आखिर आरएसएस को भाजपा के नजरिए से न देखें तो फिर कैसे देखें, बना यक्ष प्रश्न!
आखिर आरएसएस को भाजपा के नजरिए से न देखें तो फिर कैसे देखें, बना यक्ष प्रश्न!
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
मोहन भागवत ने कोलकाता में हाल ही में दिए बयान में कहा कि आरएसएस को भाजपा के नजरिए से देखना बड़ी गलती है, क्योंकि इससे संगठन की सच्ची प्रकृति का गलत अंदाजा लगता है। देखा जाए तो भागवत का यह बयान आरएसएस की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान को राजनीतिक चश्मे से अलग करने के उद्देश्य से आया है। लेकिन इसके सियासी मायने राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय दोनों दृष्टि से अहम हैं। इसलिए देश-दुनिया के पक्ष-विपक्ष में यह बहस छिड़ चुकी है कि आखिरकार भाजपा (पूर्व नाम जनसंघ) के मातृ संगठन समझे जाने वाले आरएसएस को बदलती भाजपा की अवसरवादी नजरिए से न देखें तो आप लोग ही बता दें कि फिर कैसे देखें?
मसलन, भागवत ने स्पष्ट किया है कि आरएसएस का कोई राजनीतिक उद्देश्य नहीं है और इसे न तो केवल सेवा संगठन समझा जाए, न ही भाजपा से जोड़कर। ऐसा उन्होंने इसलिए कहा क्योंकि कई लोग/दल गलती से आरएसएस को भाजपा से सीधे जोड़ते हैं, जबकि संगठन समाज निर्माण और हिंदू एकता पर केंद्रित है। चूंकि कोलकाता कार्यक्रम में बांग्लादेश में हिंदुओं पर हुए हमलों का भी जिक्र किया गया है, इसलिए भागवत के इस बयान का अंतर्राष्ट्रीय महत्व भी है।
भागवत का स्पष्ट कहना है कि आरएसएस को भाजपा का पर्याय मानना संगठन के स्वयंसेवक-आधारित, दीर्घकालिक राष्ट्र निर्माण कार्य को नजरअंदाज करता है। इसलिए उन्होंने जोर दिया कि आरएसएस जैसा कोई दूसरा संगठन नहीं, और जिनकी "दुकानें बंद" होने का डर है, वे इसका विरोध करते हैं। इससे साफ प्रतीत होता है कि भागवत का यह बयान आरएसएस की स्वायत्तता पर जोर देने और इसके बारे में भाजपा विरोधी दलों द्वारा फैलाए जा रहे दुष्प्रचार का माकूल जवाब है।
यही वजह है कि भागवत के इस बयान के कई सियासी मायने निकलते हैं, क्योंकि उनका यह बयान भाजपा-आरएसएस संबंधों पर बहस छेड़ता है, खासकर जब विपक्ष संगठनों को एक-दूसरे का विस्तार बताता है। अपने इस परिवर्तित स्टैंड से जहां आरएसएस अपनी गैर-राजनीतिक छवि मजबूत करता है, जो भविष्य के चुनावों में भाजपा को वैचारिक समर्थन तो देगा लेकिन हस्तक्षेप सीमित रखेगा। वहीं, भाजपा की अंतर्राष्ट्रीय छवि भी निखरती है और उसके इस दावे को बल मिलता है कि वह कोई साम्प्रदायिक पार्टी नहीं है और उस पर हिन्दू सम्प्रदायिकता फैलाने का विपक्षी आरोप निराधार है। इसलिए कहा जा सकता है कि कुल मिलाकर भागवत का यह बयान हिंदुत्व को राजनीति से ऊपर रखने का शाश्वत जनसंदेश है।
उल्लेखनीय है कि भागवत द्वारा कोलकाता में दिया गया यह बयान बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों, पश्चिम बंगाल की चरम सांप्रदायिक तनाव वाली सियासत और आरएसएस-भाजपा संबंधों की अफवाहों के बीच आया है, जो राजनीतिक रूप से संवेदनशील समय पर संघ और भाजपा दोनों की स्वायत्तता रेखांकित करता है। एक तरह से यह बयान 2024 चुनावों के बाद उभरे मतभेदों और भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नवीन की नियुक्ति में आरएसएस की हुई उपेक्षा सम्बन्धी आरोपों का जवाब है, जहां विपक्ष दोनों को एक मानता है और प्रचारित करता है।
