जातिवाद एक वैचारिक कैंसर, इससे अंतरराष्ट्रीय नुस्खे से निबटे भारत
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जातिवाद एक वैचारिक कैंसर, इससे अंतरराष्ट्रीय नुस्खे से निबटे भारत
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
देखा जाए तो भारत में जातिवाद एक राजनीतिक हथियार बन चुका है, क्योंकि राजनीतिक दल वोट बैंक के लिए जाति को भुनाते हैं, जिससे यह वैचारिक रूप से निरंतर मजबूत होता चला आया है। देखा जाता है कि दलगत उम्मीदवार चयन से लेकर नीतियां निर्धारित करने तक में दलीय हुक्मरानों के समक्ष जाति-आधारित प्राथमिकताएं बनी रहती हैं, जो समाज को क्यारियों में बांट देती हैं। इससे सामाजिक वैमनस्य बढ़ता है और राष्ट्रीय एकता कमजोर पड़ती है।
जातिवाद से सामाजिक विभाजन भी मजबूत होता है, क्योंकि जातिवाद बचपन से ही मन में ऊंच-नीच का बीज बोता है, जो छुआछूत और भेदभाव को वैचारिक बनाए रखता है। भारत का संविधान के अनुच्छेद 15 जैसे प्रावधानों के बावजूद, यह शिक्षा, विवाह और रोजगार में फैला रहता है। तभी तो संविधान निर्माता बाबा साहब डॉ. भीम राव आंबेडकर ने इसे समाज का कैंसर माना, जो सुदृढ़ समाज के सपने को बेमानी बनाता है।
जातिवादी सियासी मानसिकता से आर्थिक बाधा भी पैदा होती है क्योंकि जातिगत सोच श्रम की प्रतिष्ठा के विरुद्ध कार्य करती है और अवसरों की असमानता पैदा करती है। विकासशील भारत में यह उत्पादकता घटाती है तथा बाहरी आक्रमणों के समय राष्ट्रीय व सामाजिक एकता तोड़ती है। चूंकि राजनीति ही जातिवाद को पाल-पोस रही है, लिहाजा इसका इलाज मुश्किल हो जाता है।
जहां तक जातिवाद से मुक्ति पाने के लिए समाधान के रास्ते तलाशने की बात है तो जातिवाद के खिलाफ धार्मिक नेताओं, बुद्धिजीवियों और सरकार को एकजुटता दिखाते हुए संयुक्त मुहिम चलानी होगी। वहीं शिक्षा और जनजागरूकता से भी इसे जड़ से मिटाया जा सकता है, अन्यथा यह लोकतंत्र को खा जाएगा।
अनुभव बताता है कि भारत में राजनीतिक दल जातिवाद को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल कर बढ़ावा देते हैं। लिहाजा यह सामाजिक विभाजन को राजनीतिक लाभ में बदल देता है, क्योंकि वोट बैंक रणनीति के लिहाज से यह सटीक गणितीय हल प्रदान करता है। इसलिए दल उम्मीदवार चयन में जातिगत समीकरण बनाते हैं, जहां किसी क्षेत्र की प्रमुख जाति के नेताओं को टिकट देकर वोट सुनिश्चित करते हैं। इससे योग्यता पीछे छूट जाती है और जातीय निष्ठा आगे आती है। उदाहरणस्वरूप, बसपा, सपा, लोजपा, राजद, जदयू जैसी पार्टियां विशिष्ट जातियों को लक्षित कर उभरीं हैं।
प्रायः क्षेत्रीय पार्टियां जातीय गठजोड़ से चलती हैं, इनकी चुनावी घोषणापत्र और नीतियां भी जाति-विशेष के लाभ पर केंद्रित होती हैं, जैसे आरक्षण वादे या सब्सिडी। इसलिए ये दल जातियों के बीच वैमनस्य भड़काते हैं ताकि एक गुट दूसरे गुट के विरुद्ध वोट दे। इससे सामाजिक सामंजस्य कमजोर पड़ता है। वहीं, रणनीतिक मामलों में ये राष्ट्रीय दलों पर हावी हो जाती हैं। भारत में भाजपा और कांग्रेस जैसी पार्टियों की क्षेत्रीय दुविधा समझकर इन्हें आसानी से समझा जा सकता है।
भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय परिवारवाद का मेल भी खतरनाक ट्रेंड बन चुका है, क्योंकि दल विशेष अब जातीय रूप से प्रभावशाली परिवारों को टिकट देकर ही अपना दलगत 'गढ़' बनाते हैं, जहां नाम और जाति ही जीत की गारंटी बन जाती है। हालांकि यह आंतरिक लोकतंत्र को नष्ट करता है और कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ता है। दिलचस्प तो यह कि सभी प्रमुख दल- कांग्रेस, भाजपा, सपा आदि- इसमें लिप्त हैं।
