जैविक हथियार क्या है? इसके दुरूपयोग की आशंकाओं से भारत जैसा विकासशील देश क्यों चिंतित हैं?
जैविक हथियार क्या है? इसके दुरूपयोग की आशंकाओं से भारत जैसा विकासशील देश क्यों चिंतित हैं?
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
जैविक हथियार ऐसे हथियार होते हैं जिनमें विस्फोटक के बजाय वायरस, बैक्टीरिया, फंगस या विषाक्त जैविक एजेंटों का उपयोग किया जाता है। इन हथियारों का उद्देश्य लोगों, जानवरों या पौधों में जानलेवा बीमारियां फैलाना होता है, जिससे बड़ी संख्या में मौतें, विकलांगता और सामाजिक-आर्थिक तबाही हो सकती है। स्पष्ट है कि जैविक हथियार बिना धमाके के भी बड़ी तबाही करते हैं और ये कम समय में व्यापक क्षेत्र में प्रभाव डाल सकते हैं।
जानकारों की मानें तो इतिहास में पहला जैविक हथियार प्रयोग प्रथम विश्व युद्ध में जर्मनी ने किया था, और बाद में द्वितीय विश्व युद्ध में जापान ने भी इसका इस्तेमाल किया था। आज भी अमेरिका, रूस, चीन और अन्य कई देश जैविक हथियारों के संभव भंडारण और अनुसंधान में संलग्न हैं, हालांकि इन हथियारों की वास्तविक उपस्थिति का खुलासा आमतौर पर नहीं होता है।
भारत सहित दुनिया के अन्य विकाशशील देशों के लिए जैविक हथियार एक गंभीर खतरा हैं क्योंकि ये महामारी फैलाकर जीवन संकट में डाल सकते हैं, स्वास्थ्य प्रणालियों पर दबाव बढ़ा सकते हैं और आर्थिक, सामाजिक अस्थिरता पैदा कर सकते हैं। ऐसा इसलिए कि वैश्विक स्तर पर, जैविक हथियारों का नियंत्रण और रोकथाम चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि इनका दुरुपयोग आतंकवाद, साइंटिफिक प्रयोगों और जैविक आतंक के रूप में हो सकता है।
खासकर भारत जैसे बड़े जनसंख्या वाले देश जहां स्वास्थ्य प्रणाली अभी भी विकासशील है, जैविक हथियार एक राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे के रूप में बहुत गंभीर हो सकते हैं। ऐसे हथियार मानव जीवन की रक्षा, कृषि, पशुपालन और आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करते हैं, इसलिए इनके उपयोग को रोकने के लिए वैश्विक स्तर पर बायोलॉजिकल वेपन्स कन्वेंशन (बीडब्ल्यूसी) जैसी संधियों के साथ कड़े नियंत्रण और निगरानी आवश्यक हैं।
# जैविक हथियारों के प्रयोग के इतिहास पर एक नजर यूँ डालिए
आंकड़े बताते हैं कि जैविक हथियारों का प्रयोग इतिहास में कई बार हुआ है, जिनमें प्रमुख घटनाएँ इस प्रकार हैं:- पहली, सन् 1347 में मंगोलियाई सेना ने काफा (वर्तमान यूक्रेन के फ्यूडोसिया) के तट पर प्लेग (ब्लैक डेथ महामारी) से संक्रमित शव फेंके थे, जिससे यूरोप में करोड़ों लोगों की मौत हुई। दूसरी, 1710 में स्वीडन-रूस युद्ध में रूस की सेना पर प्लेग संक्रमित शवों का प्रयोग हुआ।
तीसरी, 1763 में ब्रिटेन ने फोर्ट पिट (पिट्सबर्ग) में डेलावेयर इंडियन लोगों पर चेचक वायरस से संक्रमित कंबल फेंके।