जहां तक भागवत के इस बयान के क्षेत्रीय संदर्भ की बात है तो कोलकाता कार्यक्रम में भागवत ने बांग्लादेशी हिंदुओं की स्थिति पर चिंता जताई और बंगाल सरकार को सीमाओं पर सतर्क रहने की अप्रत्यक्ष नसीहत दी। इससे व्याकुल टीएमसी नेता कुणाल घोष ने इसे केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकार पर थोपने का प्रयास बताया, जो बंगाल की सियासत में हिंदू एकता के मुद्दे को तेज करता है। इससे भाजपा को बंगाल में हिंदू वोट एकजुट करने का संकेत मिलता है। इसलिए समझा जाता है कि भागवत के इस बयान से आरएसएस-भाजपा के पारस्परिक सम्बन्धों में गतिशीलता आएगी।
जहां तक भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में नितिन नवीन की नियुक्ति को लेकर आरएसएस की उपेक्षा होने की बात के सियासी हलकों में तैरने का सवाल है, तो भागवत की परोक्ष सफाई बिल्कुल सही समय पर आई है, जिसने स्पष्ट किया है कि संघ राजनीति से अलग एक प्रगतिशील सांस्कृतिक संगठन है, जो सलाह दे सकता है लेकिन फैसले भाजपा के होते हैं। इस प्रकार यह बयान संघ की शताब्दी वर्ष में आंतरिक एकता मजबूत करता है और विपक्षी नैरेटिव को कमजोर करने जैसा है।
स्पष्ट है कि आरएसएस-भाजपा के मतभेद विचारों के हो सकते हैं, लेकिन मनभेद कभी नहीं, जो समन्वय पर जोर देता है। इसलिए उनके इस दृष्टिकोण का दोनों के रिश्तों पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा। साथ ही उनका यह बयान हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को राजनीति से अलग रखने का संदेश देता है, जो आने वाले चुनावों में भाजपा को वैचारिक समर्थन तो देगा लेकिन हस्तक्षेप सीमित रखेगा। इससे संघ की गैर-राजनीतिक छवि मजबूत होती है, जो समाज निर्माण पर केंद्रित रहने का आश्वासन है।
वहीं, कतिपय राजनीतिक विश्लेषकों का मत है कि मोहन भागवत का बयान भाजपा के लिए अप्रत्यक्ष नसीहत है कि वह आरएसएस को केवल चुनावी या वैचारिक समर्थन के रूप में न देखे, बल्कि संगठन की स्वायत्त सांस्कृतिक पहचान का सम्मान करे। इस प्रकार यह भाजपा को चेतावनी देता है कि राजनीतिक फैसलों में तात्कालिक लाभ के बजाय दीर्घकालिक राष्ट्र निर्माण पर ध्यान दे। जहां तक भाजपा की स्वायत्तता का संदेश की बात है तो भागवत ने जोर दिया कि आरएसएस सलाह दे सकता है लेकिन फैसले भाजपा के होते हैं, जो पार्टी को अपनी सीमाओं में रहने का संकेत है। इससे भाजपा को याद दिलाया जाता है कि संघ के स्वयंसेवक व्यक्ति निर्माण पर केंद्रित हैं, न कि सत्ता की मशीन। इसलिए मतभेद विचारों के हो सकते हैं, मनभेद नहीं।
वहीं, मोहन भागवत के बयान के चुनावी निहितार्थ भी स्पष्ट है।यह 2024 चुनावों के बाद उठे मतभेदों के बीच भाजपा को वैचारिक आधार तो देता है लेकिन हस्तक्षेप की अपेक्षा कम करता है। खासकर बंगाल जैसे राज्यों में हिंदू एकता पर फोकस से भाजपा को वोट एकजुट करने का संदेश मिलता है, बिना संघ को राजनीतिक चश्मे से जोड़े। जहां तक उनके बयान के दीर्घकालिक प्रभाव की बात है तो यह भाजपा के लिए साफ संदेश है कि संघ की शताब्दी वर्ष में एकता बनाए रखें, लेकिन सेवा कार्यों और समाज सुधार को प्राथमिकता दें। इससे पार्टी की छवि मजबूत होती है, विपक्षी आरोप कमजोर पड़ते हैं।