जहां तक जातिवाद के विपरीत प्रभाव की बात है तो ऐसी राजनीति विकास के मुद्दों को दबा देती है और सत्ता को कुछ जातिगत-परिवारों तक सीमित कर देती है। इससे लोकतंत्र कमजोर होता है। उदाहरण स्वरूप, लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, राम विलास पासवान, मायावती, चौधरी देवी लाल, जवाहरलाल नेहरू, एच डी देवगौड़ा, एन टी रामाराव, करुणानिधि, शेख अब्दुल्ला, शरद पवार, करुणानिधि, विजया राजे सिंधिया, माधव राव सिंधिया, बाला साहेब ठाकरे, भैरोंसिंह शेखावत, राजनाथ सिंह, शकुनि चौधरी, उपेंद्र कुशवाहा, जीतन राम मांझी, ओवैसी जैसे ढेर सारे सियासी विकसित हो चुके हैं। ये आपस में इतने घुले मिले रहते हैं कि दूसरे प्रतिभाशाली नेताओं की राह में रोड़ा बनकर खड़े हो जाते हैं।
इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि जातिवाद वाली राजनीति भारत के सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करती जा रही है। यह विकास के बजाय विभाजन को बढ़ावा देकर राष्ट्र निर्माण में बाधा बनती जा रही है। चर्चा तो यहां तक है कि भारतीय जातिवादी संगठन अब अमेरिकी डीप स्टेट, इस्लामिक संगठनों और चीनी खुफिया इकाइयों से गुप्त सांठगांठ करके सामाजिक और राजनीतिक विघटन का कारक बनते प्रतीत हो रहे हैं। ऐसी क्षुद्र जातीय रणनीति समाज को जातिगत क्यारियों में बांट देती है, जिससे पारस्परिक वैमनस्य, हिंसा और छुआछूत का भाव बढ़ता जाता है। इससे राष्ट्रीय एकता कमजोर पड़ती है और सामाजिक-साम्प्रदायिक सद्भाव नष्ट होता है। इससे विकास मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।
भारत में सवर्णों के खिलाफ लक्षित ओबीसी-दलित हमले से इसे आसानी से समझा जा सकता है। इससे आर्थिक हानि होती है क्योंकि योग्यता के बजाय जाति को प्राथमिकता देने से अकुशल नेता सत्ता में आते हैं, जो नीतियां गलत बनाते हैं। इससे संसाधन जाति-विशेष तक सीमित रहते हैं, जिससे समग्र विकास रुक जाता है। फलस्वरूप गरीबी और असमानता बढ़ती है।
जातिवाद से लोकतांत्रिक क्षय होता है, क्योंकि चुनाव जातीय समीकरणों पर टिक जाते हैं, जहां व्यक्ति की बजाय जाति वोटर इकाई बन जाती है। इससे आंतरिक लोकतंत्र मरता है और परिवारवाद पनपता है। इससे शासन की गुणवत्ता गिरती है। इसलिए जातिवाद एक दीर्घकालिक खतरा बन चुकी है। वास्तव में यह दोधारी तलवार बन चुकी है- पार्टियां अल्पकालिक लाभ लेती हैं, लेकिन अंततः स्वयं पर भारी पड़ता है, जैसा बसपा, सपा, राजद, लोजपा आदि के साथ हुआ। इससे समाज और परिवार विशेष का समरसता असंभव हो जाता है।
इसलिए भारत में जातिवादी राजनीति को कम करने के लिए बहुआयामी रणनीति अपनाना बहुत जरूरी है। इसके लिए संसद और सुप्रीम कोर्ट को सजग होना पड़ेगा। क्योंकि जातीय मानसिकता में बदलाव के लिए सामाजिक जागरूकता, कानूनी सुधारों और राजनीतिक इच्छाशक्ति को प्रदर्शित करना होगा, अन्यथा यह असंभव है। खासकर शिक्षा और जागरूकता से भी इसे कम किया जा सकता है।स्कूल के पाठ्यक्रम में समानता, भाईचारा और जातिवाद के हानिकारक प्रभावों को शामिल करने पर भी जातिवाद को कम किया जा सकता है।
वहीं, जनजागरूकता अभियान चलाकर भी युवाओं को योग्यता-आधारित सोच अपनाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। इससे आने वाली पीढ़ी जाति से ऊपर उठेगी।
