आखिर पश्चिम बंगाल को 'महाजंगलराज' से निजात कब और कैसे मिलेगा?
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आखिर पश्चिम बंगाल को 'महाजंगलराज' से निजात कब और कैसे मिलेगा?
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
पश्चिम बंगाल में 'महाजंगलराज' व्याप्त है। इससे कब और कैसे निजात मिलेगी, यक्ष प्रश्न है। वर्ष 2026 के जनवरी महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल की इस स्थिति पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने लोगों से टीएमसी की निर्मम ममता सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वान किया है ताकि पश्चिम बंगाल की सूरत और सीरत दोनों बदला जा सके। उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल के पड़ोसी राज्य बिहार को जंगलराज से मुक्ति दिलाने का श्रेय भाजपा नीत एनडीए गठबंधन में शामिल जदयू की नीतीश सरकार को जाता है। इसलिए पश्चिम बंगाल के लोगों को भी उम्मीद है कि भाजपा सरकार ही उन्हें सुशासन व विकास की गारंटी दे सकती है।
आपको याद होगा कि वर्ष 2019 में संसदीय आमचुनाव केदौरान केंद्रीय चुनाव पर्यवेक्षक रहे बिहार कैडर के 1984 बैच के आईएएस अधिकारी और बिहार के पूर्व मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) अजय वी नायक ने भी जंगलराज सम्बन्धी कुछ बात कही थी। तब उन्होंने चुनाव आयोग के विशेष पर्यवेक्षक के रूप में कार्य करते हुए पश्चिम बंगाल की बदत्तर कानून व्यवस्था की स्थिति की तुलना बिहार के लालू-राबड़ी सरकार के जंगलराज (1990-2005) से की थी।
आईएएस अजय वी नायक ने कहा था कि पश्चिम बंगाल में आज (2019 में) वैसा ही जंगल राज है जैसा
बिहार के लालू प्रसाद-राबड़ी राज में था। उनके कथनों के मुख्य विवरण और उससे संबंधित दृष्टांत तत्कालीन अखबारों में उपलब्ध हैं, जो 20 अप्रैल 2019 को पश्चिम बंगाल में तैनात रहते हुए दिया था। तब अजय नायक ने पत्रकारों से कहा कि पश्चिम बंगाल में कानून व्यवस्था की स्थिति लगभग वैसी ही है जैसी लगभग 10 से 15 साल पहले बिहार में थी।
दरअसल, यही तुलना करते हुए उन्होंने केंद्रीय चुनाव आयोग से पश्चिम बंगाल में विशेष रूप से केंद्रीय बलों की भारी तैनाती की आवश्यकता का उल्लेख किया था, और दो टूक कहा था कि पश्चिम बंगाल के लोगों का राज्य पुलिस पर से विश्वास उठ गया है, जिससे वे सभी मतदान केंद्रों पर केंद्रीय अर्द्धसैनिकबलों की तैनाती की मांग कर रहे हैं।
हालांकि, इसपर प्रतिक्रिया देते हुए तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने उनके बयान की कड़ी आलोचना करते हुए अत्यंत ही अनुचित और पक्षपातपूर्ण बताया था। लगे हाथ उनपर भाजपा/आरएसएस की ओर से काम करने का आरोप लगाते हुए उन्हें पद से हटाने की मांग की थी। उल्लेखनीय है कि हिंसा और धमकियों की खबरों के मद्देनजर चुनाव आयोग द्वारा नायक को बंगाल में 2019 के लोकसभा चुनावों के अंतिम पांच चरणों की निगरानी के लिए नियुक्त किया गया था।
