने इस घटना पर अमेरिका के समक्ष औपचारिक विरोध दर्ज कराया है और समुद्री जहाजों पर हमले रोकने की मांग की है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में तीन भारतीयों की मौत ने एक स्थानीय सैन्य कार्रवाई को वैश्विक कूटनीतिक मुद्दा बना दिया है। 
सच कहा जाए तो यह घटना बताती है कि पश्चिम एशिया का संघर्ष अब वैश्विक समुद्री व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और भारत-अमेरिका संबंधों को सीधे प्रभावित करने लगा है। यदि तनाव कम नहीं हुआ तो इसके असर तेल बाजारों से लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति तक महसूस किए जाएंगे। 
हालांकि अंतरराष्ट्रीय संबंध "मित्रता" से अधिक "राष्ट्रीय हितों" पर आधारित होते हैं। भारत और अमेरिका के बीच रक्षा, प्रौद्योगिकी, व्यापार और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में गहरा सहयोग है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि दोनों देशों के हित हर परिस्थिति में पूरी तरह समान हों। 

चूंकि इतिहास में भी कई मित्र देशों के बीच गंभीर मतभेद और दुखद घटनाएं हुई हैं। लिहाजा, इस घटना के बाद प्रमुख प्रश्न होंगे कि पहला, क्या हमला जानबूझकर किया गया था या पहचान की त्रुटि थी? दूसरा, क्या अमेरिकी पक्ष ने पर्याप्त सावधानी बरती थी? तीसरा, क्या स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होगी? चौथा, क्या मृत भारतीयों के परिवारों को न्याय और मुआवजा मिलेगा? और पांचवां, क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए नए सुरक्षा प्रोटोकॉल बनाए जाएंगे?
जहां तक इस घटना पर भारत, अमेरिका और अन्य अंतरराष्ट्रीय पक्षों की प्रतिक्रियाओं का सवाल है तो भारत सरकार ने इस घटना की कड़ी निंदा की और नई दिल्ली में अमेरिकी प्रभारी राजनयिक (Chargé d'Affaires) को तलब कर "सशक्त विरोध" (Strong Protest) दर्ज कराया गया। वहीं, ओमानी अधिकारी भी भारतीय दूतावास के साथ समन्वय में रहे और बाद की घटनाओं की निगरानी भी कर रहे हैं। सबने जहाजरानी पर बढ़ते खतरों की आलोचना की। अलबत्ता, शिपिंग समुदाय में भी चिंता बढ़ी है क्योंकि भारतीय नाविक विश्व समुद्री कार्यबल का बड़ा हिस्सा हैं। यही भारत-अमेरिका संबंधों की अगली परीक्षा मानी जा रही है।

वहीं, अमेरिका की आधिकारिक प्रतिक्रिया मुख्य रूप से उसकी सैन्य कमान, United States Central Command (CENTCOM), के माध्यम से आई है।
CENTCOM का कहना है कि जिस टैंकर पर कार्रवाई की गई, वह अमेरिकी नाकेबंदी का उल्लंघन करते हुए कथित रूप से ईरानी तेल ले जा रहा था। अमेरिकी पक्ष के अनुसार जहाज को कई बार चेतावनी दी गई, लेकिन निर्देशों का पालन नहीं किया गया, जिसके बाद उसके इंजन कक्ष को निशाना बनाकर "प्रिसिजन स्ट्राइक" की गई। 

अमेरिकी अधिकारियों ने यह भी कहा कि कार्रवाई का उद्देश्य जहाज को रोकना था, न कि चालक दल को निशाना बनाना। हालांकि तीन भारतीय नाविकों की मौत के बाद इस दावे पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। हैरत की बात तो यह है कि अब तक अमेरिकी प्रशासन की ओर से सार्वजनिक रूप से औपचारिक माफी या जिम्मेदारी स्वीकार करने की कोई बड़ी घोषणा सामने नहीं आई है। अमेरिका अपने कदम को ईरान के खिलाफ चल रही समुद्री नाकेबंदी के प्रवर्तन का हिस्सा बता रहा है। भारत द्वारा कड़ा विरोध दर्ज कराने के बाद भी अमेरिकी पक्ष ने अपने मूल तर्क—नाकेबंदी के उल्लंघन और चेतावनियों की अनदेखी—को ही दोहराया है। 

कूटनीतिक दृष्टि से यह घटना भारत-अमेरिका संबंधों को समाप्त नहीं करेगी, लेकिन यह अवश्य बताएगी कि संकट की घड़ी में अमेरिका, भारत की चिंताओं का कितना सम्मान करता है। यदि अमेरिका पारदर्शिता, जांच और जवाबदेही दिखाता है, तो संबंधों पर प्रभाव सीमित रह सकता है। यदि ऐसा नहीं होता, तो भारत में अमेरिकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग सकते हैं।