साथ ही राजनीतिक सुधार से भी जातिवाद की सोच बदलेंगी। इसलिए चुनाव सुधार लाए जाने की भी जरूरत है—जैसे जाति-आधारित वोटिंग पर पाबंदी हो या सभी पार्टियों को जातीय प्रचार रोकने के लिए बाध्य किया जाए।
साथ ही उम्मीदवार चयन में योग्यता को प्राथमिकता देना होगा और पार्टियों के आंतरिक लोकतंत्र को भी मजबूत करना होगा। सर्वजन हिताय की नीतियां अपनाएं।
जातिवाद उन्मूलन के लिए कानूनी कदम उठाना भी जरूरी हैं, क्योंकि अबतक के कदम सवर्ण विरोधी प्रतीत हुए हैं। इसलिए आरक्षण को आर्थिक आधार पर स्थानांतरित करना होगा, न कि केवल जाति पर। वहीं जातिवादी संगठनों व उनके नेताओं के बिगड़ैल बोल पर सख्ती बरतनी होगी। साथ ही कथित धर्मगुरुओं की निगरानी बढ़ाने होंगे, क्योंकि सच्चा धर्मगुरु जातिवाद की धारा में कभी नहीं बहेगा।
वहीं, मीडिया को जातीय भेदभाव वाली रिपोर्टिंग से रोकने के कानून बनाने होंगे।वहीं जातिवाद रोकने हेतु सामाजिक पहल भी जरूरी है। खासकर विवाह, रोजगार और सामुदायिक कार्यक्रमों में जाति-मुक्त माहौल बनाने होंगे। इसके लिए सिविल सोसाइटी और एनजीओ संवाद मंच स्थापित करने होंगे, जहां जातिगत पूर्वाग्रहों पर खुली चर्चा हो।
देखा जाए तो वैश्विक पैमाने पर भी जातिवादी राजनीति को कम करने वाले उपायों—जैसे शिक्षा, कानूनी सुधार और योग्यता-आधारित चयन—को सफलतापूर्वक लागू करने वाले देश सीमित हैं, क्योंकि अधिकांश आधुनिक राष्ट्रों ने ऐतिहासिक रूप से जाति जैसी कठोर सामाजिक संरचना को कभी अपनाया ही नहीं। फिर भी, कुछ देशों ने समान विभाजनकारी कारकों (जैसे नस्लवाद, जनजातिवाद) को राजनीति से हटाने में उल्लेखनीय सफलता पाई है। इस दिशा में अमेरिका, कनाडा, स्वीडन, सिंगापुर से भारत बहुत कुछ सीख सकता है। इसके लिए हमारे नेताओं, नौकरशाहों और न्यायधीशों को राष्ट्रीय हित के दृष्टिगत आगे आना होगा और विवेकसम्मत पहल करनी होगी। अन्यथा देर सबेर जातीय हिंसा भड़केगी ही। या फिर कश्मीर की तरह सवर्ण खासकर ब्राह्मण विरोधी मुहिम पूरे देश में चलना संभाव्य है।
देखा जाए तो अमेरिका में सिविल राइट्स एक्ट 1965 ने नस्लीय भेदभाव को गैरकानूनी बनाया, जिससे राजनीतिक दल नस्ल के बजाय नीतियों पर फोकस करने लगे। शिक्षा और मतदाता जागरूकता अभियानों ने लंबे समय में जाति-नस्ल आधारित वोटिंग को काफी कम कर दिया। जबकि, कनाडा में बहुसांस्कृतिक नीतियों और सख्त एंटी-डिस्क्रिमिनेशन कानूनों ने आप्रवासी-आधारित विभाजन को रोका। फलस्वरूप पार्टियां योग्यता पर टिकट बांटती हैं, न कि जातीय समूहों पर, जिससे सामाजिक एकीकरण मजबूत हुआ।
वहीं, स्वीडन में समानता-केंद्रित शिक्षा पाठ्यक्रम और पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया ने वर्ग/जातीय विभाजन को न्यूनतम किया। राजनीति विकास मुद्दों पर केंद्रित रहती है, क्योंकि सामाजिक कल्याण राज्य ने असमानताओं को कम किया।
जबकि सिंगापुर में कठोर कानूनों (जैसे इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट) और बहुसांस्कृतिक आवास नीतियों ने जातीय राजनीति को दबाया। नेतृत्व योग्यता परीक्षा पर आधारित है, जिससे मेरिटोक्रेसी मजबूत बनी।
इसप्रकार इन देशों ने साबित किया है कि मजबूत कानूनी ढांचा, जनजागरूकता और आर्थिक समानता बिना जातिवादी राजनीति के प्रगति के भी संभव बनाती है। लिहाजा भारत इन्हें अपने हिसाब से अनुकूलित कर सकता है। इससे भारत का भविष्य सदैव उज्ज्वल बना रहेगा। अन्यथा कोहराम मचेगा ही, जिसके तेवर सोशल मीडिया में दिखाई-सुनाई पड़ते हैं, ब्रेक के बाद!
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