चौथी, प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) के दौरान जर्मनी ने एंथ्रेक्स और ग्लैंडर जैसे जीवाणुओं के जरिए जैविक हथियारों का सीमित इस्तेमाल किया। पांचवीं, दूसरे विश्व युद्ध में जापान ने चीन के खिलाफ टाइफाइड जैसे वायरस का प्रयोग किया। छठी, 1980 के दशक में ओशो के अनुयायियों ने अमेरिका में सालमोनेला बैक्टीरिया का उपयोग कर राजनीतिक वर्चस्व हासिल करने के लिए भोजन और पानी प्रदूषित किया।
हालांकि 1925 में जेनेवा प्रोटोकॉल में जैविक हथियारों पर प्रतिबंध लगा दिया गया, लेकिन बाद के वर्षों में कई देशों ने जैविक हथियारों के शोध और भंडारण कार्यक्रम जारी रखे, जिससे वैश्विक सुरक्षा को खतरा बना हुआ है। वर्तमान में दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जैविक हथियारों के आतंकवादी और राज्यस्तरीय उपयोग की आशंकाएं बनी हुई हैं।लिहाजा, भारत ने सोमवार को अनिश्चित अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा माहौल को देखते हुए जैविक हथियारों के संभावित दुरुपयोग पर रोक लगाने के लिए एक वैश्विक तंत्र की जरूरत बताई है।
# जैविक हथियारों की चुनौतियों से निपटने के लिए एक स्पष्ट खाका तैयार करने की है जरूरत : जयशंकर
भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने जैविक हथियारों की चुनौती से निपटने के लिए एक स्पष्ट खाका तैयार करने की जरूरत पर बल दिया है। उन्होंने दो टूक कहा कि सरकार से इतर तत्वों द्वारा जैविक हथियारों का ‘‘दुरुपयोग’’ किया जाना अब दूर की बात नहीं है और ऐसी चुनौती से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग जरूरी है। विदेश मंत्री श्री जयशंकर ने जैविक हथियार संधि (बीडब्ल्यूसी) की 50वीं वर्षगांठ पर आयोजित एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए ऐसा कहा।
उन्होंने आगे कहा कि ‘‘जैविक आतंकवाद एक गंभीर चिंता का विषय है, जिसके लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को पूरी तरह से तैयार रहना होगा। हालांकि, बीडब्ल्यूसी में अब भी बुनियादी संस्थागत ढांचे की कमी है।’’ उन्होंने यहां तक कहा, ‘‘इसमें कोई अनुपालन प्रणाली नहीं है, कोई स्थायी तकनीकी संस्था नहीं है और नए वैज्ञानिक घटनाक्रमों पर नजर रखने के लिए कोई तंत्र नहीं है। भरोसा मजबूत करने के लिए इन खामियों को दूर करना आवश्यक है।’’
विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि भारत ने लगातार बीडब्ल्यूसी के अंदर मजबूत अनुपालन उपायों की मांग की है, जिसमें आज की दुनिया के अनुरूप सत्यापन भी शामिल है। उन्होंने कहा, ‘‘भारत शांतिपूर्ण इस्तेमाल के उद्देश्य से सामग्री और उपकरणों के आदान-प्रदान को संभव बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग एवं मदद का मदद का समर्थन करता है।’’उन्होंने पुनः कहा, ‘‘हमने वैज्ञानिक और तकनीकी विकास की व्यवस्थित समीक्षा की मांग की है ताकि शासन वास्तव में नवाचार की गति के साथ तालमेल बिठा सके।’’
