भारत का "इंपोर्ट टू एक्सपोर्ट" मॉडल क्या है? इससे क्या रणनीतिक लाभ मिलेगा?

भारत का "इंपोर्ट टू एक्सपोर्ट" मॉडल क्या है? इससे क्या रणनीतिक लाभ मिलेगा?
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

भारत का "इंपोर्ट टू एक्सपोर्ट" मॉडल मुख्य रूप से चीन जैसे कारोबारी देशों से कच्चे माल या मध्यवर्ती सामान आयात करके उन्हें भारत में प्रोसेसिंग, असेंबली या मैन्युफैक्चरिंग के बाद अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका आदि बाजारों में निर्यात करने पर आधारित है। यह मॉडल व्यापार घाटे के बावजूद भारत को प्रोसेसिंग हब के रूप में स्थापित करने की रणनीति है।

जहां तक इस नूतन मॉडल की व्याख्या की बात है तो यह मॉडल स्मार्टफोन (जैसे ऐप्पल, सैमसंग) और फार्मास्यूटिकल सेक्टरों में प्रमुख है, जहां चीन से इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स या एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडिएंट्स (APIs) आयात होते हैं। भारत इनका मूल्यवर्धन जोड़कर उच्च मूल्य पर निर्यात करता है, जिससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में मजबूती मिलती है। बताया जाता है कि चीन से व्यापार घाटा (लगभग 100 अरब डॉलर से अधिक) होने पर भी यह फायदेमंद है क्योंकि निर्यात मूल्य आयात से कहीं अधिक होता है।

जहां तक इस कारोबारी के नीति लाभार्थी की बात है तो भारतीय निर्यातक उद्योग यथा स्मार्टफोन और फार्मा कंपनियां सबसे बड़ा फायदा उठाती हैं, क्योंकि आयात पर निर्भरता से उनका उत्पादन सस्ता और प्रतिस्पर्धी बनता है। वहीं रोजगार और अर्थव्यवस्था में बढ़ोतरी होती है, क्योंकि प्रोसेसिंग से लाखों नौकरियां पैदा होती हैं, जीडीपी में योगदान बढ़ता है, और विदेशी मुद्रा आय होती है।

लिहाजा भारत सरकार: विदेश व्यापार नीति (FTP) के तहत RoDTEP, EPCG जैसी योजनाएं शुल्क प्रतिपूर्ति और छूट देती हैं, जो निर्यात बढ़ावा देती हैं। हालांकि इस नीति के समक्ष कुछ चुनौतियां भी हैं। भले ही यह मॉडल सफल है, लेकिन चीन पर अत्यधिक निर्भरता जोखिमपूर्ण है, क्योंकि भू-राजनीतिक तनाव आयात बाधित कर सकते हैं। इसलिए केंद्र सरकार आत्मनिर्भर भारत और PLI स्कीम से स्थानीय उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रही है।

जानकार बताते हैं कि भारत का इंपोर्ट टू एक्सपोर्ट मॉडल आयात पर भारी निर्भरता के कारण कई जोखिमों से ग्रस्त है, जैसे व्यापार घाटा और बाहरी झटके। ये नुकसान अर्थव्यवस्था, उद्योगों और करेंसी पर पड़ते हैं। जहां तक प्रमुख जोखिम की बात है तो यह व्यापार घाटा और करेंसी दबाव: आयात निर्यात से अधिक होने से ट्रेड डेफिसिट बढ़ता है। उदाहरणतया अक्टूबर 2025 में $21.8 बिलियन, जो रुपए की कीमत गिराता है और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव डालता है।

वहीं आपूर्ति श्रृंखला बाधा भी यक्ष प्रश्न सरीखा है, क्योंकि चीन जैसे देशों पर निर्भरता से भू-राजनीतिक तनाव (जैसे US टैरिफ या युद्ध) आयात रोक सकते हैं, उत्पादन ठप कर देता है। वहीं बढ़ी लागत यानी उच्च लॉजिस्टिक्स, कस्टम ड्यूटी, ब्याज दरें और पूंजी लागत (चीन-वियतनाम से अधिक) लाभ मार्जिन घटाते हैं। यद्यपि नियामकीय चुनौतियां काफी  जटिल हैं। कतिपय जटिल नियम जैसे IEC, ICEGATE, AD कोड, GST दोहरी वसूली और FIRC दस्तावेज निर्यातकों को परेशान करते हैं। लिहाजा गुणवत्ता मानक पूरा न करने पर बाजार बंद हो जाता है, जबकि एक्सचेंज रेट उतार-चढ़ाव वित्तीय हानि पहुंचाता है। 
जहां तक आर्थिक प्रभाव की बात है तो इससे घरेलू उद्योग कमजोर होते हैं क्योंकि आयात सस्ते सामान से प्रतिस्पर्धा बढ़ाता है। वहीं वैश्विक मंदी या टैरिफ (जैसे US के 50%) निर्यात गिराते हैं, स्टॉक मार्केट अस्थिर होता है। यही वजह है कि भारत के इंपोर्ट टू एक्सपोर्ट मॉडल के जोखिमों को कम करने के लिए सरकार और उद्योग जगत बहुआयामी रणनीतियां अपना रहे हैं। ये उपाय आयात निर्भरता घटाने, विविधीकरण बढ़ाने और घरेलू क्षमता मजबूत करने पर केंद्रित हैं।