# देखा जाए तो इस घटना के बाद कई महत्वपूर्ण सवाल उठे हैं, जिनका जवाब समय के साथ मिलेगा।

पहला, भारत-अमेरिका संबंधों की कठिन परीक्षा: भारत और अमेरिका पिछले दो दशकों में रणनीतिक साझेदार बने हैं, लेकिन भारतीय नागरिकों की मौत ने इस रिश्ते के सामने एक संवेदनशील चुनौती खड़ी कर दी है। नई दिल्ली ने अमेरिकी राजनयिक को तलब कर अपनी "गहरी चिंता" व्यक्त की है। इससे यह स्पष्ट है कि भारत अपने नागरिकों की सुरक्षा के मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से भी कड़ा रुख अपनाने को तैयार है। 

दूसरा, हिंद महासागर और खाड़ी क्षेत्र में बढ़ता सैन्य जोखिम: यह घटना दर्शाती है कि पश्चिम एशिया का संघर्ष अब केवल अमेरिका-ईरान तक सीमित नहीं रहा। अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाज और उन पर काम करने वाले नागरिक भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। ओमान और होर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा हैं; यहां अस्थिरता वैश्विक समुद्री सुरक्षा के लिए खतरा है। 

तीसरा, भारतीय समुद्री कर्मियों की सुरक्षा बड़ा मुद्दा: भारत दुनिया के सबसे बड़े समुद्री मानव संसाधन प्रदाताओं में से एक है। लाखों भारतीय नाविक अंतरराष्ट्रीय जहाजों पर कार्यरत हैं। लगातार भारतीय चालक दल वाले जहाजों पर हमले होने से भारतीय नाविकों की सुरक्षा, बीमा लागत और रोजगार परिस्थितियों पर असर पड़ सकता है। 

चौथा, ऊर्जा बाजार पर प्रभाव: भारत अपनी तेल आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आयात करता है। यदि होर्मुज़ क्षेत्र में तनाव और बढ़ता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, शिपिंग लागत में वृद्धि और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव देखने को मिल सकता है। 

पांचवां, अंतरराष्ट्रीय कानून और समुद्री स्वतंत्रता पर बहस:
अमेरिका का दावा है कि संबंधित जहाज ईरानी तेल परिवहन कर रहे थे और उसकी नाकेबंदी का उल्लंघन कर रहे थे, जबकि जहाज प्रबंधन ने इन आरोपों को खारिज करते हुए स्वतंत्र जांच की मांग की है। इससे अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून, नौवहन की स्वतंत्रता और सैन्य बल के प्रयोग की वैधता पर नई बहस शुरू हो सकती है।

छठा, भारत की संभावित रणनीतिक प्रतिक्रिया: भारत संभवतः तीन स्तरों पर सक्रिय होगा- प्रभावित परिवारों और नाविकों की सहायता। अमेरिका से जवाबदेही और जांच की मांग। खाड़ी क्षेत्र में भारतीय जहाजों की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना। 

चूंकि भारत के लिये यह एक राजनीतिक और भावनात्मक प्रश्न है, जिसका उत्तर संतुलित दृष्टि से देखना चाहिए। क्योंकि अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में भारतीय नागरिकों की मृत्यु हुई है, तो स्वाभाविक रूप से भारत में यह सवाल उठेगा कि "जब भारत और अमेरिका रणनीतिक साझेदार हैं, तो भारतीय नागरिकों की सुरक्षा क्यों सुनिश्चित नहीं हुई?" ऐसे मामलों में मित्रता की कसौटी केवल साझा बयान नहीं, बल्कि जवाबदेही, पारदर्शी जांच और पीड़ितों के प्रति न्याय होती है। इसलिए सवाल केवल "यह कैसी मित्रता है?" का नहीं, बल्कि "इस त्रासदी के बाद मित्रता की जिम्मेदारी कैसे निभाई जाती है?" का भी है। यही आने वाले दिनों में भारत-अमेरिका संबंधों की वास्तविक परीक्षा होगी।

राजनीतिक दृष्टि से देखें तो भारत में सबसे बड़ा प्रश्न यही उठ रहा है कि यदि जहाज पर बड़ी संख्या में भारतीय नाविक थे, तो क्या घातक सैन्य कार्रवाई के बजाय कोई वैकल्पिक तरीका अपनाया जा सकता था। यही मुद्दा आने वाले दिनों में भारत-अमेरिका कूटनीतिक वार्ताओं का केंद्र बन सकता है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस घटना की जानकारी अभी मुख्यतः प्रारंभिक रिपोर्टों और आधिकारिक बयानों पर आधारित है। यदि संयुक्त जांच होती है, तो तथ्य और स्पष्ट हो सकते है।

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