भारत चाहता है कि जैविक हथियारों के हमले से बचाव के लिए सबसे महत्वपूर्ण कदम वैश्विक और राष्ट्रीय निगरानी प्रणालियों को मजबूत करना है ताकि किसी भी संदिग्ध जैविक प्रकोप का शीघ्र पता लगाया जा सके। इसके अलावा, स्वास्थ्य प्रणाली को सशक्त बनाना आवश्यक है ताकि जल्दी से जल्दी निदान, इलाज और संक्रमण नियंत्रण किया जा सके।
# जैविक हथियार के सम्भावित हमले की स्थिति में ऐसे करें से बचाव
जैविक हथियार हमले से बचाव के मुख्य उपाय निम्नलिखित हैं:- पहला, व्यक्तिगत स्वच्छता और हाथ धोने जैसे सामान्य स्वच्छता प्रथाओं का पालन करना। दूसरा, संदिग्ध संक्रमण के खिलाफ वैक्सीनेशन और प्राथमिक उपचार की तैयारी। तीसरा, सार्वजनिक स्थानों पर सतर्कता बढ़ाना, और ऐसे स्थानों की हवा, पानी और भोजन की नियमित जाँच। चतुर्थ, बायोसुरक्षा स्तर वाले लैब में शीघ्रता से रोगों की पहचान तथा दवाइयों का विकास और वितरण।पंचम, संक्रमण फैलने पर तत्काल घर के अंदर रहकर और सार्वजनिक संपर्क सीमित करके रोकथाम सेल्फ।
छठा, श्वसन सुरक्षा के लिए हेपा (HEPA) फिल्टर मास्क और बॉडी प्रोटेक्शन सूट का उपयोग। सातवां, सरकारी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बचाव हेतु बायोलॉजिकल वेपन्स कन्वेंशन (बीडब्ल्यूसी) जैसी संधियों के अधीन जैविक हथियारों के दुरुपयोग को रोकना। आठवां, अंतरराष्ट्रीय सहयोग से जांच, निगरानी और बायोसुरक्षा का समन्वय बढ़ाना। नवम, सिंथेटिक बायोलॉजी प्रयोगों को नियंत्रित करने के सख्त नियम बनाना और वैज्ञानिक अनुसंधान में पारदर्शिता होना।
इस प्रकार, जैविक हथियारों के हमले से बचाव के लिए प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य तंत्र, जागरूकता, और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से व्यापक रणनीति अपनाना आवश्यक है, ताकि किसी भी हमले के प्रभाव को न्यूनतम किया जा सके। क्योंकि जैविक हथियारों का संभावित दुरुपयोग व्यापक और गंभीर हो सकता है। इनमें जानबूझकर मनुष्यों, जानवरों या पौधों में रोग फैलाने वाले सूक्ष्मजीवों या विषाक्त पदार्थों का इस्तेमाल कर व्यापक बीमारियों, मृत्यु, आर्थिक नुकसान और सामाजिक उथल-पुथल मचाना शामिल है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि ऐसे हथियार आतंकवादी, राज्य या गैर-राज्य अभिनेताओं द्वारा जैविक आतंकवाद के रूप में इस्तेमाल हो सकते हैं, जिससे मानव स्वास्थ्य, राष्ट्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय स्थिरता को खतरा होता है।
# जैविक हथियारों के दुरुपयोग के संभावित रूप को ऐसे समझिए
जैविक हथियारों के दुरुपयोग के संभावित रूप इस प्रकार हैं:-पहला, संक्रमित एजेंटों को हवा, भोजन, पानी या कीटों के माध्यम से फैलाना जिससे महामारी फैल सकती है। दूसरा, जैविक एजेंटों का आतंक फैलाने के लिए जैसे पोस्ट या सार्वजनिक स्थानों पर भेजना, जैसा कि 2001 में एंथ्रेक्स मौजूद है।