वहीं प्रमुख उपाय जैसे आत्मनिर्भर भारत और PLI स्कीम यानी उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं से स्मार्टफोन, फार्मा और इलेक्ट्रॉनिक्स में स्थानीय निर्माण बढ़ रहा है, जिससे चीन जैसे आयात स्रोतों पर निर्भरता कम हो रही है।वहीं आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण के तहत वियतनाम, इंडोनेशिया और अफ्रीकी देशों से वैकल्पिक आयात स्रोत विकसित करना, साथ ही FTAs (फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स) जैसे भारत-ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के साथ समझौते निर्यात बाजारों को सुरक्षित करते हैं।

जहां तक शुल्क राहत और सब्सिडी की बात है तो RoDTEP, EPCG और ड्यूटी ड्रॉबैक योजनाओं से निर्यात लागत घटती है, जबकि इंश्योरेंस और हेजिंग से करेंसी उतार-चढ़ाव का जोखिम कम होता है। वहीं, नीतिगत कदम जैसे सरकार लॉजिस्टिक्स, ईज ऑफ डूइंग सुधार रही है, जैसे ICEGATE डिजिटलीकरण और सिंगल विंडो सिस्टम से नियामकीय जटिलताएं घटा रही है। साथ ही, R&D निवेश से मूल्यवर्धन बढ़ाकर व्यापार घाटे को संतुलित किया जा रहा है।

वहीं दीर्घकालिक रणनीति के तहत घरेलू आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करने के लिए MSME क्रेडिट गारंटी और स्किल इंडिया से रोजगार बढ़ाना शामिल है। ये कदम वैश्विक मंदी या भू-राजनीतिक झटकों से लचीलापन प्रदान करते हैं।

जहां तक इंपोर्ट टू एक्सपोर्ट मॉडल के सफल वैकल्पिक मॉडल की बात है तो यह जानना जरूरी है कि आखिर वो कौन-कौन से हैं, तो यह जान लीजिए कि भारत के इंपोर्ट टू एक्सपोर्ट मॉडल के सफल वैकल्पिक मॉडल वे हैं जो आयात निर्भरता कम करके घरेलू उत्पादन और उच्च मूल्यवर्धन पर जोर देते हैं। ये मॉडल वियतनाम, दक्षिण कोरिया और जर्मनी जैसे देशों से प्रेरित हैं, जहां निर्यात अधिशेष और स्थानीय आपूर्ति श्रृंखलाएं मजबूत हैं।

वहीं, उच्च मूल्यवर्धन मॉडल के तहत आयात के बजाय स्थानीय कच्चे माल से उच्च-तकनीकी उत्पाद बनाकर निर्यात करता है। उदाहरण दक्षिण कोरिया का सेमीकंडक्टर मॉडल, जहां सैमसंग जैसी कंपनियां 70%+ मूल्यवर्धन जोड़ती हैं। वहीं भारत के लिए PLI स्कीम के तहत इलेक्ट्रॉनिक्स में अपनाया जा रहा, जिससे स्मार्टफोन निर्यात बढ़ा है।

इसके अलावा निर्यात-उन्मुख औद्योगीकरण (EOU) मॉडल भी पूरी तरह घरेलू उत्पादन पर आधारित है, ड्यूटी-फ्री आयात सीमित रखते हुए। वहीं, वियतनाम का फोन असेंबली मॉडल भी सस्ते श्रम और FTAs से जुड़ा है जहां सैमसंग का 50%+ उत्पादन करता है, लेकिन आयात केवल 20-30% है। इससे लाभ यानी व्यापार अधिशेष और FDI आकर्षण है। भारत में SEZ इसे अपना रहे हैं।

वहीं, सेवा-आधारित निर्यात मॉडल में माल के बजाय IT, BPM निर्यात, जो शून्य आयात पर निर्भर है। भारत का मौजूदा $250 बिलियन+ सेवा निर्यात, जो माल घाटे को संतुलित करता है। वैकल्पिक यानी जर्मनी का मशीनरी मॉडल, जहां 80% निर्यात घरेलू है।

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