बता दें कि 'महाजंगलराज' एक राजनीतिक शब्द है जो कानून-व्यवस्था की पूर्ण पतन, हिंसा, भ्रष्टाचार और अराजकता की स्थिति को दर्शाता है। यह मूल रूप से बिहार में लालू प्रसाद यादव/राबड़ी देवी के शासनकाल (1990-2005) के लिए प्रयुक्त हुआ था, जहां अपराध, किडनैपिंग और पुलिस की निष्क्रियता आम थी। मसलन, पश्चिम बंगाल राज्य में जिस तरह से राजनीतिक हत्याएं, घुसपैठ और सांप्रदायिक दंगे जारी हैं, जैसा कि नादिया, बेलडांगा और अन्य क्षेत्रों की घटनाओं से स्पष्ट है, महाजंगल राज की स्थिति व्याप्त है। इसलिए इंटेलिजेंस एजेंसियां सिस्टमिक फेलियर की चेतावनी दे रही हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने कानून-व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
आलम यह है कि सूबे में अपराध दर राष्ट्रीय औसत पर है, लेकिन राजनीतिक हिंसा प्रमुख चिंता बनी हुई है। इसलिए भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी और सुकांत मजूमदार का कहना है कि भाजपा सरकार बनने पर ही कानून-व्यवस्था दुरुस्त होगी, निवेश बढ़ेगा। क्योंकि बिहार में भी भाजपा समर्थित जदयू सरकार ने भी ऐसी ही अपेक्षित सफलता पाई हैं। वहीं टीएमसी पर आरोप है कि भाजपा के लोग अल्पसंख्यक तुष्टीकरण और भ्रष्टाचार का मनगढ़ंत आरोप लगाकर स्थिति बिगाड़ रहे हैं। साइबर क्राइम में कमी आई है, लेकिन संपत्ति अपराध जैसे मुद्दे बने हैं।
चूंकि पश्चिम बंगाल में टीएमसी शासन (2011 से 2026) को भाजपा 'महाजंगलराज' कहती है, जिसमें शामिल हैं: पोस्ट-2021 चुनाव हिंसा, जब भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्याएं हुईं, जैसे नादिया और बेलडांगा क्षेत्रों में। वहीं,
संतालपरगना घुसपैठ और सांप्रदायिक दंगे हुए, जिसका लक्ष्य बांग्लादेशी घुसपैठियों को कथित संरक्षण प्रदान करना है। वहीं, कटमनी और सिंडिकेट राज के तहत निर्माण ठेकों पर हिंसा और वसूली बेखौफ होती है। ये घटनाक्रम विपक्षी आरोपों पर आधारित हैं और मुख्यतः पश्चिम बंगाल तक सीमित हैं।
दरअसल, बिहार में भी चंपा बिस्वास बलात्कार कांड (1998-99), जहां आईएएस अधिकारी की पत्नी समेत परिवार पर राजद नेता के बेटे द्वारा दो वर्षों तक बलात्कार करते रहने जैसा जघन्य आरोप लगा। वहीं, जी. कृष्णैया हत्याकांड (1994), जिसमें गोपालगंज डीएम को छोटन शुक्ला अंतिम संस्कार जुलूस में भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला था। वहीं, दुर्दांत अपराधी व बाहुबली मोहम्मद शहाबुद्दीन का राज, जब अपहरण, हत्याएं और न्यायपालिका पर दबाव, जैसे शिल्पी जैन हत्या आदि प्रकरण के बावजूद सत्ता प्रतिष्ठान राजनीतिक कारणों से किंकर्तव्यविमूढ़ बना रहा। यही स्थिति जंगलराज/महाजंगलराज करार दी गई।
यही वजह है कि पश्चिम बंगाल में भी भाजपा इसे टीएमसी शासन की विशेषता बताती है, जहां राजनीतिक हत्याएं, सांप्रदायिक दंगे, घुसपैठ और 'कटमनी' संस्कृति व्याप्त है। तभी तो पीएम मोदी ने जनवरी 2026 में इसे '15 साल का महाजंगलराज' कहा, जो 2026 चुनावों में परिवर्तन का नारा बन गया। जहां तक देश के अन्य राज्यों में इस शब्द के चरितार्थ होने की बात है तो यह मुख्यतः पश्चिम बंगाल के लिए प्रचलित है, लेकिन विपक्षी दलों द्वारा बिहार ( लालू-राबड़ी गठबंधन काल 1990-2005), झारखंड (हेमंत सोरेन काल) और कभी-कभी केरल या तमिलनाडु की हिंसा पर भी प्रयुक्त होता है।
वर्तमान में (जनवरी 2026) पश्चिम बंगाल इसका प्रमुख उदाहरण बना हुआ है। जहां महाजंगलराज से तात्पर्य कानून-व्यवस्था की पूर्ण पतन की स्थिति से है, जहां अपराध, राजनीतिक हिंसा, पुलिस निष्क्रियता और भ्रष्टाचार व्याप्त रहता है। यह शब्द मूल रूप से 1990 के दशक में बिहार में लालू प्रसाद यादव/राबड़ी देवी शासन के लिए गढ़ा गया था।
निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता है, क्योंकि जबतक तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी सरकार राज्य में सत्तारूढ़ रहेगी, तबतक इससे बाहर निकलने की उम्मीद लगभग धूमिल है। आमलोगों की स्थिति दयनीय बनी हुई है। राज्य में राजनीतिक हिंसा, सांप्रदायिक तनाव और कानून-व्यवस्था की खराबी इस कदर व्याप्त है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी इसपर गहरी चिंता जतानी पड़ी। वहीं प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा लगातार टीएमसी की ममता सरकार की कार्यशैली पर हमला बोल रहे हैं। हालांकि इसमें सुधार के लिए कोई निश्चित समयसीमा नहीं है, लेकिन मार्च-अप्रैल 2026 के विधानसभा चुनावों को निर्णायक मोड़ माना जा रहा है।
देखा जाए तो पश्चिम बंगाल में कानून-व्यवस्था सुधारने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के पास सीमित लेकिन स्पष्ट संवैधानिक विकल्प उपलब्ध हैं। लिहाजा राज्य सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होने के बावजूद केंद्र सहायता या हस्तक्षेप कर सकता है। जहां तक राज्य सरकार के विकल्प की बात है तो राज्य सरकार पुलिस सुधार, नई भर्तियां और केंद्रीय योजनाओं का बेहतर उपयोग करके मौजूदा जटिल हालात पर काबू पा सकती है। वहीं प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने के लिए अतिरिक्त जिले गठन या स्थानीय कानून सख्ती से लागू किए जा सकते हैं।
जहां तक केंद्र सरकार के विकल्प की बात है तो यह उसकी जिम्मेदारी भी है। संविधान के अनुच्छेद 355 के तहत केंद्र सरकार राज्य की कानून-व्यवस्था की रक्षा के दायित्व को सुनिश्चित कर सकता है, जिसमें केंद्रीय बल तैनात करना भी शामिल है। वहीं संविधान के अनुच्छेद 249 या 356 जैसे प्रावधानों से राज्य सूची के विषयों पर हस्तक्षेप संभव है, लेकिन हमेशा यह विवादास्पद रहता है और ऐसी कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट भी एक्टिव हो जाता है।
इसलिए केंद्र सरकार और राज्य सरकार के लिए बेहतर स्थिति होगी कि परस्पर सहयोगी उपाय किए जाएं। केंद्र-राज्य समन्वय परिषद या आयोग के माध्यम से संयुक्त नीतियां बनाई जा सकती हैं, जैसा सरकारिया आयोग ने सिफारिश की। चुनाव पूर्व केंद्रीय एजेंसियां सक्रिय हो सकती हैं। चूंकि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव मार्च-अप्रैल 2026 में अपेक्षित हैं, क्योंकि मौजूदा सदन 7 मई 2026 को समाप्त होगा। इसलिए भाजपा इसे 'महाजंगलराज' खत्म करने का एक अवसर बता रही है, जबकि टीएमसी एसआईआर जैसे मुद्दों पर केंद्र को घेर रही है। खैर पूरा परिणाम टीएमसी की सत्ता पर निर्भर करेगा।
इस प्रकार देखा जाए तो सन 2026 में भी पश्चिम बंगाल की स्थिति कमोबेश लगभग वही यानी बिहार के जंगलराज मानिंद है या उससे भी ज्यादा है। तभी तो पीएम ने महाजंगलराज बताया है। हाल के वर्षों की घटनाएं इस बात की चुगली करती है कि पश्चिम बंगाल की स्थिति लगभग पूरी तरह बिगड़ चुकी है। सवाल उठता रहता है कि क्या मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल को भारत का अंग मानती हैं या नहीं! क्या वह भी ग्रेटर बंगलादेश का कूटनीतिक टूल्स बनना चाहती हैं? अब यह तय करना संसद या सुप्रीम कोर्ट के हाथों में है, जिसे स्वतः संज्ञान लेना चाहिए।
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