आखिर छोटे छोटे दलों को तोड़वाकर भाजपा/कांग्रेस खुद को या गठबंधन को कितना मजबूत बना पाएंगी? (After all, by engineering the split of small parties, how much will the BJP or Congress be able to strengthen themselves or their alliances?)
आखिर छोटे छोटे दलों को तोड़वाकर भाजपा/कांग्रेस खुद को या एनडीए/इंडिया गठबंधन को कितना मजबूत बना पाएंगी?
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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
भारतीय राजनीति में भाजपा या कांग्रेस जैसे बड़े दलों और क्षेत्रीय दलों के संबंध अक्सर सहयोग, प्रतिस्पर्धा और संघर्ष—तीनों पर आधारित होते हैं। यही वजह है कि पहले कांग्रेस द्वारा और अब भाजपा द्वारा छोटे-छोटे क्षेत्रीय और जातीय आधार वाले दलों को अपने साथ मिलाना, उनका विलय कराना या उनके नेताओं को पार्टी में शामिल कराना भारतीय राजनीति की एक महत्वपूर्ण रणनीति रही है।
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वाकई कोई कम, कोई ज्यादा, क्योंकि इसका उद्देश्य केवल सीटें बढ़ाना नहीं, बल्कि विपक्षी सामाजिक समीकरणों को कमजोर करना और अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करना भी होता है। इस यक्ष प्रश्न समुपस्थित है कि आखिर छोटे छोटे दलों को तोड़वाकर भाजपा/कांग्रेस खुद को या एनडीए/इंडिया गठबंधन को कितना मजबूत बना पाएंगी?
देखा जाए तो भारत की बहुदलीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका अभी भी बहुत महत्वपूर्ण है, इसलिए उनकी उपेक्षा करके कोई भी राष्ट्रीय गठबंधन—चाहे एनडीए हो या इंडिया गठबंधन—स्थायी रूप से मजबूत नहीं रह सकता। चाहे भाजपा हो या कांग्रेस हो, दोनों ने अबतक किन किन दलों को तोड़वाया, यह जानना और समझना दिलचस्प है।
मज़ेदार बात तो यह है कि खुद कांग्रेस, जनता पार्टी, जनता दल, जनसंघ जैसे दल भी समय के साथ टूटे या अपना स्वरूप बदलने को अभिशप्त हुए। भाजपा से भी कई नेता निकले, स्वयं का दल बनाये और पुनः भाजपा में लौटने या सियासी अप्रासंगिक होने का जोखिम उठाये। इसलिए अब क्रमशः चर्चा करते हैं:-
सच कहूं तो भाजपा या कांग्रेस ने अब तक किन किन दलों को तोड़वाया, यह विषय राजनीतिक रूप से संवेदनशील है, इसलिए आरोप और स्थापित तथ्य अलग-अलग रखना ज़रूरी है। कहने का तातपर्य यह कि किसी दल के "तोड़े जाने" का दावा अक्सर राजनीतिक आरोप होता है; जबकि कई मामलों में दलों के भीतर पहले से मौजूद नेतृत्व संघर्ष, वैचारिक मतभेद या सत्ता-साझेदारी के विवाद भी बड़ी भूमिका निभाते हैं।
# आइए समझते हैं भाजपा पर लगने वाले प्रमुख आरोप
विपक्षी दल अक्सर आरोप लगाते रहे हैं कि भाजपा ने अपने राजनीतिक विस्तार के लिए विरोधी दलों में विभाजन को प्रोत्साहित किया। जिन प्रमुख मामलों का उल्लेख किया जाता है, उनमें शामिल हैं: पहला, Shiv Sena में 2022 का विभाजन, जिसमें Eknath Shinde के नेतृत्व वाला गुट अलग हुआ। दूसरा, Nationalist Congress Party में 2023 का विभाजन, जिसमें Ajit Pawar का गुट अलग हुआ।
तीसरा, Janata Dal (Secular) के कुछ नेताओं का समय-समय पर भाजपा में जाना। चौथा, पूर्वोत्तर के कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों और उनके विधायकों का भाजपा या एनडीए में शामिल होना। हाल ही में तृणमूल कांग्रेस में हुई टूट के बाद अलग हुए धड़े द्वारा एनडीए को समर्थन देने से इसी बात जज्बात को मजबूती मिलती है। वहीं, शिवसेना यूटीबी में भी एक और टूट हुई और बागी सांसद शिवसेना एकनाथ शिंदे वाले गुट से जा मिले। हालांकि भाजपा का कहना रहा है कि ये निर्णय संबंधित नेताओं, सांसदों और विधायकों के थे तथा दलों के आंतरिक संकटों का परिणाम थे।
