रूसी राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा से वैश्विक महाशक्तियों की सोच-साजिश दोनों पर पड़ेगा बहुआयामी असर
रूसी राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा से वैश्विक महाशक्तियों की सोच-साजिश दोनों पर पड़ेगा बहुआयामी असर
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
रूसी राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा से वैश्विक महाशक्तियों खासकर अमेरिका, यूरोपीय संघ और चीन आदि की सोच और साजिश दोनों पर गहरा बहुआयामी असर पड़ेगा। साथ ही पुतिन की नई दिल्ली यात्रा से भारत-रूस संबंधों को भी काफी फायदा होगा। इस दौरे के दौरान दोनों देश अपनी रणनीतिक और सैन्य साझेदारी को और मजबूत करेंगे, जिसमें अगली पीढ़ी के Su-57 फाइटर जेट और एडवांस्ड S-500 मिसाइल डिफेंस सिस्टम की खरीद पर चर्चा होगी। इसके अलावा, आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देने के लिए मेगा इंडिया-रूस बिजनेस फोरम का आयोजन होगा, जिससे व्यापार और निवेश के मौके बढ़ेंगे।
अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिज्ञों के मुताबिक, रक्षा सहयोग के अतिरिक्त इस दौरे पर परमाणु ऊर्जा संयंत्र कुडनकुलम के विस्तार और चंद्रयान मिशन में रूस की भागीदारी पर भी समझौते होने की संभावना है। दोनों देश वीजा फ्री यात्रा जैसे नागरिक सुविधाओं पर भी बात करेंगे, जिससे लोगों के बीच संपर्क और बढ़ेगा। इस प्रकार पुतिन की यह भारत यात्रा विश्व स्तर पर बहुपक्षीय व्यवस्था को मजबूत करने, भारत के स्थायी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सदस्यता के समर्थन जैसे वैश्विक मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने की दिशा में भी संकेत है।
एक बात और, वह यह कि आर्थिक स्तर पर 2030 तक 100 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार लक्ष्य को हासिल करने के लिए यह यात्रा सहायक होगी। इस प्रकार, पुतिन के इस दौरे से रक्षा, व्यापार, ऊर्जा, विज्ञान, और कूटनीतिक क्षेत्रों में भारत-रूस साझेदारी को नई गति और दिशा मिलेगी, जो दोनों देशों के लंबे समय से चले आ रहे खास संबंधों को और भी मजबूत करेगा। यह यात्रा दोनों देशों के बीच समग्र सहयोग के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
स्रोतों के अनुसार, इस दौरे के दौरान नए बड़े सौदों से ज्यादा, दीर्घकालिक रणनीतिक सहयोग पर फोकस रहेगा, जो भारत-रूस संबंधों को और मजबूती देगा। वहीं, पुतिन की दिल्ली यात्रा का क्षेत्रीय भू-राजनीति पर महत्वपूर्ण और गहरा प्रभाव होगा। यह यात्रा इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारत अपनी विदेश नीति में स्वतंत्रता और विविध साझेदारी बनाए रखने का प्रयास कर रहा है, खासकर अमेरिकी दबाव के बीच रूस के साथ अपने गहरे सामरिक और आर्थिक संबंधों को बरकरार रखना चाहता है। यह दक्षिण एशिया में भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय नेतृत्व को मजबूत करने में योगदान देगा।
यह यात्रा चीन और अमेरिका दोनों के लिए एक राजनीतिक संदेश भी है कि भारत केवल एक पक्ष के प्रभाव में नहीं है, बल्कि वह वैश्विक और क्षेत्रीय शक्तियों के बीच संतुलन स्थापित करने में सक्षम है। रूस के साथ बढ़ती सहयोगी साझेदारी से भारत को क्षेत्रीय संकटों में बेहतर सहयोग और सुरक्षा गारंटी मिलती है, जो खासतौर पर पाकिस्तान और चीन से सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए महत्वपूर्ण है।
रूस की दृष्टि से, भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी उसे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भी अपना प्रभाव बढ़ाने में मदद करती है, जहां वह चीन के प्रतिस्पर्धी हितों के बीच सामंजस्य खोज रहा है। इस दौरे के माध्यम से भारत-रूस संबंध न केवल द्विपक्षीय होंगे, बल्कि वे व्यापक क्षेत्रीय स्थिरता और बहुपक्षीय कूटनीति को भी प्रभावित करेंगे।
संक्षेप में, पुतिन की भारत यात्रा भारत को दक्षिण एशिया में प्रभावी सामरिक साझेदारी और वैश्विक कूटनीति में स्वतंत्र भूमिका निभाने का अवसर देगी, जो क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और स्थिरता में सुधार लाएगी।
वहीं, पुतिन की दिल्ली यात्रा से भारत-रूस संबंध मजबूत होंगे, लेकिन इससे अमेरिका, चीन और यूरोपीय संघ के साथ भारत की निकटता पर संतुलित और जटिल प्रभाव पड़ेगा। भारत की विदेश नीति बहुपक्षीय और स्वतंत्र है, इसलिए यह रूस के साथ गहरे रणनीतिक और आर्थिक रिश्ते बनाए रखेगा, जिसमें रक्षा, ऊर्जा और प्रौद्योगिकी सहयोग प्रमुख हैं।
हालांकि, रूस और चीन के बढ़ते गठजोड़ से भारत को क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, जिससे उसे अमेरिका और उसके नेतृत्व वाले पश्चिमी गठबंधनों के महत्व को भी अधिक समझना होगा। इस कारण भारत अपनी सुरक्षा और वैश्विक कूटनीति में अमेरिका के साथ मजबूती से काम करता रहेगा, खासकर Indo-Pacific क्षेत्र में।
वहीं, यूरोपीय संघ भी भारत के साथ आर्थिक और तकनीकी सहयोग को बढ़ावा देना चाहता है, जिससे भारत को रूस से निर्भरता घटाने और यूरोपीय बाजारों व निवेश के अवसरों को विकसित करने में मदद मिलेगी। यूरोप इस दिशा में भारत को रूस से दूर लाने की कोशिश भी कर रहा है, लेकिन भारत अपनी जरूरतों को देखते हुए सभी पक्षों से तालमेल बनाए रखेगा।
संक्षेप में, भारत रूस के साथ संबंधों को सुदृढ़ करता रहेगा, लेकिन ये कदम अमेरिका, चीन और यूरोपीय संघ के साथ उसकी निकटता को खंडित नहीं करेंगे, बल्कि यह एक व्यापक बहुपक्षीय रणनीति का हिस्सा होगा जिसमें भारत अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय व वैश्विक महत्व को बनाए रखने पर फोकस करता है। यह बहु-ध्रुवीय संतुलन भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता को और मजबूत करेगा।
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