इसलिए उम्मीद की जाती है कि मोहन भागवत के बयान से भाजपा नेतृत्व पर सीमित लेकिन रणनीतिक प्रभाव पड़ेगा, जो पार्टी को संघ की स्वायत्तता का सम्मान करने और वैचारिक आधार को मजबूत रखने की याद दिलाएगा। यह नेतृत्व को आश्वस्त करता है कि संघ समर्थन देगा लेकिन हस्तक्षेप नहीं, जिससे 2024 चुनावों के बाद की आलोचनाओं का सामना आसान होगा। जहां तक आंतरिक समन्वय की बात है तो भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा और अन्य नेता इसे संघ की शताब्दी वर्ष में एकता का संदेश मानेंगे, जो संगठनात्मक सुधारों को प्रेरित करेगा।
बहरहाल, भागवत की "सलाह देते हैं, पर फैसले आपके" वाली बात से नेतृत्व को स्वतंत्रता मिलती है, लेकिन सामाजिक कार्यों पर फोकस बढ़ाने का दबाव बनेगा।जहां तक चुनावी रणनीति की बात है तो बंगाल और अन्य राज्यों में हिंदू एकता पर जोर से भाजपा को वोट बैंक मजबूत करने का संकेत मिलेगा, बिना संघ को राजनीतिक चश्मे से जोड़े। इसलिए भरोसा है कि विपक्षी आरोप कमजोर होंगे, जिससे मोदी सरकार की नीतियों पर फोकस बढ़ेगा।जहां तक दीर्घकालिक बदलाव की बात है तो नेतृत्व को समाज निर्माण को प्राथमिकता देकर "हिंदू राष्ट्र" के नैरेटिव को वैचारिक रखना होगा, जो भविष्य के गठबंधनों में मददगार साबित होगा। कुल मिलाकर, प्रभाव सकारात्मक रहेगा लेकिन सत्ता के अहंकार पर अंकुश लगाएगा।
देखा जाए तो मोहन भागवत के बयान के समसामयिक राजनीतिक निहितार्थ भाजपा नेतृत्व के लिए संगठनात्मक समन्वय मजबूत करने और विपक्षी नैरेटिव को कमजोर करने के होंगे, खासकर नितिन नबीन के हालिया कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद। यह नेतृत्व को संघ के साथ सामंजस्य दिखाने का अवसर देता है, जो बंगाल जैसे राज्यों में आगामी चुनावों के लिए जमीनी तैयारी तेज करेगा। जहां तक इस पर संगठनात्मक प्रतिक्रिया की बात है तो भाजपा नेतृत्व तुरंत आंतरिक बैठकों में संघ की स्वायत्तता पर चर्चा करेगा, जिससे जेपी नड्डा या नितिन नबीन जैसी युवा नेतृत्व को वैचारिक मजबूती मिलेगी।
वहीं उनके इस बयान से पार्टी को "आरएसएस नियंत्रित" आरोपों का जवाब मिलेगा, जो संसदीय सत्रों में विपक्ष के हमलों को झेलने में मददगार साबित होगा। जहां तक इसके क्षेत्रीय प्रभाव की बात है तो पश्चिम बंगाल में हिंदू एकता का संदेश तत्काल टीएमसी के खिलाफ प्रचार को गति देगा, जहां भाजपा बूथ मजबूती पर फोकस बढ़ाएगी। केंद्र सरकार बांग्लादेश मुद्दे पर कूटनीतिक रुख कड़ा कर सकती है, जो मोदी नेतृत्व की छवि मजबूत करेगा। जहां तक मीडिया और विपक्ष के बहस की बात है तो मीडिया बहस छेड़ेगा, जिससे भाजपा को स्पष्टीकरण जारी करने पड़ेंगे, लेकिन कुल मिलाकर यह वैचारिक स्पष्टता से पार्टी की एकजुटता का संदेश देगा। इसके तत्कालीन निहितार्थ सकारात्मक रहेंगे, जो 2026 के विधानसभा चुनावों की रणनीति को प्रभावित करेंगे।
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