# फिर जानते हैं कांग्रेस पर लगने वाले प्रमुख आरोप और उदाहरण के बारे में
कांग्रेस पर भी अपने लंबे राजनीतिक इतिहास में कई बार प्रतिद्वंद्वी दलों या सहयोगी दलों को कमजोर करने के आरोप लगे हैं:- पहला, समाजवादी और जनता परिवार का विखंडन: 1960-90 के दशक के दौरान कांग्रेस पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता था कि वह समाजवादी धड़े और जनता परिवार की विभिन्न इकाइयों के नेताओं को अपने साथ जोड़कर विपक्षी एकता को कमजोर करती रही। दूसरा, वामपंथी और क्षेत्रीय दलों में सेंध: कई राज्यों में कांग्रेस ने क्षेत्रीय दलों के प्रभावशाली नेताओं को पार्टी में शामिल कर अपना आधार बढ़ाने की कोशिश की। यह रणनीति विशेष रूप से आंध्र प्रदेश, असम, अरुणाचल प्रदेश और गोवा जैसे राज्यों में समय-समय पर देखी गई।
तीसरा, तेलुगु देशम और अन्य क्षेत्रीय दल: Telugu Desam Party तथा अन्य क्षेत्रीय दलों के नेताओं को कांग्रेस में शामिल कराने के आरोप विभिन्न कालखंडों में लगते रहे हैं।चौथा, बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी राजनीति में हस्तक्षेप: उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस पर समय-समय पर यह आरोप लगता रहा कि वह क्षेत्रीय दलों के प्रभावशाली नेताओं को आकर्षित कर उनके सामाजिक आधार में सेंध लगाने की कोशिश करती है।
# असल में दल-बदल, विभाजन और पुनर्गठन केवल भाजपा या कांग्रेस तक सीमित नहीं रहे हैं, ये लोग खुद भी टूटे या इनके नेता बिखरे!
जहां तक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की बात है तो असल में दल-बदल, विभाजन और पुनर्गठन केवल भाजपा या कांग्रेस तक सीमित नहीं रहे हैं, बल्कि भारतीय राजनीति में Indian National Congress स्वयं कई बार टूटी। वहीं, Janata Party और उसके उत्तराधिकारी दल भी अनेक बार विभाजित हुए। इसी प्रकार समाजवादी, कम्युनिस्ट और क्षेत्रीय दलों में भी कई टूटें हुईं।
कई बार विभाजन या एकीकरण का कारण बाहरी राजनीतिक दबाव बताया जाता है, जबकि कई बार नेतृत्व संघर्ष, उत्तराधिकार विवाद, वैचारिक मतभेद और सत्ता की राजनीति प्रमुख कारण होते हैं। जनसंघ का जनता पार्टी में विलय और फिर भारतीय जनता पार्टी के अभ्युदय के पीछे भी कुछ ऐसी ही कहानी है। यूपी में पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी, तमिलनाडु के भाजपा नेता रहे अन्नामलाई आदि ने जो किया, या कर रहे हैं, वह सूक्ष्म टूट नहीं तो क्या समझा जाएगा।
निष्कर्षतः यह कह जा सकता है कि भाजपा पर हाल के वर्षों में शिवसेना और एनसीपी जैसे दलों में विभाजन को बढ़ावा देने के आरोप लगे हैं, जबकि कांग्रेस पर अपने लंबे इतिहास में विपक्षी और क्षेत्रीय दलों के नेताओं को साथ लेकर प्रतिद्वंद्वी दलों को कमजोर करने के आरोप लगते रहे हैं। लेकिन अधिकांश मामलों में यह कहना कि किसी दल को केवल एक दूसरी पार्टी ने "तोड़ दिया", राजनीतिक दृष्टि से सरलीकरण होगा; आमतौर पर आंतरिक असंतोष और बाहरी राजनीतिक अवसर—दोनों मिलकर ऐसी परिस्थितियां बनाते हैं।
# जानिए क्षेत्रीय दलों को तोड़वाकर भाजपा को क्या लाभ मिला
सवाल है कि आखिर क्षेत्रीय दलों को तोड़वाकर भाजपा को क्या लाभ मिलता है? तो जवाब होगा कि- पहला, क्षेत्रीय आधार का विस्तार: जिन राज्यों में भाजपा का संगठन अपेक्षाकृत कमजोर रहा, वहां स्थानीय दलों के नेताओं को साथ लेकर वह तेजी से अपनी उपस्थिति बढ़ाती है। उदाहरण के तौर पर बिहार, महाराष्ट्र, हरियाणा और पूर्वोत्तर राज्यों में यह रणनीति दिखाई देती है।
दूसरा, जातीय समीकरणों पर पकड़: छोटे दल अक्सर किसी विशेष जाति या समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं।लिहाजा, ऐसे दलों या नेताओं के भाजपा में आने से या एनडीए में शामिल होकर भाजपा को सहयोग देने से उस समुदाय तक पहुंच बनाने में मदद मिलती है। तीसरा, विपक्ष का विखंडन: जब विपक्षी गठबंधन के घटक दल कमजोर होते हैं, तो भाजपा को सीधा चुनावी लाभ मिल सकता है। चौथा, एनडीए का व्यापक स्वरूप: अधिक सहयोगी दल होने से भाजपा यह संदेश दे सकती है कि उसका गठबंधन राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक समर्थन रखता है।