तीसरा, जैविक हथियारों के उपयोग से अकस्मात संक्रमण का खतरा भी रहता है, जो प्रयोगशाला में ही रिसर्चर को संक्रमित कर बाहर फैल सकता है। जहां तक इसके प्रभाव और खतरे की बात है तो वह जानलेवा बीमारियाँ फैलाना, जिससे लाखों लोगों की मृत्यु हो सकती है। वहीं, कृषि एवं पशुपालन क्षेत्र को भी नुकसान पहुंचाना, जिससे खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो। इसके अलावा, सामाजिक भय और आर्थिक बंदिशें, जैसे कि व्यापार एवं यात्रा प्रतिबंध। यही नहीं, बीमारियों के प्रति विकसित दवाइयों या टीकों को बेअसर करने वाली वायरस या जीवाणु तैयार करना, जो बचाव को और कठिन बना देंगे।
# अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बायोलॉजिकल वेपन्स कन्वेंशन (बीडब्ल्यूसी) जैसे संधि के तहत रोकथाम और निगरानी के उपाय हैं अतिआवश्यक हैं, ताकि स्वास्थ्य प्रणालियों को किया जा सके सशक्त
जैविक हथियारों के रोकथाम और नियंत्रण के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बायोलॉजिकल वेपन्स कन्वेंशन (बीडब्ल्यूसी)जैसे संधि के तहत रोकथाम और निगरानी के उपाय अतिआवश्यक हैं। ताकि स्वास्थ्य प्रणालियों को सशक्त बनाकर किसी भी संदिग्ध जैविक हमले का शीघ्र पता लगाना आसान हो जाए।
वहीं, इस बाबत व्यापक और पारदर्शी वैज्ञानिक अनुसंधान और नियंत्रण नियम बनाना भी जरूरी है ताकि जैविक हथियारों के दुरुपयोग पर अंकुश लगाया जा सके। इस प्रकार, जैविक हथियारों का दुरुपयोग न केवल मानव जीवन के लिए बल्कि वैश्विक सुरक्षा के लिए भी गंभीर और बढ़ते खतरे का संकेत है, जिसका मुकाबला करने के लिए वैश्विक सहयोग और कड़े नियम आवश्यक हैं।
# जैविक हथियार से फैलने वाले संक्रमण का पता लगाने और तेज़ निदान के विभिन्न प्रभावी तरीके, जो करते हैं
संक्रमण के स्रोत का शीघ्र और सटीक पहचान
संक्रमण का पता लगाने और तेज़ निदान के कई प्रभावी तरीके हैं जो संक्रमण के स्रोत का शीघ्र और सटीक पहचान करने में मदद करते हैं, जिससे जल्दी उपचार शुरू किया जा सके। संक्रमण का पता लगाने के मुख्य तरीके इस प्रकार हैं:- पहला, शारीरिक परीक्षण: डॉक्टर लक्षणों जैसे बुखार, थकान, खांसी आदि की जाँच करते हैं और प्रभावित क्षेत्र का निरीक्षण करते हैं। दूसरा, प्रयोगशाला परीक्षण: इसमें रक्त, मूत्र, गले या अन्य शरीर के तरल पदार्थ से नमूने लेकर सूक्ष्मजीवों की पहचान की जाती है। इसमें पीसीआर (पॉलीमरेज़ चेन रिएक्शन) जैसे आणविक परीक्षण शामिल हैं, जो व्यापक रूप से वायरस और बैक्टीरिया की आनुवंशिक सामग्री की पहचान करते हैं। ये परीक्षण तेज़ और बहुत सटीक होते हैं। तीसरा, पॉइंट-ऑफ-केयर डिवाइस: हैंडहेल्ड डायग्नोस्टिक किट मिनटों में संक्रमण का पता लगाने में सक्षम होती हैं, खासकर दूरदराज इलाकों में।