# लेकिन इसकी कतिपय सीमाएँ भी हैं, जिसे बीजेपी समझती है, सचेत रहती आई है!
लेकिन इसकी सीमाएँ भी हैं। भाजपा इसे बखूबी समझती भी है। इसलिए वह उन्हें अपने साथ रखकर खुद को मजबूत बनाने की रणनीति पर चलायमान रहती है:-पहला, स्थायी वोट ट्रांसफर नहीं होता: कई बार नेता तो पार्टी बदल लेते हैं, लेकिन उनका वोट बैंक साथ नहीं आता।महाराष्ट्र और कुछ अन्य राज्यों में ऐसे उदाहरण देखे गए हैं।
दूसरा, मूल कार्यकर्ताओं में असंतोष: बाहर से आए नेताओं को महत्व मिलने पर पुराने कार्यकर्ता नाराज हो सकते हैं।तीसरा, वैचारिक प्रश्न: भाजपा स्वयं को वैचारिक पार्टी बताती है। इसलिए लगातार दल-बदलुओं को शामिल करने पर उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता पर सवाल उठते हैं।
# आखिर ऐसा करके भाजपा और एनडीए कितना मजबूत होंगे?
सवाल है कि आखिर ऐसा करके भाजपा और एनडीए कितना मजबूत होंगे? इसका उत्तर राज्य-दर-राज्य अलग है। चूंकि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात जैसे राज्यों में भाजपा का मुख्य आधार उसका अपना संगठन है, इसलिए छोटे दलों का योगदान सीमित है। जबकि बिहार, महाराष्ट्र, झारखंड, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में सहयोगी दल और स्थानीय नेता चुनावी सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
यही वजह है कि राष्ट्रीय स्तर पर यह रणनीति भाजपा और एनडीए को अल्पकाल में मजबूत कर सकती है, लेकिन दीर्घकालीन मजबूती का आधार केवल दलों का विलय नहीं बल्कि शासन, संगठन, नेतृत्व और जनसमर्थन ही रहेगा।अलबत्ता राजनीतिक निष्कर्ष यही निकलता है कि भाजपा छोटे दलों को साथ लेकर या उन्हें कमजोर करके अपनी चुनावी शक्ति बढ़ा सकती है, लेकिन भारत जैसे बहुदलीय लोकतंत्र में स्थायी राजनीतिक प्रभुत्व केवल इसी रणनीति से संभव नहीं है।
अंततः जनता का समर्थन, सुशासन, आर्थिक प्रदर्शन और सामाजिक संतुलन ही किसी दल या गठबंधन की वास्तविक ताकत तय करते हैं। छोटे दलों का क्षरण भाजपा को लाभ पहुंचा सकता है, लेकिन इससे भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय आकांक्षाएं और नई राजनीतिक शक्तियां पूरी तरह समाप्त नहीं।
# अब जानिए क्षेत्रीय दलों को तोड़वाकर कांग्रेस को क्या लाभ मिला
सवाल है कि आखिर छोटे छोटे दलों को चकमा देकर, उन्हें तोड़कर कांग्रेस, खुद को या यूपीए-इंडिया गठबंधन को कितना मजबूत बना पाई? पूरक सवाल यह कि क्या अपने सहयोगियों की उपेक्षा करके इंडिया गठबंधन कितना मजबूत बना सकती है? क्योंकि कांग्रेस के संदर्भ में भी यही प्रश्न उतना ही महत्वपूर्ण है जितना भाजपा के संदर्भ में।लिहाजा, कांग्रेस यदि छोटे दलों को कमजोर करके खुद को मजबूत करना चाहे तो क्या क्या लाभ होगा?
चूंकि भारत की सामाजिक और भाषाई विविधता के कारण क्षेत्रीय दलों की प्रासंगिकता सदैव बनी रहती है। इसलिए केवल छोटे दलों को कमजोर कर देने से भाजपा या कांग्रेस का पूर्ण वर्चस्व स्थापित होना आसान नहीं है। यही आज की भी कड़वी सच्चाई है, जो कल भी अक्षुण्ण रहेगी और भाजपा/कांग्रेस के अखंड राज में कील मानिंद चुभती रहेगी। आजाद भारत में तो यही स्थिति महसूस की गई। भविष्य में क्या होगा, कुछ कहने की अपेक्षा दृष्टा बनकर इंतजार करना श्रेयस्कर रहेगा।
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# "राजनैतिकदुनिया डॉट ब्लॉग्स्पॉट डॉट कॉम" वैचारिक क्रांति का अग्रदूत है, इसलिए जनसहयोग अपेक्षित
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