चतुर्थ, नेक्स्ट-जेनरेशन सीक्वेंसिंग (NGS): यह तकनीक अज्ञात या नए रोगाणुओं की पहचान में मदद करती है, जो तेजी से नए संक्रमणों के प्रभावी प्रबंधन के लिए जरूरी है।पंचम, इमेजिंग टेस्ट: एक्स-रे, सीटी स्कैन या एमआरआई का उपयोग संक्रमण के बायोफिजिकल प्रभावों जैसे फेफड़ों में संक्रमण का पता लगाने के लिए किया जाता है।छठा, एंटीजन और एंटीबॉडी परीक्षण: ये संक्रमण का तेजी से पता लगाने में सहायक होते हैं, जहां एंटीजन टेस्ट संक्रमण को सीधे पहचानता है और एंटीबॉडी टेस्ट संक्रमण के खिलाफ शरीर की प्रतिक्रिया मापता है।
जानकारों के मुताबिक, ये तकनीकें न केवल संक्रमण का शीघ्र पता लगाती हैं, बल्कि उनकी गंभीरता और प्रकार की सटीक जानकारी भी प्रदान करती हैं जिससे संक्रमण को प्रभावी तरीके से नियंत्रित और रोका जा सके। इससे स्वास्थ्य सेवा प्रदाता समय रहते उचित उपचार शुरू कर सकते हैं और महामारी के फैलाव को रोक सकते हैं
# जैविक हथियारों के सबसे सामान्य एजेंट में मुख्य रूप से वायरस, बैक्टीरिया, और विषैले सूक्ष्मजीव से सावधान रहिए
बता दें कि जैविक हथियारों के सबसे सामान्य एजेंट में मुख्य रूप से वायरस, बैक्टीरिया, और विषैले सूक्ष्मजीव शामिल होते हैं जो जानलेवा बीमारियां फैला सकते हैं। कुछ प्रमुख जैविक एजेंट इस प्रकार हैं: पहला, वेरियोला वायरस (Smallpox): यह चेचक बीमारी का कारण होता है, जो अत्यंत संक्रामक और घातक है। दूसरा, बायसेवेरा ऐंथ्रेक्स (Bacillus anthracis): यह एंथ्रेक्स रोग का कारण बनता है, जो त्वचा, फेफड़े और आंतों को प्रभावित कर सकता है। तीसरा, यर्सिनिया पेस्टिस (Yersinia pestis): प्लेग या महमूरी का जीवाणु, जो इतिहास में महामारी का कारण बना।
चतुर्थ, बोटुलिनम टॉक्सिन: यह सबसे जहरीला जीवाणु विष है, जो न्यूरोटॉक्सिन के रूप में काम करता है।पंचम, रेबिज वायरस (Rabies virus): पशुओं और मनुष्यों में फैलने वाला वायरस। षष्टम, वायरल हेमोरेजिक फीवर वायरस (जैसे ईबोला, मारबर्ग वायरस): जिनसे खून बहने वाली घातक बीमारियां होती हैं। अष्टम, निपाह वायरस और हैन्टा वायरस: ये उभरते वायरस हैं जो गंभीर संक्रमण कर सकते हैं।
जानकारों के मुताबिक, ये एजेंट एरोसोल, भोजन, पानी या सीधे संपर्क के माध्यम से फैल सकते हैं और बड़े जनसंख्या समूहों के लिए खतरनाक साबित होते हैं। जैविक हथियारों में इन एजेंटों का प्रयोग महामारी फैलाने, कृषि और पशुपालन को प्रभावित करने के लिए भी किया जा सकता है, जिससे व्यापक सामाजिक-आर्थिक क्षति होती है। कहना न होगा कि ऐसी सम्भावित परिस्थिति भारत सहित दुनिया के अन्य देशों के लिए यह खतरा गंभीर है, क्योंकि संक्रमित एजेंटों से व्यापक बीमारी फैल सकती है जो मानव जीवन, स्वास्थ्य सेवाओं, आर्थिक स्थिरता एवं सुरक्षा के लिए घातक साबित हो सकती है। लिहाजा, ऐसे खतरे को कम करने के लिए जैविक हथियारों की रोकथाम, संक्रमण की पहचान, और टीकाकरण जैसे बचाव उपाय आवश्यक हैं। विदेश मंत्री जयशंकर की ताजा टिप्पणी का तातपर्य भी यही है।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें